भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 285

(224) अगस्त्य-संहिता

जपप्रधानो मन्त्रोऽयं राज्यप्राप्त्येकसाधनम्। यो जपेन्नियतो मन्त्रं लक्षमेकं समाहितः।।4।। सोऽचिरान्नष्टराज्यं स्वं प्राप्नोत्येव न संशयः। इस मन्त्र में जप की प्रधानता है। यह राज्यप्राप्ति का साधन है। जो नियमपूर्वक एकाग्र होकर इस मन्त्र का एक लाख जप करते हैं, वे शीघ्र ही अपने नष्ट राज्य को प्राप्त करते हैं, इसमें सन्देह नहीं। अभिषिक्तमयोध्यायां ध्यायेद्राममनन्यधीः।।5।। पंचायुतमिदं जप्त्वा नष्टराज्यमवाप्नुयात्। अयोध्या में राज्याभिषिक्त श्रीराम का ध्यान करें और एकाग्र होकर पचास हजार मन्त्र का जप कर अपने नष्ट राज्य को पावें। नागपाशविनिर्मुक्तं ध्यायन्नेकान्त आस्थितः।।6।। जप्त्वायुतं प्रमुच्येत निगडायैस्तदेव हि। नागपाश से विमुक्त श्रीराम का ध्यान करते हुए एकान्त में रहकर दस हजार जप कर बेड़ी के बन्धन से मुक्त हो जाता है। आञ्जनेयसमानीतैरोषधीभिर्गतव्यथम् ।।7।। ध्यायन्नयुतजायेन स्वापमृत्युं जयेन्नरः। हनुमानजी के द्वारा लायी गयी औषधियों के प्रभाव से कष्ट से मुक्त श्रीराम का ध्यान करते हुए दस हजार जप करने से मनुष्य अपनी अपमृत्यु को जीत लेता है। इन्द्रजित्प्राणहन्तारं ध्यायन्नेव समाहितः।।8।। दुर्जयं चापि वेगेन जयेदरिकुलं बहु। मेघनाद का वध करनेवाले श्रीलक्ष्मण का ध्यान करते हुए एकाग्र होकर जप करने से शीघ्र ही बहुत सारे दुर्जय शत्रुओं को जीत लेते हैं। शूर्पणख्याश्च नासाग्रछेदनोद्युक्तमानसम्।।9।। ध्यायन् सहस्रजापेन पुरहूतादिकान् जयेत्। शूर्पणखा की नाक काटने के लिए उन्मुख श्री लक्ष्मण का ध्यान करते हुए एक हजार जप करने से इन्द्र आदि को भी जीत लेते हैं।