भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

एकत्रिंशोऽध्यायः (227) दीक्षितं स्तम्भनास्त्राणां१ मन्त्रेषु नियतव्रतः ।।२४।। संस्मरन् विधिवन्नित्यं मासत्रयममन्यधीः। पूजापुरस्सरं सप्तसहस्त्रं विजितेन्द्रियः ।।२५।। जपन्नखिलविद्यानां तत्त्वज्ञो भवति ध्रुवम्। 'स्तम्भन' नामक अस्त्र के सन्धान में दीक्षित श्रीराम का स्मरण करते हुए नियमपूर्वक, जितेन्द्रिय होकर तीन मास तक पूजन करते हुए मन्त्र का सात हजार जप करता हुआ साधक सभी विद्याओं का तत्त्वज्ञ बन जाता है। विश्वामित्रक्रतुवरे कृताद्भुतपराक्रमम् ।।२६।। ध्यायन्नयुतजापेन भयेभ्यो मुच्यतेऽचिरात् । सन्ध्यां चोपास्य विधिवन्मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् ।।२७।। त्रिकालं नियतो भूत्वा कृतनित्यविधिः स्वयं। दीक्षायुतो यथान्यायं गुर्वनुज्ञापुरस्सरम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो याति विष्णोः परं पदम् ।।२८।। विश्वामित्र मुनि के विशाल यज्ञ में अद्भुत पराक्रम दिखानेवाले श्रीराम का ध्यान करते हुए दस हजार जप करने से सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाते हैं। विधान पूर्वक मूलमन्त्र से तीनों समयों में सन्ध्यावन्दन कर मन्त्रज्ञानी नित्यकर्मों को सम्पन्न कर गुरु की आज्ञा से जप करते हुए सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं तथा विष्णु के परम स्थान को प्राप्त करते हैं। ऐहिकाननपेक्ष्यैव निष्कामो योऽर्चयेद्धरिम्। दीक्षां प्राप्य विधानेन गुरोर्विगतकल्मषात् ।।२९।। आचारनियताद् गृहस्थाद् विजितेन्द्रियात् । तदनुज्ञानमात्रेण पुरश्चर्यां यथाविधिः ।।३०।। स सर्वान् पुण्यपापौघान् जित्वा निर्मलमानसः । पुनरावृत्तिरहितं शाश्वतं पदमवाप्नुयात् ।।३१।। जो अपने आचार में दृढ़, जितेन्द्रिय, निष्पाप गृहस्थ गुरु से दीक्षा प्राप्त कर उनकी आज्ञा से सांसारिक विषयों की कामना न करते हुए हरि की अर्चना करते हैं और विधि के अनुसार पुरश्चरण करते हैं, वे सभी पुण्यों और पापों के समूह को जीतकर निर्मल मन से पुनर्जन्म से रहित शाश्वत स्थान को प्राप्त करते हैं।

  1. घ. जृम्भणास्त्राणां।