भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 284

त्रिंशोऽध्यायः (223) — — — — — — — — — — — — — — — — — — रामपूजारतैर्नित्यं सदा सेव्योऽयमञ्जसा। यो जपेल्लक्ष्मणमनुं नित्यमेकान्तमास्थितः।।43।। मुच्यते सर्वपापेभ्यो स कामानश्नुतेऽखिलान्। श्रीराम की पूजा में लीन साधकों को इस मन्त्र का विधानपूर्वक जप करना चाहिए। जो प्रतिदिन एकान्त में रहते हुए लक्ष्मण-मन्त्र का जप करतें हैं वे सभी पापों से मुक्त होकर सभी कामनाओं का भोग करते हैं। मनोवाक्कायकर्मद्यैरत्यन्तैरप्यनेकशः ।।44।। महद्भिरपि पापौघैर्मुच्यते नात्र संशयः। सर्वान् कामानवाप्नोति यान्ति विष्णोः परं पदम्।।45।। मन, वाणी, शरीर और क्रिया से अनेक बार जो महान् पाप किए गये हो उस समूह से पाप मुक्त हो जाता है साधक, इसमें सन्देह नहीं। वह सभी कामनाओं को प्राप्त करता है और विष्णु के परमधाम को चला जाता है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये लक्ष्मणादिपूजनविधिर्नाम त्रिंशोऽध्यायः। एकत्रिंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच पुरोदितस्य मन्त्रस्य प्रयोगानखिलाञ्जसा¹। कथयामि यथाशक्ति सरहस्यं सुविस्तरम्।।1।। प्रयोगायैव मन्त्रोऽयमुपदिष्टोऽथ शार्ङ्गिणा। अर्जुनस्य पुरा सर्गे तेनैव² धनञ्जयः।।2।। दिशो विजित्य सकलाः स कुरून् एक एव हि। प्रातिष्ठिपद्धर्मराजं पैतृके राज्य उत्तमे।।3।। अगस्त्य बोले- पूर्व में कहे गये मन्त्रों के रहस्य के साथ अपनी शक्ति के अनुसार मैं उनके प्रयोगों को विस्तारपूर्वक कहता हूँ। ये मन्त्र इससे पूर्व की सृष्टि में भगवान् विष्णु के द्वारा अर्जुन को प्रयोग करने के लिए ही दिये गये थे और उन मन्त्रों के द्वारा ही अर्जुन ने अकेले ही सभी दिशाओं और कुरुओं को जीत कर धर्मराज युधिष्ठिर को अपने उत्तम पैतृक राज्य में स्थापित किया।

  1. घ. प्रयोगोऽहमञ्जसा। 2. घ. अर्जुनस्य पुरा सम्यगनेनैव धनञ्जयः।