भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 297

(236) अगस्त्य-संहिता तार (ॐ) आदि में बोलकर 'वज्रकायं, 'वज्रतुण्ड' कहें। तब 'कपिलपिंगल' यह कहकर 'ऊर्ध्वकेश' और 'महाबल' कहें। 'रक्त मुखतडिज्जिह्वा' कहकर 'महारौद्र' पद कहें। तब 'महादृढप्रहार' और लंकेश्वरवधाय' कहें। इसके बाद 'महासेतुबन्ध' पद कहकर 'महाशैलप्रवाह' कहें। इसके बाद 'गगने चर', एहि एहि, भगवँस्त्वं और 'महा' कहें। तब 'बलपराक्रम' यह कहकर 'भैरवाज्ञां जय' ऐसा कहकर 'एहि एहि महारौद्र दीर्घपुच्छेन वेष्टय' और वैरिणं भञ्जय' यह शब्द बोलकर दो बार 'हुं' कहकर 'फट्' शब्द से अन्त करें। इस प्रकार यह मन्त्र होगा- ॐ वज्रकाय वज्रतुण्ड कपिलपिंगल ऊर्ध्वकेश महाबल रक्तमुखतडिज्जिह्वा महारौद्र महादृढप्रहार लंकेश्वरवधाय महासेतुबन्ध महाशैलप्रवाह गगने चर एहि एहि भगवँस्त्वं महाबलपराक्रम भैरवाज्ञां जय एहि एहि महारौद्र दीर्घपुच्छेन वेष्टय वैरिणं भञ्जय भञ्जय हुं फट् । पचीस पदों से अधिक का यह शताक्षर मन्त्र है, जो ज्वर आदि रोगों का नाश करनेवाला हनुमन् का मालामन्त्र है। आदौ षट्कोणमुद्धृत्य ततो वृत्तं लिखेन्मुने । दलानि विलिखेदष्टौ ततः स्वाच्चतुरस्रकम् ॥ ५० ॥ सर्वलक्षणसंव्यक्तं साध्याख्याकर्मगर्भितम् । ' तद्बीजं विलिखेद् भूयस्तत् क्रोडीकृतमान्मथम् ॥ ५१ ॥ ततस्तत् पंचबीजानि पुनरावर्तयेन्मुने । पुनर्दशाक्षरेणैव तदेव परिवेष्टयेत् ॥ ५२ ॥ षडङ्गानग्निकोणादिकोणेष्वेव क्रमाल्लिखेत् । तथा कोणकपोलेषु ह्रीं श्रीं द्वे विलिखेत्ततः ॥ ५३ ॥ हुं बीजं प्रतिकोणाग्रे केसराग्रेषु च स्वरान् । मालामन्त्रस्य वर्णाः स्युश्चत्वारिंशच्च सप्त च ॥ ५४ ॥ वर्णाः सप्तदलेष्वेव षट्पञ्चाष्टमके दले । पूर्वतो वेष्टयेत् काद्यैस्तत्सर्वं च तपोधन ॥ ५५ ॥ दिग्विदिनु लिखेद बीजे नारसिंह वराहयोः । क्रौं हुं चेति पूर्वादिभूगृहे चतुरस्रके ॥ ५६ ॥ यन्त्रेऽस्मिन् सम्यगाराध्य भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।