अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अध्याय ९५ * २०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
शेष आठ मण्डपोंको दो-दो हाथ बढ़ाकर रखे। (इस प्रकार कुल नौ मण्डप होने चाहिये।) [पाद आदिसे वृद्धलिङ्गोंकी स्थापनामें पादों (पायों)- के अनुसार मण्डप बनावे। बाणलिङ्ग, रत्नजलिङ्ग तथा लौहलिङ्गकी स्थापनाके अवसरपर हास्तिक (आठ हाथवाले) मण्डपके अनुसार सब कुछ बनावे। अथवा जो देवीका प्रासाद हो, उसके अनुसार मण्डप बनावे। समस्त लिङ्गोंके लिये प्रासाद-निर्माणकी विधि शैव-शास्त्रके अनुसार जाननी चाहिये। घन, घोष, विराग, काञ्चन, काम, राम, सुवेश, घर्मर तथा दक्ष—ये नौ लिङ्गोंके लिये नौ मण्डपोंके नाम हैं। चारों कोणोंमें चार खंभे हों और दरवाजोंपर दो-दो। यह सब हास्तिक-मण्डपके विषयमें बताया गया है। उससे विस्तृत मण्डपमें जैसे भी उसकी शोभा सम्भव हो, अन्य खंभोंका भी उपयोग किया जा सकता है।] * ॥ १८-१९ ॥
मध्य-मण्डलमें चार हाथकी वेदी बनावे। उसके चारों कोनोंमें चार खंभे हों। वेदी और पायोंके बीचका स्थान छोड़कर कुण्डोंका निर्माण करे। इनकी संख्या नौ अथवा पाँच होनी चाहिये। ईशान या पूर्व दिशामें एक ही कुण्ड बनावे। वह गुरुका स्थान है। यदि पचास आहुति देनी हो तो मुट्ठी बँधे हाथसे एक हाथका कुण्ड होना चाहिये। सौ आहुतियाँ देनी हों तो कोहनीसे लेकर कनिष्ठिकातकके मापसे एक अरत्नि या एक हाथका कुण्ड बनावे। एक हजार आहुतियोंका होम करना हो तो एक हाथ लंबा, चौड़ा और गहरा कुण्ड हो। दस हजार आहुतियोंके लिये इससे दूने मापका कुण्ड होना चाहिये। लाख आहुतियोंके लिये चार हाथके और एक करोड़ आहुतियोंके लिये आठ हाथके कुण्डका विधान है। अग्निकोणमें भगाकार, दक्षिण दिशामें अर्धचन्द्राकार, नैर्ऋत्यकोणमें त्रिकोण (पश्चिम दिशामें चन्द्रमण्डलके समान गोलाकार), वायव्यकोणमें षट्कोण, उत्तर दिशामें कमलाकार, ईशानकोणमें अष्टकोण (तथा पूर्व दिशामें चतुष्कोण) कुण्डका निर्माण करना चाहिये॥ २०—२३ ॥
कुण्ड सब ओरसे बराबर और ढालू होना चाहिये। ऊपरकी ओर मेखलाएँ बनी होनी चाहिये। बाहरी भागमें क्रमशः चार, तीन और दो अङ्गुल चौड़ी तीन मेखलाएँ होती हैं। अथवा एक ही छः अङ्गुल चौड़ी मेखला रहे। मेखलाएँ कुण्डके आकारके बराबर ही होती हैं। उनके ऊपर मध्यभागमें योनि हो, जिसकी आकृति पीपलके पत्तेकी भाँति रहे। उसकी ऊँचाई एक अङ्गुल और चौड़ाई आठ अङ्गुलकी होनी चाहिये। लंबाई कुण्डार्धके तुल्य हो। योनिका मध्यभाग कुण्डके कण्ठकी भाँति हो, पूर्व, अग्निकोण और दक्षिण दिशाके कुण्डोंकी योनि उत्तराभिमुखी होनी चाहिये, शेष दिशाओंके कुण्डोंकी योनि पूर्वाभिमुखी हो तथा ईशानकोणके कुण्डकी योनि उक्त दोनों प्रकारोंमेंसे किसी एक प्रकारकी (उत्तराभिमुखी या पूर्वाभिमुखी) रह सकती है॥ २४-२७ ॥
कुण्डोंका जो चौबीसवाँ भाग है, वह 'अङ्गुल' कहलाता है। इसके अनुसार विभाजन करके मेखला, कण्ठ और नाभिका निश्चय करना चाहिये। मण्डपमें पूर्वादि दिशाओंकी ओर जो चार दरवाजे लगते हैं, वे क्रमशः पाकड़, गूलर, पीपल और बड़की लकड़ीके होने चाहिये। पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे इनके नाम शान्ति, भूति, बल और आरोग्य हैं। दरवाजोंकी ऊँचाई पाँच, छः अथवा सात हाथकी होनी चाहिये। वे
* प्रसङ्गको ठीकसे समझनेके लिये 'कर्मकाण्ड-क्रमावली' से अपेक्षित अंश यहाँ भावार्थरूपमें उद्धृत किया गया है। (देखिये श्लोक-सं० १३३३ से १३३६)
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हाथभर गहरे खुदे हुए गड्ढेमें खड़े किये गये हों। उनका विस्तार ऊँचाई या लंबाईकी अपेक्षा आधा होना चाहिये। उनमें आम्र-पल्लव आदिकी बन्दनवारें लगा देनी चाहिये। मण्डपकी पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः इन्द्रायुधकी भाँति तिरंगी, लाल, काली, धूमिल, चाँदनीकी भाँति श्वेत, तोतेकी पाँखके समान हरे रंगकी, सुनहरे रंगकी तथा स्फटिक मणिके समान उज्ज्वल पताका फहरानी चाहिये। ईशान और पूर्वके मध्यभागमें ब्रह्माजीके लिये लाल रंगकी तथा नैर्ऋत्य और पश्चिमके मध्यभागमें अनन्त (शेषनाग)-के लिये नीले रंगकी पताका फहरानी चाहिये। ध्वजोंकी पताकाएँ पाँच हाथ लंबी और इससे आधी चौड़ी हों। ध्वज-दण्डकी ऊँचाई पाँच हाथकी होनी चाहिये। ध्वजकी मोटाई ऐसी हो कि दोनों हाथोंकी पकड़में आ जाय॥ २८-३२॥
पर्वत-शिखर, राजद्वार, नदीतट, घुड़सार, हथिसार, विमौट, हाथीके दाँतोंके अग्रभागसे कोड़ी गयी भूमि, साँड़के सींगसे खोदी गयी भूमि, कमलसमूहके नीचेके स्थान, सूअरकी खोदी हुई भूमि, गोशाला तथा चौराहा—इन बारह स्थानोंसे बारह प्रकारकी मिट्टी लेनी चाहिये। भगवान् विष्णुकी स्थापनामें ये द्वादश मृत्तिकाएँ तथा भगवान् शिवकी स्थापनामें आठ प्रकारकी मृत्तिकाएँ ग्राह्य हैं। बरगद, गूलर, पीपल, आम और जामुनकी छालसे पैदा हुई पाँच प्रकारकी गोंद संग्रहणीय हैं। आठ प्रकारके ऋतुफल मँगा लेने चाहिये। तीर्थजल, सुगन्धित जल, सर्वौषधि-मिश्रित जल, शस्य-पुष्पमिश्रित जल, स्वर्णमिश्रित, रत्नमिश्रित तथा गो-शृङ्गके स्पर्शसे युक्त जल, पञ्चगव्य और पञ्चामृत—इन सबको देवस्नानके लिये एकत्र करे। विघ्नकर्ताओंको डरानेके लिये आटेके बने हुए वज्र आदि आयुध-द्रव्योंको भी प्रस्तुत रखना चाहिये। सहस्र छिद्रोंसे युक्त कलश तथा मङ्गलकृत्यके लिये गोरोचना भी रखे॥ ३३-३७॥
सौ प्रकारकी ओषधियोंकी जड़, विजया, लक्ष्मणा (श्वेत कण्टकारिका), बला (अथवा अभया-हर्रे), गुरुचि, अतिबला, पाठा, सहदेवा, शतावरी, ऋद्धि, सुवर्चला और वृद्धि—इन सबका पृथक्-पृथक् स्नानके लिये उपयोग बताया गया है। रक्षाके लिये तिल और कुशा आदि संग्रहणीय हैं। भस्मस्नानके लिये भस्म जुटा ले। विद्वान् पुरुष स्नानके लिये जौ और गेहूँके आटे, बेलका चूर्ण, विलेपन, कपूर, कलश तथा गडुओंका संग्रह कर ले। खाट, दो तूलिका (रुईभरा गद्दा तथा रजाई), तकिया, चादर आदि अन्य आवश्यक वस्त्र—इन सबको अपने वैभवके अनुसार तैयार करावे और विविध चिह्नोंसे सुसज्जित शयन-कक्षमें इनको रखे। घी और मधुसे युक्त पात्र, सोनेकी सलाई, पूजोपयोगी जलसे भरा पात्र, शिवकलश और लोकपालोंके लिये कलशका भी संग्रह करे॥ ३८-४२॥
एक कलश निद्राके लिये भी होना चाहिये। कुण्डोंकी संख्याके अनुसार उतने ही शान्ति-कलश रखे जाने चाहिये। द्वारपाल आदि, धर्म आदि तथा प्रशान्त आदिके लिये भी कलश जुटा ले। वास्तुदेव, लक्ष्मी और गणेशके लिये भी अन्यान्य पृथक्-पृथक् कलश आवश्यक हैं। इन कलशोंके नीचे आधारभूमिपर धान्य-पुञ्ज रखना चाहिये। सभी कलश वस्त्र और पुष्पमालासे विभूषित किये जाने चाहिये। इनके भीतर सुवर्ण डालकर इनका स्पर्श किया जाय और इन्हें सुगन्धित जलसे भरा जाय। सभी कलशोंके ऊपर पूर्णपात्र और फल रखे जायें। उनके मुखभागमें पञ्चपल्लव रहें तथा वे कलश उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न हों। कलशोंको वस्त्रोंसे आच्छादित करे। सब ओर बिखेरनेके लिये पीली सरसों और लावाका संग्रह कर ले। पूर्ववत् ज्ञान-खड्गका भी सम्पादन करे। चरु रखनेके लिये बटलोई
* अध्याय ९६ * २०७
और उसका ढक्कन मँगा ले। ताँबेकी बनी हुई करछुल तथा पादाभ्यङ्गके लिये घृत और मधुका पात्र भी संगृहीत कर ले॥ ४३–४७॥
कुशके तीस दलोंसे बने हुए दो-दो हाथ लंबे-चौड़े चार-चार आसन एकत्र कर ले। इसी तरह पलाशोंके बने हुए चार-चार परिधि भी जुटा ले। तिलपात्र, हविष्यपात्र, अर्घ्यपात्र और पवित्रक एकत्र करे। इनका मान बीस-बीस पल है। घण्टा और धूपदानी भी मँगा ले। स्रुक्, स्रुवा, पिटक (पिटारी एवं टोकरी), पीठ (पीढ़ा या चौकी), व्यजन, सूखी लकड़ी, फूल, पत्र, गुग्गुल, घीके दीपक, धूप, अक्षत, तिगुना सूत, गायका घी, जौ, तिल, कुशा, शान्तिकर्मके लिये त्रिविध मधुर पदार्थ (मधु, शक्कर और घी), दस पर्वकी समिधाएँ, बाँह-बराबर या एक हाथका स्रुवा, सूर्य आदि ग्रहोंकी शान्तिके लिये समिधाएँ—आक, पलाश, खैर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशा भी संग्रहणीय हैं। आक आदिमें प्रत्येककी समिधाएँ एक सौ आठ-आठ होनी चाहिये। ये न मिल सकें तो इनकी जगह जौ और तिलोंकी आहुति देनी चाहिये। इनके सिवा घरेलू आवश्यकताकी वस्तुओंका भी संग्रह करे॥ ४८–५३॥
बटलोई, करछुल, ढक्कन आदि जुटा ले। देवता आदिके लिये प्रत्येकको दो-दो वस्त्र देने चाहिये। आचार्यकी पूजाके लिये मुद्रा, मुकुट, वस्त्र, हार, कुण्डल और कङ्कन आदि तैयार करा ले। धन खर्च करनेमें कंजूसी न करे॥ ५४$\frac{१}{२}$॥
मूर्ति धारण करनेवाले तथा अस्त्र-मन्त्रका जप करनेवाले ब्राह्मणोंको आचार्यकी अपेक्षा एक-एक चौथाई कम दक्षिणा दे। सामान्य ब्राह्मणों, ज्योतिषियों तथा शिल्पियोंको जपकर्ताओंके बराबर ही पूजा देनी चाहिये। हीरा, सूर्यकान्तमणि, नीलमणि, अतिनीलमणि, मुक्ताफल, पुष्पराग, पद्मराग तथा आठवाँ रत्न वैदूर्यमणि—इनका भी संग्रह करे। उशीर (खस), विष्णुक्रान्ता (अपराजिता), रक्तचन्दन, अगुरु, श्रीखण्ड, शारिवा (अनन्ता या श्यामालता), कुष्ठ (कुट) और शङ्खिनी (श्वेत पुन्नाग)—इन ओषधियोंका समुदाय संग्रहणीय है॥ ५५–५७$\frac{१}{२}$॥
सोना, ताँबा, लोहा, राँगा, चाँदी, काँसी और सीसा—इन सबकी ‘लोह’ संज्ञा है। इनका भी संग्रह करे। हरिताल, मैनसिल, गेरू, हेममाक्षीक, पारा, वह्निगैरिक, गन्धक और अभ्रक—ये आठ धातुएँ संग्रहणीय हैं। इसी प्रकार आठ प्रकारके व्रीहियों (अनाजों)-का भी संग्रह करना चाहिये। उनके नाम इस प्रकार हैं—धान, गेहूँ, तिल, उड़द, मूँग, जौ, तिन्नी और साँवाँ॥ ५८–६१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘प्रतिष्ठा, काल और सामग्री आदिकी विधिका वर्णन’ नामक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९५॥
छियानबेवाँ अध्याय
प्रतिष्ठामें अधिवासकी विधि
**भगवान् शिव कहते हैं—**स्कन्द! पुरोहितको चाहिये कि वह स्नान करके प्रातःकाल और मध्याह्नकाल, दोनों समयोंका नित्यकर्म सम्पन्न करके मूर्तिरक्षक सहायक ब्राह्मणोंके साथ यज्ञमण्डपको पधारे। (मूर्तिभिर्जापिभिर्विप्रैः — इस पाठान्तरके अनुसार मूर्तियों और जपकर्ता ब्राह्मणोंके साथ यज्ञमण्डपमें जाय, ऐसा अर्थ समझना चाहिये।) फिर वहाँ शान्ति आदि
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द्वारोंका पूर्ववत् क्रमशः पूजन करे। इन द्वारोंकी दोनों शाखाओंपर प्रदक्षिणक्रमसे द्वारपालोंकी पूजा करनी चाहिये। पूर्व दिशामें द्वारपाल नन्दी और महाकालकी, दक्षिण दिशामें भृङ्गी और विनायककी, पश्चिम दिशामें वृषभ और स्कन्दकी तथा उत्तर दिशामें देवी और चण्डकी पूजा करे। द्वार-शाखाओंके मूलदेशमें पूर्वादि क्रमसे दो-दो कलशोंकी पूजा करे। उनके नाम इस प्रकार हैं— पूर्व दिशामें प्रशान्त और शिशिर, दक्षिणमें पर्जन्य और अशोक, पश्चिममें भूतसंजीवन और अमृत तथा उत्तरमें धनद और श्रीप्रद—इन दो-दो कलशोंकी क्रमशः पूजाका विधान है। इनके नामके आदिमें 'प्रणव' और अन्तमें 'नमः' जोड़कर चतुर्थ्यन्त रूप रखे। यही इनके पूजनका मन्त्र है। यथा—'ॐ प्रशान्तशिशिराभ्यां नमः।' इत्यादि॥ १—५॥
लोक दो, ग्रह दो, वसु दो, द्वारपाल दो, नदियाँ दो, सूर्य तीन, युग एक, वेद एक, लक्ष्मी तथा गणेश—इतने देवता यज्ञमण्डपके प्रत्येक द्वारपर रहते हैं। इनका कार्य है—विघ्नसमूहका निवारण और यज्ञका संरक्षण। पूर्वादि दस दिशाओंमें वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा, त्रिशूल, चक्र और कमलकी क्रमशः पूजा करे तथा प्रत्येक दिशामें दिक्पालकी पताकाका भी पूजन करे। पूजनके मन्त्रका स्वरूप इस प्रकार है—ॐ हूं हः वज्राय हूं फट्। ॐ हूं हः शक्तये हूं फट्।$^१$ इत्यादि॥ ६—९॥
कुमुद, कुमुदाक्ष, पुण्डरीक, वामन, शङ्कुकर्ण, सर्पनेत्र (अथवा पद्मनेत्र), सुमुख और सुप्रतिष्ठित—ये ध्वजोंके आठ देवता हैं, जो पूर्वादि दिशाओंमें कोटि-कोटि भूतोंसहित पूजनीय हैं। इनके पूजन-सम्बन्धी मन्त्र इस प्रकार हैं—'ॐ कुं$^२$ कुमुदाय नमः।' इत्यादि। हेतुक (अथवा हेरुक), त्रिपुरघ्न, शक्ति (अथवा वह्नि), यमजिह्व, काल, छठा कराली, सातवाँ एकाङ्घ्रि और आठवाँ भीम—ये क्षेत्रपाल हैं। इनका क्रमशः पूर्वादि आठ दिशाओंमें पूर्ववत् पूजन करे। बलि, पुष्प और धूप देकर इन सबको सन्तुष्ट करे। तदनन्तर उत्तम एवं पवित्र तृणोंपर, अथवा बाँसके खंभोंपर क्रमशः पृथ्वी आदि पाँच तत्त्वोंकी स्थापना करके सद्योजातादि पाँच मन्त्रोंद्वारा उनका पूजन करे। सदाशिवपदव्यापी मण्डपका, जो भगवान् शंकरका धाम है तथा पताका एवं शक्तिसे संयुक्त है (पाठान्तरके अनुसार पातालशक्ति या पिनाकशक्तिसे संयुक्त है), तत्त्वदृष्टिसे अवलोकन करे॥ १०—१५॥
पूर्ववत् दिव्य अन्तरिक्ष एवं भूलोकवर्ती विघ्नोंका अपसारण करके पश्चिम द्वारमें प्रवेश करे और शेष दरवाजोंको बंद करा दे (अथवा शेष द्वारोंका दर्शनमात्र कर ले)। प्रदक्षिणक्रमसे मण्डपके भीतर जाकर वेदीके दक्षिण भागमें उत्तराभिमुख होकर बैठे और पूर्ववत् भूतशुद्धि करे। अन्तर्याग, विशेषार्घ्य, मन्त्र-द्रव्यादि-शोधन, स्वात्मपूजन तथा पञ्चगव्य आदि पूर्ववत् करे। फिर वहाँ आधारशक्तिकी प्रतिष्ठापूर्वक कलश-स्थापन करे। विशेषतः शिवका ध्यान करे। तदनन्तर क्रमशः तीनों तत्त्वोंका चिन्तन करे। ललाटमें शिवतत्त्वकी, स्कन्धदेशमें विद्यातत्त्वकी तथा पादान्त-भागमें उत्तम आत्मतत्त्वकी भावना करे। शिवतत्त्वके रुद्र, विद्यातत्त्वके नारायण तथा आत्मतत्त्वके ब्रह्मा देवता हैं। इनका अपने नाम-मन्त्रोंद्वारा पूजन करना चाहिये। इन तत्त्वोंके आदि-बीज क्रमशः इस प्रकार हैं—'ॐ ईं आम्'॥ १६—२१॥
१. सोमशम्भुरचित 'कर्मकाण्ड-क्रमावली'में मन्त्रका यही स्वरूप उपलब्ध होता है। कुछ प्रतियोंमें 'ॐ हूं फट् नमः। ॐ हूं फट् द्वाःस्थशक्तये हूं फट् नमः।' ऐसा पाठ है।
२. कहीं-कहीं—'कुं' के स्थानमें 'कौं' पाठ है।
- अध्याय ९६ * २०९
मूर्तियों और मूर्तीश्वरोंकी वहाँ पूर्ववत् स्थापना करे। उनमें व्यापक शिवका साङ्ग पूजन करके मस्तकपर शिवहस्त रखे। भावनाद्वारा ब्रह्मरन्ध्रके मार्गसे प्रविष्ट हुए तेजसे अपने बाहर-भीतरकी अन्धकार-राशिको नष्ट करके आत्मस्वरूपका इस प्रकार चिन्तन करे कि 'वह सम्पूर्ण दिङ्मण्डलको प्रकाशित कर रहा है।' मूर्तिपालकोंके साथ अपने-आपको भी हार, वस्त्र और मुकुट आदिसे अलंकृत करके—'मैं शिव हूँ'—ऐसा चिन्तन करते हुए 'बोधासि' (ज्ञानमय खड्ग)-को उठावे। चतुष्पदान्त संस्कारोंद्वारा यज्ञमण्डपका संस्कार करे। बिखेरने योग्य वस्तुओंको सब ओर बिखेरकर, कुशकी कूँचीसे उन सबको समेटे। उन्हें आसनके नीचे करके वार्धनीके जलसे पूर्ववत् वास्तु आदिका पूजन करे। शिव-कुम्भास्त्र और वार्धनीके सुस्थिर आसनोंकी भी पूजा करे। अपनी-अपनी दिशामें कलशोंपर विराजमान इन्द्रादि लोकपालोंका क्रमशः उनके वाहनों और आयुध आदिके साथ यथाविधि पूजन करे॥ २२—२७॥
पूर्व दिशामें इन्द्रका चिन्तन करे। वे ऐरावत हाथीपर बैठे हैं। उनकी अङ्ग-कान्ति सुवर्णके समान दमक रही है। मस्तकपर किरीट शोभा दे रहा है। वे सहस्र नेत्र धारण करते हैं। उनके हाथमें वज्र शोभा पाता है। अग्निकोणमें सात ज्वालामयी जिह्वाएँ धारण किये, अक्षमाला और कमण्डलु लिये, लपटोंसे घिरे रक्त वर्णवाले अग्निदेवका ध्यान करे। उनके हाथमें शक्ति शोभा पाती है तथा बकरा उनका वाहन है। दक्षिणमें महिषारूढ दण्डधारी यमराजका चिन्तन करे, जो कालाग्निके समान प्रकाशित हो रहे हैं। नैर्ऋत्य-कोणमें लाल नेत्रवाले नैर्ऋत्यकी भावना करे, जो हाथमें तलवार लिये, शव (मुर्दे)-पर आरूढ हैं। पश्चिममें मकरारूढ, श्वेतवर्ण, नागपाशधारी वरुणका चिन्तन करे। वायव्यकोणमें मृगारूढ, नीलवर्ण वायुदेवका तथा उत्तरमें भेंड़ेपर सवार कुबेरका ध्यान करे। ईशानकोणमें त्रिशूलधारी, वृषभारूढ ईशानका, नैर्ऋत्य तथा पश्चिमके मध्यभागमें कच्छपपर सवार चक्रधारी भगवान् अनन्तका तथा ईशान और पूर्वके भीतर चार मुख एवं चार भुजा धारण करनेवाले हंसवाहन ब्रह्माका ध्यान करे॥ २८—३२॥
खंभोंके मूल भागमें स्थित कलशोंमें तथा वेदीपर धर्म आदिका पूजन करे। कुछ लोग सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थित कलशोंपर अनन्त आदिकी पूजा भी करते हैं। इसके बाद शिवाज्ञा सुनावे और कलशोंको अपने पृष्ठभागतक घुमावे। तत्पश्चात् पहले कलशको और फिर वार्धनीको पूर्ववत् अपने स्थानपर रख दे। स्थिर आसनवाले शिवका कलशमें और शस्त्रके लिये ध्रुवासनका पूर्ववत् पूजन करके उद्भव-मुद्राद्वारा स्पर्श करे। उस समय भगवान्से इस प्रकार प्रार्थना करे—'हे जगन्नाथ! आप अपने भक्तजनपर कृपा करके इस अपने ही यज्ञकी रक्षा कीजिये।'—यों रक्षाके लिये प्रार्थना सुनाकर कलशमें खड्गकी स्थापना करे। दीक्षा और स्थापनाके समय कलशमें, वेदीपर अथवा मण्डलमें भगवान् शिवका पूजन करे। मण्डलमें देवेश्वर शिवका पूजन करनेके पश्चात् कुण्डके समीप जाय॥ ३३—३७॥
कुण्ड-नाभिको आगे करके बैठे हुए मूर्तिधारी पुरुष गुरुकी आज्ञासे अपने-अपने कुण्डका संस्कार करें। जप करनेवाले ब्राह्मण संख्यारहित मन्त्रका जप करें। दूसरे लोग संहिताका पाठ करें। अपनी शाखाके अनुसार वेदोंके पारंगत विद्वान् शान्तिपाठमें लगे रहें। ऋग्वेदी विद्वान् पूर्व दिशामें श्रीसूक्त, पावमानी ऋचा, मैत्रेय ब्राह्मण तथा वृषाकपि-मन्त्र—इन सबका पाठ करें। सामवेदी विद्वान्
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- अग्निपुराण *
दक्षिणमें देवव्रत, भारुण्ड, ज्येष्ठसाम, रथन्तरसाम तथा पुरुषगीत—इन सबका गान करें। यजुर्वेदी विद्वान् पश्चिम दिशामें रुद्रसूक्त, पुरुषसूक्त, श्लोकाध्याय तथा विशेषतः ब्राह्मणभागका पाठ करें। अथर्ववेदी विद्वान् उत्तर दिशामें नीलरुद्र, सूक्ष्मासूक्ष्म तथा अथर्वशीर्षका तत्परतापूर्वक अध्ययन करें ॥ ३८-४३ ॥
आचार्य (अरणी-मन्थनद्वारा) अग्निका उत्पादन करके उसे प्रत्येक कुण्डमें स्थापित करावें। अग्निके पूर्व आदि भागोंको पूर्व-कुण्ड आदिके क्रमसे लेकर धूप, दीप और चरुके निमित्त अग्निका उद्धार करे। फिर पहले बताये अनुसार भगवान् शंकरका पूजन करके शिवाग्निमें मन्त्र-तर्पण करे। देश, काल आदिकी सम्पन्नता तथा दुर्निमित्तकी शान्तिके लिये होम करके मन्त्रज्ञ आचार्य मङ्गलकारिणी पूर्णाहुति प्रदान करके, पूर्ववत् चरु तैयार करे और उसे प्रत्येक कुण्डमें निवेदित करे। यजमानसे वस्त्राभूषणोंद्वारा विभूषित एवं सम्मानित मूर्तिपालक ब्राह्मण स्नान-मण्डपमें जायँ। भद्रपीठपर भगवान् शिवकी प्रतिमाको स्थापित करके ताड़न और अवगुण्ठनकी क्रिया करें। पूर्वकी वेदीपर पूजन करके मिट्टी, काषाय-जल, गोबर और गोमूत्रसे तथा बीच-बीचमें जलसे भगवत्प्रतिमाको स्नान करावे। तत्पश्चात् भस्म तथा गन्धयुक्त जलसे नहलावे। इसके बाद आचार्य 'अस्त्राय फट्।'—इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलके द्वारा मूर्तिपालकोंके साथ हाथ धोकर कवच-मन्त्रसे अभिमन्त्रित पीताम्बरद्वारा मूर्तिको आच्छादित करके श्वेत फूलोंसे उसकी पूजा करे। तदनन्तर उसे उत्तर-वेदीपर ले जाय ॥ ४४-५०$\frac{१}{२}$ ॥
वहाँ आसनयुक्त शय्यापर सुलाकर कुङ्कुममें रँगे हुए सूतसे अङ्गोंका विभाजन करके आचार्य सोनेकी शलाकाद्वारा उस प्रतिमामें दोनों नेत्र अङ्कित करे। यह कार्य शस्त्र-क्रियाद्वारा सम्पन्न होना चाहिये। पहले चिह्न बनानेवाला गुरु नेत्र-चिह्नको अञ्जनसे अङ्कित कर दे; इसके बाद वह शिल्पी, जो मूर्ति-निर्माणका कार्य पहले भी कर चुका हो, उस नेत्रचिह्नको शस्त्रद्वारा खोदे (अर्थात् खुदाई करके नेत्रकी आकृतिको स्पष्टरूपसे अभिव्यक्त करे)। अर्चाके तीन अंशसे कम अथवा एक चौथाई भाग या आधे भागमें सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये शुभ लक्षण (चिह्न)-की अवतारणा करनी चाहिये। शिवलिङ्गकी लंबाईके मानमें तीनसे भाग देकर एक भागको त्याग देनेसे जो मान हो, वही लिङ्गके लक्ष्मदेहका सब ओरसे विस्तार होना चाहिये ॥ ५१-५५ ॥
एक हाथके प्रस्तरखण्डमें जो लक्ष्मरेखा बनेगी, उसकी गहराई और चौड़ाई उतनी ही होगी, जितनी जौके नौ भागोंमेंसे एकको छोड़ने और आठको लेनेसे होती है। इसी प्रकार डेढ़ हाथ या दो हाथ आदिके लिङ्गसे लेकर नौ हाथतकके लिङ्गमें क्रमशः $\frac{१}{९}$ भागकी वृद्धि करके लक्ष्मरेखा बनानी चाहिये। इस तरह नौ हाथवाले लिङ्गमें आठ जौके बराबर मोटी और गहरी लक्ष्मरेखा होनी चाहिये। जो शिवलिङ्ग परस्पर अन्तर रखते हुए उत्तरोत्तर सवाये बड़े हों, वहाँ लक्ष्म-देहका विस्तार एक-एक जौ बढ़ाकर करना चाहिये। गहराई और मोटाईकी वृद्धिके अनुसार रेखा भी एक तिहाई बढ़ जायगी। सभी शिवलिङ्गोंमें लिङ्गका ऊपरी भाग ही उनका सूक्ष्म मस्तक है ॥ ५६-५९ ॥
लक्ष्म अर्थात् चिह्नका जो क्षेत्र है, उसका आठ भाग करके दो भागोंको मस्तकके अन्तर्गत रखे। शेष छः भागोंमेंसे नीचेके दो भागोंको छोड़कर मध्यके अवशिष्ट भागोंमें तीन रेखा खींचे
* अध्याय ९६ * २११
और उन्हें पृष्ठदेशमें ले जाकर जोड़ दे। रत्नमय लिङ्गमें लक्षणोद्धारकी आवश्यकता नहीं है। भूमिसे स्वतः प्रकट हुए अथवा नर्मदादि नदियोंसे प्रादुर्भूत हुए शिवलिङ्गमें भी लक्ष्मोद्धार अपेक्षित नहीं है। रत्नमय लिङ्गोंके रत्नोंमें जो निर्मल प्रभा होती है, वही उनके स्वरूपका लक्षण (परिचायक) है। मुखभागमें जो नेत्रोन्मीलन किया जाता है, वह आवश्यक है और उसीके संनिधानके लिये वह लक्ष्म या चिह्न बनाया जाता है। लक्षणोद्धारकी रेखाका घृत और मधुसे मृत्युञ्जय-मन्त्रद्वारा पूजन करके, शिल्पिदोषकी निवृत्तिके लिये मृत्तिका आदिसे स्नान कराकर, लिङ्गकी अर्चना करे। फिर दान-मान आदिसे शिल्पीको संतुष्ट करके आचार्यको गोदान दे। तदनन्तर सौभाग्यवती स्त्रियाँ धूप, दीप आदिके द्वारा लिङ्गकी विशेष पूजा करके मङ्गल-गीत गायें और सव्य या अपसव्य भावसे सूत्र अथवा कुशके द्वारा स्पर्शपूर्वक रोचना अर्पित करके न्योछावर दें। इसके बाद यजमान गुड़, नमक और धनिया देकर उन स्त्रियोंको विदा करे॥ ६०—६६॥
तत्पश्चात् गुरु मूर्तिरक्षक ब्राह्मणोंके साथ ‘नमः’ या प्रणव-मन्त्रके द्वारा मिट्टी, गोबर, गोमूत्र और भस्मसे पृथक्-पृथक् स्नान करावे। एक-एकके बाद बीचमें जलसे स्नान कराता जाय। फिर पञ्चगव्य, पञ्चामृत, रूखापन दूर करनेवाले कषाय द्रव्य, सर्वौषधिमिश्रित जल, श्वेत पुष्प, फल, सुवर्ण, रत्न, सींग एवं जौ मिलाये हुए जल, सहस्रधारा, दिव्यौषधियुक्त जल, तीर्थ-जल, गङ्गाजल, चन्दनमिश्रित जल, क्षीरसागर आदिके जल, कलशोंके जल तथा शिवकलशके जलसे अभिषेक करे। रूखेपनको दूर करनेवाला विलेपन लगाकर उत्तम गन्ध और चन्दन आदिसे पूजन करनेके पश्चात् ब्रह्ममन्त्रद्वारा पुष्प तथा कवच-मन्त्रसे लाल वस्त्र चढ़ावे। फिर अनेक प्रकारसे आरती उतारकर रक्षा और तिलकपूर्वक गीत-वाद्य आदिसे, विविध द्रव्योंसे तथा जय-जयकार और स्तुति आदिसे भगवान्को संतुष्ट करके पुरुष-मन्त्रसे उनकी पूजा करे। तदनन्तर हृदय-मन्त्रसे आचमन करके इष्टदेवसे कहे—‘प्रभो! उठिये’॥ ६७—७३॥
फिर इष्टदेवको ब्रह्मरथपर बिठाकर उसीके द्वारा उन्हें सब ओर घुमाते और द्रव्य बिखेरते हुए मण्डपके पश्चिम द्वारपर ले जाय और वहाँ शय्यापर भगवान्को पधरावे। आसनके आदि-अन्तमें शक्तिकी भावना करके उस शुभ आसनपर उन्हें विराजमान करे। पश्चिमाभिमुख प्रासादमें पश्चिम दिशाकी ओर पिण्डिका स्थापित करके उसके ऊपर ब्रह्मशिला रखे। शिवकोणमें सौ अस्त्र-मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित निद्रा-कलश और शिवासनकी कल्पना करके, हृदय-मन्त्रसे अर्घ्य दे, देवताको उठाकर लिङ्गमय आसनपर शिरोमन्त्रद्वारा पूर्वकी ओर मस्तक रखते हुए आरोपित एवं स्थापित करे। इस प्रकार उन परमात्माका साक्षात्कार होनेपर चन्दन और धूप चढ़ाते हुए उनकी पूजा करे तथा कवच-मन्त्रसे वस्त्र अर्पित करे। घरका उपकरण आदि अर्पित कर दे। फिर अपनी शक्तिके अनुसार नमस्कारपूर्वक नैवेद्य निवेदन करे। अभ्यङ्ग-कर्मके लिये घृत और मधुसे युक्त पात्र इष्टदेवके चरणोंके समीप रखे। वहाँ उपस्थित हुए आचार्य शक्तिसे लेकर भूमि-पर्यन्त छत्तीस तत्त्वोंके समूहको उनके अधिपतियोंसहित स्थापित करके फूलकी मालाओंसे उनके तीन भागोंकी कल्पना करे॥ ७४—८०॥
वे तीन भाग मायासे लेकर शक्ति-पर्यन्त हैं।
२१२ * अग्निपुराण *
उनमें प्रथम भाग चतुष्कोण, द्वितीय भाग अष्टकोण और तृतीय भाग वर्तुलाकार है। प्रथम भागमें आत्मतत्त्व, द्वितीय भागमें विद्यातत्त्व और तृतीय भागमें शिवतत्त्वकी स्थिति है। इन भागोंमें सृष्टिक्रमसे एक-एक अधिपति हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव नामसे प्रसिद्ध हैं। तदनन्तर मूर्तियों और मूर्तीश्वरोंका पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे न्यास करे। पृथ्वी, अग्नि, यजमान, सूर्य, जल, वायु, चन्द्रमा और आकाश—ये आठ मूर्तिरूप हैं। इनका न्यास करनेके पश्चात् इनके अधिपतियोंका न्यास करना चाहिये। उनके नाम इस प्रकार हैं—शर्व, पशुपति, उग्र, रुद्र, भव, ईश्वर, महादेव और भीम। इनके वाचक मन्त्र निम्नलिखित हैं—लं, रं, शं, खं, चं, पं, सं, हं* अथवा त्रिमात्रिक प्रणव तथा 'हां' अथवा हृदय-मन्त्र अथवा कहीं-कहीं मूल-मन्त्र इनके (मूर्तियों और मूर्तिपतियोंके) पूजनके उपयोगमें आते हैं। अथवा पञ्चकुण्डात्मक यागमें पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच मूर्तियोंका ही न्यास करे॥ ८१—८६॥
फिर क्रमशः इनके पाँच अधिपतियों—ब्रह्मा, शेषनाग, रुद्र, ईश और सदाशिवका मन्त्रज्ञ पुरुष सृष्टि-क्रमसे न्यास करे। यदि यजमान मुमुक्षु हो तो वह पञ्चमूर्तियोंके स्थानमें 'निवृत्ति' आदि पाँच कलाओं तथा उनके 'अजात' आदि अधिपतियोंका न्यास करे। अथवा सर्वत्र व्याप्तिरूप कारणात्मक त्रितत्त्वका ही न्यास करना चाहिये। शुद्ध अध्वामें विद्येश्वरोंका और अशुद्धमें लोकनायकोंका मूर्तिपतियोंके रूपमें दर्शन करना चाहिये। भोगी (सर्प) भी मन्त्रेश्वर हैं। पैंतीस, आठ, पाँच और तीन मूर्तिरूप-तत्त्व क्रमशः कहे गये हैं। ये ही इनके तत्त्व हैं। इन तत्त्वोंके अधिपतियोंके मन्त्रोंका दिग्दर्शनमात्र कराया जाता है। ॐ हां शक्तितत्त्वाय नमः। इत्यादि। ॐ हां शक्तितत्त्वाधिपाय नमः। इत्यादि। ॐ हां क्षमामूर्तये नमः। ॐ हां क्षमामूर्त्यधिपतये ब्रह्मणे नमः। इत्यादि। ॐ हां शिवतत्त्वाय नमः। ॐ हां शिवतत्त्वाधिपतये रुद्राय नमः। इत्यादि। नाभिमूलसे उच्चरित होकर घण्टानादके समान सब ओर फैलनेवाले, ब्रह्मादि कारणोंके त्यागपूर्वक, द्वादशान्तस्थानको प्राप्त हुए मनसे अभिन्न तथा आनन्द-रसके उद्गमको पा लेनेवाले मन्त्रका और निष्कळ, व्यापक शिवका, जो अड़तीस कलाओंसे युक्त, सहस्रों किरणोंसे प्रकाशमान, सर्वशक्तिमय तथा साङ्ग हैं, ध्यान करते हुए उन्हें द्वादशान्तसे लाकर शिवलिङ्गमें स्थापित करे॥ ८७—९४॥
इस प्रकार शिवलिङ्गमें जीवन्यास होना चाहिये, जो सम्पूर्ण पुरुषार्थोंका साधक है। पिण्डिका आदिमें किस प्रकार न्यास करना चाहिये, यह बताया जाता है। पिण्डिकाको स्नान कराकर उसमें चन्दन आदिका लेप करे और उसे सुन्दर वस्त्रोंसे आच्छादित करके, उसके भगस्वरूप छिद्रमें पञ्चरत्न आदि डालकर, उस पिण्डिकाको लिङ्गसे उत्तर दिशामें स्थापित करे। उसमें भी लिङ्गकी ही भाँति न्यास करके विधिपूर्वक उसकी पूजा करे। उसका स्नान आदि पूजन-कार्य सम्पन्न करके लिङ्गके मूलभागमें शिवका न्यास करे। फिर शक्त्यन्त वृषभका भी स्नान आदि संस्कार करके स्थापन करना चाहिये॥ ९५—९८॥
तत्पश्चात् पहले प्रणवका, फिर 'हां हूं हीं'—इन तीन बीजोंमेंसे किसी एकका उच्चारण करते हुए क्रियाशक्तिसहित आधाररूपिणी शिला-पिण्डिकाका पूजन करे। भस्म, कुशा और तिलसे तीन प्राकार (परकोटा) बनावे तथा रक्षाके लिये
* सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड-क्रमावली'में इन मन्त्रोंका क्रम 'य, र, स, ष, व, य, ह, प्रणव' इस प्रकार दिया गया है।
* अध्याय ९६ * २१३
आयुधोंसहित लोकपालोंको बाहरकी ओर नियोजित एवं पूजित करे। पूजनके मन्त्र इस प्रकार हैं—'ॐ ह्रीं क्रियाशक्तये नमः। ॐ ह्रीं महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा।' निम्नाङ्कित मन्त्रके द्वारा पिण्डिकामें पूजन करे—'ॐ ह्रीं आधारशक्तये नमः। ॐ हां वृषभाय नमः।'॥ ९९-१०१॥
धारिका, दीप्ता, अत्युग्रा, ज्योत्स्ना, बलोत्कटा, धात्री और विधात्री—इनका पिण्डीमें न्यास करे; अथवा वामा, ज्येष्ठा, क्रिया, ज्ञाना और वेधा (अथवा रोधा या प्रह्नी)—इन पाँच नायिकाओंका न्यास करे। अथवा क्रिया, ज्ञाना तथा इच्छा—इन तीनका ही न्यास करे; पूर्ववत् शान्तिमूर्तियोंमें तमी, मोहा, क्षुधा, निद्रा, मृत्यु, माया, जरा और भया—इनका न्यास करे; अथवा तमा, मोहा, घोरा, रति, अपज्वरा—इन पाँचोंका न्यास करे; या क्रिया, ज्ञाना और इच्छा—इन तीन अधिनायिकाओंका आत्मा आदि तीन तीव्र मूर्तिवाले तत्त्वोंमें न्यास करे। यहाँ भी पिण्डिका, ब्रह्मशिला आदिमें पूर्ववत् गौरी आदि शम्बरों (मन्त्रों) द्वारा ही सब कार्य विधिवत् सम्पन्न करे॥ १०२-१०६॥
इस प्रकार न्यास-कर्म करके कुण्डके समीप जा, उसके भीतर महेश्वरका, मेखलाओंमें चतुर्भुजका, नाभिमें क्रियाशक्तिका तथा ऊर्ध्वभागमें नादका न्यास करे। तदनन्तर कलश, वेदी, अग्नि और शिवके द्वारा नाड़ीसंधान-कर्म करे। कमलके तन्तुकी भाँति सूक्ष्मशक्ति ऊर्ध्वगत वायुकी सहायतासे ऊपर उठती और शून्य मार्गसे शिवमें प्रवेश करती है। फिर वह ऊर्ध्वगत शक्ति वहाँसे निकलती और शून्यमार्गसे अपने भीतर प्रवेश करती है। इस प्रकार चिन्तन करे। मूर्तिपालकोंको भी सर्वत्र इसी प्रकार संधान करना चाहिये॥ १०७-११०॥
कुण्डमें आधार-शक्तिका पूजन करके, तर्पण करनेके पश्चात्, क्रमशः तत्त्व, तत्त्वेश्वर, मूर्ति और मूर्तिश्वरोंका घृत आदिसे पूजन और तर्पण करे। फिर उन दोनों (तत्त्व, तत्त्वेश्वर एवं मूर्ति, मूर्तीश्वर)—को संहिता-मन्त्रोंसे एक सौ, एक सहस्र अथवा आधा सहस्र आहुतियाँ दे। साथ ही पूर्णाहुति भी अर्पण करे। तत्त्व और तत्त्वेश्वरों तथा मूर्ति और मूर्तीश्वरोंका पूर्वोक्त रीतिसे एक-दूसरेके संनिधानमें तर्पण करके मूर्तिपालक भी उनके लिये आहुतियाँ दें। इसके बाद द्रव्य और कालके अनुसार वेदों और अङ्गोंद्वारा तर्पण करके, शान्ति-कलशके जलसे प्रोक्षित कुश-मूलद्वारा लिङ्गके मूलभागका स्पर्श करके, होम-संख्याके बराबर जप करे। हृदय-मन्त्रसे संनिधापन और कवच-मन्त्रसे अवगुण्ठन करे॥ १११-११५॥
इस प्रकार संशोधन करके, लिङ्गके ऊर्ध्व-भागमें ब्रह्मा और अन्त (मूल) भागमें विष्णुका पूजन आदि करके, शुद्धिके लिये पूर्ववत् सारा कार्य सम्पन्न कर, होम-संख्याके अनुसार जप आदि करे। कुशके मध्यभागसे लिङ्गके मध्यभागका और कुशके अग्रभागसे लिङ्गके अग्रभागका स्पर्श करे। जिस मन्त्रसे जिस प्रकार संधान किया जाता है, वह इस समय बताया जाता है—ॐ हां हं, ॐ ॐ एं, ॐ भूं भूं बाह्यमूर्तये नमः। ॐ हां वां, आं ॐ आं षां, ॐ भूं भूं वां वह्निमूर्तये नमः*। इसी प्रकार यजमान आदि मूर्तियोंके साथ भी अभिसंधान करना चाहिये। पञ्चमूर्त्यात्मक शिवके लिये भी हृदयादि-मन्त्रोंद्वारा इसी तरह संधानकर्म करनेका विधान है। त्रित्त्वात्मक स्वरूपमें मूलमन्त्र अथवा अपने बीज-मन्त्रोंद्वारा संधानकर्म करनेकी विधि है—ऐसा जानना चाहिये। शिला, पिण्डिका एवं
* आचार्य सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड-क्रमावली' में ये मन्त्र इस प्रकार उपलब्ध होते हैं—ॐ हां हां वा, ॐ ॐ ॐ वा, ॐ लूं लूं वा, क्ष्मामूर्तये नमः। ॐ हां हां वा, ॐ ॐ ॐ वा, ॐ रूं रूं वा, वह्निमूर्तये नमः।
२१४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
वृषभके लिये भी इसी तरह संधान आवश्यक है। प्रत्येक भागकी शुद्धिके लिये अपने मन्त्रोंद्वारा शतादि होम करे और उसे पूर्णाहुतिद्वारा पृथक् कर दे॥ ११९-१२०॥
न्यूनता आदि दोषसे छुटकारा पानेके लिये शिव-मन्त्रसे एक सौ आठ आहुतियाँ दे और जो कर्म किया गया है, उसे शिवके कानमें निवेदन करे—'प्रभो! आपकी शक्तिसे ही मेरे द्वारा इस कार्यका सम्पादन हुआ है, ॐ भगवान् रुद्रको नमस्कार है। रुद्रदेव! आपको मेरा नमस्कार है। यह कार्य विधिपूर्ण हो या अपूर्ण, आप अपनी शक्तिसे ही इसे पूर्ण करके ग्रहण करें।' 'ॐ ह्रीं शांकरि पूरय स्वाहा।' ऐसा कहकर पिण्डिकामें न्यास करे। तदनन्तर ज्ञानी पुरुष लिङ्गमें क्रिया-शक्तिका और पीठ-विग्रहमें ब्रह्मशिलाके ऊपर आधाररूपिणी शक्तिका न्यास करे॥ १२१-१२५॥
सात, पाँच, तीन अथवा एक राततक उसका निरोध करके या तत्काल ही उसका अधिवासन करे। अधिवासनके बिना कोई भी याग सम्पादित होनेपर भी फलदायक नहीं होता। अतः अधिवासन अवश्य करे। अधिवासन-कालमें प्रतिदिन देवताओंको अपने-अपने मन्त्रोंद्वारा सौ-सौ आहुतियाँ दे तथा शिव-कलश आदिकी पूजा करके दिशाओंमें बलि अर्पित करे॥ १२६-१२७ $\frac{१}{२}$॥
गुरु आदिके साथ रातमें नियमपूर्वक वास 'अधिवास' कहलाता है। 'अधि' पूर्वक 'वस्' धातुसे भावमें 'घञ्' प्रत्यय किया गया है। इससे 'अधिवास' शब्द सिद्ध हुआ है॥ १२८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रतिष्ठाके अन्तर्गत संधान एवं अधिवासकी विधिकी वर्णन' नामक छियानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९६॥
सत्तानबेवाँ अध्याय
शिव-प्रतिष्ठाकी विधि
भगवान् शिव कहते हैं— स्कन्द! प्रातःकाल नित्य-कर्मके अनन्तर द्वार-देवताओंका पूजन करके मण्डपमें प्रवेश करे। पूर्वोक्त विधिसे देहशुद्धि आदिका अनुष्ठान करे। दिक्पालोंका, शिव-कलशका तथा वार्थानी (जलपात्र)-का पूजन करके अष्टपुष्पिकाद्वारा शिवलिङ्गकी अर्चना करे और क्रमशः आहुति दे, अग्निदेवको तृप्त करे। तदनन्तर शिवकी आज्ञा ले 'अस्त्राय फट्।' का उच्चारण करते हुए मन्दिरमें प्रवेश करे तथा 'अस्त्राय हुं फट्।' बोलकर वहाँके विघ्नोंका अपसारण करे॥ १-३॥
शिलाके ठीक मध्यभागमें शिवलिङ्गकी स्थापना न करे; क्योंकि वैसा करनेपर वेध-दोषकी आशङ्का रहती है। इसलिये मध्यभागको त्यागकर, एक या आधा जौ किंचित् ईशान भागका आश्रय ले आधारशिलामें शिवलिङ्गकी स्थापना करे। मूल-मन्त्रका उच्चारण करते हुए उस (अनन्त) नाम-धारिणी, सर्वाधारस्वरूपिणी, सर्वव्यापिनी शिलाको सृष्टियोगद्वारा अविचल भावसे स्थापित करे। अथवा निम्नाङ्कित मन्त्रसे शिवकी आसनस्वरूपा उस शिलाकी पूजा करे—'ॐ नमो व्यापिनि भगवति स्थिरेऽचले ध्रुवे ह्रीं लं ह्रीं स्वाहा।' पूजनसे पहले यों कहे—'आधारशक्ति-स्वरूपिणि शिले! तुम्हें भगवान् शिवकी आज्ञासे यहाँ नित्य-निरन्तर स्थिरतापूर्वक स्थित रहना चाहिये।'—ऐसा कहकर पूजन करनेके पश्चात् अवरोधिनी-मुद्रासे शिलाको अवरुद्ध (स्थिरतापूर्वक स्थापित) कर दे॥ ४-८॥
- अध्याय ९७ * २१५
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हीरे आदि रत्न, उशीर (खश) आदि ओषधियाँ, लौह और सुवर्ण, कांस्य आदि धातु, हरिताल, आदि, धान आदिके पौधे तथा पूर्वकथित अन्य वस्तुएँ क्रमशः एकत्र करे और मन-ही-मन भावना करे कि 'ये सब वस्तुएँ कान्ति, आरोग्य, देह, वीर्य और शक्तिस्वरूप हैं'। इस प्रकार एकाग्रचित्तसे भावना करके लोकपाल और शिवसम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा पूर्वादिकुण्डोंमें इन वस्तुओंमेंसे एक-एकको क्रमशः डाले। सोने अथवा ताँबेके बने हुए कछुए या वृषभको द्वारके सम्मुख रखकर नदीके किनारेकी या पर्वतके शिखरकी मिट्टीसे युक्त करे और उसे बीचके कुण्ड आदिमें डाल दे। अथवा सुवर्णनिर्मित मेरुको मधूक, अक्षत और अञ्जनसे युक्त करके उसमें डाले अथवा सोने या चाँदीकी बनी हुई पृथ्वीको सम्पूर्ण बीजों और सुवर्णसे संयुक्त करके उसे मध्यम कुण्डमें डाले। अथवा सोने, चाँदी या सब प्रकारके लोहसे निर्मित सुवर्णमय केसरोंसे युक्त कमल या अनन्त (शेषनाग)-की मूर्तिको उसमें छोड़े॥ ९—१५॥
शक्तिसे लेकर मूर्ति-पर्यन्त अथवा शक्तिसे लेकर शक्ति-पर्यन्त तत्त्वका देवाधिदेव महादेवके लिये आसन निर्मित करके उसमें खीर या गुग्गुलका लेप करे। तत्पश्चात् वस्त्रसे गर्तको आच्छादित करके कवच और अस्त्र-मन्त्रद्वारा उसकी रक्षा करे। फिर दिक्पालोंको बलि देकर आचार्य आचमन करे। शिला और गर्तके सङ्ग-दोषकी निवृत्तिके लिये शिवमन्त्रसे अथवा अस्त्र-मन्त्रसे विधिपूर्वक सौ आहुतियाँ दे। साथ ही पूर्णाहुति भी करे। वास्तु देवताओंको एक-एक आहुति देकर तृप्त करनेके पश्चात् हृदय-मन्त्रसे भगवान्को उठाकर मङ्गल-वाद्य और मङ्गल-पाठ आदिके साथ ले आवे॥ १६—१९॥
गुरु भगवान्के आगे-आगे चले और चार दिशाओंमें स्थित चार मूर्तिपालोंके साथ यजमान स्वयं भगवान्की सवारीके पीछे-पीछे चले। मन्दिर आदिके चारों ओर घुमाकर शिवलिङ्गको भद्र-द्वारके सम्मुख नहलावे और अर्घ्य देकर उसे मन्दिरके भीतर ले जाय। खुले द्वारसे अथवा द्वारके लिये निश्चित स्थानसे शिवलिङ्गको मन्दिरमें ले जाय। इन सबके अभावमें द्वार बंद करनेवाली शिलासे शून्य-मार्गसे अथवा उस शिलाके ऊपरसे होकर मन्दिरमें प्रवेशका विधान है। दरवाजेसे ही महेश्वरको मन्दिरमें ले जाय, परंतु उनका द्वारसे स्पर्श न होने दे। यदि देवालयका समारम्भ हो रहा हो तो किसी कोणसे भी शिवलिङ्गको मन्दिरके भीतर प्रविष्ट कराया जा सकता है। व्यक्त अथवा स्थूल शिवलिङ्गके मन्दिर-प्रवेशके लिये सर्वत्र यही विधि जाननी चाहिये। घरमें प्रवेशका मार्ग द्वार ही है, इसका साधारण लोगोंको भी प्रत्यक्ष अनुभव है। यदि बिना द्वारके घरमें प्रवेश किया जाय तो गोत्रका नाश होता है—ऐसी मान्यता है॥ २०—२४ $\frac{१}{२}$॥
तदनन्तर पीठपर, द्वारके सामने शिवलिङ्गको स्थापित करके नाना प्रकारके वाद्यों तथा मङ्गलसूचक ध्वनियोंके साथ उसपर दूर्वा और अक्षत चढ़ावे तथा 'समुत्तिष्ठ नमः'—ऐसा कहकर महापाशुपत-मन्त्रका पाठ करे। इसके बाद आचार्य गर्तमें रखे हुए घटको वहाँसे हटाकर मूर्तिपालकोंके साथ यन्त्रमें स्थापित करावे और उसमें कुङ्कुम आदिका लेप करके, शक्ति और शक्तिमान्की एकताका चिन्तन करते हुए लयान्त मूल-मन्त्रका उच्चारण करके, उस आलम्बनलक्षित घटका स्पर्शपूर्वक पुनः गर्तमें ही स्थापना करा दे। ब्रह्मभागके एक अंश, दो अंश, आधा अंश अथवा आठवें अंशतक या सम्पूर्ण ब्रह्मभागका
२१६ * अग्निपुराण *
ही गर्तमें प्रवेश करावे। फिर नाभिपर्यन्त दीर्घआँके साथ शीशेका आवरण देकर, एकाग्रचित्त हो, नीचेके गर्तको बालूसे पाट दे और कहे— 'भगवन्! आप सुस्थिर हो जाइये'॥ २५—३०॥
तदनन्तर लिङ्गके स्थिर हो जानेपर सकल (सावयव) रूपवाले परमेश्वरका ध्यान करके, शक्त्यन्त-मूल-मन्त्रका उच्चारण करते हुए, शिवलिङ्गके स्पर्शपूर्वक उसमें निष्कलीकरण-न्यास करे। जब शिवलिङ्गकी स्थापना हो रही हो, उस समय जिस-जिस दिशाका आश्रय ले, उस- उस दिशाके दिक्पाल-सम्बन्धी मन्त्रका उच्चारण करके पूर्णाहुति-पर्यन्त होम करे और दक्षिणा दे। यदि शिवलिङ्गसे शब्द प्रकट हो अथवा उसका मुख्यभाग हिले या फट-फूट जाय तो मूल- मन्त्रसे या 'बहुरूप' मन्त्रद्वारा सौ आहुतियाँ दे। इसी प्रकार अन्य दोष प्राप्त होनेपर शिवशास्त्रोक्त शान्ति करे। उक्त विधिसे यदि शिवलिङ्गमें न्यासका विधान किया जाय तो कर्ता दोषका भागी नहीं होता। तदनन्तर लक्षणस्पर्शरूप पीठबन्ध करके गौरीमन्त्रसे उसका लय करे। फिर पिण्डीमें सृष्टिन्यास करे॥ ३१—३५॥
लिङ्गके पार्श्वभागमें जो संधि (छिद्र) हो, उसको बालू एवं वज्रलेपसे भर दे। तत्पश्चात् गुरु मूर्तिपालकोंके साथ शान्तिकलशके आधे जलसे शिवलिङ्गको नहलाकर, अन्य कलशों तथा पञ्चामृत आदिसे भी अभिषिक्त करे। फिर चन्दन आदिका लेप लगा, जगदीश्वर शिवकी पूजा करके, उमा-महेश्वर-मन्त्रोंद्वारा लिङ्गमुद्रासे उन दोनोंका स्पर्श करे। इसके बाद छहों अध्वाओंके न्यासपूर्वक त्रितत्त्वन्यास करके, मूर्तिन्यास, दिक्पालन्यास, अङ्गन्यास एवं ब्रह्मन्यासपूर्वक ज्ञानाशक्तिका लिङ्गमें तथा क्रियाशक्तिका पीठमें न्यास करनेके पश्चात् स्नान करावे॥ ३६—३९॥
गन्धका लेपन करके धूप दे और व्यापकत्वरूपसे शिवका न्यास करे। हृदय-मन्त्रद्वारा पुष्पमाला, धूप, दीप, नैवेद्य और फल निवेदन करे। यथाशक्ति इन वस्तुओंको निवेदित करनेके पश्चात् महादेवजीको आचमन करावे। फिर विशेषार्घ्य देकर मन्त्र जपे और भगवान्के वरदायक हाथमें उस जपको अर्पित करनेके पश्चात् इस प्रकार कहे—'हे नाथ! जबतक चन्द्रमा, सूर्य और तारोंकी स्थिति रहे, तबतक मूर्तीशों तथा मूर्तिपालकोंके साथ आप स्वेच्छापूर्वक ही इस मन्दिरमें सदा स्थित रहें।' ऐसा कहकर प्रणाम करनेके पश्चात् बाहर जाय और हृदय या प्रणव- मन्त्रसे वृषभ (नन्दिकेश्वर)-की स्थापना करके, फिर पूर्ववत् बलि निवेदन करे। तत्पश्चात् न्यूनता आदि दोषके निराकरणके लिये मृत्युञ्जय- मन्त्रसे सौ बार समिधाओंकी आहुति दे एवं शान्तिके लिये खीरसे होम करे॥ ४०—४४॥
इसके बाद यों प्रार्थना करे—'महाविभो! ज्ञान अथवा अज्ञानपूर्वक कर्ममें जो त्रुटि रह गयी है, उसे आप पूर्ण करें।' यों कहकर यथाशक्ति सुवर्ण, पशु एवं भूमि आदि सम्पत्ति तथा गीत- वाद्य आदि उत्सव, सर्वकारणभूत अम्बिकानाथ शिवको भक्तिपूर्वक समर्पित करे। तदनन्तर चार दिनोंतक लगातार दान एवं महान् उत्सव करे। मन्त्रज्ञ आचार्यको चाहिये कि उत्सवके इन चार दिनोंमेंसे तीन दिनोंतक तीनों समय मूर्तिपालकोंके साथ होम करे और चौथे दिन पूर्णाहुति देकर, बहुरूप-सम्बन्धी मन्त्रसे चरु निवेदित करे। सभी कुण्डोंमें सम्पाताहुतिसे शोधित चरु अर्पित करना चाहिये। उक्त चार दिनोंतक निर्माल्य न हटाये। चौथे दिनके बाद निर्माल्य हटाकर, स्नान करानेके पश्चात् पूजन करे। सामान्य लिङ्गोंमें साधारण मन्त्रोंद्वारा पूजा करनी चाहिये। लिङ्ग-चैतन्यको छोड़कर स्थाणु-विसर्जन करे। असाधारण लिङ्गोंमें 'क्षमस्व' इत्यादि कहकर विसर्जन
- अध्याय ९७ * २१७
करे ॥ ४५—५० ॥
आवाहन, अभिव्यक्ति, विसर्ग, शक्तिरूपता और प्रतिष्ठा—ये पाँच बातें मुख्य हैं। कहीं-कहीं प्रतिष्ठाके अन्तमें स्थिरता आदि गुणोंकी सिद्धिके लिये सात आहुतियाँ देनेका विधान है। भगवान् शिव स्थिर, अप्रमेय, अनादि, बोधस्वरूप, नित्य, सर्वव्यापी, अविनाशी एवं आत्मतृप्त हैं। महेश्वरकी संनिधि या उपस्थितिके लिये ये गुण कहे गये हैं। आहुतियोंका क्रम इस प्रकार है—‘ॐ नमः शिवाय स्थिरो भव नमः स्वाहा।’—इत्यादि। इस प्रकार इस कार्यका सम्पादन करके शिव-कलशकी भाँति दो कलश और तैयार करे। उनमेंसे एक कलशके जलसे भगवान् शिवको स्नान कराकर, दूसरा यजमानके स्नानके लिये रखे। (कहीं-कहीं ‘कर्मस्थानाय धारयेत्।’ ऐसा पाठ है। इसके अनुसार दूसरे कलशका जल कर्मानुष्ठानके लिये स्थापित करे, यह अर्थ समझना चाहिये।) इसके बाद बलि देकर आचमन करनेके पश्चात् शिवकी आज्ञासे बाहर जाय ॥ ५१–५५ ॥
याग-मण्डपके बाहर मन्दिरके ईशानकोणमें चण्डका स्थापन-पूजन करे। फिर मण्डपमें धामके गर्भके बराबर उत्तम पीठपर आसनकी कल्पना करके, पूर्ववत् न्यास, होम, आदिका अनुष्ठान करे। फिर ध्यानपूर्वक ‘सद्योजात’ आदिकी स्थापना करके, वहाँ ब्रह्माङ्गोंद्वारा विधिवत् पूजन करे। ब्रह्माङ्गोंका वर्णन पहले किया जा चुका है। अब जिस प्रकार मन्त्रद्वारा पूजन किया जाता है, उसे सुनो—‘ॐ वं सद्योजाताय हूं फट् नमः।’ ‘ॐ विं वामदेवाय हूं फट् नमः।’<sup>१</sup> ‘ॐ वुं अघोराय हूं फट् नमः।’ इसी प्रकार ‘ॐ वें तत्पुरुषाय हूं फट् नमः।’ तथा ‘ॐ वों ईशानाय हूं फट् नमः।’—ये मन्त्र हैं<sup>१</sup> ॥ ५६–५९ ॥
इस प्रकार जप निवेदन करके, तर्पण करनेके पश्चात्, स्तुतिपूर्वक विज्ञापना देकर चण्डेशसे प्रार्थना करे—‘हे चण्डेश! जबतक श्रीमहादेवजी यहाँ विराजमान हैं, तबतक तुम भी इसके समीप विद्यमान रहो। मैंने अज्ञानवश जो कुछ भी न्यूनाधिक कर्म किया है, वह सब तुम्हारे कृपाप्रसादसे पूर्ण हो जाय। तुम स्वयं उसे पूर्ण करो।’ जहाँ बाणलिङ्ग (नर्मदेश्वर) हो, जहाँ चल लोहमय (सुवर्णमय) लिङ्ग हो, जहाँ सिद्धलिङ्ग (ज्योतिर्लिङ्गादि) तथा स्वयम्भूतिङ्ग हों, वहाँ और सब प्रकारकी प्रतिमाओंपर चढ़े हुए निर्माल्यमें चण्डेशका अधिकार नहीं होता है। अद्वैतभावनायुक्त यजमानपर तथा स्थण्डिलेश-विधिमें भी चण्डेशका अधिकार नहीं है।<sup>२</sup> चण्डका पूजन करके स्नापक (अभिषेक करनेवाला गुरु) स्वयं ही पत्नी और पुत्रसहित यजमानको पूर्व-स्थापित कलशके जलसे स्नान करावे। यजमान भी स्नापक गुरुका महेश्वरकी भाँति पूजन करके, धनकी कंजूसी छोड़कर, उन्हें भूमि और सुवर्ण आदिकी दक्षिणा दे ॥ ६०–६४ $\frac{१}{२}$ ॥
तत्पश्चात् मूर्तिपालकों तथा जपकर्ता ब्राह्मणोंका, ज्योतिषीका और शिल्पीका भी भलीभाँति विधिवत् पूजन करके दीनों और अनाथों आदिको भोजन करावे। इसके बाद यजमान गुरुसे इस प्रकार प्रार्थना करे—‘हे भगवन्! यहाँ सम्मुख करनेके लिये मैंने आपको जो कष्ट दिया है, वह सब आप क्षमा करें; क्योंकि नाथ! आप करुणाके सागर हैं, अतः मेरा सारा अपराध भूल जायँ।’ इस प्रकार प्रार्थना करनेवाले यजमानको सद्गुरु
१. इन मन्त्रोंके विषयमें पाठभेद मिलता है। सोमशम्भुकी ‘कर्मकाण्ड-क्रमावली’में ये मन्त्र इस प्रकार दिये गये हैं—‘ॐ चैं सद्योजाताय हूं फट् नमः।’ ‘ॐ चैं तत्पुरुषाय हूं फट् नमः।’ ‘ॐ चौं प्रशमनाय हूं फट् नमः।’
२. बाणलिङ्गे चले लोहे सिद्धलिङ्गे स्वयम्भुवि।
प्रतिमासु च सर्वासु न चण्डोऽधिकृतो भवेत्। अद्वैतभावनायुक्ते स्थण्डिलेशविधावपि॥ (अग्नि० ९७। ६२-६३)
२१८ * अग्निपुराण *
अपने हाथसे कुश, पुष्प और अक्षतपुञ्जके साथ प्रतिष्ठाजनित पुण्यकी सत्ता समर्पित करे, जिसका स्वरूप चमकते हुए तारोंके समान दीप्तिमान् है ॥ ६५–६८ ॥
तदनन्तर, पाशुपत-मन्त्रका जप करके, परमेश्वरको प्रणाम करनेके अनन्तर, भूतगणोंको बलि अर्पित करे और इस प्रकार उन सबको समीप लाकर यों निवेदन करे—'आपलोगोंको तबतक यहाँ स्थित रहना चाहिये, जबतक महादेवजी यहाँ विराजमान हैं।' वस्त्र आदिसे युक्त याग-मण्डपको गुरु अपने अधिकारमें ले ले तथा समस्त उपकरणोंसे युक्त स्नापन-मण्डपको शिल्पी ग्रहण करे। अन्य देवता आदिकी आगमोक्त मन्त्रोंद्वारा स्थापना करनी चाहिये। सूर्यके वर्णभेदके अनुसार उन देवता आदिके वर्णभेद समझने चाहिये। वे अपने तैजस-तत्त्वमें व्याप्त हैं—ऐसी भावना करनी चाहिये। साध्य आदि देवता, सरिताएँ, ओषधियाँ, क्षेत्रपाल और किंनर आदि—ये सब पृथ्वीतत्त्वके आश्रित हैं। कहीं-कहीं सरस्वती, लक्ष्मी और नदियोंका स्थान जलमें बताया गया है ॥ ६९–७३ ॥
भुवनाधिपतियोंका स्थान वही है, जहाँ उनकी स्थिति है। अहंकार, बुद्धि और प्रकृति—ये तीन तत्त्व ब्रह्माके स्थान हैं। तन्मात्रासे लेकर प्रधान-पर्यन्त तीन तत्त्व श्रीहरिके स्थान हैं। नाट्येश, गण, मातृका, यक्षराज, कार्तिकेय तथा गणेशका अण्डजादि शुद्ध विद्यान्त-तत्त्व है। मायांश देशसे लेकर शक्ति-पर्यन्त तत्त्व शिवा, शिव तथा उग्रतेजवाले सूर्यदेवका स्थान है। व्यक्त प्रतिमाओंके लिये ईश्वर-पर्यन्त पद बताया गया है। स्थापनाकी सामग्रीमें जो कूर्म आदिका वर्णन किया गया है तथा जो रत्न आदि पाँच वस्तुएँ कही गयी हैं, उन सबको देवपीठके गर्तमें डाल दे, परंतु पाँच ब्रह्मशिलाओंको उसमें न डाले ॥ ७४–७७$\frac{१}{२}$ ॥
मन्दिरके गर्भका छः भागोंमें विभाजन करके छठे भागको त्याग दे और पाँचवें भागमें देवताकी स्थापना करे। अथवा मन्दिरके गर्भका आठ भाग करके सातवें भागमें प्रतिमाओंकी स्थापना करे तो वह सुखावह होता है। लेप अथवा चित्रमय विग्रहकी स्थापनामें पञ्चभूतोंकी धारणाओंद्वारा विशुद्धि होती है। वहाँ स्नान आदि कार्य जलसे नहीं, मानसिक किये जाते हैं। वैसे विग्रहोंको शिला एवं रत्न आदिके भवनमें रखना चाहिये। उनमें नेत्रोन्मीलन तथा आसन आदिकी कल्पना अभीष्ट है। इनकी पूजा जलरहित पुष्पोंसे करनी चाहिये, जिससे चित्र दूषित न हो ॥ ७८–८१ ॥
अब चल लिङ्गोंके लिये स्थापनाकी विधि बतायी जाती है। गर्भस्थानके पाँच अथवा तीन भाग करके एक भागको छोड़ दे और तीसरे या दूसरे भागमें चल लिङ्गकी स्थापना करे। इसी प्रकार उनके पीठोंके लिये भी करना चाहिये। लिङ्गोंमें तत्त्वभेदसे पूजनकी प्रक्रियामें भेद होता है। स्फटिक आदिके लिङ्गोंमें इष्टमन्त्रसे (अथवा सृष्टि-मन्त्रसे) विधिवत् संस्कार होना चाहिये। इसके सिवा वहाँ ब्रह्मशिला एवं रत्नप्रभृतिका निवेदन अपेक्षित नहीं है ॥ ८२–८४ ॥
पिण्डिकाकी योजना भी मनसे ही कर लेनी चाहिये। स्वयम्भू्लिङ्ग और बाणलिङ्ग आदिमें संस्कारका नियम नहीं है।* उन लिङ्गोंको संहिता-मन्त्रोंसे स्नान कराना चाहिये। वैदिक विधिसे ही उनके लिये न्यास और होम करना चाहिये। नदी, समुद्र तथा रोह—इनके स्थापन करानेका विधान पूर्ववत् है ॥ ८५–८६ ॥
इहलोकमें जो मृत्तिका आदिके अथवा आटे आदिके शिवलिङ्गका पूजन किया जाता है, वह तात्कालिक होता है। अर्थात् पूजन-कालमें ही लिङ्ग-निर्माण करके वीक्षणादि विधानसे उनकी
* पाठान्तरके अनुसार वहाँ पीठके ही संस्कारका नियम है, लिङ्गका नहीं।
* अध्याय ९८ * २१९
शुद्धि करे। तत्पश्चात् विधिवत् पूजन करना चाहिये। पूजनके पश्चात् मन्त्रोंको लेकर अपने-आपमें स्थापित करे और उस लिङ्गको जलमें डाल दे। एक वर्षतक ऐसा करनेसे वह लिङ्ग और उसका पूजन मनोवाञ्छित फल देनेवाला होता है। विष्णु आदि देवताओंकी स्थापनाके मन्त्र अलग हैं। उन्हींके द्वारा उनकी स्थापना करनी चाहिये॥ ८७-८९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शिव-प्रतिष्ठाकी विधिका वर्णन' नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९७॥
अट्ठानबेवाँ अध्याय
गौरी-प्रतिष्ठा-विधि
भगवान् शिव कहते हैं—स्कन्द! अब मैं पूजासहित गौरीकी प्रतिष्ठाका वर्णन करूँगा, सुनो। पूर्ववत् मण्डप आदिकी रचना करके देवीकी स्थापना एवं शय्याधिवासन करे। पूर्वोक्त मन्त्रों और मूर्त्यादिकोंका न्यास करके आत्म-तत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्वका परमेश्वरमें स्थापन करे। तदनन्तर पराशक्तिका न्यास, होम और जप पूर्ववत् करके क्रियाशक्तिस्वरूपिणी पिण्डीका संधान करे। सर्वव्यापिनी पिण्डीका ध्यान करके वहाँ रत्न आदिका न्यास करे। इस विधिसे पिण्डीकी स्थापना करके उसके ऊपर देवीको स्थापित करे॥ १–४॥
वे देवी परमशक्तिस्वरूपा हैं। उनका अपने ही मन्त्रसे सृष्टि-न्यासपूर्वक स्थापन करे। तदनन्तर पीठमें क्रियाशक्तिका और देवीके विग्रहमें ज्ञानशक्तिका न्यास करे। इसके बाद सर्वव्यापिनी शक्तिका आवाहन करके देवीकी प्रतिमामें उसका नियोजन करे। फिर 'शिवा' नामवाली अम्बिका देवीका स्पर्शपूर्वक पूजन करे*॥ ५–६॥
पूजाके मन्त्र इस प्रकार हैं—'ॐ आं आधारशक्तये नमः। ॐ कूर्माय नमः। ॐ कन्दाय नमः। ॐ ह्रीं नारायणाय नमः। ॐ ऐश्वर्याय नमः। ॐ अधश्छदनाय नमः। ॐ पद्मासनाय नमः।' तदनन्तर केसरोंकी पूजा करे। तत्पश्चात् 'ॐ ह्रीं कर्णिकायै नमः। ॐ क्षं पुष्कराक्षेभ्यो नमः।'—इन मन्त्रोंद्वारा कर्णिका एवं कमलाक्षोंका पूजन करे। इसके बाद 'ॐ हां पुष्ट्यै नमः। ॐ ह्रीं ज्ञानायै नमः। ॐ हूं क्रियायै नमः।'—इन मन्त्रोंद्वारा पुष्टि, ज्ञाना एवं क्रियाशक्तिका पूजन करे॥ ७–१०॥
'ॐ नालाय नमः। ॐ रं धर्माय नमः। ॐ रुं ज्ञानाय नमः। ॐ वैराग्याय नमः। ॐ अधर्माय नमः। ॐ रं अज्ञानाय नमः। ॐ अवैराग्याय नमः। ॐ अनैश्वर्याय नमः।' —इन मन्त्रोंद्वारा नाल आदिकी पूजा करे।
ॐ हूं वाचे नमः। ॐ हूं रागिण्यै नमः। ॐ हूं ज्वालिन्यै नमः। ॐ हौं शमायै नमः। ॐ हूं ज्येष्ठायै नमः। ॐ हौं रौं क्रौं नवशक्त्यै नमः। —इन मन्त्रोंद्वारा वाक् आदि शक्तियोंकी पूजा करे।
'ॐ गौं गौर्यासनाय नमः। ॐ गौं गौरीमूर्तये नमः।' अब गौरीका मूलमन्त्र बताया जाता है— 'ॐ ह्रीं सः महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा गौर्यै नमः। ॐ गां हृदयाय नमः, ॐ गीं शिरसे स्वाहा। ॐ गूं शिखायै वषट्। ॐ गैं कवचाय हुम्। ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ गः अस्त्राय फट्। ॐ गौं विज्ञानशक्तये नमः।'—इन मन्त्रोंसे शिखा आदिकी पूजा करे॥ ११–१५॥
'ॐ गूं क्रियाशक्तये नमः।'—इस मन्त्रसे क्रियाशक्तिकी पूजा करे। पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि
* पाठान्तरके अनुसार 'अमुकेशी' इत्यादि नामसे उनका स्पर्शपूर्वक पूजन करे। यथा—'रामेश्वर्यै नमः। कृष्णैश्यै नमः।' इत्यादि।
२२० * अग्निपुराण *
देवताओंका पूजन करे। इनके मन्त्र पहले बताये गये हैं। ‘ॐ सुं सुभागायै नमः’—इससे सुभागाका, ‘ॐ ह्रीं ललितायै नमः।’ से ललिताका पूजन करे। ‘ॐ ह्रीं कामिन्यै नमः।’ ‘ॐ हूं काममालिन्यै नमः।’—इन मन्त्रोंसे गौरीकी प्रतिष्ठा, पूजा और जप करनेसे उपासक सब कुछ पा लेता है*॥ १६-१७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘गौरी-प्रतिष्ठा-विधिका वर्णन’ नामक अठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९८॥
निन्यानबेवाँ अध्याय
सूर्यदेवकी स्थापनाकी विधि
**भगवान् शिव बोले—**स्कन्द! अब मैं सूर्यदेवकी प्रतिष्ठाका वर्णन करूँगा। पूर्ववत् मण्डप-निर्माण और स्नान आदि कार्यका सम्पादन करके, पूर्वोक्त विधिसे विद्या तथा साङ्ग सूर्यदेवका आसन-शय्यामें न्यास करके त्रितत्त्वका, ईश्वरका तथा आकाशादि पाँच भूतोंका न्यास करे॥ १-२॥
पूर्ववत् शुद्धि आदि करके पिण्डीका शोधन करे। फिर सदेशपद-पर्यन्त तत्त्व-पञ्चकका न्यास करे। तदनन्तर सर्वतोमुखी शक्तिके साथ विधिवत् स्थापना करके, गुरु सूर्य-सम्बन्धी मन्त्र बोलते हुए शक्त्यन्त सूर्यका विधिवत् स्थापन करे॥ ३-४॥
श्रीसूर्यदेवका स्वाम्यन्त अथवा पादान्त नाम रखे। (यथा विक्रमादित्य-स्वामी अथवा रामादित्यपाद इत्यादि) सूर्यके मन्त्र पहले बताये गये हैं, उन्हींका स्थापनकालमें भी साक्षात्कार (प्रयोग) करना चाहिये॥ ५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘सूर्य-प्रतिष्ठा-विधिका वर्णन’ नामक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९९॥
सौवाँ अध्याय
द्वारप्रतिष्ठा-विधि
**भगवान् शंकर कहते हैं—**स्कन्द! अब मैं द्वारगत प्रतिष्ठाकी विधिका वर्णन करूँगा। द्वारके अङ्गभूत उपकरणोंका कसैले जल आदिसे संस्कार करके उन्हें शय्यापर रखे। द्वारके मूल, मध्य और अग्रभागोंमें आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्वका न्यास करके संनिरोधिनी-मुद्राद्वारा उनका निरोध करे। फिर तदनुरूप होम और जप करके, द्वारके अधोभागमें अनन्त देवताके मन्त्रसे वास्तु-देवताकी
* सोमशम्भुकी ‘कर्मकाण्ड-क्रमावली’में इन मन्त्रोंके स्वरूप और बीज कुछ भिन्न रूपमें मिलते हैं। अतः उन्हें अविकल रूपमें यहाँ उद्धृत किया जाता है—ॐ आं आधारशक्तये नमः। ॐ ईं कन्दराय नमः। ॐ ॐ नालाय नमः। ॐ ऋं धर्माय नमः। ॐ ॠं ज्ञानाय नमः। ॐ लूं वैराग्याय नमः। ॐ लूं ऐश्वर्याय नमः। ॐ ऋं अधर्माय नमः। ॐ ॠं अज्ञानाय नमः। ॐ लूं अवैराग्याय नमः। ॐ लूं अनैश्वर्याय नमः। ॐ अः ऊर्ध्वच्छदनाय नमः। ॐ हां पद्माय नमः। ॐ हं केसरेभ्यो नमः। ॐ हं कर्णिकायै नमः। ॐ हं पुष्करेभ्यो नमः। ॐ हं प्राज्यै नमः। ॐ ह्रीं ज्ञानवत्यै नमः। ॐ हूं क्रियायै नमः। ॐ ह्लं वामायै नमः। ॐ ह्लं वागीश्वर्यै नमः। ॐ ह्रीं ज्वलिन्यै नमः। ॐ ह्रीं ज्येष्ठायै नमः। ॐ ह्रौं रौद्र्यै नमः इति सर्वशक्तयः। ॐ गां गौर्यासन नमः। ॐ गों गौरीमूर्तये नमः। ॐ ह्रीं सः महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा।—इति मूलमन्त्रः। गां हृदयाय नमः। गीं शिरसे स्वाहा। गूं शिखायै वषट्। गैं कवचाय हुम्। गौं नेत्रेभ्यो वौषट्। गः अस्त्राय फट्। ॐ सीं ज्ञानशक्तये नमः। ॐ सूं क्रियाशक्तये नमः। लोकपालमन्त्रास्तु पूर्वोक्ताः। ऐं सैं सुभागायै नमः। ॐ सैं ललितायै नमः। ॐ स्हं कामिन्यै नमः। ॐ स्हौं काममालिन्यै नमः। इत्येता गौरीसमानसख्यः।
- अध्याय १०१ * २२१
पूजा करे। वहीं रत्नादि-पञ्चक स्थापित करके शान्ति-होम करे। तत्पश्चात् जौ, सरसों, बरहंटा, ऋद्धि (ओषधिविशेष), वृद्धि (ओषधिविशेष), पीली सरसों, महातिल, गोमूत् (गोपीचन्दन), दरद (हिङ्गुल या सिंगरफ), नागेन्द्र (नागकेसर), मोहिनी (त्रिपुरमाली या पोई), लक्ष्मणा (सफेद कटेहरी), अमृता (गुरुचि), गोरोचन या लाल कमल, आरगवध (अमलताश) तथा दूर्वा—इन ओषधियोंको मन्दिरके नीचे नींवमें डाले तथा इनकी पोटली बनाकर दरवाजेके ऊपरी भागमें उसकी रक्षाके लिये बाँध दे। बाँधते समय प्रणव मन्त्रका उच्चारण करे॥ १-५॥
दरवाजेको कुछ उत्तर दिशाका आश्रय लेकर स्थापित करना चाहिये। द्वारके अधोभागमें आत्मतत्त्वका, दोनों बाजुओंमें विद्यातत्त्वका, आकाशदेश (खाली जगह)-में तथा सम्पूर्ण द्वार-मण्डलमें सर्वव्यापी शिवतत्त्वका न्यास करे। इसके बाद मूलमन्त्रसे महेशनाथका न्यास करना चाहिये। द्वारका आश्रय लेकर रहनेवाले नन्दी आदि द्वारपालोंके लिये ‘नमः’ पदसे युक्त उनके नाम-मन्त्रोंद्वारा सौ या पचास आहुतियाँ दे। अथवा शक्ति हो तो इससे दूनी आहुतियाँ दे॥ ६-८॥
न्यूनातिरिक्तता-सम्बन्धी दोषसे छुटकारा पानेके लिये अस्त्र-मन्त्रसे सौ आहुतियाँ दे। तदनन्तर पहले बताये अनुसार दिशाओंमें बलि देकर दक्षिणा आदि प्रदान करे॥ ९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘द्वार-प्रतिष्ठाकी विधिका वर्णन’ नामक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १००॥
एक सौ एकवाँ अध्याय
प्रासाद-प्रतिष्ठा
भगवान् शिव कहते हैं—स्कन्द! अब मैं प्रासाद (मन्दिर)-की स्थापनाका वर्णन करता हूँ। उसमें चैतन्यका सम्बन्ध दिखा रहा हूँ। जहाँ मन्दिरके गुंबजकी समाप्ति होती है, वहाँ पूर्ववेदीके मध्यभागमें आधारशक्तिका चिन्तन करके प्रणव-मन्त्रसे कमलका न्यास करे। उसके ऊपर सुवर्ण आदि धातुओंमेंसे किसी एकका बना हुआ कलश स्थापित करे। उसमें पञ्चगव्य, मधु और दूध पड़ा हुआ हो। रत्न आदि पाँच वस्तुएँ डाली गयी हों। कलशपर गन्धका लेप हुआ हो। वह वस्त्रसे आवृत हो तथा उसे सुगन्धित पुष्पोंसे सुवासित किया गया हो। उस कलशके मुखमें आम आदि पाँच वृक्षोंके पल्लव डाले गये हों। हृदय-मन्त्रसे हृदय-कमलकी भावना करके उस कलशको वहाँ स्थापित करना चाहिये॥ १-३$\frac{१}{२}$॥
तदनन्तर गुरु पूरक प्राणायामके द्वारा श्वासको भीतर लेकर, शरीरके द्वारा सकलीकरण क्रियाका सम्पादन करके, स्व-सम्बन्धी मन्त्रसे कुम्भक प्राणायामद्वारा प्राणवायुको भीतर अवरुद्ध करे। फिर भगवान् शंकरकी आज्ञासे सर्वात्मासे अभिन्न आत्मा (जीवचैतन्य)-को जगावे। तत्पश्चात्, रेचक प्राणायामद्वारा द्वादशान्त-स्थानसे प्रज्वलित अग्निकणके समान जीव चैतन्यको लेकर कलशके भीतर स्थापित करे और उसमें आतिवाहिक शरीरका न्यास करके उसके गुणोंके बोधक काल आदिका एवं ईश्वरसहित पृथ्वी-पर्यन्त तत्त्व-समुदायका भी उसमें निवेश करे॥ ४-७॥
इसके बाद उक्त कलशमें दस नाड़ियों, दस प्राणों, (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय तथा मन, बुद्धि और अहंकार—इन) तेरह इन्द्रियों तथा उनके अधिपतियोंकी भी उस कलशमें स्थापना करके, प्रणव आदि नाम-मन्त्रोंसे उनका पूजन करे। अपने-अपने कार्यके कारकरूपसे जो मायापाशके नियामक हैं, उनका, प्रेरक विघ्नेश्वरोंका
२२२ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
तथा सर्वव्यापी शिवका भी अपने-अपने मन्त्रद्वारा वहाँ न्यास और पूजन करे। समस्त अङ्गोंका भी न्यास करके अवरोधिनी-मुद्राद्वारा उन सबका निरोध करे। अथवा सुवर्ण आदि धातुओंद्वारा निर्मित पुरुषकी आकृति, जो ठीक मानव-शरीरके तुल्य हो, लेकर उसे पूर्ववत् पञ्चगव्य एवं कसैले जल आदिसे संस्कृत (शुद्ध) करे। फिर उसे शय्यापर आसीन करके उमापति रुद्रदेवका ध्यान करते हुए शिव-मन्त्रसे उस पुरुष-शरीरमें व्यापक रूपसे उन्हींका न्यास करे॥ ८-११$\frac{१}{२}$॥
उनके संनिधानके लिये होम, प्रोक्षण, स्पर्श एवं जप करे। संनिधापन तथा रोधक आदि सारा कार्य भागत्रय-विभागपूर्वक करे। इस प्रकार प्रकृति-पर्यन्त न्यास सारा विधान पूर्ण करके उस पुरुषको पूर्वोक्त कलशमें स्थापित कर दे॥ १२-१३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रासाद-प्रतिष्ठाकी विधिका वर्णन' नामक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०१॥
एक सौ दोवाँ अध्याय
ध्वजारोपण
**भगवान् शंकर कहते हैं—**स्कन्द! देव-मन्दिरमें शिखर, ध्वजदण्ड एवं ध्वजकी प्रतिष्ठा जिस प्रकार बतायी गयी है, उसका तुमसे वर्णन करता हूँ। शिखरके आधे भागमें शूलका प्रवेश हो अथवा सम्पूर्ण शूलके आधे भागका शिखरमें प्रवेश कराकर प्रतिष्ठा करनी चाहिये। ईंटोंके बने हुए मन्दिरमें लकड़ीका शूल होना चाहिये और प्रस्तरनिर्मित मन्दिरमें प्रस्तरका। विष्णु आदिके मन्दिरमें कलशको चक्रसे संयुक्त करना चाहिये। वह कलश देवमूर्तिकी मापके अनुरूप ही होना चाहिये। कलश यदि त्रिशूलसे युक्त हो तो 'अग्रचूल' या अगचूड नामसे प्रसिद्ध होता है॥ १-३॥
यदि उसके मस्तक-भागमें शिवलिङ्ग हो तो उसे 'ईश शूल' कहते हैं। अथवा शिरोभागमें बिजौरे नीबूकी आकृतिसे युक्त होनेपर भी उसका यही नाम है। शैव-शास्त्रोंमें वैसे शूलका वर्णन मिलता है। जिसकी ऊँचाई जङ्घावेदीके बराबर अथवा जङ्घावेदीके आधे मापकी हो, वह 'चित्रध्वज' कहा गया है। अथवा उसका मान दण्डके बराबर या अपनी इच्छाके अनुसार रखे। जो पीठको आवेष्टित कर ले, वह 'महाध्वज' कहा गया है। चौदह, नौ अथवा छः हाथोंके मापका दण्ड क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधम माना गया है—यह विद्वान् पुरुषोंद्वारा जाननेके योग्य है। ध्वजका दण्ड बाँसका अथवा साखू आदिका हो तो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला होता है॥ ४-७॥
यह ध्वज आरोपण करते समय यदि टूट जाय तो राजा अथवा यजमानके लिये अनिष्टकारक होता है—ऐसा जानना चाहिये। उस दशामें बहुरूप-मन्त्रद्वारा पूर्ववत् शान्ति करे। द्वारपाल आदिका पूजन तथा मन्त्रोंका तर्पण करके ध्वज और उसके दण्डको अस्त्र-मन्त्रसे नहलावे। गुरु इसी मन्त्रसे ध्वजका प्रोक्षण करके मिट्टी तथा कसैले जल आदिसे मन्दिरको भी स्नान करावे। चूलक (ध्वजके ऊपरी भाग)-में गन्धादिका लेप करके उसे वस्त्रसे आच्छादित करे। फिर पूर्ववत् उसे शय्यापर रखकर उसमें लिङ्गकी भाँति न्यास करना चाहिये। परंतु चूलकमें ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिका
- अध्याय १०२ * २२३
न्यास न करे। वहाँ विशेषार्थ-बोधिका चतुर्थी भी वाञ्छित नहीं है और न उसके लिये कुम्भ या कुण्डकी ही कल्पना आवश्यक है॥ ८—१२॥
दण्डमें आत्मतत्त्वका, विद्यातत्त्वका तथा सद्योजात आदि पाँच मुखोंका न्यास करे। फिर ध्वजमें शिवतत्त्वका न्यास करे। वहाँ निष्कल शिवका न्यास करके हृदय आदि अङ्गोंकी पूजा करे। तदनन्तर मन्त्रज्ञ गुरु ध्वज और ध्वजाग्रभागमें संनिधिकरणके लिये फडन्त संहिता-मन्त्रोंद्वारा प्रत्येक भागमें होम करे। किसी और प्रकारसे भी कहीं जो ध्वज-संस्कार किया गया है, वह भी इस प्रकार अस्त्र-याग करके ही करना चाहिये। ये सब बातें मनीषी पुरुषोंने करके दिखायी हैं॥ १३—१५$\frac{१}{२}$॥
मन्दिरको नहलाकर, पुष्पहार और वस्त्र आदिसे विभूषित करके, जङ्घावेदीके ऊपरी भागमें त्रितत्त्व आदिका न्यास, होम आदिका विधान एवं शिवका पूर्ववत् पूजन करके, उनके सर्वतत्त्वमय व्यापक स्वरूपका ध्यान करते हुए व्यापक-न्यास करे। भगवान् शिवके चरणारविन्दमें अनन्त एवं कालरुद्रकी भावना करके पीठमें कूष्माण्ड, हाटक, पाताल तथा नरकोंकी भावना करे। तदनन्तर भुवनों, लोकपालों तथा शतरुद्रादिसे घिरे हुए इस ब्रह्माण्डका ध्यान करके जङ्घावेदीमें स्थापित करे॥ १६—१९$\frac{१}{२}$॥
पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाशरूप पञ्चाष्टक, सर्वावरणसंज्ञक, बुद्धियोन्यष्टक, योगाष्टक, प्रलय-पर्यन्त रहनेवाला त्रिगुण, पटस्थ पुरुष और वाम सिंह—इन सबका भी जङ्घावेदीमें चिन्तन करे; किंतु मञ्जरी वेदिकामें विद्यादि चार तत्त्वोंकी भावना करे। कण्ठमें माया और रुद्रका, अमलसारमें विद्याओंका तथा कलशमें ईश्वर-बिन्दु और विद्येश्वरका चिन्तन करे। चन्द्रार्धस्वरूप शूलमें जटाजूटकी भावना करे। उसी शूलमें त्रिविध शक्तियोंकी तथा दण्डमें नाभिकी भावना करके ध्वजमें कुण्डलिनी शक्तिका चिन्तन करे। इस प्रकार मन्दिरके अवयवोंमें विभिन्न तत्त्वोंकी भावना करनी चाहिये॥ २०—२४$\frac{१}{२}$॥
जगतोसे धाम (प्रासाद या मन्दिर)-का तथा पिण्डिकासे लिङ्गका संधान करके शेष सारा विधान यहाँ भी पूर्ववत् करना चाहिये। इसके बाद गुरु वाद्योंके मङ्गलमय घोष तथा वेदध्वनिके साथ मूर्तिधरोंसहित शिवरूप मूलवाले ध्वज-दण्डको उठाकर जहाँ मन्त्रोच्चारणपूर्वक शक्तिमय कमलका न्यास हुआ है तथा रत्नादि-पञ्चकका भी न्यास हो गया है, वहाँ आधार-भूमिमें उसे स्थापित कर दे॥ २५-२६॥
जब प्रासाद-शिखरपर ध्वज लग जाय, तब यजमान अपने मित्रों और बन्धुओं आदिके साथ मन्दिरकी परिक्रमा करके अभीष्ट फलका भागी होता है। गुरुको चाहिये कि वह अस्त्र आदिके साथ पाशुपतका चिरकालतक चिन्तन करते हुए उन सबके शस्त्रयुक्त अधिपतियोंको मन्दिरकी रक्षाके लिये निवेदन करे। न्यूनता आदि दोषकी शान्तिके लिये होम, दान और दिग्बलि करके यजमान गुरुको दक्षिणा दे। ऐसा करके वह दिव्य धाममें जाता है॥ २७—२९॥
प्रतिमा, लिङ्ग और वेदीके जितने परमाणु होते हैं, उतने सहस्र युगोंतक मन्दिरका निर्माण एवं प्रतिष्ठा करनेवाला यजमान दिव्यलोकमें उत्तम भोग भोगता है। यही उसका प्राप्तव्य फल है॥ ३०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'ध्वजारोपणादिकी विधिका वर्णन' नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०२॥
२२४ * अग्निपुराण *
एक सौ तीनवाँ अध्याय
शिवलिङ्ग आदिके जीर्णोद्धारकी विधि
भगवान् शंकर कहते हैं—स्कन्द! जीर्ण आदि लिङ्गोंके विधिवत् उद्धारका प्रकार बता रहा हूँ। जिसका चिह्न मिट गया हो, जो टूट-फूट गया हो, मैल आदिसे स्थूल हो गया हो, वज्रसे आहत हुआ हो, सम्पुटित (बंद) हो, फट गया हो, जिसका अङ्ग-भङ्ग हो गया हो तथा जो इसी तरहके अन्य विकारोंसे ग्रस्त हो—ऐसे दूषित लिङ्गोंकी पिण्डी तथा वृषभका तत्काल त्याग कर देना चाहिये॥ १-२॥
जो शिवलिङ्ग किसीके द्वारा चालित हो या स्वयं चलित हो, अत्यन्त नीचा हो गया हो, विषम स्थानमें स्थित हो; जहाँ दिङ्मोह होता हो, जो किसीके द्वारा गिरा दिया गया हो अथवा जो मध्यस्थ होकर भी गिर गया हो—ऐसे लिङ्गकी पुनः ठीकसे स्थापना कर देनी चाहिये। परंतु यदि वह व्रणरहित हो, तभी ऐसा किया जा सकता है। यदि वह नदीके जलप्रवाहद्वारा वहाँसे अन्यत्र हटा दिया जाता हो तो उस स्थानसे अन्यत्र भी शास्त्रीय विधिके अनुसार उसकी स्थापना की जा सकती है। जो शिवलिङ्ग अच्छी तरह स्थित हो, सुदृढ़ हो, उसे विचलित करना या चलाना नहीं चाहिये॥ ३-५॥
जो अस्थिर या अदृढ़ हो, उस शिवलिङ्गको यदि चालित करे तो उसकी शान्तिके लिये एक सहस्त्र आहुतियाँ दे तथा सौ आहुतियाँ देकर पुनः उसकी स्थापना करे। जीर्णता आदि दोषोंसे युक्त शिवलिङ्ग भी यदि नित्यपूजा-अर्चा आदिसे युक्त हो तो उसे सुस्थित ही रहने दे; चालित न करे। जीर्णोद्धारके लिये दक्षिणदिशामें एक मण्डप बनावे। ईशानकोणमें पश्चिम द्वारका एक फाटक लगा दे। द्वारपूजा आदि करके, वेदीपर शिवजीकी पूजा करे। इसके बाद मन्त्रोंका पूजन और तर्पण करके वास्तुदेवताकी पूर्ववत् पूजा करे। तदनन्तर बाहर जा, दिशाओंमें बलि दे, स्वयं आचमन करनेके पश्चात् गुरु ब्राह्मणोंको भोजन करावे। तत्पश्चात् भगवान् शंकरको इस प्रकार विज्ञप्ति दे—॥ ६-८॥
'शम्भो! यह लिङ्ग दोषयुक्त हो गया है। इसके उद्धार करनेसे शान्ति होगी—ऐसा आपका वचन है। अतः विधिपूर्वक इसका अनुष्ठान होने जा रहा है। शिव! इसके लिये आप मेरे भीतर स्थित होइये और अधिष्ठाता बनकर इस कार्यका सम्पादन कीजिये।' देवेश्वर शिवको इस प्रकार विज्ञप्ति देकर मधु और घृतमिश्रित खीर एवं दूर्वाद्वारा मूल-मन्त्रसे एक सौ आठ आहुतियाँ देकर शान्ति-होमका कार्य सम्पन्न करे। तदनन्तर लिङ्गको स्नान कराकर वेदीपर इसकी पूजा करे। पूजनकालमें 'ॐ व्यापकेश्वराय शिवाय नमः।' इस मन्त्रका उच्चारण करे। अङ्गपूजा और अङ्गन्यासके मन्त्र इस प्रकार हैं—'ॐ व्यापकेश्वराय हृदयाय नमः। ॐ व्यापकेश्वराय शिरसे स्वाहा। ॐ व्यापकेश्वराय शिखायै वषट्। ॐ व्यापकेश्वराय कवचाय हुम्। ॐ व्यापकेश्वराय नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ व्यापकेश्वराय अस्त्राय फट्।'॥ ९-१३॥
तत्पश्चात् उस शिवलिङ्गके आश्रित रहनेवाले भूतको अस्त्र-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक सुनावे—'यदि कोई भूत-प्राणी यहाँ इस लिङ्गका आश्रय लेकर रहता है, वह भगवान् शिवकी आज्ञासे इस लिङ्गको त्यागकर, जहाँ इच्छा हो, वहाँ चला जाय। अब यहाँ विद्या तथा विद्येश्वरोंके साथ साक्षात् भगवान् शम्भु निवास करेंगे।' इसके बाद पाशुपतमन्त्रसे प्रत्येक भागके लिये सहस्त्र आहुतियाँ देकर शान्तिजलसे प्रोक्षण करे। फिर कुशोंद्वारा स्पर्श करके उक्त मन्त्रको जपे॥ १४-१६॥