अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अध्याय १०५ * २२७
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है और क्षेत्रसे वेध होनेपर धनकी हानि होती है ॥ ३०-३१ ॥
प्रासाद, गृह एवं शाला आदिके मार्गोंसे द्वारोंके विद्ध होनेपर बन्धन प्राप्त होता है, सभासे वेध प्राप्त होनेपर दरिद्रता होती है तथा वर्णसे वेध हो तो निराकरण (तिरस्कार) प्राप्त होता है। उलूखलसे वेध हो तो दारिद्र्य, शिलासे वेध हो तो शत्रुता और छायासे वेध हो तो निर्धनता प्राप्त होती है। इन सबका छेदन अथवा उत्पाटन हो जानेसे वेध-दोष नहीं लगता है। इनके बीचमें चहारदीवारी उठा दी जाय तो भी वेध-दोष दूर हो जाता है। अथवा सीमासे दुगुनी भूमि छोड़कर ये वस्तुएँ हों तो भी वेध-दोष नहीं होता है ॥ ३२-३४ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सामान्य-प्रासादलक्षण-वर्णन' नामक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥
एक सौ पाँचवाँ अध्याय नगर, गृह आदिकी वास्तु-प्रतिष्ठा-विधि
भगवान् शंकर कहते हैं—स्कन्द! नगर, ग्राम तथा दुर्ग आदिमें गृहों और प्रासादोंकी वृद्धि हो, इसकी सिद्धिके लिये इक्यासी पदोंका वास्तुमण्डल बनाकर उसमें वास्तु-देवताकी पूजा अवश्य करनी चाहिये। (दस रेखा पश्चिमसे पूर्वकी ओर और दस दक्षिणसे उत्तरकी ओर खींचनेपर इक्यासी पद तैयार होते हैं।) पूर्वाभिमुखी दस रेखाएँ दस नाडियोंकी प्रतीकभूता हैं। उन नाडियोंके नाम इस प्रकार बताये गये हैं—शान्ता, यशोवती, कान्ता, विशाला, प्राणवाहिनी, सती, वसुमती, नन्दा, सुभद्रा और मनोरमा। उत्तराभिमुख प्रवाहित होनेवाली दस नाडियाँ और हैं, जो उक्त नौ पदोंको इक्यासी पदोंमें विभाजित करती हैं; उनके नाम ये हैं—हरिणी, सुप्रभा, लक्ष्मी, विभूति, विमला, प्रिया, जया, (विजया,) ज्वाला और विशोका। सूत्रपात करनेसे ये रेखामयी नाडियाँ अभिव्यक्त होकर चिन्तनका विषय बनती हैं ॥ १–४ ॥
ईश आदि आठ-आठ देवता 'अष्टक' हैं, जिनका चारों दिशाओंमें पूजन करना चाहिये। (पूर्वादि चार दिशाओंके पृथक्-पृथक् अष्टक हैं।) ईश, घन (पर्जन्य), जय (जयन्त), शक्र (इन्द्र), अर्क (आदित्य या सूर्य), सत्य, भृश और व्योम (आकाश)—इन आठ देवताओंका वास्तुमण्डलमें पूर्व दिशाके पदोंमें पूजन करना चाहिये। हव्यवाह (अग्नि), पूषा, वितथ, सौम (सोमपुत्र गृहक्षत), कृतान्त (यम), गन्धर्व, भृङ्ग (भृङ्गराज) और मृग—इन आठ देवताओंकी दक्षिण दिशाके पदोंमें अर्चना करनी चाहिये। पितर, द्वारपाल (या दौवारिक), सुग्रीव, पुष्पदन्त, वरुण, दैत्य (असुर), शेष (या शोष) और यक्ष्मा (पापयक्ष्मा)—इन आठोंका सदा पश्चिम दिशाके पदोंमें पूजन करनेकी विधि है। रोग, अहि (नाग), मुख्य, भल्लाट, सोम, शैल (ऋषि), अदिति और दिति—इन आठोंकी उत्तर दिशाके पदोंमें पूजा होनी चाहिये। वास्तुमण्डलके मध्यवर्ती नौ पदोंमें ब्रह्माजी पूजित होते हैं और शेष अड़तालीस पदोंमेंसे आधेमें अर्थात् चौबीस पदोंमें वे देवता पूजनीय हैं, जो अकेले छः पदोंपर अधिकार रखते हैं। [ब्रह्माजीके चारों ओर एक-एक करके चार देवता षट्पदगामी हैं—जैसे पूर्वमें मरीचि (या अर्यमा), दक्षिणमें विवस्वान्, पश्चिममें मित्र देवता तथा उत्तरमें पृथ्वीधर।] ॥ ५-८ ॥
२२८ * अग्निपुराण *
ब्रह्माजी तथा ईशके मध्यवर्ती कोष्ठकोंमें जो दो पद हैं, उनमें ‘आप’की तथा नीचेवाले दो पदोंमें ‘आपवत्स’की पूजा करे। इसके बाद छः पदोंमें मरीचिकी अर्चना करे। मरीचि और अग्निके बीचमें जो कोणवर्ती दो पद हैं, उनमें सविताकी स्थिति है और उनसे निम्नभागके दो पदोंमें सावित्र तेज या सावित्रीकी। उसके नीचे छः पदोंमें विवस्वान् विद्यमान हैं। पितरों और ब्रह्माजीके बीचके दो पदोंमें विष्णु-इन्दु स्थित हैं और नीचेके दो पदोंमें इन्द्र-जय विद्यमान हैं, इनकी पूजा करे। वरुण तथा ब्रह्माके मध्यवर्ती छः पदोंमें मित्र-देवताका यजन करे। रोग तथा ब्रह्माके बीचवाले दो पदोंमें रुद्र-रुद्रदासकी पूजा करे और नीचेके दो पदोंमें यक्ष्मकी। फिर उत्तरके छः पदोंमें धराधर (पृथ्वीधर)-का यजन करे। फिर मण्डलके बाहर ईशानादि कोणोंके क्रमसे चरकी, स्कन्द, बिदारीविकट, पूतना, जम्भ, पापा (पापराक्षसी) तथा पिलिपिच्छ (या पिलिपित्स) — इन बालग्रहोंकी पूजा करे॥ ९-१३॥
इक्यासी पदोंसे युक्त वास्तुचक्र
| ईशान<br>चरकी | पूर्व<br>इन्द्र<br>स्कन्द | अग्नि<br>बिदारी | ||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १<br>ईश | २<br>(पर्जन्य)<br>घन | ३<br>(जयन्त)<br>जय | ४<br>(इन्द्र)<br>शक्र | ५ अर्क<br>(आदित्य<br>या सूर्य) | ६<br>सत्य | ७<br>भृश | ८<br>व्योम<br>(आकाश) | ९<br>हव्यवाह<br>(अग्नि) |
| ३२<br>दिति | ३३<br>आप | आप | मरीचि | मरीचि | मरीचि | सविता | ३४<br>सविता | १०<br>पूषा |
| ३१<br>अदिति | आपवत्स | ४४<br>आपवत्स | मरीचि | ३७<br>मरीचि | मरीचि | सावित्री | ३८<br>सावित्री | ११<br>वितथ |
| ३०<br>गिरि(शैल)<br>या ऋषि | पृथ्वीधर | पृथ्वीधर | विवस्वान् | विवस्वान् | १२<br>सोम<br>(गृहक्षत) | |||
| २९<br>सोम | पृथ्वीधर | ४३<br>पृथ्वीधर | ४५<br>ब्रह्मा | ३९<br>विवस्वान् | विवस्वान् | १३ कृतान्त<br>(धर्मराज<br>या यम) | ||
| २८<br>भल्लाट | पृथ्वीधर | पृथ्वीधर | विवस्वान् | विवस्वान् | १४<br>गन्धर्व | |||
| २७<br>मुख्य | रुद्र-<br>रुद्रदास | ४२<br>रुद्र-<br>रुद्रदास | मित्र | ४१<br>मित्र | मित्र | ४०<br>विष्णु-इन्दु | विष्णु-इन्दु | १५<br>भृङ्ग या<br>भृङ्गराज |
| २६<br>अहि<br>(नाग) | ३६<br>यक्ष्म | यक्ष्म | मित्र | मित्र | मित्र | इन्द्र-जय | ३५<br>इन्द्र-जय | १६<br>मृग |
| २५<br>रोग | २४<br>यक्ष्मा<br>(पापयक्ष्मा) | २३<br>शेष या<br>शोष | २२<br>दैत्य<br>(असुर) | २१<br>वरुण | २०<br>पुष्पदन्त | १९<br>सुग्रीव | १८<br>द्वारपाल<br>(दौवारिक) | १७<br>पितर |
| पापा (पापराक्षसी)<br>वायु | जम्भ<br>वरुण | पूतना<br>निर्ऋति |
पार्श्व-निर्देश:
- उत्तर / पिलिपिच्छ (पिलिपित्स) / सोम (कुबेर) (वाम पार्श्व)
- कन्दर्प (विकट) / दक्षिण (यम) (दक्षिण पार्श्व)
- अध्याय १०५ * २२९
यह इक्यासी पदवाले वास्तुचक्रका वर्णन हुआ। एक शतपद-मण्डप भी होता है। उसमें भी पूर्ववत् देवताओंकी पूजाका विधान है। शतपदचक्रके मध्यवर्ती सोलह पदोंमें ब्रह्माजीकी पूजा करनी चाहिये। ब्रह्माजीके पूर्व आदि चार दिशाओंमें स्थित मरीचि, विवस्वान्, मित्र तथा पृथ्वीधरकी दस-दस पदोंमें पूजाका विधान है। अन्य जो ईशान आदि कोणोंमें स्थित देवता हैं, जैसे दैत्योंकी माता दिति और ईश; अग्नि तथा मृग (पूषा) और पितर तथा पापयक्ष्मा और अनिल (रोग)—वे सब-के-सब डेढ़-डेढ़ पदमें अवस्थित हैं॥ १४—१६॥
स्कन्द! अब मैं यज्ञ आदिके लिये जो मण्डप होता है, उसका संक्षेपसे तथा क्रमशः वर्णन करूँगा। तीस हाथ लंबा और अट्ठाईस हाथ चौड़ा मण्डप शिवका आश्रय है। लंबाई और चौड़ाई—दोनोंमें ग्यारह-ग्यारह हाथ घटा देनेपर उन्नीस हाथ लंबा और सत्रह हाथ चौड़ा मण्डप शिव-संज्ञक होता है। बाईस हाथ लम्बा और उन्नीस हाथ चौड़ा अथवा अठारह हाथ लम्बा तथा पन्द्रह हाथ चौड़ा मण्डप हो तो वह सावित्र-संज्ञावाला कहा गया है। अन्य गृहोंका विस्तार आंशिक होता है। दीवारकी जो मोटी उपजङ्घा (कुर्सी) होती है, उसकी ऊँचाईसे दीवारकी ऊँचाई तिगुनी होनी चाहिये। दीवारके लिये जो सूतसे मान निश्चित किया गया हो, उसके बराबर ही उसके सामने भूमि (सहन) होनी चाहिये। वह वीथीके भेदसे अनेक भेदवाली होती है॥ १७—२०॥
‘भद्र’ नामक प्रासादमें वीथियोंके समान ही ‘द्वारवीथी’ होती है; केवल वीथीका अग्रभाग द्वारवीथीमें नहीं होता है। ‘श्रीजय’ नामक प्रासादमें जो द्वारवीथी होती है, उसमें वीथीका पृष्ठभाग नहीं होता है। वीथीके पार्श्वभागोंको द्वारवीथीमें कम कर दिया जाय, तो उससे उपलक्षित प्रासादकी भी ‘भद्र’ संज्ञा ही होती है। गर्भके विस्तारकी ही भाँति वीथीका भी विस्तार होता है। कहीं-कहीं उसके आधे या चौथाई भागके बराबर भी होता है। वीथीके आधे मानसे उपवीथी आदिका निर्माण करना चाहिये। वह एक, दो या तीन पुरोंसे युक्त होता है। अब अन्य साधारण गृहोंके विषयमें बताया जाता है; गृहका वैसा स्वरूप हो तो वह सबकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है। वह क्रमशः एक, दो, तीन, चार और आठ शालाओंसे युक्त होता है। एक शालावाले गृहकी शाला दक्षिणभागमें बनती है और उसका दरवाजा उत्तरकी ओर होता है। यदि दो शालाएँ बनानी हों तो पश्चिम और पूर्वमें बनवाये और उनका द्वार आमने-सामने पूर्व-पश्चिमकी ओर रखे। चार शालाओंवाला गृह चार द्वारों और अलिन्दोंसे युक्त होनेके कारण सर्वतोमुख होता है। वह गृहस्वामीके लिये कल्याणकारी है। पश्चिम दिशाकी ओर दो शालाएँ हों तो उस द्विशाल-गृहको ‘यमसूर्यक’ कहा गया है। पूर्व तथा उत्तरकी ओर शालाएँ हों तो उस गृहकी ‘दण्ड’ संज्ञा है तथा पूर्व-दक्षिणकी ओर दो शालाएँ हों तो वह गृह ‘वात’ संज्ञक होता है। जिस तीन शालावाले गृहमें पूर्व दिशाकी ओर शाला न हो, उसे ‘सुक्षेत्र’ कहा गया है, वह बुद्धिदायक होता है*॥ २१—२६॥
यदि दक्षिण दिशामें कोई शाला न हो (और
* मत्स्यपुराणमें एकशाल, द्विशाल, त्रिशाल और चतुःशाल-गृहका परिचय इस प्रकार दिया है—जिसमें एक दिशामें एक ही शाला (कमरा) हो और अन्य दिशाओंमें कोई कमरा न होकर बरामदा मात्र हो, वह ‘एकशाल-गृह’ है। इसी तरह दो दिशाओंमें दो कमरे और तीन दिशाओंमें तीन कमरे तथा चारों दिशाओंमें चार कमरे होनेपर उन घरोंको क्रमशः ‘द्विशाल’, ‘त्रिशाल’ और ‘चतुःशाल’ कहते हैं। चतुःशाल-गृहमें चारों ओर कमरे एवं चारों ओर दरवाजे होते हैं और वे द्वार आमने-सामने बने होते हैं। अतः वह सर्वतोमुखगृह है और उसका नाम ‘सर्वतोभद्र’ है। यह देवालय तथा नृपालय दोनोंमें शुभ होता है। पश्चिममें द्वार न हो (और अन्य तीन दिशाओंमें हो) तो उस गृहका विशेष नाम है—‘नन्द्यावर्त’। यदि दक्षिण दिशामें ही द्वार न हो तो उस भवनका नाम है—‘वर्धमान’। पूर्व-
२३०
- अग्निपुराण *
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अन्य दिशाओंमें हो) तो उस घरकी 'विशाल' संज्ञा है। वह कुलक्षयकारी तथा अत्यन्त भयदायक होता है। जिसमें पश्चिम दिशामें ही शाला न बनी हो, उस विशाल गृहको 'पक्षघ्न' कहते हैं। वह पुत्र-हानिकारक तथा बहुत-से शत्रुओंका उत्पादक होता है। अब मैं पूर्वाद दिशाओंके क्रमसे 'ध्वज'* आदि आठ गृहोंका वर्णन करता हूँ। (ध्वज, धूम, सिंह, श्वान, वृषभ, खर (गधा), हाथी और काक-ये ही आठोंके नाम हैं।) पूर्व-दिशामें स्नान और अनुग्रह (लोगोंसे कृपापूर्वक मिलने)-के लिये घर बनावे। अग्निकोणमें उसका रसोईघर होना चाहिये। दक्षिण दिशामें रस-क्रिया तथा शय्या (शयन)-के लिये घर बनाना चाहिये। नैर्ऋत्यकोणमें शस्त्रागार रहे। पश्चिम दिशामें धन-रत्न आदिके लिये कोषागार रखे। वायव्यकोणमें सम्यक् अन्नागार स्थापित करे। उत्तर दिशामें धन और पशुओंको रखे तथा ईशानकोणमें दीक्षाके लिये उत्तम भवन बनवावे। गृहस्वामीके हाथसे नापे हुए गृहका जो पिण्ड है, उसकी लंबाई-चौड़ाईके हस्तमानको तिगुना करके उसमें आठ-से भाग दे। उस भागका जो शेष हो, तदनुसार यह ध्वज आदि आय स्थित होता है। उसीसे ध्वजादि-काकान्त आयका ज्ञान होता है। दो, तीन, चार, छः, सात और आठ शेष बचे तो उसके अनुसार शुभाशुभ फल हो। यदि मध्य (पाँचवें) और अन्तिम (काक)-में गृहकी स्थिति हुई तो वह गृह सर्वनाशकारी होता है। इसलिये आठ भागोंको छोड़कर नवम भागमें बना हुआ गृह शुभकारक होता है। उस नवम भागमें ही मण्डप उत्तम माना गया है। उसकी लंबाई-चौड़ाई बराबर रहे अथवा चौड़ाईसे लंबाई दुगुनी रहे ॥२७-३३॥
पूर्वसे पश्चिमकी ओर तथा उत्तरसे दक्षिणकी ओर बाजारमें ही गृहपङ्क्ति देखी जाती है। एक-एक भवनके लिये प्रत्येक दिशामें आठ-आठ द्वार हो सकते हैं। इन आठों द्वारोंके क्रमशः फल भी पृथक्-पृथक् कहे जाते हैं। भय, नारीकी चपलता, जय, वृद्धि, प्रताप, धर्म, कलह तथा निर्धनता—ये पूर्ववर्ती आठ द्वारोंके अवश्यम्भावी फल हैं। दाह, दुःख, सुहृन्नाश, धननाश, मृत्यु, धन, शिल्पज्ञान
द्वारसे रहित होनेपर उसका नाम 'स्वस्तिक' होता है और उत्तर द्वारसे रहित होनेपर 'रुचक'। जब किसी एक दिशामें शाला (कमरा) ही न हो तो वह 'त्रिशाल-गृह' है। इसके भी कई भेद हैं। जिस मकानके भीतर उत्तर दिशामें कोई शाला न हो, वह त्रिशाल-गृह 'धान्यक' कहलाता है। वह मनुष्योंके लिये क्षेमकारक, वृद्धिकारक तथा बहुपुत्र-फलदायक होता है। यदि पूर्व-दिशामें शाला न हो तो उस त्रिशाल-गृहको 'सुक्षेत्र' कहते हैं। यह धन, यश और आयुको देनेवाला तथा शोक और मोहका नाश करनेवाला होता है। यदि दक्षिण-दिशामें शाला न हो तो उसको 'विशाल' कहा गया है। वह मनुष्योंके लिये कुलक्षयकारी होता है तथा उसमें सब प्रकारके रोगोंका भय बना रहता है। यदि पश्चिम-दिशामें कोई शाला न हो तो उस त्रिशाल-गृहको 'पक्षघ्न' कहते हैं। वह मित्र, भाई-बन्धु तथा पुत्रोंका मारक होता है और उसमें सब प्रकारके भय प्राप्त होते रहते हैं।
अब द्विशाल-घरका फल बताते हैं—दक्षिण-पश्चिम दिशाओंमें ही दो शालाएँ हों (और अन्य दो दिशाओंमें न हों) तो वह द्विशाल-गृह, धन-धान्यफलदायक, मानवोंके क्षेमकी वृद्धि करनेवाला तथा पुत्ररूप फल देनेवाला है। यदि केवल पश्चिम और उत्तर दिशाओंमें ही दो शालाएँ हों तो उस गृहको 'यमसूर्य' कहते हैं। वह राजा और अग्निका भय देनेवाला है तथा मनुष्योंके कुलका संहार करनेवाला होता है। यदि उत्तर और पूर्वमें ही दो शालाएँ हों तो उस गृहका नाम 'दण्ड' है। जहाँ 'दण्ड' हो, वहाँ अकाल-मृत्युका भय प्राप्त होता है तथा शत्रुओंकी ओरसे भी भयकी प्राप्ति होती है। पूर्व और दक्षिण दिशाओंमें ही शाला होनेसे जो द्विशाल-गृह निर्मित हुआ है, उसकी 'धन' या 'बात' संज्ञा है। वह शस्त्रभय तथा पराभव देनेवाला होता है। पूर्व-पश्चिममें दो शालाएँ हों तो उसकी 'चुल्ली' संज्ञा है। वह मृत्युकी सूचक है। वह गृह स्त्रियोंके लिये वैधव्यकारक तथा अनेक भयदायक है। उत्तर-दक्षिणमें ही दो शालाएँ हों तो वह भी मनुष्यके लिये भयदायक है। (द्रष्टव्य अध्याय २५४ के श्लोक सं० १ से १३ तक।)
* अपराजितपृच्छा (विश्वकर्म-शास्त्र ६४ वें सूत्र)-के अनुसार पूर्वाद दिशाओंमें प्रदक्षिणक्रमसे रहनेवाले ध्वज आदिका उल्लेख इस प्रकार मिलता है—
ध्वजो धूमश्च सिंहश्च श्वानो वृषखरो गजः। ध्वाङ्क्षश्चेति समुद्दिष्टाः प्राच्यादिषु प्रदक्षिणाः ॥
* अध्याय १०६ * २३१
तथा पुत्रकी प्राप्ति — ये दक्षिण दिशाके आठ द्वारोंके फल हैं। आयु, संन्यास, सस्य, धन, शान्ति, अर्थनाश, शोषण, भोग एवं संतानकी प्राप्ति — ये पश्चिम द्वारके फल हैं। रोग, मद, आर्ति, मुख्यता, अर्थ, आयु, कृशता और मान — ये क्रमशः उत्तर दिशाके द्वारके फल हैं॥ ३४—३८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नगरगृह आदिकी वास्तु-प्रतिष्ठा-विधिका वर्णन' नामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०५॥
एक सौ छठा अध्याय
नगर आदिके वास्तुका वर्णन
भगवान् महेश्वर कहते हैं— कार्तिकेय! अब मैं राज्यादिकी अभिवृद्धिके लिये नगर-वास्तुका वर्णन करता हूँ। नगर-निर्माणके लिये एक योजन या आधी योजन भूमि ग्रहण करे। वास्तु-नगरका पूजन करके उसको प्राकारसे संयुक्त करे। ईशादि तीस पदोंमें सूर्यके सम्मुख पूर्वद्वार, गन्धर्वके समीप दक्षिणद्वार, वरुणके निकट पश्चिमद्वार और सोमके समीप उत्तरद्वार बनाना चाहिये। नगरमें चौड़े-चौड़े बाजार बनाने चाहिये। नगरद्वार छः हाथ चौड़ा बनाना चाहिये, जिससे हाथी आदि सुखपूर्वक आ-जा सकें। नगर छिन्नकर्ण, भग्न तथा अर्धचन्द्राकार नहीं होना चाहिये। वज्र-सूचीमुख नगर भी हितकर नहीं है। एक, दो या तीन द्वारोंसे युक्त धनुषाकार वज्रनागाभ नगरका निर्माण शान्तिप्रद है॥ १—५॥
नगरके आग्नेयकोणमें स्वर्णकारोंको बसावे, दक्षिण दिशामें नृत्योपजीविनी वाराङ्गनाओंके भवन हों। नैर्ऋत्यकोणमें नट, कुम्भकार तथा केवट आदिके आवास-स्थान होने चाहिये। पश्चिममें रथकार, आयुधकार और खड्ग-निर्माताओंका निवास हो। नगरके वायव्यकोणमें मद्य-विक्रेता, कर्मकार तथा भृत्योंका निवेश करे। उत्तर दिशामें ब्राह्मण, यति, सिद्ध और पुण्यात्मा पुरुषोंको बसावे। ईशानकोणमें फलादिका विक्रय करनेवाले एवं वणिग्-जन निवास करें। पूर्व दिशामें सेनाध्यक्ष रहें। आग्नेयकोणमें विविध सैन्य, दक्षिणमें स्त्रियोंको ललित कलाकी शिक्षा देनेवाले आचार्यों तथा नैर्ऋत्यकोणमें धनुर्धर सैनिकोंको रखे। पश्चिममें महामात्य, कोषपाल एवं कारीगरोंको, उत्तरमें दण्डाधिकारी, नायक तथा द्विजोंको; पूर्वमें क्षत्रियोंको, दक्षिणमें वैश्योंको, पश्चिममें शूद्रोंको, विभिन्न दिशाओंमें वैद्योंको और अश्वों तथा सेनाको चारों ओर रखे॥ ६—१२॥
राजा पूर्वमें गुप्तचरों, दक्षिणमें श्मशान, पश्चिममें गोधन और उत्तरमें कृषकोंका निवेश करे। म्लेच्छोंको दिक्कोणोंमें स्थान दे अथवा ग्रामोंमें स्थापित करे। पूर्वद्वारपर लक्ष्मी एवं कुबेरकी स्थापना करे। जो उन दोनोंका दर्शन करते है, उन्हें लक्ष्मी (सम्पत्ति)-की प्राप्ति होती है। पश्चिममें निर्मित देवमन्दिर पूर्वाभिमुख, पूर्व दिशामें स्थित पश्चिमाभिमुख तथा दक्षिण दिशाके मन्दिर उत्तराभिमुख होने चाहिये। नगरकी रक्षाके लिये इन्द्र और विष्णु आदि देवताओंके मन्दिर बनवावे। देवशून्य नगर, ग्राम, दुर्ग तथा गृह आदिका पिशाच उपभोग करते हैं और वह रोगसमूहसे परिभूत हो जाता है। उपर्युक्त विधिसे निर्मित नगर आदि सदा जयप्रद और भोग-मोक्ष प्रदान करनेवाले होते हैं॥ १३—१७॥
वास्तु-भूमिकी पूर्व दिशामें शृङ्गार-कक्ष, अग्निकोणमें पाकगृह (रसोईघर), दक्षिणमें शयनगृह,
२३२ * अग्निपुराण *
नैर्ऋत्यकोणमें शस्त्रागार, पश्चिममें भोजनगृह, वायव्यकोणमें धान्य-संग्रह, उत्तर दिशामें धनागार तथा ईशानकोणमें देवगृह बनवाना चाहिये। नगरमें एकशाल, द्विशाल, त्रिशाल या चतुःशाल-गृहका निर्माण होना चाहिये। चतुःशाल-गृहके शाला और अलिन्द (प्राङ्गण)-के भेदसे दो सौ भेद होते हैं। उनमें भी चतुःशाल-गृहके पचपन, त्रिशाल-गृहके चार तथा द्विशालके पाँच भेद होते हैं॥ १८-२१॥
एकशाल-गृहके चार भेद हैं। अब मैं अलिन्दयुक्त गृहके विषयमें बतलाता हूँ, सुनिये। गृह-वास्तु तथा नगर-वास्तुमें अट्ठाईस अलिन्द होते हैं। चार तथा सात अलिन्दोंसे पचपन, छः अलिन्दोंसे बीस तथा आठ अलिन्दोंसे भी बीस भेद होते हैं। इस प्रकार नगर आदिमें आठ अलिन्दोंसे युक्त वास्तु भी होता है॥ २२-२४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नगर आदिके वास्तुका वर्णन' नामक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ॥ १०६॥
एक सौ सातवाँ अध्याय
भुवनकोष (पृथ्वी-द्वीप आदि)-का तथा स्वायम्भुव सर्गका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! अब मैं भुवनकोष तथा पृथ्वी एवं द्वीप आदिके लक्षणोंका वर्णन करूँगा। आग्नीध्र, अग्निबाहु, वपुष्मान्, द्युतिमान्, मेधा, मेधातिथि, भव्य, सवन और क्षय—ये प्रियव्रतके पुत्र थे। उनका दसवाँ यथार्थनामा पुत्र ज्योतिष्मान् था। प्रियव्रतके ये पुत्र विश्वमें विख्यात थे। पिताने उनको सात द्वीप प्रदान किये। आग्नीध्रको जम्बूद्वीप एवं मेधातिथिको प्लक्षद्वीप दिया। वपुष्मान्को शाल्मलिद्वीप, ज्योतिष्मान्को कुशद्वीप, द्युतिमान्को क्रौञ्चद्वीप तथा भव्यको शाकद्वीपमें अभिषिक्त किया। सवनको पुष्करद्वीप प्रदान किया। (शेष तीनको कोई स्वतन्त्र द्वीप नहीं मिला।) आग्नीध्रने अपने पुत्रोंमें लाखों योजन विशाल जम्बूद्वीपको इस प्रकार विभाजित कर दिया। नाभिको हिमवर्ष (आधुनिक भारतवर्ष) प्रदान किया। किम्पुरुषको हेमकूटवर्ष, हरिवर्षको नैषधवर्ष, इलावृतको मध्यभागमें मेरुपर्वतसे युक्त इलावृतवर्ष, रम्यकको नीलाचलके आश्रित रम्यकवर्ष, हिरण्यवान्को श्वेतवर्ष एवं कुरुको उत्तरकुरुवर्ष दिया। उन्होंने भद्राश्वको भद्राश्ववर्ष तथा केतुमालको मेरुपर्वतके पश्चिममें स्थित केतुमालवर्षका शासन प्रदान किया। महाराज प्रियव्रत अपने पुत्रोंको उपर्युक्त द्वीपोंमें अभिषिक्त करके वनमें चले गये। वे नरेश शालग्रामक्षेत्रमें तपस्या करके विष्णुलोकको प्राप्त हुए॥ १-८॥
मुनिश्रेष्ठ! किम्पुरुषादि जो आठ वर्ष हैं, उनमें सुखकी बहुलता है और बिना यत्नके स्वभावसे ही समस्त भोग-सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। उनमें जरा-मृत्यु आदिका कोई भय नहीं है और न धर्म-अधर्म अथवा उत्तम, मध्यम और अधम आदिका ही भेद है। वहाँ सब समान हैं। वहाँ कभी युग-परिवर्तन भी नहीं होता। हिमवर्षके शासक नाभिके मेरु देवीसे ऋषभदेव पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए। ऋषभके पुत्र भरत हुए। ऋषभदेवने भरतपर राज्यलक्ष्मीका भार छोड़कर शालग्रामक्षेत्रमें श्रीहरिकी शरण ग्रहण की। भरतके नामसे 'भारतवर्ष' प्रसिद्ध है। भरतसे सुमति हुए। भरतने सुमतिको राज्यलक्ष्मी देकर शालग्रामक्षेत्रमें श्रीहरिकी शरण ली। उन योगिराजने योगाभ्यासमें तत्पर होकर प्राणोंका परित्याग किया। इनका वह
- अध्याय १०८ * \hfill २३३
चरित्र तुमसे मैं फिर कहूँगा॥ ९—१२$\frac{१}{२}$॥
तदनन्तर सुमतिके वीर्यसे इन्द्रद्युम्नका जन्म हुआ। उससे परमेष्ठी और परमेष्ठीका पुत्र प्रतीहार हुआ। प्रतीहारके प्रतिहर्ता, प्रतिहर्ताके भव, भवके उद्गीथ, उद्गीथके प्रस्तार तथा प्रस्तारके विभु नामक पुत्र हुआ। विभुका पृथु, पृथुका नक्त एवं नक्तका पुत्र गय हुआ। गयके नर नामक पुत्र और नरके विराट् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। विराट्का पुत्र महावीर्य था। उससे धीमान्का जन्म हुआ तथा धीमान्का पुत्र महान्त और उसका पुत्र मनस्यु हुआ। मनस्युका पुत्र त्वष्टा, त्वष्टाका विरज और विरजका पुत्र रज हुआ। मुने! रजके पुत्र शतजित्के सौ पुत्र उत्पन्न हुए, उनमें विश्वज्योति मुख्य था। उनसे भारतवर्षकी अभिवृद्धि हुई। कृत-त्रेतादि युगक्रमसे यह स्वायम्भुव-मनुका वंश माना गया है॥ १३—१९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'भुवनकोष तथा पृथ्वी एवं द्वीप आदिके लक्षणका वर्णन' नामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०७॥
एक सौ आठवाँ अध्याय
भुवनकोष-वर्णनके प्रसंगमें भूमण्डलके द्वीप आदिका परिचय
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! जम्बू, प्लक्ष, महान् शाल्मलि, कुश, क्रौञ्च, शाक और सातवाँ पुष्कर—ये सातों द्वीप चारों ओरसे खारे जल, इक्षुरस, मदिरा, घृत, दधि, दुग्ध और मीठे जलके सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। जम्बूद्वीप उन सब द्वीपोंके मध्यमें स्थित है और उसके भी बीचों-बीचमें मेरुपर्वत सीना ताने खड़ा है। उसका विस्तार चौरासी हजार योजन है और यह पर्वतराज सोलह हजार योजन पृथिवीमें घुसा हुआ है। ऊपरी भागमें इसका विस्तार बत्तीस हजार योजन है। नीचेकी गहराईमें इसका विस्तार सोलह हजार योजन है। इस प्रकार यह पर्वत इस पृथिवीरूप कमलकी कर्णिकाके समान स्थित है। इसके दक्षिणमें हिमवान्, हेमकूट और निषध तथा उत्तरमें नील, श्वेत और शृङ्गी नामक वर्षपर्वत हैं। उनके बीचके दो पर्वत (निषध और नील) एक-एक लाख योजनतक फैले हुए हैं। दूसरे पर्वत उनसे दस-दस हजार योजन कम हैं। वे सभी दो-दो सहस्र योजन ऊँचे और इतने ही चौड़े हैं॥ १—६॥
द्विजश्रेष्ठ! मेरुपर्वतके दक्षिणकी ओर पहला वर्ष भारतवर्ष है तथा दूसरा किम्पुरुषवर्ष और तीसरा हरिवर्ष माना गया है। उत्तरकी ओर रम्यक, हिरण्मय और उत्तरकुरुवर्ष है, जो भारतवर्षके ही समान है। मुनिप्रवर! इनमेंसे प्रत्येकका विस्तार नौ-नौ हजार योजन है तथा इन सबके बीचमें इलावृतवर्ष है, जिसमें सुवर्णमय सुमेरु पर्वत खड़ा है। महाभाग! इलावृतवर्ष सुमेरुके चारों ओर नौ-नौ हजार योजनतक फैला हुआ है। इसके चारों ओर चार पर्वत हैं। ये चारों पर्वत मानो सुमेरुको धारण करनेवाले ईश्वरनिर्मित आधारस्तम्भ हों। इनमेंसे मन्दराचल पूर्वमें, गन्धमादन दक्षिणमें, विपुल पश्चिम पार्श्वमें और सुपार्श्व उत्तरमें है। ये सभी पर्वत दस-दस हजार योजन विस्तृत हैं। इन पर्वतोंपर ग्यारह-ग्यारह सौ योजन विस्तृत कदम्ब, जम्बू, पीपल और वटके वृक्ष हैं, जो इन पर्वतोंकी पताकाओंके समान प्रतीत होते हैं। इनमेंसे जम्बूवृक्ष ही जम्बूद्वीपके नामका कारण है। उस जम्बूवृक्षके फल हाथीके समान विशाल और मोटे होते हैं।
२३४ * अग्निपुराण *
इसके रससे जम्बूनदी प्रवाहित होती है। इसीसे परम उत्तम जाम्बूनद-सुवर्णका प्रादुर्भाव होता है। मेरुके पूर्वमें भद्राश्ववर्ष और पश्चिममें केतुमाल वर्ष है। इसी प्रकार उसके पूर्वकी ओर चैत्ररथ, दक्षिणकी ओर गन्धमादन, पश्चिमकी ओर वैभ्राज और उत्तरकी ओर नन्दन नामक वन है। इसी तरह पूर्व आदि दिशाओंमें अरुणोद, महाभद्र, शीतोद और मानस—ये चार सरोवर हैं। सिताम्भ तथा चक्रमुञ्ज आदि (भूपद्मकी कर्णिकारूप) मेरुके पूर्व-दिशावर्ती केसर-स्थानीय अचल हैं। दक्षिणमें त्रिकूट आदि, पश्चिममें शिखिवास-प्रभृति और उत्तर दिशामें शङ्खकूट आदि इसके केसराचल हैं। सुमेरु पर्वतके ऊपर ब्रह्माजीकी पुरी है। उसका विस्तार चौदह हजार योजन है। ब्रह्मपुरीके चारों ओर सभी दिशाओंमें इन्द्रादि लोकपालोंके नगर हैं। इसी ब्रह्मपुरीसे श्रीविष्णुके चरणकमलसे निकली हुई गङ्गानदी चन्द्रमण्डलको आप्लावित करती हुई स्वर्गलोकसे नीचे उतरती हैं। पूर्वमें शीता (अथवा सीता) नदी भद्राश्वपर्वतसे निकलकर एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर जाती हुई समुद्रमें मिल जाती है। इसी प्रकार अलकनन्दा भी दक्षिण दिशाकी ओर भारतवर्षमें आती है और सात भागोंमें विभक्त होकर समुद्रमें मिल जाती है॥ ७—२०॥
चक्षु पश्चिम समुद्रमें तथा भद्रा उत्तरकुरुवर्षको पार करती हुई समुद्रमें जा गिरती है। माल्यवान् और गन्धमादन पर्वत उत्तर तथा दक्षिणकी ओर नीलाचल एवं निषध पर्वततक फैले हुए हैं। उन दोनोंके बीचमें कर्णिकाकार मेरुपर्वत स्थित है। मर्यादापर्वतोंके बहिर्भागमें स्थित भारत, केतुमाल, भद्राश्व और उत्तरकुरुवर्ष—इस लोकपद्मके दल हैं। जठर और देवकूट—ये दोनों मर्यादापर्वत हैं। ये उत्तर और दक्षिणकी ओर नील तथा निषध पर्वततक फैले हुए हैं। पूर्व और पश्चिमकी ओर विस्तृत गन्धमादन एवं कैलास—ये दो पर्वत अस्सी हजार योजन विस्तृत हैं। पूर्वके समान मेरुके पश्चिमकी ओर भी निषध और पारियात्र नामक दो मर्यादापर्वत हैं, जो अपने मूलभागसे समुद्रके भीतरतक प्रविष्ट हैं॥ २१—२५॥
उत्तरकी ओर त्रिशृङ्ग और रुधिर नामक वर्षपर्वत हैं। ये दोनों पूर्व और पश्चिमकी ओर समुद्रके गर्भमें व्यवस्थित हैं। इस प्रकार जठर आदि मर्यादापर्वत मेरुके चारों ओर सुशोभित होते हैं। ऋषिप्रवर! केसरपर्वतोंके मध्यमें जो श्रेणियाँ हैं, उनमें लक्ष्मी, विष्णु, अग्नि तथा सूर्य आदि देवताओंके नगर हैं। ये भौम होते हुए भी स्वर्गके समान हैं। इनमें पापात्मा पुरुषोंका प्रवेश नहीं हो पाता॥ २६—२८½॥
श्रीविष्णुभगवान् भद्राश्ववर्षमें हयग्रीवरूपसे, केतुमालवर्षमें वराहरूपसे, भारतवर्षमें कूर्मरूपसे तथा उत्तरकुरुवर्षमें मत्स्यरूपसे निवास करते हैं। भगवान् श्रीहरि विश्वरूपसे सर्वत्र पूजित होते हैं। किम्पुरुष आदि आठ वर्षोंमें क्षुधा, भय तथा शोक आदि कुछ भी नहीं है। उनमें प्रजाजन चौबीस हजार वर्षतक रोग-शोकरहित होकर जीवन व्यतीत करते हैं। उनमें कृत-त्रेतादि युगोंकी कल्पना नहीं होती; न उनमें कभी वर्षा ही होती है। उनमें केवल पार्थिव-जल रहता है। इन सभी वर्षोंमें सात-सात कुलाचल पर्वत हैं और उनसे निकली हुई सैकड़ों तीर्थरूपा नदियाँ हैं। अब मैं भारतवर्षमें जो तीर्थ हैं, उनका तुम्हारे सम्मुख वर्णन करता हूँ॥ २९—३३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'भुवनकोशका वर्णन' नामक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०८॥
* अध्याय १०९ *
२३५
एक सौ नौवाँ अध्याय
तीर्थ-माहात्म्य
अग्निदेव कहते हैं— अब मैं सब तीर्थोंका माहात्म्य बताऊँगा, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। जिसके हाथ, पैर और मन भलीभाँति संयममें रहें तथा जिसमें विद्या, तपस्या और उत्तम कीर्ति हो, वही तीर्थके पूर्ण फलका भागी होता है। जो प्रतिग्रह छोड़ चुका है, नियमित भोजन करता और इन्द्रियोंको काबूमें रखता है, वह पापरहित तीर्थयात्री सब यज्ञोंका फल पाता है। जिसने कभी तीन राततक उपवास नहीं किया; तीर्थोंकी यात्रा नहीं की और सुवर्ण एवं गौका दान नहीं किया, वह दरिद्र होता है। यज्ञसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही तीर्थ-सेवनसे भी मिलता है*॥ १—४॥
ब्रह्मन्! पुष्कर श्रेष्ठ तीर्थ है। वहाँ तीनों संध्याओंके समय दस हजार कोटि तीर्थोंका निवास रहता है। पुष्करमें सम्पूर्ण देवताओंके साथ ब्रह्माजी निवास करते हैं। सब कुछ चाहनेवाले मुनि और देवता वहाँ स्नान करके सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। पुष्करमें देवताओं और पितरोंकी पूजा करनेवाले मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करके ब्रह्मलोकमें जाते हैं। जो कार्तिककी पूर्णिमाको वहाँ अन्नदान करता है, वह शुद्धचित्त होकर ब्रह्मलोकका भागी होता है। पुष्करमें जाना दुष्कर है, पुष्करमें तपस्याका सुयोग मिलना दुष्कर है, पुष्करमें दानका अवसर प्राप्त होना भी दुष्कर है और वहाँ निवासका सौभाग्य होना तो अत्यन्त ही दुष्कर है। वहाँ निवास, जप और श्राद्ध करनेसे मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करता है। वहीं जम्बूमार्ग तथा तण्डुलिकाश्रम तीर्थ भी हैं॥ ५—९॥
(अब अन्य तीर्थोंके विषयमें सुनो—) कण्वाश्रम, कोटितीर्थ, नर्मदा और अर्बुद (आबू) भी उत्तम तीर्थ हैं। चर्मण्वती (चम्बल), सिन्धु, सोमनाथ, प्रभास, सरस्वती-समुद्र-संगम तथा सागर भी श्रेष्ठ तीर्थ हैं। पिण्डारक क्षेत्र, द्वारका और गोमती—ये सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाले तीर्थ हैं। भूमितीर्थ, ब्रह्मतुङ्गतीर्थ और पञ्चनद (सतलज आदि पाँचों नदियाँ) भी उत्तम हैं। भीमतीर्थ, गिरीन्द्रतीर्थ, पापनाशिनी देविका नदी, पवित्र विनशनतीर्थ (कुरुक्षेत्र), नागोद्भेद, अघार्दन तथा कुमारकोटि तीर्थ—ये सब कुछ देनेवाले बताये गये हैं। 'मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा, कुरुक्षेत्रमें निवास करूँगा' जो सदा ऐसा कहता है, वह शुद्ध हो जाता है और उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है। वहाँ विष्णु आदि देवता रहते हैं। वहाँ निवास करनेसे मनुष्य श्रीहरिके धाममें जाता है। कुरुक्षेत्रमें समीप ही सरस्वती बहती हैं। उसमें स्नान करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकका भागी होता है। कुरुक्षेत्रकी धूलि भी परम गतिकी प्राप्ति कराती है। धर्मतीर्थ, सुवर्णतीर्थ, परम उत्तम गङ्गाद्वार (हरिद्वार), पवित्र तीर्थ कनखल, भद्रकर्ण-ह्रद, गङ्गा-सरस्वती-संगम और ब्रह्मावर्त—ये पापनाशक तीर्थ हैं॥ १०—१७॥
भृगुतुङ्ग, कुब्जाम्र तथा गङ्गोद्भेद—ये भी पापोंको दूर करनेवाले हैं। वाराणसी (काशी)
* ............................................................................। यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम्॥
विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते। प्रतिग्रहादुपावृत्तो लब्धाहारो जितेन्द्रियः॥
निष्पापस्तीर्थयात्री तु सर्वयज्ञफलं लभेत्। अनुपोष्य त्रिरात्राणि तीर्थान्यनभिगम्य च॥
अदत्त्वा काञ्चनं गाश्च दरिद्रो नाम जायते। तीर्थाभिगमने तत्स्याद्यद्यज्ञेनाऽऽप्यते फलम्॥
(अग्नि० १०९।१—४)
२३६ * अग्निपुराण *
सर्वोत्तम तीर्थ है। उसे श्रेष्ठ अविमुक्त-क्षेत्र भी कहते हैं। कपाल-मोचनतीर्थ भी उत्तम है, प्रयाग तो सब तीर्थोंका राजा ही है। गोमती और गङ्गाका संगम भी पावन तीर्थ है। गङ्गाजी कहीं भी क्यों न हों, सर्वत्र स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाली हैं। राजगृह पवित्र तीर्थ है। शालग्राम तीर्थ पापोंका नाश करनेवाला है। वटेश, वामन तथा कालिका-संगम तीर्थ भी उत्तम हैं॥ १८-२०॥ लौहित्य-तीर्थ, करतोया नदी, शोणभद्र तथा ऋषभतीर्थ भी श्रेष्ठ हैं। श्रीपर्वत, कोलाचल, सह्यगिरि, मलयगिरि, गोदावरी, तुङ्गभद्रा, वरदायिनी कावेरी नदी, तापी, पयोष्णी, रेवा (नर्मदा) और दण्डकारण्य भी उत्तम तीर्थ हैं। कालंजर, मुञ्जवट, शूर्पारक, मन्दाकिनी, चित्रकूट और शृङ्गवेरपुर श्रेष्ठ तीर्थ हैं। अवन्ती भी उत्तम तीर्थ है। अयोध्या सब पापोंका नाश करनेवाली है। नैमिषारण्य परम पवित्र तीर्थ है। वह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है॥ २१-२४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'तीर्थमाहात्म्य-वर्णन' नामक एक सौ नौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०९॥
एक सौ दसवाँ अध्याय
गङ्गाजीकी महिमा
अग्निदेव कहते हैं— अब गङ्गाका माहात्म्य बतलाता हूँ। गङ्गाका सदा सेवन करना चाहिये। वह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। जिनके बीचसे गङ्गा बहती हैं, वे सभी देश श्रेष्ठ तथा पावन हैं। उत्तम गतिकी खोज करनेवाले प्राणियोंके लिये गङ्गा ही सर्वोत्तम गति है। गङ्गाका सेवन करनेपर वह माता और पिता—दोनोंके कुलोंका उद्धार करती है। एक हजार चान्द्रायण-व्रतकी अपेक्षा गङ्गाजीके जलका पीना उत्तम है। एक मास गङ्गाजीका सेवन करनेवाला मनुष्य सब यज्ञोंका फल पाता है॥ १-३॥
गङ्गादेवी सब पापोंको दूर करनेवाली तथा स्वर्गलोक देनेवाली हैं। गङ्गाके जलमें जबतक हड्डी पड़ी रहती है, तबतक वह जीव स्वर्गमें निवास करता है। अंधे आदि भी गङ्गाजीका सेवन करके देवताओंके समान हो जाते हैं। गङ्गा-तीर्थसे निकली हुई मिट्टी धारण करनेवाला मनुष्य सूर्यके समान पापोंका नाशक होता है। जो मानव गङ्गाका दर्शन, स्पर्श, जलपान अथवा 'गङ्गा' इस नामका कीर्तन करता है, वह अपनी सैकड़ों-हजारों पीढ़ियोंके पुरुषोंको पवित्र कर देता है॥ ४-६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गङ्गाजीकी महिमा' नामक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११०॥
एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय
प्रयाग-माहात्म्य
अग्निदेव कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं प्रयागका माहात्म्य बताता हूँ, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला तथा उत्तम है। प्रयागमें ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता तथा बड़े-बड़े मुनिवर निवास करते हैं। नदियाँ, समुद्र, सिद्ध, गन्धर्व तथा अप्सराएँ भी उस तीर्थमें वास करती हैं। प्रयागमें तीन
* अध्याय ११२ * २३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
अग्निकुण्ड हैं। उनके बीचमें गङ्गा सब तीर्थोंको साथ लिये बड़े वेगसे बहती हैं। वहाँ त्रिभुवन-विख्यात सूर्यकन्या यमुना भी हैं। गङ्गा और यमुनाका मध्यभाग पृथ्वीका 'जघन' माना गया है और प्रयागको ऋषियोंने जघनके बीचका 'उपस्थ भाग' बताया है॥ १-४॥
प्रतिष्ठान (झूसी) सहित प्रयाग, कम्बल और अश्वतर नाग तथा भोगवती तीर्थ—ये ब्रह्माजीके यज्ञकी वेदी कहे गये हैं। प्रयागमें वेद और यज्ञ मूर्तिमान् होकर रहते हैं। उस तीर्थके स्तवन और नाम-कीर्तनसे तथा वहाँकी मिट्टीका स्पर्श करनेमात्रसे भी मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। प्रयागमें गङ्गा और यमुनाके संगमपर किये हुए दान, श्राद्ध और जप आदि अक्षय होते हैं॥ ५-७॥
ब्रह्मन्! वेद अथवा लोक—किसीके कहनेसे भी अन्तमें प्रयागतीर्थके भीतर मरनेका विचार नहीं छोड़ना चाहिये। प्रयागमें साठ करोड़, दस हजार तीर्थोंका निवास है; अतः वह सबसे श्रेष्ठ है। वासुकि नागका स्थान, भोगवती तीर्थ और हंसप्रपतन—ये उत्तम तीर्थ हैं। कोटि गोदानसे जो फल मिलता है, वही इनमें तीन दिनोंतक स्नान करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है। प्रयागमें माघमासमें मनीषी पुरुष ऐसा कहते हैं कि 'गङ्गा सर्वत्र सुलभ हैं; किंतु गङ्गाद्वार, प्रयाग और गङ्गा-सागर-संगम—इन तीन स्थानोंमें उनका मिलना बहुत कठिन है।' प्रयागमें दान देनेसे मनुष्य स्वर्गमें जाता है और इस लोकमें आनेपर राजाओंका भी राजा होता है॥ ८-१२॥
अक्षयवटके मूलके समीप और संगम आदिमें मृत्युको प्राप्त हुआ मनुष्य भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। प्रयागमें परम रमणीय उर्वशी-पुलिन, संध्यावट, कोटितीर्थ, दशाश्वमेध घाट, गङ्गा-यमुनाका उत्तम संगम, रजोहीन मानसतीर्थ तथा वासरक तीर्थ—ये सभी परम उत्तम हैं॥ १३-१४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रयाग-माहात्म्य-वर्णन' नामक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १११॥
एक सौ बारहवाँ अध्याय
वाराणसीका माहात्म्य
अग्निदेव कहते हैं—वाराणसी परम उत्तम तीर्थ है। जो वहाँ श्रीहरिका नाम लेते हुए निवास करते हैं, उन सबको वह भोग और मोक्ष प्रदान करता है। महादेवजीने पार्वतीसे उसका माहात्म्य इस प्रकार बतलाया है॥ १॥
महादेवजी बोले—गौरि! इस क्षेत्रको मैंने कभी मुक्त नहीं किया—सदा ही वहाँ निवास किया है, इसलिये यह 'अविमुक्त' कहलाता है। अविमुक्त-क्षेत्रमें किया हुआ जप, तप, होम और दान अक्षय होता है। पत्थरसे दोनों पैर तोड़कर बैठ रहे, परंतु काशी कभी न छोड़े। हरिश्चन्द्र, आम्रातकेश्वर, जप्येश्वर, श्रीपर्वत, महालय, भृगु, चण्डेश्वर और केदारतीर्थ—ये आठ अविमुक्त-क्षेत्रमें परम गोपनीय तीर्थ हैं। मेरा अविमुक्त-क्षेत्र सब गोपनीयोंमें भी परम गोपनीय है। वह दो योजन लंबा और आधा योजन चौड़ा है। 'वरणा' और 'नासी' (असी)—इन दो नदियोंके बीचमें 'वाराणसीपुरी' है। इसमें स्नान, जप, होम, मृत्यु, देवपूजन, श्राद्ध, दान और निवास—जो कुछ होता है, वह सब भोग एवं मोक्ष प्रदान करता है॥ २-७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वाराणसी-माहात्म्यवर्णन' नामक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११२॥
२३८ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
एक सौ तेरहवाँ अध्याय
नर्मदा-माहात्म्य
अग्निदेव कहते हैं— अब मैं नर्मदा आदिका माहात्म्य बताऊँगा। नर्मदा श्रेष्ठ तीर्थ है। गङ्गाका जल स्पर्श करनेपर मनुष्यको तत्काल पवित्र करता है, किंतु नर्मदाका जल दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देता है। नर्मदातीर्थ सौ योजन लंबा और दो योजन चौड़ा है। अमरकण्टक पर्वतके चारों ओर नर्मदा-सम्बन्धी साठ करोड़, साठ हजार तीर्थ हैं। कावेरी-संगमतीर्थ बहुत पवित्र है। अब श्रीपर्वतका वर्णन सुनो — ॥ १—३ ॥
एक समय गौरीने श्रीदेवीका रूप धारण करके भारी तपस्या की। इससे प्रसन्न होकर श्रीहरिने उन्हें वरदान देते हुए कहा—‘‘देवि! तुम्हें अध्यात्म-ज्ञान प्राप्त होगा और तुम्हारा यह पर्वत ‘श्रीपर्वत’के नामसे विख्यात होगा। इसके चारों ओर सौ योजनतकका स्थान अत्यन्त पवित्र होगा।’’ यहाँ किया हुआ दान, तप, जप तथा श्राद्ध सब अक्षय होता है। यह उत्तम तीर्थ सब कुछ देनेवाला है। यहाँकी मृत्यु शिवलोककी प्राप्ति करानेवाली है। इस पर्वतपर भगवान् शिव सदा पार्वतीदेवीके साथ क्रीड़ा करते हैं तथा हिरण्यकशिपु यहीं तपस्या करके अत्यन्त बलवान् हुआ था। मुनियोंने भी यहाँ तपस्यासे सिद्धि प्राप्त की है ॥ ४—७ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘नर्मदा-माहात्म्य-वर्णन’ नामक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११३ ॥
एक सौ चौदहवाँ अध्याय
गया-माहात्म्य
अग्निदेव कहते हैं— अब मैं गयाके माहात्म्यका वर्णन करूँगा। गया श्रेष्ठ तीर्थोंमें सर्वोत्तम है। एक समयकी बात है—गय नामक असुरने बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की। उससे देवता संतप्त हो उठे और उन्होंने क्षीरसागरशायी भगवान् विष्णुके समीप जाकर कहा—‘भगवन्! आप गयासुरसे हमारी रक्षा कीजिये।’ ‘तथास्तु’ कहकर श्रीहरि गयासुरके पास गये और उससे बोले—‘कोई वर माँगो।’ दैत्य बोला—‘भगवन्! मैं सब तीर्थोंसे अधिक पवित्र हो जाऊँ।’ भगवान्ने कहा—‘ऐसा ही होगा।’—यों कहकर भगवान् चले गये। फिर तो सभी मनुष्य उस दैत्यका दर्शन करके भगवान्के समीप जा पहुँचे। पृथ्वी सूनी हो गयी। स्वर्गवासी देवता और ब्रह्मा आदि प्रधान देवता श्रीहरिके निकट जाकर बोले—‘देव! श्रीहरि! पृथ्वी और स्वर्ग सूने हो गये। दैत्यके दर्शनमात्रसे सब लोग आपके धाममें चले गये हैं।’ यह सुनकर श्रीहरिने ब्रह्माजीसे कहा—‘तुम सम्पूर्ण देवताओंके साथ गयासुरके पास जाओ और यज्ञभूमि बनानेके लिये उसका शरीर माँगो।’ भगवान्का यह आदेश सुनकर देवताओंसहित ब्रह्माजी गयासुरके समीप जाकर उससे बोले—‘दैत्यप्रवर! मैं तुम्हारे द्वारपर अतिथि होकर आया हूँ और तुम्हारे पावन शरीरको यज्ञके लिये माँग रहा हूँ’॥ १—६ ॥
‘तथास्तु’ कहकर गयासुर धरतीपर लेट गया। ब्रह्माजीने उसके मस्तकपर यज्ञ आरम्भ किया। जब पूर्णाहुतिका समय आया, तब गयासुरका
- अध्याय ११४ * २३९
शरीर चञ्चल हो उठा। यह देख प्रभु ब्रह्माजीने पुनः भगवान् विष्णुसे कहा—‘देव! गयासुर पूर्णाहुतिके समय विचलित हो रहा है।’ तब श्रीविष्णुने धर्मको बुलाकर कहा—‘तुम इस असुरके शरीरपर देवमयी शिला रख दो और सम्पूर्ण देवता उस शिलापर बैठ जायें। देवताओंके साथ मेरी गदाधरमूर्ति भी इसपर विराजमान होगी।’ यह सुनकर धर्मने देवमयी विशाल शिला उस दैत्यके शरीरपर रख दी। (शिलाका परिचय इस प्रकार है—) धर्मसे उनकी पत्नी धर्मवतीके गर्भसे एक कन्या उत्पन्न हुई थी, जिसका नाम 'धर्मव्रता' था। वह बड़ी तपस्विनी थी। ब्रह्माके पुत्र महर्षि मरीचिने उसके साथ विवाह किया। जैसे भगवान् विष्णु श्रीलक्ष्मीजीके साथ और भगवान् शिव श्रीपार्वतीजीके साथ विहार करते हैं, उसी प्रकार महर्षि मरीचि धर्मव्रताके साथ रमण करने लगे ॥ ७—११॥
एक दिनकी बात है। महर्षि जंगलसे कुशा और पुष्प आदि ले आकर बहुत थक गये थे। उन्होंने भोजन करके धर्मव्रतासे कहा—‘प्रिये! मेरे पैर दबाओ।’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर प्रिया धर्मव्रता थके-माँदे मुनिके चरण दबाने लगी। मुनि सो गये; इतनेमें ही वहाँ ब्रह्माजी आ गये। धर्मव्रताने सोचा—‘मैं ब्रह्माजीका पूजन करूँ या अभी मुनिकी चरण-सेवामें ही लगी रहूँ। ब्रह्माजी गुरुके भी गुरु हैं—मेरे पतिके भी पूज्य हैं; अतः इनका पूजन करना ही उचित है।’ ऐसा विचारकर वह पूजन-सामग्रियोंसे ब्रह्माजीकी पूजामें लग गयी। नींद टूटनेपर जब मरीचि मुनिने धर्मव्रताको अपने समीप नहीं देखा, तब आज्ञा-उल्लङ्घनके अपराधसे उसे शाप देते हुए कहा—‘तू शिला हो जायगी।’ यह सुनकर धर्मव्रता कुपित हो उनसे बोली—‘मुने! चरण-सेवा छोड़कर मैंने आपके पूज्य पिताकी पूजा की है, अतः मैं सर्वथा निर्दोष हूँ; ऐसी दशामें भी आपने मुझे शाप दिया है, अतः आपको भी भगवान् शिवसे शापकी प्राप्ति होगी।’ यों कहकर धर्मव्रताने शापको पृथक् रख दिया और स्वयं अग्निमें प्रवेश करके वह हजारों वर्षोंतक कठोर तपस्यामें संलग्न रही। इससे प्रसन्न होकर श्रीविष्णु आदि देवताओंने कहा—‘वर माँगो।’ धर्मव्रता देवताओंसे बोली—‘आपलोग मेरे शापको दूर कर दें’ ॥ १२—१८ ॥
देवताओंने कहा—शुभे! महर्षि मरीचिका दिया हुआ शाप अन्यथा नहीं होगा। तुम देवताओंके चरण-चिह्नसे अङ्कित परमपवित्र शिला होओगी। गयासुरके शरीरको स्थिर रखनेके लिये तुम्हें शिलाका स्वरूप धारण करना होगा। उस समय तुम देवव्रता, देवशिला, सर्वदेवस्वरूपा, सर्वतीर्थमयी तथा पुण्यशिला कहलाओगी ॥ १९-२० ॥
देवव्रता बोली—देवताओ! यदि आपलोग मुझपर प्रसन्न हों तो शिला होनेके बाद मेरे ऊपर ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र आदि देवता और गौरी-लक्ष्मी आदि देवियाँ सदा विराजमान रहें ॥ २१ ॥
अग्निदेव कहते हैं—देवव्रताकी बात सुनकर सब देवता 'तथास्तु' कहकर स्वर्गको चले गये। उस देवमयी शिलाको ही धर्मने गयासुरके शरीरपर रखा। परंतु वह शिलाके साथ ही हिलने लगा। यह देख रुद्र आदि देवता भी उस शिलापर जा बैठे। अब वह देवताओंको साथ लिये हिलने-डोलने लगा। तब देवताओंने क्षीरसागरशायी भगवान् विष्णुको प्रसन्न किया। श्रीहरिने उनको अपनी गदाधरमूर्ति प्रदान की और कहा—‘देवगण! आपलोग चलिये; इस देवगम्य मूर्तिके द्वारा मैं स्वयं ही वहाँ उपस्थित होऊँगा।’ इस प्रकार उस दैत्यके शरीरको स्थिर रखनेके लिये व्यक्ताव्यक्त उभयस्वरूप साक्षात् गदाधारी भगवान् विष्णु वहाँ स्थित हुए। वे आदि-गदाधरके नामसे उस तीर्थमें विराजमान
२४० * अग्निपुराण *
| भगवान् ब्रह्मा [ अग्नि० अ० ४९ ] | अष्टभुज विष्णु [ अग्नि० अ० ४९ ] |
| त्रैलोक्यमोहन श्रीहरि [ अग्नि० अ० ४९ ] | विश्वरूप विष्णु [ अग्नि० अ० ४९ ] |
* अध्याय ११४ * २४१
हैं॥ २२-२५॥
पूर्वकालमें ‘गद’ नामसे प्रसिद्ध एक भयंकर असुर था। उसे श्रीविष्णुने मारा और उसकी हड्डियोंसे विश्वकर्माने गदाका निर्माण किया। वही ‘आदि-गदा’ है। उस आदि-गदाके द्वारा भगवान् गदाधरने ‘हेति’ आदि राक्षसोंका वध किया था, इसलिये वे ‘आदि-गदाधर’ कहलाये। पूर्वोक्त देवमयी शिलापर आदि-गदाधरके स्थित होनेपर गयासुर स्थिर हो गया; तब ब्रह्माजीने पूर्णाहुति दी। तदनन्तर गयासुरने देवताओंसे कहा— ‘किसलिये मेरे साथ वञ्चना की गयी है? क्या मैं भगवान् विष्णुके कहनेमात्रसे स्थिर नहीं हो सकता था? देवताओ! यदि आपने मुझे शिला आदिके द्वारा दबा रखा है, तो आपको मुझे वरदान देना चाहिये’॥ २६-३०॥
देवता बोले— ‘दैत्यप्रवर! तीर्थ-निर्माणके लिये हमने तुम्हारे शरीरको स्थिर किया है; अतः यह तुम्हारा क्षेत्र भगवान् विष्णु, शिव तथा ब्रह्माजीका निवास-स्थान होगा। सब तीर्थोंसे बढ़कर इसकी प्रसिद्धि होगी तथा पितर आदिके लिये यह क्षेत्र ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाला होगा।’—यों कहकर सब देवता वहीं रहने लगे। देवियों और तीर्थ आदिने भी उसे अपना निवास-स्थान बनाया। ब्रह्माजीने यज्ञ पूर्ण करके उस समय ऋत्विजोंको दक्षिणाएँ दीं। पाँच कोसका गया-क्षेत्र और पचपन गाँव अर्पित किये। यही नहीं, उन्होंने सोनेके अनेक पर्वत बनाकर दिये। दूध और मधुकी धारा बहानेवाली नदियाँ समर्पित कीं। दही और घीके सरोवर प्रदान किये। अन्न आदिके बहुत-से पहाड़, कामधेनु गाय, कल्पवृक्ष तथा सोने-चाँदीके घर भी दिये। भगवान् ब्रह्माने ये सब वस्तुएँ देते समय ब्राह्मणोंसे कहा— ‘विप्रवरो! अब तुम मेरी अपेक्षा अल्प-शक्ति रखनेवाले अन्य व्यक्तियोंसे कभी याचना न करना।’ यों कहकर उन्होंने वे सब वस्तुएँ उन्हें अर्पित कर दीं॥ ३१-३५॥
तत्पश्चात् धर्मने यज्ञ किया। उस यज्ञमें लोभवश धन आदिका दान लेकर जब वे ब्राह्मण पुनः गयामें स्थित हुए, तब ब्रह्माजीने उन्हें शाप दिया— ‘अब तुमलोग विद्याविहीन और लोभी हो जाओगे। इन नदियोंमें अब दूध आदिका अभाव हो जायगा और ये सुवर्ण-शैल भी पत्थर मात्र रह जायँगे।’ तब ब्राह्मणोंने ब्रह्माजीसे कहा— ‘भगवन्! आपके शापसे हमारा सब कुछ नष्ट हो गया। अब हमारी जीविकाके लिये कृपा कीजिये।’ यह सुनकर वे ब्राह्मणोंसे बोले— ‘अब इस तीर्थसे ही तुम्हारी जीविका चलेगी। जबतक सूर्य और चन्द्रमा रहेंगे, तबतक इसी वृत्तिसे तुम जीवननिर्वाह करोगे। जो लोग गया-तीर्थमें आयेंगे, वे तुम्हारी पूजा करेंगे। जो हव्य, कव्य, धन और श्राद्ध आदिके द्वारा तुम्हारा सत्कार करेंगे, उनकी सौ पीढ़ियोंके पितर नरकसे स्वर्गमें चले जायँगे और स्वर्गमें ही रहनेवाले पितर परमपदको प्राप्त होंगे’॥ ३६-४०॥
महाराज गयने भी उस क्षेत्रमें बहुत अन्न और दक्षिणासे सम्पन्न यज्ञ किया था। उन्हींके नामसे गयापुरीकी प्रसिद्धि हुई। पाण्डवोंने भी गयामें आकर श्रीहरिकी आराधना की थी॥ ४१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘गया-माहात्म्य-वर्णन’ नामक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११४॥
२४२ * अग्निपुराण *
एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय
गया-यात्राकी विधि
अग्निदेव कहते हैं—यदि मनुष्य गया जानेको उद्यत हो तो विधिपूर्वक श्राद्ध करके तीर्थयात्रीका वेष धारणकर अपने गाँवकी परिक्रमा कर ले; फिर प्रतिदिन पैदल यात्रा करता रहे। मन और इन्द्रियोंको वशमें रखे। किसीसे कुछ दान न ले। गया जानेके लिये घरसे चलते ही पग-पगपर पितरोंके लिये स्वर्गमें जानेकी सीढ़ी बनने लगती है। यदि पुत्र (पितरोंका श्राद्ध करनेके लिये) गया चला जाय तो उससे होनेवाले पुण्यके सामने ब्रह्मज्ञानकी क्या कीमत है? गौओंको संकटसे छुड़ानेके लिये प्राण देनेपर भी क्या उतना पुण्य होना सम्भव है? फिर तो कुरुक्षेत्रमें निवास करनेकी भी क्या आवश्यकता है? पुत्रको गयामें पहुँचा हुआ देखकर पितरोंके यहाँ उत्सव होने लगता है। वे कहते हैं—‘क्या यह पैरोंसे भी जलका स्पर्श करके हमारे तर्पणके लिये नहीं देगा?’ ब्रह्मज्ञान, गयामें किया हुआ श्राद्ध, गोशालामें मरण और कुरुक्षेत्रमें निवास—ये मनुष्योंकी मुक्तिके चार साधन हैं।$^१$ नरकके भयसे डरे हुए पितर पुत्रकी अभिलाषा रखते हैं। वे सोचते हैं, जो पुत्र गयामें जायगा, वह हमारा उद्धार कर देगा॥ १—६ $\frac{१}{२}$॥
मुण्डन और उपवास—यह सब तीर्थोंके लिये साधारण विधि है। गयातीर्थमें काल आदिका कोई नियम नहीं है। वहाँ प्रतिदिन पिण्डदान देना चाहिये। जो वहाँ तीन पक्ष (डेढ़ मास) निवास करता है, वह सात पीढ़ीतिकके पितरोंको पवित्र कर देता है। अष्टका$^२$ तिथियोंमें, आभ्युदयिक कार्योंमें तथा पिता आदिकी क्षयाह-तिथिको भी यहाँ गयामें माताके लिये पृथक् श्राद्ध करनेका विधान है। अन्य तीर्थोंमें स्त्रीका श्राद्ध उसके पतिके साथ ही होता है। गयामें पिता आदिके क्रमसे 'नव देवताक' अथवा 'द्वादशदेवताक' श्राद्ध करना आवश्यक है$^३$॥ ७—९ $\frac{१}{२}$॥
पहले दिन उत्तर-मानस-तीर्थमें स्नान करे। परम पवित्र उत्तर-मानस-तीर्थमें किया हुआ स्नान आयु और आरोग्यकी वृद्धि, सम्पूर्ण पापराशियोंका विनाश तथा मोक्षकी सिद्धि करनेवाला है; अतः वहाँ अवश्य स्नान करे। स्नानके बाद पहले देवता और पितर आदिका तर्पण करके श्राद्धकर्ता पुरुष पितरोंको पिण्डदान दे। तर्पणके समय यह भावना करे कि 'मैं स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूमिपर रहनेवाले सम्पूर्ण देवताओंको तृप्त करता हूँ।' स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूमिके
१. ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोगृहे मरणं तथा॥ वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषा चतुर्विधा। (अग्नि पु० ११५। ५-६)
२. मार्गशीर्ष मासकी पूर्णिमाके बाद जो चार कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथियाँ आती हैं, उन्हें 'अष्टका' कहते हैं। उनके चार पृथक्-पृथक् नाम हैं—पौष कृष्ण अष्टमीको 'ऐन्द्री', माघ कृष्ण अष्टमीको 'वैश्वीदेवी', फाल्गुन कृष्ण अष्टमीको 'प्राजापत्या' और चैत्र कृष्ण अष्टमीको 'पित्र्या' कहते हैं।
उक्त चार अष्टकाओंका क्रमशः इन्द्र, विश्वेदेव, प्रजापति तथा पितृ-देवतासे सम्बन्ध है। अष्टकाके दूसरे दिन जो नवमी आती है, उसे 'अन्वष्टका' कहते हैं। 'अष्टका संस्कार'-कर्म है; अतः एक ही बार किया जाता है, प्रतिवर्ष नहीं। उस दिन मातृपूजा और आभ्युदयिक श्राद्धके पश्चात् गृह्याग्निमें होम किया जाता है।
३. पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, प्रमातामह तथा वृद्ध प्रमातामह—ये नौ देवता हैं। इनके लिये किया जानेवाला श्राद्ध 'नवदेवताक' या 'नवदैवत्य' कहलाता है। इसमें मातामही आदिका भाग मातामह आदिके साथ ही सम्मिलित रहता है। जहाँ मातामही, प्रमातामही और वृद्ध प्रमातामहीको भी पृथक् पिण्ड दिया जाय, वहाँ बारह देवता होनेसे वह 'द्वादशदेवताक' श्राद्ध है।
* अध्याय ११५ * २४३
देवता आदि एवं पिता-माता आदिका तर्पण करे। फिर इस प्रकार कहे—'पिता, पितामह और प्रपितामह; माता, पितामही और प्रपितामही तथा मातामह, प्रमातामह और वृद्ध-प्रमातामह—इन सबको तथा अन्य पितरोंको भी उनके उद्धारके लिये मैं पिण्ड देता हूँ। सोम, मङ्गल और बुधस्वरूप तथा बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतुरूप भगवान् सूर्यको प्रणाम है।' उत्तर-मानस-तीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष अपने समस्त कुलका उद्धार कर देता है॥ १०—१६॥
सूर्यदेवको नमस्कार करके मनुष्य मौन-भावसे दक्षिण-मानस-तीर्थको जाय और यह भावना करे—'मैं पितरोंकी तृप्तिके लिये दक्षिण-मानस-तीर्थमें स्नान करता हूँ। मैं गयामें इसी उद्देश्यसे आया हूँ कि मेरे सम्पूर्ण पितर स्वर्गलोकको चले जायँ।' तदनन्तर श्राद्ध और पिण्डदान करके भगवान् सूर्यको प्रणाम करते हुए इस प्रकार कहे—'सबका भरण-पोषण करनेवाले भगवान् भानुको नमस्कार है। प्रभो! आप मेरे अभ्युदयके साधक हों। मैं आपका ध्यान करता हूँ। आप मेरे सम्पूर्ण पितरोंको भोग और मोक्ष देनेवाले हों। कव्यवाट्, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद तथा आज्यप नामवाले महाभाग पितृ-देवता यहाँ पदार्पण करें। आपलोगोंके द्वारा सुरक्षित जो मेरे पिता-माता, मातामह आदि पितर हैं, उनको पिण्डदान करनेके उद्देश्यसे मैं इस गयातीर्थमें आया हूँ।' मुण्डपृष्ठके उत्तर भागमें देवताओं और ऋषियोंसे पूजित जो 'कनखल' नामक तीर्थ है, वह तीनों लोकोंमें विख्यात है। सिद्ध पुरुषोंके लिये आनन्ददायक और पापियोंके लिये भयंकर बड़े-बड़े नाग, जिनकी जीभ लपलपाती रहती है, उस तीर्थकी प्रतिदिन रक्षा करते हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य इस भूतलपर सुखपूर्वक क्रीडा करते और अन्तमें स्वर्गलोकको जाते हैं॥ १७—२४॥
तत्पश्चात् महानदीमें स्थित परम उत्तम फल्गु-तीर्थपर जाय। यह नाग, जनार्दन, कूप, वट और उत्तर-मानससे भी उत्कृष्ट है। इसे 'गयाका शिरोभाग' कहा गया है। गयाशिरको ही 'फल्गु-तीर्थ' कहते हैं। यह मुण्डपृष्ठ और नग आदि तीर्थकी अपेक्षा सारसे भी सार वस्तु है। इसे 'आभ्यन्तर-तीर्थ' कहा गया है। जिसमें लक्ष्मी, कामधेनु गौ, जल और पृथ्वी सभी फलदायक होते हैं तथा जिससे दृष्टि रमणीय, मनोहर वस्तुएँ फलित होती हैं, वह 'फल्गु-तीर्थ' है। फल्गु-तीर्थ किसी हलके-फुलके तीर्थके समान नहीं है। फल्गु-तीर्थमें स्नान करके मनुष्य भगवान् गदाधरका दर्शन करे तो इससे पुण्यात्मा पुरुषोंको क्या नहीं प्राप्त होता? भूतलपर समुद्र-पर्यन्त जितने भी तीर्थ और सरोवर हैं, वे सब प्रतिदिन एक बार फल्गु-तीर्थमें जाया करते हैं। जो तीर्थराज फल्गु-तीर्थमें श्रद्धाके साथ स्नान करता है, उसका वह स्नान पितरोंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाला तथा अपने लिये भोग और मोक्षकी सिद्धि करनेवाला होता है॥ २५—३०॥
श्राद्धकर्ता पुरुष स्नानके पश्चात् भगवान् ब्रह्माजीको प्रणाम करे। (उस समय इस प्रकार कहे—) 'कलियुगमें सब लोग महेश्वरके उपासक हैं; किंतु इस गया-तीर्थमें भगवान् गदाधर उपास्यदेव हैं। यहाँ लिङ्गस्वरूप ब्रह्माजीका निवास है, उन्हीं महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। भगवान् गदाधर (वासुदेव), बलराम (संकर्षण), प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नृसिंह तथा वराह आदिको मैं प्रणाम करता हूँ।' तदनन्तर श्रीगदाधरका दर्शन करके मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। दूसरे दिन धर्मारण्य-तीर्थका दर्शन करे।
२४४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
वहाँ मतङ्ग मुनिके श्रेष्ठ आश्रममें मतङ्ग-वापीके जलमें स्नान करके श्राद्धकर्ता पुरुष पिण्डदान करे। वहाँ मतङ्गेश्वर एवं सुसिद्धेश्वरको मस्तक झुकाकर इस प्रकार कहे—'सम्पूर्ण देवता प्रमाणभूत होकर रहें, समस्त लोकपाल साक्षी हों, मैंने इस मतङ्ग-तीर्थमें आकर पितरोंका उद्धार कर दिया।' तत्पश्चात् ब्राह्म-तीर्थ नामक कूपमें स्नान, तर्पण और श्राद्ध आदि करे। उस कूप और यूपके मध्यभागमें किया हुआ श्राद्ध सौ पीढ़ियोंका उद्धार करनेवाला है। वहाँ धर्मात्मा पुरुष महाबोधि- वृक्षको नमस्कार करके स्वर्गलोकका भागी होता है। तीसरे दिन नियम एवं व्रतका पालन करनेवाला पुरुष 'ब्रह्म-सरोवर' नामक तीर्थमें स्नान करे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करे—'मैं ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित ब्रह्म-सरोवर-तीर्थमें पितरोंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेके लिये स्नान करता हूँ।' श्राद्धकर्ता पुरुष तर्पण करके पिण्डदान दे। फिर वृक्षको सींचे। जो वाजपेय-यज्ञका फल पाना चाहता हो, वह ब्रह्माजीद्वारा स्थापित यूपकी प्रदक्षिणा करे॥ ३१-३९॥
उस तीर्थमें एक मुनि रहते थे, वे जलका घड़ा और कुशका अग्रभाग हाथमें लिये आमके पेड़की जड़में पानी देते थे। इससे आम भी सींचे गये और पितरोंकी भी तृप्ति हुई। इस प्रकार एक ही क्रिया दो प्रयोजन सिद्ध करनेवाली हो गयी।* ब्रह्माजीको नमस्कार करके मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। चौथे दिन फल्गु-तीर्थमें स्नान करके देवता आदिका तर्पण करे। फिर गयाशीर्षमें श्राद्ध और पिण्डदान करे। गयाका क्षेत्र पाँच कोसका है। उसमें एक कोस केवल 'गयाशीर्ष' है। उसमें पिण्डदान करके
मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर सकता है। परम बुद्धिमान् महादेवजीने मुण्डपृष्ठमें अपना पैर रखा है। मुण्डपृष्ठमें ही गयासुरका साक्षात् सिर है, अतएव उसे 'गया-शिर' कहते हैं। जहाँ साक्षात् गयाशीर्ष है, वहीं फल्गु-तीर्थका आश्रय है। फल्गु अमृतकी धारा बहाती है। वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे किया हुआ दान अक्षय होता है। दशाश्वमेध-तीर्थमें स्नान तथा ब्रह्माजीका दर्शन करके महादेवजीके चरण (रुद्रपाद)-का स्पर्श करनेपर मनुष्य पुनः इस लोकमें जन्म नहीं लेता। गयाशीर्षमें शमीके पत्ते-बराबर पिण्ड देनेसे भी नरकोंमें पड़े हुए पितर स्वर्गको चले जाते हैं और स्वर्गवासी पितरोंको मोक्षकी प्राप्ति होती है। वहाँ खीर, आटा, सत्तू, चरु और चावलसे पिण्डदान करे। तिलमिश्रित गेहूँसे भी रुद्रपादमें पिण्डदान करके मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर सकता है॥ ४०-४८॥
इसी प्रकार 'विष्णुपदी'में भी श्राद्ध और पिण्डदान करनेवाला पुरुष पितृ-ऋणसे छुटकारा पाता है और पिता आदि ऊपरकी सौ पीढ़ियों तथा अपनेको भी तार देता है। 'ब्रह्मपद'में श्राद्ध करनेवाला मानव अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाता है। दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य-अग्नि तथा आहवनीय-अग्निके स्थानमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष यज्ञफलका भागी होता है। आवसथ्याग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, गणेश, अगस्त्य और कार्तिकेयके स्थानमें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य अपने कुलका उद्धार कर देता है। मनुष्य सूर्यके रथको नमस्कार करके कर्णादित्यको मस्तक झुकावे। कनकेश्वरके पदको प्रणाम करके गया-केदार-तीर्थको नमस्कार करे। इससे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पाकर
* एको मुनिः कुम्भकुशाग्रहस्त आम्रस्य मूले सलिलं ददाति। आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च तृप्ता एका क्रिया द्व्यर्थकरी प्रसिद्धा॥ (अग्नि पु० ११५।४०)
- अध्याय ११५ * २४५
अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। विशाल भी गयाशीर्षमें पिण्डदान करनेसे पुत्रवान् हुए।
कहते हैं, विशाला नगरीमें एक 'विशाल' नामसे प्रसिद्ध राजपुत्र थे। उन्होंने ब्राह्मणोंसे पूछा—'मुझे पुत्र आदिकी उत्पत्ति किस प्रकार होगी?' यह सुनकर ब्राह्मणोंने विशालसे कहा—'गयामें पिण्डदान करनेसे तुम्हें सब कुछ प्राप्त होगा।' तब विशालने भी गयाशीर्षमें पितरोंको पिण्डदान किया। उस समय आकाशमें उन्हें तीन पुरुष दिखायी दिये, जो क्रमशः श्वेत, लाल और काले थे। विशालने उनसे पूछा—'आपलोग कौन हैं?' उनमेंसे एक श्वेतवर्णवाले पुरुषने विशालसे कहा—'मैं तुम्हारा पिता हूँ; मेरा वर्ण श्वेत है; मैं अपने शुभकर्मसे इन्द्रलोकमें गया था। बेटा! ये लाल रंगवाले मेरे पिता और काले रंगवाले मेरे पितामह थे। ये नरकमें पड़े थे; तुमने हम सबको मुक्त कर दिया। तुम्हारे पिण्डदानसे हमलोग ब्रह्मलोकमें जा रहे हैं।' यों कहकर वे तीनों चले गये। विशालको पुत्र-पौत्र आदिकी प्राप्ति हुई। उन्होंने राज्य भोगकर मृत्युके पश्चात् भगवान् श्रीहरिको प्राप्त कर लिया ॥ ४९-५९ ॥
एक प्रेतोंका राजा था, जो अन्य प्रेतोंके साथ बहुत पीड़ित रहता था। उसने एक दिन एक वणिक्से अपनी मुक्तिके लिये इस प्रकार कहा—'भाई! हमारे द्वारा एक ही पुण्य हुआ था, जिसका फल यहाँ भोगते हैं। पूर्वकालमें एक बार श्रवण-नक्षत्र और द्वादशी तिथिका योग आनेपर हमने अन्न और जलसहित कुम्भदान किया था; वही प्रतिदिन मध्याह्नके समय हमारी जीवन-रक्षाके लिये उपस्थित होता है। तुम हमसे धन लेकर गया जाओ और हमारे लिये पिण्डदान करो।' वणिक्ने उससे धन लिया और गयामें उसके निमित्त पिण्डदान किया। उसका फल यह हुआ कि वह प्रेतराज अन्य सब प्रेतोंके साथ मुक्त होकर श्रीहरिके धाममें जा पहुँचा। गयाशीर्षमें पिण्डदान करनेसे मनुष्य अपने पितरोंका तथा अपना भी उद्धार कर देता है ॥ ६०-६३ ॥
वहाँ पिण्डदान करते समय इस प्रकार कहना चाहिये—'मेरे पिताके कुलमें तथा माताके वंशमें और गुरु, श्वशुर एवं बन्धुजनोंके वंशमें जो मृत्युको प्राप्त हुए हैं, इनके अतिरिक्त भी जो बन्धु-बान्धव मरे हैं, मेरे कुलमें जिनका श्राद्ध-कर्म—पिण्डदान आदि लुप्त हो गया है, जिनके कोई स्त्री-पुत्र नहीं रहा है, जिनके श्राद्ध-कर्म नहीं होने पाये हैं, जो जन्मके अंधे, लँगड़े और विकृत रूपवाले रहे हैं, जिनका अपक्व गर्भके रूपमें निधन हुआ है, इस प्रकार जो मेरे कुलके ज्ञात एवं अज्ञात पितर हों, वे सब मेरे दिये हुए इस पिण्डदानसे सदाके लिये तृप्त हो जायँ। जो कोई मेरे पितर प्रेतरूपसे स्थित हों, वे सब यहाँ पिण्ड देनेसे सदाके लिये तृप्तिको प्राप्त हों।' अपने कुलको तारनेवाली सभी संतानोंका कर्तव्य है कि वे अपने सम्पूर्ण पितरोंके उद्देश्यसे वहाँ पिण्ड दें तथा अक्षय लोककी इच्छा रखनेवाले पुरुषको अपने लिये भी पिण्ड अवश्य देना चाहिये* ॥ ६४-६८ ॥
बुद्धिमान् पुरुष पाँचवें दिन 'गदालोल' नामक तीर्थमें स्नान करे। उस समय इस मन्त्रका पाठ करे—'भगवान् जनार्दन! जिसमें आपकी गदाका प्रक्षालन हुआ था, उस अत्यन्त पावन 'गदालोल' नामक तीर्थमें मैं संसाररूपी रोगकी शान्तिके लिये स्नान करता हूँ' ॥ ६९$\frac{१}{२}$ ॥
'अक्षय स्वर्ग प्रदान करनेवाले अक्षयवटको नमस्कार है। जो पिता-पितामह आदिके लिये अक्षय आश्रय है तथा सब पापोंका क्षय करनेवाला
* पिण्डो देयस्तु सर्वैश्च सर्वैर्न कुलतारकैः। आत्मनस्तु तथा देयो ह्यक्षयं लोकमिच्छता ॥ (अग्निपु० ११५।६८)
२४६ * अग्निपुराण *
है, उस अक्षय वटको नमस्कार है।'—यों प्रार्थना कर वटके नीचे श्राद्ध करके ब्राह्मण-भोजन करावे॥ ७०-७१॥
वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेसे कोटि ब्राह्मणोंको भोजन करानेका पुण्य होता है। फिर यदि बहुत-से ब्राह्मणोंको भोजन कराया जाय, तब तो उसके पुण्यका क्या कहना है? वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे जो कुछ दिया जाता है, वह अक्षय होता है। पितर उसी पुत्रसे अपनेको पुत्रवान् मानते हैं, जो गयामें जाकर उनके लिये अन्नदान करता है। वट तथा वटेश्वरको नमस्कार करके अपने प्रपितामहका पूजन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष अक्षय लोकमें जाता है और अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। क्रमसे हो या बिना क्रमसे, गयाकी यात्रा महान् फल देनेवाली होती है॥ ७२—७४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गया-यात्राकी विधिका वर्णन' नामक एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११५॥
एक सौ सोलहवाँ अध्याय
गयामें श्राद्धकी विधि
अग्निदेव कहते हैं— गायत्री-मन्त्रसे ही महानदीमें स्नान करके संध्योपासना करे। प्रातःकाल गायत्रीके सम्मुख किया हुआ श्राद्ध और पिण्डदान अक्षय होता है। सूर्योदयके समय तथा मध्याह्नकालमें स्नान करके गीत और वाद्यके द्वारा सावित्री देवीकी उपासना करे। फिर उन्हींके सम्मुख संध्या करके नदीके तटपर पिण्डदान करे। तदनन्तर अगस्त्यपदमें पिण्डदान करे। फिर 'योनिद्वार' (ब्रह्मयोनि)-में प्रवेश करके निकले। इससे वह फिर माताकी योनिमें नहीं प्रवेश करता, पुनर्जन्मसे मुक्त हो जाता है। तत्पश्चात् काकशिलापर बलि देकर कुमार कार्तिकेयको प्रणाम करे। इसके बाद स्वर्गद्वार, सोमकुण्ड और वायु-तीर्थमें पिण्डदान करे। फिर आकाशगङ्गा और कपिलाके तटपर पिण्ड दे। वहाँ कपिलेश्वर शिवको प्रणाम करके रुक्मिणीकुण्डपर पिण्डदान करे॥ १-५॥
कोटि-तीर्थमें भगवान् कोटीश्वरको नमस्कार करके मनुष्य अमोघपद, गदालोल, वानरक एवं गोप्रचार-तीर्थमें पिण्डदान दे। वैतरणीमें गौको नमस्कार एवं दान करके मनुष्य अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। वैतरणीके तटपर श्राद्ध एवं पिण्डदान करे। उसके बाद क्रौञ्चपादमें पिण्ड दे। तृतीया तिथिको विशाला, निश्चिरा, ऋणमोक्ष तथा पापमोक्ष-तीर्थमें भी पिण्डदान करे। भस्मकुण्डमें भस्मसे स्नान करनेवाला पुरुष पापसे मुक्त हो जाता है। वहाँ भगवान् जनार्दनको प्रणाम करे और इस प्रकार प्रार्थना करे— 'जनार्दन! यह पिण्ड मैंने आपके हाथमें समर्पित किया है। परलोकमें जानेपर यह मुझे अक्षयरूपमें प्राप्त हो।' गयामें साक्षात् भगवान् विष्णु ही पितृदेवके रूपमें विराजमान हैं॥ ६-१०॥
उन भगवान् कमलनयनका दर्शन करके मानव तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। तदनन्तर मार्कण्डेयेश्वरको प्रणाम करके मनुष्य गृध्रेश्वरको नमस्कार करे। महादेवजीके मूलक्षेत्र धारामें पिण्डदान करना चाहिये। इसी प्रकार गृध्रकूट, गृध्रवट और धौतपादमें भी पिण्डदान करना उचित है। पुष्करिणी, कर्दममाल और रामतीर्थमें पिण्ड दे। फिर प्रभासेश्वरको नमस्कार करके