अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 290, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वात्रिंशोऽध्यायः (229) शैव, वैष्णव, सौर और गाणपत्य मन्त्रों में से कुछ केवल मुक्ति देनेवाले हैं तथा कुछ केवल सांसारिक कामनाओं के साधक हैं, किन्तु यह मन्त्र भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करनेवाला है, अतः यह परम जयशील श्रेष्ठ है। इत्यस्त्यसंहितायां परमरहस्ये लक्ष्मणादिमन्त्रकथनं नाम एकत्रिशोऽध्यायः ।। 31 ।। द्वात्रिंशोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच सर्ववेदार्थतत्त्वज्ञो ननु निश्चलमानसः। सम्यक् संशिक्षितश्चाहं बहुनापि कृपानिधे ।। 1 ।। त्वया कारुण्यनिधिना पूर्वमज्ञास्तथा जहुः। त्वत्प्रसादेन संजातं ज्ञानं विगतकल्मषम् ।। 2 ।। हे करुणा के सागर! मुनि अगस्त्य! प्राचीन काल में आपकी सहायता से लोगों ने अपने अज्ञान को त्याग दिया था, वह निष्कलुष ज्ञान आपकी कृपा से आज प्रकट हुआ। रामात्मनि परं ब्रह्मण्यासक्तमनसं च माम्। लक्ष्मणे हि तथा रामे किञ्चिद् भेदोऽस्ति नैव हि ।। 3 ।। श्रीराम के स्वरूप परम ब्रह्म मैं आसक्त हूँ, किन्तु अब ज्ञात हुआ कि लक्ष्मण और श्रीराम में किंचिद् भेद नहीं है। हनुमन्मन्त्र इत्युक्तस्त्वया वै मुनिपुङ्गव । तस्यानुष्ठानमेवाहं ज्ञातुमिच्छामि तन्त्रभो ।। 4 ।। त्वयि प्रसन्ने सकलमाचक्ष्वाशु दयानिधे। आपने हनुमान् का जो मन्त्र कहा, उसकी अनुष्ठान-विधि मैं जानना चाहता हूँ। जब आप प्रसन्न हों, तब मुझे यह सबकुछ बतलायें। अगस्त्य उवाच स्मारितः सम्यगेवाहं त्वया श्रद्धावता मुने ।। 5 ।। आञ्जनेयमनुल्लोके भुक्तिमुक्त्यैकसाधनम्। Rarest Archiver