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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 337 में से

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पृष्ठ 295

(234) अगस्त्य-संहिता यस्तु गेहे हनूमन्तं सर्वदैव प्रपूजयेत्।।३२।। अर्चयेतेन मन्त्रेण तस्य लक्ष्मीरचंचला। दीर्घमायुर्ल्लभेदेव सर्वतो विजयी भवेत्।।३३।। मायादिभूतसंक्षोभस्तस्य देशे न जायते। नान्यत्साधनमस्त्येव मन्त्रात्तस्माद्धनूमतः।।३४।। चौरादिव्याधिभूतानामयमेव परायणम्। परापहृतराज्यानां¹ घर्षितानां परैः पुनः।।३५।। सन्नाहभाजां युद्धेषु बद्धानां परसैनिकैः। शत्रवः सर्वदा मित्रभावेनैवासते सदा।।३६।। जो अपने घर में इस मन्त्र से प्रतिदिन हनुमान् की पूजा करते हैं उसके घर लक्ष्मी स्थिर होकर रहती है। वह दीर्घायु तो होता ही है, सभी जगत उसकी जीत होती है। माया आदि तथा भूतों का प्रकोप और कफ, पित्त और वायु का दोष नहीं होता। हनुमान् के उस मन्त्र को छोड़कर उनके लिए दूसरा साधन है ही नहीं। चोर, मानसिक सन्ताप, व्याधि और भूतों का भी यहीं पलायनु है। दूसरे ने जिनका राज्य छीन लिया हो या दूसरे ने कुचल डाला हो या जो कवच पहनकर युद्धों में लड़ रहे हों या शत्रु के सैनिकों ने पकड़ लिया हो ऐसे संकट में पड़े लोगों के शत्रु हमेशा मित्र की भाँति व्यवहार करने लगते हैं। शैवानां वैष्णवानां वै षट्कर्मार्त्र प्रदर्शितम् ।।² वैष्णवों एवं शैवों के लिए यहाँ केवल छह कर्म प्रदर्शित किए गये हैं। यात्राकाले हनूमन्तं स्मरन् यस्तु स्वकाद् गृहात्।।३७।। निर्गच्छति स वेगेन इष्टार्थमपि गच्छति। यात्रा के समय जो हनुमान् का स्मरण कर अपने घर से निकलते हैं, वे शीघ्र ही अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँचते हैं। स्वापकाले स्मरन्नित्यं चौरभूतादिकं जपेत्।।३८।। यद्वयं वासुदेवाय हनूमन्तपदन्ततः। फलेति च फलि पदं धगेति धगितेति च।।३९।। आयुरा ख फ डा डे हि सद्यः प्रत्ययकारकः। चतुर्विंशत्यक्षरकोऽमोघमन्त्रोऽयं प्लीहरोगनुत्।।४०।।

  1. ग. पगपद्रतराज्यानां। 2. बंगाल की प्रति में इसी स्थल पर ग्रन्थ की समाप्ति हो जाती है।
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