अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 300, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वातत्रिंशोऽध्यायः (239) मित्राणि स्थिरतां यान्ति शत्रवो यान्ति मित्रताम्। ग्रहाः प्रसादमायान्ति दास्यं यान्ति महीभृतः।।67।। किमत्र बहुनोक्तेन नास्त्यनेन सुदुर्ल्लभम्। यन्त्रेण रामचन्द्रस्य वज्रपञ्जरसंज्ञितम्।।68।। अब मैं श्रीराम का वह यन्त्र बतलाता हूँ, जिसे कवच कहा गया है। इस यन्त्र के धारण करने से मनुष्यों को सभी सिद्धियाँ मिल जाती हैं। सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, सारी विपत्तियाँ नष्ट हो जाती है। भूत, प्रेत पिशाच आदि देखने से ही भाग जाते हैं। उनकी मित्रता स्थिर होती है, शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, ग्रह प्रसन्न होते हैं और राजागण उस व्यक्ति के दास बन जाते हैं। अधिक क्या कहना! श्रीरामचन्द्र के वज्रपंजर नामक यन्त्र के धारण करने से कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। कोष्ठैः सहैकविंशत्या पंक्तिद्वयविभूषितम्। विन्यसेदुत्तमं चक्रमेतस्मिन् कवचं लिखेत्।।69।। इक्कीस कोष्ठों के साथ दो पंक्तियों में सुसज्जित उत्तम चक्र लिखें और इसमें कवच लिखें। द्वादशाक्षरवर्णानि गृहाद्यन्त्रेषु विन्यसेत्। अनुलोमविलोमाभ्यां प्राग्दाक्षिण्यक्रमेण च।।70।। भू-पुर से यन्त्र तक द्वादशाक्षर मन्त्र अनुलोम और प्रतिलोम की विधि से पूर्व-दक्षिण क्रम से लिखें। राघवादीनि नामानि नमस्कारेण योजयेत्। मे शिरः पात्विति च स्यात् सर्वतो वाक्ययोजना।।71।। राघव आदि नाम नमस्कार के साथ लिखकर 'मे शिरः पातु' इत्यादि सभी स्थलों पर वाक्य योजना होगी। साध्याख्यसंयुतां षष्ठ्यां स्वाहेत्येकादशे गृहे। स्वकामशक्तिवाग्वर्म नारसिंहमतः परम्।।72।। लक्ष्मीपाशाङ्कुशार्णानि वाराहं फट्स्वरूपके। स्वाहेति रामभद्रस्य द्वादशाक्षरमीरितम्।।73।।