भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 286

एकत्रिंशोऽध्यायः (225) रामपादाब्जसेवार्थं कृतद्वारमथ स्मरन् ।।10।। जपन्नयुतमेकान्ते महारोगान् बहून्यपि। क्षयापस्मारकुष्ठादीन्नाशयत्येव तत्क्षणात् ।।11।। श्रीराम के चरणकमल की सेवा करने के लिए द्वार बनाकर अवस्थित श्री लक्ष्मण का ध्यान करते हुए एकान्त में जप करते हुए साधक अनेक महारोगों को जीत लेते हैं। त्रिमासं नियताहारो जपेत् सप्तसहस्रकम्। दिने दिने विधानेन युगपद् विजितेन्द्रियः ।।12।। अष्टोत्तरशतैः पुष्पैः निश्छिद्रैः शतपत्रकैः। पायसं शर्करोपेतं नैवेद्यं विधिवन्मुने।।13।। घनसारसमायुक्तं चन्दनेनावलिप्य च। देवोद्देशेन नित्यं च सम्पूज्यैव द्विजोत्तम ।।14।। कुष्ठरोगात् प्रमुच्येत दुःचिकित्स्यादनेकंशः। दुर्दोषाजा बहुविधा मण्डलादिप्रभेदतः ।।15।। ते सर्वे नाशमायान्ति दुःचिकित्स्या अपि क्षणे। तीन मास तक संयमित भोजन करते हुए प्रतिदिन सात हजार जप विधानपूर्वक कर के साथ साथ छिद्र रहित एक सौ आठ कमल के फूलों से तथा शक्कर के साथ पायस (खीर) नैवेद्य समर्पित कर, कर्पूर के साथ चन्दन से देवता का लेपन कर प्रतिदिन पूजा करके साधक कुष्ठ रोग से मुक्त हो जाता है। अन्य अनेक असाध्य रोग, मण्डल आदि अनेक प्रकार के रोग जो बुरे दोषों से उत्पन्न होते हैं वे सभी क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं। एकान्ते नियताहारः षण्मासान् विजितेन्द्रियः ।।16।। जपन्नेवं विधानेन क्षयरोगात्प्रमुच्यते। एकान्त में संयमित आहार लेकर छह मास तक इन्द्रियों को वश में कर के इस प्रकार जप करते हुए क्षय रोग से मुक्ति मिलती है। मासं पूपादिनैवेद्यैः जपन्मन्त्रं समाहितः ।।17।। वातरोगात्प्रमुच्येत बहुभेदादपि क्षणात्।