भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 337 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 293

(232) अगस्त्य-संहिता ब्रह्मास्त्रनिवारणाय चास्त्रमन्त्रसमीरितः। षडङ्गं च मुने कृत्वा ध्यायेद्देवमनन्यधीः॥२१॥ अब करन्यास कहते हैं। 'ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय' इससे दोनों हाथों के अंगूठे में न्यास कहा गया है। 'रुद्रमूर्तये' इससे दोनों तर्जनी में न्यास करें। 'वायुसुताय' इसका दोनों मध्यमा में स्पष्ट रूप से न्यास करें। 'अग्निगर्भाय' इससे दोनों अनामिका में न्यास करें। तब 'रामदूताय' से दोनों कनिष्ठिका में न्यास करें। 'ब्रह्मास्त्रनिवारणाय' यह अस्त्रमन्त्र कहा गया है। इस प्रकार षडंगन्यास कर एकाग्र होकर भगवान् हनुमान् का ध्यान करें। ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय इत्यङ्गुष्ठाभ्याम्। ॐ नमो भगवते रुद्रमूर्त्तये इति तर्जनीभ्याम्। ॐ नमो भगवते वायुसुताय इति मध्यमाभ्याम्। ॐ नमो भगवते अग्निगर्भाय इत्यनामिकाभ्याम् ॐ नमो भगवते रामदूताय इति कनिष्ठिकाभ्याम् ॐ नमो भगवते ब्रह्मास्त्रनिवारणाय हुं अस्त्राय फट्। स्फटिकाभं स्वर्णकान्तिं द्विभुजं च कृताञ्जलिम्। कुण्डलद्वयसंशोभिमुखाम्भोजं मुहुर्मुहुः ।। २२ ।। स्फटिक के समान चमकते हुए, स्वर्ण के समान कान्तिवाले, दो भुजाओं वाले, अंजलि बाँधे हुए, दो कुण्डलों से शोभित मुखकमल वाले हनुमान् का ध्यान बार बार करता हूँ। अयुतं च पुरश्चर्या रामस्याग्रे शिवस्य वा। पूजां तु वैष्णवे पीठे शैवे वा विदधीत वै ।। २३ । हनुमान् का पुरश्चरण श्रीराम के आगे या शिव के आगे दस हजार मन्त्रों का होता है। पूजा वैष्णव या शैव पीठ पर करें। अवृत्तिभिर्विना नित्यं नक्ताशी विजितेन्द्रियः। क्षुद्ररोगनिवृत्त्यर्थमष्टोत्तरशतं जपेत् ।। २४ ।। जप्त्वा त्रिदिनमेकान्ते तेभ्यो मुच्येत तत्क्षणात्। निराहार न रहकर प्रतिदिन केवल रात्रि में भोजन कर जितेन्द्रिय होकर छोटे छोटे रोगों से छुटकारा पाने के लिए एक सौ आठ बार जप करें। इस प्रकार एकान्त में तीन दिन जप करने से उन रोगों से तत्क्षण मुक्ति मिल जाती है।