अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 294, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वातृंशोऽध्यायः (233) क्षुद्रभूतेऽपि शान्त्यर्थमष्टोत्तरशतं जपेत्।।25।। दिनत्रयमथो जप्त्वा भूतानां मुच्यते भयात्। छोटे-छोटे भूत-प्रेतों का प्रकोप होने पर शान्ति के लिए एक सौ आठ जप करें। तीन दिनों तक इस प्रकार जप कर भूतों-प्रेतों के भय से मुक्त हो जाता है। भूतप्रेतपिशाचादि शान्तयेष्टोत्तरं शतम्।।26।। प्रजप्वैतद्भयान्मुक्तो भवेदेव न संशयः। भूत, प्रेत, पिशाच आदि की शान्ति के लिए एक सौ आठ जप कर उनके भय से मुक्त हो ही जाता है, इसमें सन्देह नहीं। महारोगादिशान्त्यर्थमष्टोत्तरसहस्रकम् ।।27।। जप्त्वा तस्मात् प्रमुच्येत निश्चितं नियताशनः। महान् रोग आदि की शान्ति के लिए एक हजार आठ बार संयमित भोजन करते हुए जप कर उन रोगादि से निश्चित रूप से मुक्त हो जाता है। जयाभिकांक्षिणां राज्ञामस्मादन्यो न विद्यते।।28।। ध्यायन् राक्षसहन्तारमयुतं नियतात्मना। जपनियमवाँश्चैव जयेद् दुर्जयमप्यरीन्।।29।। युद्ध में जीतने की अभिलाषा रखनेवाले राजाओं के लिए इससे भिन्न कुछ भी नहीं है। चित्त एकाग्र कर राक्षसों का वध करनेवाले हनुमान् का ध्यान करते हुए विधिपूर्वक जप करनेवाले साधक दुर्जय शत्रुओं को भी जीत लेते हैं। सन्धानाय तु सुग्रीवं संतारं संस्मरन्नपि। अयुतेनैव बलिना संधिमाप्नोत्यसंशयः।।30।। मैत्री के लिए विशालकाय सुग्रीव को भी हनुमान् के साथ स्मरण करते हुए दस हजार जप करने से बलवान् व्यक्ति के साथ मैत्री हो जाती है, इसमें सन्देह नहीं। लंकाया दाहकं ध्यात्वा जपेदयुतमञ्जसा। शत्रुराष्ट्रं दहेदेव दुग्धाब्धिमपि चानघ।।31।। जयार्थी रिपुसंघानामस्मादन्यो न विद्यते। लंका को जलानेवाले हनुमान् का ध्यान कर दस हजार की संख्या के परिमाण में जप करने से शत्रु के राष्ट्र को तो जला ही देता है बल्कि क्षीर-समुद्र को भी जला डालता है। इस प्रकार विजय प्राप्ति की कामना रखनेवाले जप करें। इसके अतिरिक्त दूसरा साधन नहीं है।
- ग. आवृतीभिर्विना।