अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(228) अगस्त्य-संहिता
सकामो वाञ्छितान् लब्ध्वा भुक्तभोगान् मनोहरान्। जातिस्मरश्चिरं भूत्वा याति विष्णोः परं पदम्।।32।। किन्तु सकाम साधक इस संसार में सभी सुन्दर भोगों को प्राप्त कर अपने जन्म को स्मरण करते हुए विष्णु के परम स्थान को प्राप्त करते हैं। यथा श्रीराममन्त्राणां प्रयोक्तुः पापसम्भवः। तथा न लक्ष्मणमनोः किन्तु यान्ति परां गतिम्।।33।। जिस प्रकार सांसारिक कामना के लिए श्रीराम के मन्त्र का प्रयोग करनेवाले को पाप की सम्भावना हो सकती है, उस प्रकार लक्ष्मण के मन्त्र में पाप की सम्भावना नहीं है, किन्तु वे परम गति को प्राप्त करते हैं। मन्त्रोऽयं ब्रह्मणा पूर्वं तुष्टेन तपसा चिरम्। सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे मह्यं दत्तो हि सादरम्।।34।। प्राचीन समय में ब्रह्मा ने मेरी तपस्या से सन्तुष्ट होकर कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय यह मन्त्र मुझे दिया था। मयाप्युपासितोऽयं वै भक्तियुक्तेन चेतसा। गुरुभक्तिं समालोक्य मामेवास्याकरोदृषिम्।।35।। प्रकाशितो मयाप्यस्मिंल्लोके गुर्वाज्ञया पुनः। मैंने भी भक्तियुक्त मन से इस मन्त्र की उपासना की। तब मेरी गुरु भक्ति से सन्तुष्ट होकर उन्होंने इस मन्त्र का ऋषि मुझे ही बना दिया। फिर मैंने गुरु की आज्ञा से इसे लोक में प्रकाशित किया। उपास्य बहवो लोके मनुमेतदनेकशः।।36।। संप्राप्य वाञ्छितार्थानगमद्धाम वैष्णवम्। अनेन सदृशो मन्त्रो मया दृष्टो न कुत्रचित्।।37।। इस मन्त्र की उपासना कर अनेक लोग इच्छित सांसारिक कामनाओं को प्राप्त कर विष्णु के परम धाम को प्राप्त कर चुके हैं। इसके समान मन्त्र मैंने दूसरा कही नहीं देखा। शैववैष्णवसौरेषु गाणत्येषु वा मुने। केचिन्मुक्त्यर्थमेव स्युः केचिदैहिकसाधनाः।।38।। भुक्तिमुक्तिकरश्चायमेको विजयते परम्।।39।।