अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 35, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना (33) शततमोऽध्यायः। सम्पूर्ण कथा भविष्यकालिक कथन के रूप में पौराणिक शैली में लिखी गयी है। प्रथम 131 वें अध्याय में रामानन्दाचार्य के अवतार का उपक्रम वर्णित है। दूसरे 132वें अध्याय में सभी द्वादश शिष्यों के साथ आचार्यजी के अवतार-ग्रहण का वर्णन है, जिसमें जन्मतिथि देने के क्रम में संवत्, मास, पक्ष, तिथि एवं वार इन पाँच अंगों में से एक अंग प्रत्येक सन्त की जन्मतिथि में अनुल्लिखित है। तीसरे 133वें अध्याय में रामानन्दाचार्य की जयन्ती के अवसर पर कृत्यों का वर्णन है, जिसमें कहा गया है कि षट्कोण पर मध्य में आचार्य रामानन्द को स्थापित कर उसके बाहर वृत्त बनाकर पुनः द्वादश दल लिखकर सभी द्वादश शिष्यों को स्थापित कर षोडशोपचार से उस यन्त्र की पूजा करें। चौथे 134वें अध्याय में रामानन्दाचार्य के दिग्विजय का वर्णन है तथा पाँचवें 135वें अध्याय में आचार्यजी के अष्टोत्तरशतनाम से पूजन का वर्णन है। ये सभी पाँच अध्याय महामुनि अगस्त्य एवं सुतीक्ष्ण के संवाद के रूप में वर्णित है। सम्पूर्ण अंश में रामानन्दाचार्य को देवस्वरूप माना गया है, जो अपने आपमें रामानन्दाचार्यजी के जन्म एवं इस अंश के रचनाकाल के मध्य सुदीर्घ कालान्तर का द्योतक है। इस सम्पूर्ण अंश को इतिहास कहा गया है, जबकि यहाँ इतिहास का कोई तत्त्व नहीं है। सबसे बड़ी ऐतिहासिक भ्रान्ति है कि जब 'अगस्त्य-संहिता' हेमाद्रि के समय में विद्यमान थी, तब इसमें हेमाद्रि के परवर्ती रामानन्द और उनके शिष्यों का उल्लेख होने के कारण यह स्पष्ट है कि इस खण्ड की रचना परवर्ती काल में हुई है और चूँकि 'अगस्त्य-संहिता' बहुचर्चित थी, प्रामाणिक मानी जाती थी, रामोपासना की परम्परा में आदरणीय थी, यहाँ तक कि वेद की तरह इस संहिता का भी स्वतःप्रामाण्य परम्परा में मान्य था, अतः इस छद्म इतिहास को अगस्त्य-संहिता के साथ जोड़ने का प्रयास किया गया, ताकि उस प्रक्षेप पर कोई ऐतिहासिक दृष्टि से विवेचन करने का साहस न कर सके। अब जबकि मूल 'अगस्त्य-संहिता' पाठकों के हाथों में है, तब ऐसे छद्म-प्रक्षेपों का प्रकरण समाप्त हो जाना चाहिए। 'अगस्त्य-संहिता' में परवर्ती प्रक्षेप ऊपर हमने ऐसी रचनाओं का उल्लेख किया है, जिनका सम्बन्ध अगस्त्य- संहिता के प्रतिपाद्य विषय से नहीं रहा। इनके साथ ही ऐसी कुछ रचनाएँ भी परवर्ती काल में लिखी गयीं, जो विषयवस्तु की दृष्टि से कर्मकाण्ड अथवा उपासना से सम्बद्ध होने के आधार पर 'अगस्त्य-संहिता' से सम्बद्ध थीं। इन रचनाओं का विवेचन 'अगस्त्य-संहिता' के वर्तमान संपादन के स्वरूप से है, अतः इन रचनाओं की स्थिति का विवेचन यहाँ आवश्यक हो जाता है।