अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 291, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(230) अगस्त्य-संहिता प्रकाशितं शङ्करेण लोकानां हितमिच्छता ।।6।। भूतप्रेतपिशाचादिडाकिनीयक्षराक्षसाः । दृष्ट्वा च प्रपलायन्ते मन्त्रानुष्ठानतत्परम् ।।7।। अगस्त्य बोले- हे मुनि सुतीक्ष्ण! आप तो श्रद्धा से भरे हुए हैं। आपने ठीक ही याद दिलाया कि हनुमान् का मन्त्र इस संसार में भोग और मोक्ष दोनों का अचूक साधन है। संसार का भला चाहनेवाले भगवान् शंकर के द्वारा यह मन्त्र प्रकट किया गया है। मन्त्र के अनुष्ठान में लगे साधक को देखते ही भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी, यक्ष और राक्षस सब भाग जाते हैं। ऋषिरीश्वर एव स्यादनुष्टुप् छन्द उच्यते। हनुमान् देवता प्रोक्तो हं बीजं शक्तिरंतजौ ।।8।। कीलकं हात्रयं प्रोक्तं वेधकं तु हसौ पुनः। हनुमत्प्रीणनं चैव फलमाद्यमुदीरितम् ।।9।। सर्वेप्सितानां दातृत्वमस्यैवास्ति न चान्यतः। इस मन्त्र के ऋषि स्वयं ईश्वर शिव हैं, छन्द अनुष्टुप् है, हनुमान् देवता कहे गये हैं, ‘हं’ यह बीज है और अन्त के दो बीजवर्ण शक्ति हैं। तीन बार ‘हा’ का उच्चारण कीलक है ‘हसौ’ वेधक है। हनुमान् की प्रीति इस मन्त्र का मुख्य फल है। सभी कामनाओं की पूर्ति की शक्ति इसी मन्त्र में है, दूसरे मन्त्र से नहीं होती है। प्रणवं पूर्वमुच्चार्य नमो भगवते पदम्। ङेन्तं प्रकटसंयुक्तं पराक्रमपदं ततः ।।10।। तदाक्रान्तपदोपेतं दिङ्मण्डलमुदीरयेत्। यशोवितानधवलीकृतजगत्त्रितयाय च ।।11 ।। वज्रदेहेति चोक्त्वा हं रुद्रावतारपदं तथा। संबुद्ध्यन्तं पदं लङ्कापुरी दहनमीरयेत् ।।12 ।। उदधिर्ल्लङ्घनं चापि दशग्रीवकृतान्तकः। सीताश्वासनेतिपदमञ्जनीगर्भसम्भव ।।13।। श्रीरामलक्ष्मणानन्दकारिन् कपिसैन्यप्राकारक। सुग्रीवसन्नद्धपदं पर्वतोत्पाटनं तथा।।14।। बालब्रह्मचारिन्निति गम्भीरशब्दपदं तथा। सर्वग्रहविनाशनसर्वज्वरहरं तथा।।15।।