अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 287, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(226) अगस्त्य-संहिता एक मास तक पुआ आदि नैवेद्य समर्पित करते हुए एकाग्र होकर जप करने से अनेक प्रकार के बात रोगों से क्षण भर में मुक्ति मिल जाती है। अभिमन्त्र्य जलं नित्यं मन्त्रेण त्रिः समाहितः ।।18।। पीत्वा सन्ध्यासु भक्त्या वै मुच्यते सर्वरोगतः। दारिद्र्यं नाशयित्वा तु श्रियमाप्नोति सुव्रत ।।19।। मूल मन्त्र से अभिमन्त्रित कर प्रतिदिन तीन बार ध्यानस्थ होकर तीनों सन्ध्याओं में भक्तिपूर्वक पीने से सभी रोगों से मुक्ति मिल जाती है। वह अपनी दरिद्रता का नाश कर लक्ष्मी प्राप्त करता है। विषादिदोषसंस्पर्शो न भवेच्च कदाचन। प्रक्षाल्यैवं प्रतिदिनं मुखं भक्त्या समाहितः ।।20।। मुखनेत्रादिसम्भूतान् जयेद्रोगान् सुदारुणान्। पीत्वाभिमन्त्रितं वारि कुक्षिरोगान् जयेद् बहून् ।।21।। उसे विष आदि दोषों का स्पर्श भी नहीं होता। इस अभिमन्त्रित जल से जो प्रतिदिन भक्तिपूर्वक अपने मुख का प्रक्षालन करते हैं, वे मुख। नेत्र आदि के अनेक रोगों की जीत लेते हैं और उस अभिमन्त्रित जल को पीकर कोख सम्बन्धी रोगों को जीत लेते हैं। देवस्य प्रतिमादानं कृत्वा भक्त्या विधानतः। सर्वेभ्योप्यथ रोगेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ।।22।। भक्तिपूर्वक तथा विधानों के साथ देवता की प्रतिमा का दान करनेवाले सभी रोगों से मुक्त हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं। कन्यार्थी चोर्मिलापाणिग्रहणासक्तमानसम्। लक्ष्मणमनुर्जप्त्वा हुत्वा लाजैर्दशांशकम् ।।23।। ईप्सितां प्राप्नुयात् कन्यां शीघ्रमेव तपोधन। पत्नी की इच्छा रखनेवाले साधक उर्मिला का पाणिग्रहण करने के लिए आसक्त चित्त वाले लक्ष्मण का ध्यान कर धान के खील (लाबा) से उसका दशांश हवन कर शीघ्र ही अभीष्ट पत्नी को प्राप्त करते हैं।