भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 337 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 296

द्वातत्रिंशोऽध्यायः (235) नागवल्लीदलं चैवमष्टप्रगुणितं शुभम्। वंशजं सकलं स्थाप्य क्रमात् प्लीहोदरोपरि।।41।। जप्त्वारण्योपलाग्नौ च दर्भमुष्टिं प्रजापयेत्। मन्त्रेणानेनाभिमन्त्र्य सप्तवारं तथा पुनः।।42।। तथाभिमन्त्रयेदेवं सप्तभिस्तु विचक्षणः। स्फोटद्वारा भवेत् प्लीहो भस्मीभूतो न संशयः।।43।। सोते समय नित्य हनुमान् का ध्यान करते हुए चौरभूतादि मन्त्र का जप करें। ‘वासुदेवाय हनूमते फल फलि धग धगि आयुराखफडाडे’ इस चौबीस अक्षरों के इस मन्त्र के जप से प्लीहा से ग्रस्त उदर पर रखकर बाँस का पत्ता उसपर क्रम से रखकर जंगली पत्थर से उत्पन्न आग जलाकर एक मूँठ कुश को इस मन्त्र से सात बार गर्म करें और उससे पेट पर सात बार अभिमन्त्रित करें। इससे फोड़ा बनकर प्लीहा भस्म हो जाएगा। इसमें सन्देह नहीं। तारं हकारोऽग्निसमः षड्दीर्घस्वरविन्दुमान्। प्रणवान्ततोऽष्टाक्षरको मूलमन्त्र उदाहृतः।।44।। तारक (ॐ) के बाद अग्नि समान हकार छह दीर्घ स्वरों के साथ बोलें अन्त में पुनः प्रणव (ॐ) बोलें। यह हनुमान् अष्टाक्षर मन्त्र है। ताराद्यं वज्रकायेति वज्रतुण्डेति ह्युद्धरेत्। कपिलपिङ्गलप्रोक्ता ऊर्ध्वकेशं महाबलम्।।45।। रक्तमुखतडिजिह्वा महारौद्रपदं ततः। महादृढप्रहारश्च लंकेश्वरवधाय च।।46।। महासेतुबन्धपदं महाशैलप्रवाह च। गगने चर एह्येहि भगवंस्त्वं महापदम्। बलपराक्रमपदं भैरवाज्ञां जयेति च।।47।। एह्येहि महारौद्र दीर्घपुच्छेन वेष्टय। वैरिणं भञ्जयपदं द्विरुक्तो हं फडन्तकः।।48।। पंचविंशत्याह्यधिकः प्रोक्तो मन्त्रः शताक्षरः। मालाख्योऽयं ज्वरादीनां रोगानामन्तकः स्मृतः।।49।।