अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 298, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वात्रिंशोऽध्यायः (237) सबसे पहले षट्कोण लिखें, तब उसके बाहर एक वृत्त लिखें। इसके बाद आठ दल लिखें। तब चतुर्भुज बनावें। इस यन्त्र के मध्यभाग में सभी लक्षणों को स्पष्ट करते हुए साध्य का नाम बीच में लिखकर दोनों ओर क्रिया लिखें। तब उसका बीज बार कामबीज (क्लीं) के सम्पुटित कर लिखें। तब उन पाँच बीजाक्षरों को फिर दुहरावें। पुनः दशाक्षर मन्त्र से उसे वेष्टित करें। अग्निकोण से आरम्भ कर क्रम में लिखें। कोणों के दोनों कपोलों पर 'ह्रीं श्रीं' दो बार लिखें। प्रत्येक कोण के अग्रभाग में 'हुं' बीज लिखें और केसरों के अग्रभाग में सोलह स्वर लिखें। मालामन्त्र में सैंतालीस वर्ण हैं, जिनमें छह छह वर्ण सात दलों में और पाँच आठवें दल में लिखें। पूर्व दिशा से आरम्भ कर 'क' से ह तक व्यंजनों से सबको वेष्टित करें। दिशाओं और दिक्कोणों में नरसिंह (औं) और वराह के बीज (ह्रौं) लिखें। पूर्व दिशा से आरम्भ कर चतुर्भुज भू-पुर पर 'क्रौं हुं' यह लिखें। इस मन्त्र पर सम्यक् रूप से आराधना कर साधक भोग और मोक्ष प्राप्त करते हैं। एतद्यन्त्रं समालिख्य सौवर्णे राजते पटे।।57।। भूर्जे वा सम्यगालिख्य गुलिकीकृत्य धारयेत् ।।58।। अपुत्रो लभते पुत्रान् अधनो धनमाप्नुयात्। किमत्र बहुनोक्तेन सर्वसिद्धिप्रदं नृणाम्।।59।। यन्त्रमेतत्समाख्यातं धारणात् पातकापहम्। इस यन्त्र को सोना, चाँदी, कपड़ा या भोजपत्र पर लिखकर गोली बनाकर धारण करें। इससे अपुत्र पुत्र प्राप्त करते हैं, निर्धन धन पाते हैं अधिक क्या कहना! यह मनुष्यों के लिए सभी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। इसे धारण करने से पापों को नाश होता है। यह यन्त्र इस प्रकार कहा गया। षट्कोणादिमनोहरान्तं यन्त्रं लिखित्वा तस्य मध्ये साध्याख्या कर्मगर्भितं रामबीजं लिखेत्। तत्सर्वं मन्मथेन क्रोडीकृत्य अवशिष्टैर्मन्त्रार्णैर्मन्मथेन वेष्टयेत्।।60।। अष्टदलाद्बहिर्द्वारं दशाक्षरवेष्टनम्। इति वसिष्ठ कल्पभेदः। शेषं स्पष्टम्। षट्कोणादिरथ पूर्ववद् विलिखेत्। अथ तस्य मध्ये लिखेत्कर्म षट्सुकोणेष्वपि क्रमात्।।61।।