भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 292

द्वात्रिंशोऽध्यायः (231)

डाकिनीविध्वंसनपदं स्ततस्तारमुदीरयेत्। भयहात्रयमुच्चार्य हसावेहि वदत्ततः।।16।। सर्वविषं हर परबलं क्षोभय द्विरुच्चरेत्। सर्वकार्याणि साधयेति तथैवात्र द्विरुच्चरेत्।।17।। हुं फट् स्वाहेति मन्त्रोऽयं मालाख्यः सर्वकामधुक्। पहले प्रणव (ॐ) का उच्चारण कर 'नमो भगवते' यह पद जोड़ें। चतुर्थ्यन्त 'प्रकट' सहित 'पराक्रम' (प्रकटपराक्रमाय) पद जोड़े। तब 'आक्रान्त' पद के साथ 'दिङ्मण्डल' यह पद भी जोड़े। तब 'यशोवितानधवलीकृतजगत्त्रितयाय' यह कहें। 'वज्रदेह' ऐसा कहकर 'हं' और 'रुद्रावतार' भी चतुर्थ्यन्त पद के रूप में कहें। इसके बाद सम्बोधनान्त पद 'लंकापुरीदहन' का उच्चारण करें। तब 'उदधिल्लङ्घन', दशग्रीवकृतान्तक! सीताश्वासन! अञ्जनीगर्भसम्भव! श्रीरामलक्ष्मणानन्दकारिन्! कपिसैन्यप्राकारक! 'सुग्रीवसन्नद्ध', 'पर्वतोत्पाटन', 'बालब्रह्मचारिन्', 'गम्भीरशब्द' 'सर्वग्रहविनाशन', 'सर्वज्वरहर' एवं 'डाकिनीविध्वंसन' पद बोलकर तार (ॐ) का उच्चारण करें। इसके बाद तीन बार 'भयहा' बोलकर 'हसौ' बोलें। तब 'सर्वविषं हर' 'परबलं' कहकर 'क्षोभय' यह दो बार कहें। सर्वकार्याणि के बाद 'साधय' भी दो बार बोलें। इसके बाद 'हुं फट् स्वाहा' यह बोलें। ॐ नमो भगवते प्रकटपराक्रमाय आक्रान्तदिङ्मण्डलाय यशोवितान- धवलीकृतजगत्त्रितयाय वज्रदेहाय हं रुद्रावताराय लङ्कापुरीदहन! उदधिल्लङ्घन! दशग्रीवकृतान्तक! सीताश्वासन! अञ्जनीगर्भसम्भव! श्रीरामलक्ष्मणानन्दकारिन्! कपिसैन्यप्राकारक! सुग्रीवसन्नद्ध! पर्वतोत्पाटन! बालब्रह्मचारिन्! गम्भीरशब्द! सर्वग्रहविनाशन! सर्वज्वरहर! डाकिनीविध्वंसन! ॐ भयहा! भयहा! भयहा! हसौ एहि सर्वविषं हर परबलं क्षोभय क्षोभय सर्वकार्याणि साधय साधय हुं फट् स्वाहा। यह मन्त्र सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है। ॐ नमो भगवते चाञ्जनेयायेत्यङ्गुष्ठाभ्यामुदीरितः।।18।। रुद्रमूर्त्तय इत्येवं तर्जनीभ्यामनन्तरम्। वायुसुतायापि तथा मध्यमाभ्यामपि स्फुटम्।।19।। अग्निगर्भाय च तथानामिकाभ्यां प्रविन्‍यसेत्। रामदूताय च पुनः कनिष्ठिकाभ्यां विचक्षणः।।20।।