अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 299, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(238) अगस्त्य-संहिता षट्कोण से सुन्दर भूपूर तक यन्त्र लिखकर उसके बीच में साध्य का नाम लिखना चाहिए और क्रिया से सम्पुटित कर रामबीज (रां) लिखें। सबको कामबीज से सम्पुटित कर मन्त्र के शेष वर्णों से और कामबीज से वेष्टित करें। अष्टदल के बाहर द्वार बनाकर दशाक्षर मन्त्र से वेष्ठित करें- यह वसिष्ठ कल्प में भिन्नता है। शेष स्पष्ट है। षट्कोणादि भी पूर्वोक्त विधि से लिखें। इसके बाद षट्कोण के मध्य में अभीष्ट कार्य लिखें और छह कोणों में भी क्रमशः लिखें। मूलमन्त्राक्षराण्य़ेव सन्धिष्वङ्गं च मन्मथम्। माया गण्डेषु किञ्जल्के स्वराणां लेखनं मतम्।।62।। रेखाओं की सन्धियों पर मूलमन्त्र और रेखाओं पर कामबीज (क्लीं) लिखें। कोण के कपोलों पर माया (ह्रीं) और केसरों पर सोलह स्वर लिखें। पत्रेषु पूर्ववन्मालामन्त्रो लेख्यः। क्रमेण हि दशाक्षरेण संवेष्ट्य काद्यानि व्यञ्जनानि च।।63।। पत्रों पर पूर्वोक्त रीति से मालामन्त्र लिखें। क्रमशः दशाक्षर मन्त्रों से वेष्ठित कर 'क' आदि व्यञ्जनों से वेष्टित करें। दिग्वि दिक्षु लिखेद् बीजे नारसिंहवराहयोः। एतद् यन्त्रवरं चात्र साङ्गावरणमर्चयेत्।।63।। सौवर्णे राजते भूर्जे लिखित्वाचनमाचरेत्। फलं तु पूर्ववज्ज्ञेयं यन्त्रस्यास्य विचक्षणैः।।64।। दिशाओं और कोणों में नरसिंह (क्ष्रौं) और वराह का बीजमन्त्र (फट्) लिखें। यह यन्त्रराज है, इसका पूजन अंग और आवरण के साथ करें। सोना, चाँदी या भोजपत्र पर लिखकर इसका पूजन करें। इस यन्त्र की आराधना का फल विद्वान् वहीं जानें जो पूर्व में कहा गया है। अगस्त्य उवाच वक्ष्यामि रामचन्द्रस्य यन्त्रं कवचसंज्ञितम्। धारणात् तस्य मर्त्यानां जायन्ते सर्वसिद्धयः।।65।। नश्यन्ति सर्वपापानि विपदो यान्ति संक्षयम्। भूतप्रेतपिशाचाद्याः पलायन्ते च दर्शनात्।।66।।