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अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ
  • अध्याय ११६ * २४७

प्रेतशिलापर पिण्डदान दे। उस समय इस प्रकार कहे — 'दिव्यलोक, अन्तरिक्षलोक तथा भूमिलोकमें जो मेरे पितर और बान्धव आदि सम्बन्धी प्रेत आदिके रूपमें रहते हों, वे सब लोग इन मेरे दिये हुए पिण्डोंके प्रभावसे मुक्ति-लाभ करें।' प्रेतशिला तीन स्थानोंमें अत्यन्त पावन मानी गयी है — गयाशीर्ष, प्रभासतीर्थ और प्रेतकुण्ड। इनमें पिण्डदान करनेवाला पुरुष अपने कुलका उद्धार कर देता है॥ ११—१५॥

वसिष्ठेश्वरको नमस्कार करके उनके आगे पिण्डदान दे। गयानाभि, सुषुम्ना तथा महाकोष्ठौमें भी पिण्डदान करे। भगवान् गदाधरके सामने मुण्डपृष्ठपर देवीके समीप पिण्डदान करे। पहले क्षेत्रपाल आदिसहित मुण्डपृष्ठको नमस्कार कर लेना चाहिये। उनका पूजन करनेसे भयका नाश होता है, विष और रोग आदिका कुप्रभाव भी दूर हो जाता है। ब्रह्माजीको प्रणाम करनेसे मनुष्य अपने कुलको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। सुभद्रा, बलभद्र तथा भगवान् पुरुषोत्तमका पूजन करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करके अपने कुलका उद्धार कर देता और अन्तमें स्वर्गलोकका भागी होता है। भगवान् हृषीकेशको नमस्कार करके उनके आगे पिण्डदान देना चाहिये। श्रीमाधवका पूजन करके मनुष्य विमानचारी देवता होता है॥ १६—२०॥

भगवती महालक्ष्मी, गौरी तथा मङ्गलमयी सरस्वतीकी पूजा करके मनुष्य अपने पितरोंका उद्धार करता, स्वयं भी स्वर्गलोकमें जाता और वहाँ भोग भोगनेके पश्चात् इस लोकमें आकर शास्त्रोंका विचार करनेवाला पण्डित होता है। फिर बारह आदित्योंका, अग्निका, रेवन्तका और इन्द्रका पूजन करके मनुष्य रोग आदिसे छुटकारा पा जाता है और अन्तमें स्वर्गलोकका निवासी होता है। ‘श्रीकपर्दि विनायक' तथा कार्तिकेयका पूजन करनेसे मनुष्यको निर्विघ्नतापूर्वक सिद्धि प्राप्त होती है। सोमनाथ, कालेश्वर, केदार, प्रपितामह, सिद्धेश्वर, रुद्रेश्वर, रामेश्वर तथा ब्रह्मकेश्वर — इन आठ गुप्त लिङ्गोंका पूजन करनेसे मनुष्य सब कुछ पा लेता है। यदि लक्ष्मीप्राप्तिकी कामना हो तो भगवान् नारायण, वाराह, नरसिंहको नमस्कार करे। ब्रह्मा, विष्णु तथा त्रिपुरनाशक महेश्वरको भी प्रणाम करे। वे सब कामनाओंको देनेवाले हैं॥ २१—२५॥

सीता, राम, गरुड़ तथा वामनका पूजन करनेसे मानव अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त कर लेता है और पितरोंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति करा देता है। देवताओंसहित भगवान् श्रीआदि-गदाधरका पूजन करनेसे मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त होकर अपने सम्पूर्ण कुलको तार देता है। प्रेतशिला देवरूपा होनेसे परम पवित्र है। गयामें वह शिला देवमयी ही है। गयामें ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ तीर्थ न हो। गयामें जिसके नामसे भी पिण्ड दिया जाता है, उसे वह सनातन ब्रह्ममें प्रतिष्ठित कर देता है। फल्गीश्वर, फल्गुचण्डी तथा अङ्गारकेश्वरको प्रणाम करके श्राद्धकर्ता पुरुष मातङ्गमूनिके स्थानमें पिण्डदान दे। फिर भरतके आश्रमपर भी पिण्ड दे। इसी प्रकार हंस-तीर्थ और कोटि-तीर्थमें भी करना चाहिये। जहाँ पाण्डुशिला नद है, वहाँ अग्निधारा तथा मधुस्रवा तीर्थमें पिण्डदान करे। तत्पश्चात् इन्द्रेश्वर, किलकिलेश्वर तथा वृद्धि-विनायकको प्रणाम करे; तदनन्तर धेनुकारण्यमें पिण्डदान करे, धेनुपदमें गौको नमस्कार करे। इससे वह अपने सम्पूर्ण पितरोंका उद्धार कर देता है। फिर सरस्वती-तीर्थमें जाकर पिण्ड दे। सायंकाल संध्योपासना करके सरस्वती देवीको प्रणाम करे। ऐसा करनेवाला पुरुष तीनों

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कालकी सन्ध्योपासनामें तत्पर वेद-वेदाङ्गोंका पारंगत विद्वान् ब्राह्मण होता है॥ २६—३३॥

गयाकी परिक्रमा करके वहाँके ब्राह्मणोंका पूजन करनेसे गया-तीर्थमें किया हुआ अन्नदान आदि सम्पूर्ण पुण्य अक्षय होता है। भगवान् गदाधरकी स्तुति करके इस प्रकार प्रार्थना करे— 'जो आदिदेवता, गदा धारण करनेवाले, गयाके निवासी तथा पितर आदिको सद्गति देनेवाले हैं, उन योगदाता भगवान् गदाधरको मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिके लिये प्रणाम करता हूँ। वे देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और अहंकारसे शून्य हैं। नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, द्वैतशून्य तथा देवता और दानवोंसे वन्दित हैं। देवताओं और देवियोंके समुदाय सदा उनकी सेवामें उपस्थित रहते हैं; मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। वे कलिके कल्मष (पाप) और कालकी पीड़ाका नाश करनेवाले हैं। उनके कण्ठमें वनमाला सुशोभित होती है। सम्पूर्ण लोकपालोंका भी उन्हींके द्वारा पालन होता है। वे सबके कुलोंका उद्धार करनेमें मन लगाते हैं। व्यक्त और अव्यक्त—सबमें अपने स्वरूपको विभक्त करके स्थित होते हुए भी वे वास्तवमें अविभक्तात्मा ही हैं। अपने स्वरूपमें ही उनकी स्थिति है। वे अत्यन्त स्थिर और सारभूत हैं तथा भयंकर पापोंका भी मर्दन करनेवाले हैं। मैं उनके चरणोंमें मस्तक झुकाता हूँ। देव! भगवान् गदाधर! मैं पितरोंका श्राद्ध करनेके निमित्त गयामें आया हूँ। आप यहाँ मेरे साक्षी होइये। आज मैं तीनों ऋणोंसे मुक्त हो गया। ब्रह्मा और शंकर आदि देवता मेरे लिये साक्षी बनें। मैंने गयामें आकर अपने पितरोंका उद्धार कर दिया।' श्राद्ध आदिमें गयाके इस माहात्म्यका पाठ करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकका भागी होता है। गयामें पितरोंका श्राद्ध अक्षय होता है। वह अक्षय ब्रह्मलोक देनेवाला है॥ ३४—४३॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गयामें श्राद्धकी विधि' विषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११६॥


एक सौ सत्रहवाँ अध्याय

श्राद्ध-कल्प

अग्निदेव कहते हैं—महर्षि कात्यायनने मुनियोंसे जिस प्रकार श्राद्धका वर्णन किया था, उसे बतलाता हूँ। गया आदि तीर्थोंमें, विशेषतः संक्रान्ति आदिके अवसरपर श्राद्ध करना चाहिये। अपराह्नकालमें, अपरपक्ष (कृष्णपक्ष)-में, चतुर्थी तिथिको अथवा उसके बादकी तिथियोंमें श्राद्धोपयोगी सामग्री एकत्रित कर उत्तम नक्षत्रमें श्राद्ध करे। श्राद्धके एक दिन पहले ही ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। संन्यासी, गृहस्थ, साधु अथवा स्नातक तथा श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको, जो निन्दाके पात्र न हों, अपने कर्मोंमें लगे रहते हों और शिष्ट एवं सदाचारी हों—निमन्त्रित करना चाहिये। जिनके शरीरमें सफेद दाग हों, जो कोढ़ आदिके रोगोंसे ग्रस्त हों, ऐसे ब्राह्मणोंको छोड़ दे; उन्हें श्राद्धमें सम्मिलित न करे। निमन्त्रित ब्राह्मण जब स्नान और आचमन करके पवित्र हो जायँ तो उन्हें देवकर्ममें पूर्वाभिमुख बिठावे। देव-श्राद्ध, पितृ-श्राद्धमें तीन-तीन ब्राह्मण रहें अथवा दोनोंमें एक-एक ही ब्राह्मण हों। इस प्रकार मातामह आदिके श्राद्धमें भी समझना चाहिये। शाक आदिसे भी श्राद्ध-कर्म करावे॥ १—५॥

श्राद्धके दिन ब्रह्मचारी रहे, क्रोध और

  • अध्याय ११७ * २४९

उतावली न करे। नम्र, सत्यवादी और सावधान रहे। उस दिन अधिक मार्ग न चले, स्वाध्याय भी न करे, मौन रहे। सम्पूर्ण पंक्तिमूर्धन्य (पंक्तिमें सर्वश्रेष्ठ अथवा पंक्तिपावन) ब्राह्मणोंसे प्रत्येक कर्मके विषयमें पूछे। आसनपर कुश बिछावे। पितृकर्ममें कुशोंको दोहरा मोड़ देना चाहिये। पहले देव-कर्म, फिर पितृ-कर्म करे।$^१$ देव-धर्ममें स्थित ब्राह्मणोंसे पूछे—'मैं विश्वेदेवोंका आवाहन करूँगा।' ब्राह्मण आज्ञा दें—'आवाहन करो', तब ‘विश्वेदेवास आगत शृणुताम इमं हवम्, एदं बर्हिर्निषीदत' (यजु० ७। ३४)—इस मन्त्रके द्वारा विश्वेदेवोंका आवाहन करके आसनपर जौ छोड़े तथा 'विश्वेदेवाः शृणुतेमं हवं मे ये अन्तरिक्षे य उपद्यविष्ठ। ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वम्॥' (यजु० ३३। ५३)—इस मन्त्रका जप करे। तत्पश्चात् पितृकर्ममें नियुक्त ब्राह्मणोंसे पूछे—'मैं पितरोंका आवाहन करूँगा।' ब्राह्मण कहें—'आवाहन करो।' तब 'उशन्तस्त्वा०'$^२$ इस मन्त्रका पाठ करते हुए आवाहन करे। फिर ‘अपहता असुरा रक्षांसि वेदिषदः॥' (यजु० २। २९)—इस मन्त्रसे तिल बिखेरकर ‘आयन्तु नः०'$^३$ इत्यादि मन्त्रका जप करे। इसके बाद पवित्रकसहित अर्घ्यपात्रमें ‘शं नो देवी०'$^४$ इस मन्त्रसे जल डाले॥ ६—१०॥

तदनन्तर 'यवोऽसि'$^५$ इस मन्त्रसे जौ देकर पितरोंके निमित्त सर्वत्र तिलका उपयोग करे। (पितरोंके अर्घ्यपात्रमें भी 'शं नो देवी०' इस मन्त्रसे जल डालकर) ‘तिलोऽसि सोमदेवत्यो गोसवे देवनिर्मितः। प्रत्नवद्भिः प्रत्तः स्वधया पितॄँल्लोकान् पृणीहि नः स्वधा।' यह मन्त्र पढ़कर तिल डाले। फिर 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्याव-होरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्। इष्णन्नि-षाणामुं म इषाण सर्वलोकं म इषाण॥' (यजु० ३१। २२) इस मन्त्रसे अर्घ्यपात्रमें फूल छोड़े। अर्घ्यपात्र सोना, चाँदी, गूलर अथवा पत्तेका होना चाहिये। उसीमें देवताओंके लिये सव्यभावसे और पितरोंके लिये अपसव्यभावसे उक्त वस्तुएँ रखनी चाहिये। एक-एकको एक-एक अर्घ्यपात्र पृथक्-पृथक् देना उचित है। पितरोंके हाथोंमें पहले पवित्री रखकर ही उन्हें अर्घ्य देना चाहिये॥ ११—१३॥

तत्पश्चात् (देवताओंके अर्घ्यपात्रको बायें हाथमें लेकर उसमें रखी हुई पवित्रीको दाहिने हाथसे निकालकर देव-भोजन-पात्रपर पूर्वाग्र करके रख दे। उसके ऊपर दूसरा जल देकर अर्घ्यपात्रको ढककर) निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े—‘ॐ या दिव्या आपः पयसा सम्बभूवुर्या अन्तरिक्षा उत पार्थिवीर्याः। हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता न आपः शिवाः शंः स्योनाः सुहवा भवन्तु॥' फिर (जौ, कुश और जल हाथमें लेकर संकल्प पढ़े—) ‘ॐ अद्यामुकगोत्राणां पितृपितामह-प्रपितामहानाम् अमुकामुकशर्मणाम् अमुकश्राद्धसम्बन्धिनो विश्वेदेवाःएष वो हस्तार्घ्यः स्वाहा।'—यों कहकर देवताओंको अर्घ्य देकर पात्रको दक्षिण भागमें सीधे रख दे। इसी प्रकार पिता आदिके लिये भी अर्घ्य दे। उसका संकल्प इस प्रकार है—'ओम्अद्य अमुकगोत्र पितः


१. श्राद्ध आरम्भ करनेसे पूर्व रक्षा-दीप जला लेना चाहिये।
२. ॐ उशन्तस्त्वा निधीमह्युशन्तः समिधीमहि। उशन्नुशत आवह पितॄन् हविषे अत्तवे॥ (यजु० १९। ७०)
३. ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः। अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्॥ (यजु० १९। ५८)
४. ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शंय्योरभिस्स्रवन्तु नः॥ (अथर्व० १। ६। १)
५. ॐ यवोऽसि यवयास्मद्द्वेषो यवयारातीः। (यजु० ५। २६)

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अमुकशर्मन् अमुकश्राद्धे एष हस्तार्घ्यः ते स्वधा।' इसी तरह पितामह आदिको भी दे। फिर सब अर्घ्यका अवशेष पहले पात्रमें डाल दे अर्थात् प्रपितामहके अर्घ्यमें जो जल आदि हो, उसे पितामहके पात्रमें डाल दे। इसके बाद वह सब पिताके अर्घ्यपात्रमें रख दे। पिताके अर्घ्यपात्रको पितामहके अर्घ्यपात्रके ऊपर रखे। फिर उन दोनोंको प्रपितामहके अर्घ्यपात्रके ऊपर रख दे। तत्पश्चात् तीनोंको पिताके आसनके वामभागमें 'पितृभ्यः स्थानमसि।' ऐसा कहकर उलट दे। तदनन्तर वहाँ देवताओं और पितरोंके लिये गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा वस्त्र आदिका दान किया जाता है॥ १४-१६॥

उसके बाद श्राद्धकर्ता पुरुष पात्रमेंसे घृतयुक्त अन्न निकालकर ब्राह्मणोंसे पूछे—'मैं अग्निमें इस अन्नका हवन करूँगा।' ब्राह्मण आज्ञा दें—'करो'। तब साग्निक पुरुष तो अग्निमें हवन करे और निरग्निक पुरुष पवित्रीयुक्त पितरके हाथ (अथवा जल)-में मन्त्रसे आहुति दे। पहली आहुति 'अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा।' (यजु० २।२९) कहकर दे। दूसरी आहुति 'सोमाय पितृमते स्वाहा।' (यजु० २।२९) इस मन्त्रसे दे। दूसरे विद्वानोंका मत है कि 'यम' एवं 'अङ्गिरा' के उद्देश्यसे आहुति दे¹। हवनसे शेष बचे हुए अन्नमेंसे क्रमशः देवताओं और पितरोंके पात्रोंमें परोसे और पात्रको हाथसे ढक दे। उस समय निम्नाङ्कित मन्त्रका जप करे—'ॐ पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखेऽमृतेऽमृतं जुहोमि स्वाहा। इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् समूढमस्य पाँसुरे स्वाहा॥ कृष्ण हव्यमिदं रक्ष मदीयम्।' (यजु० ५।१५) ऐसा पढ़कर अन्तमें ब्राह्मणके अँगूठेका स्पर्श करावे। (देवपात्रोंपर 'यवोऽसि यवयास्मद्द्वेषो यवयारातीः।' इस मन्त्रसे जौ छींटे) और पितरोंके पात्रोंपर 'अपहता असुरा रक्षांसि वेदिषदः।' इस मन्त्रसे तिल छींटकर संकल्पपूर्वक अन्न अर्पण करे। तदनन्तर 'जुषध्वम्।' (आपलोग अन्न ग्रहण करें) ऐसा कहकर गायत्री-मन्त्र आदिका जप करे॥ १७-२१॥

देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः॥²

'इस मन्त्रका भी जप करे। पितरोंको तृप्त जानकर पात्रमें अन्न बिखेरे। फिर एक-एक बार सबको जल दे। पूर्ववत् सव्यभावसे गायत्री-जप करके **'मधु वाता'**³ इस ऋचाका जप करे।⁴ इसके बाद ब्राह्मणोंसे पूछे—'आपलोग तृप्त हो गये?' ब्राह्मण कहें—'हाँ, हम तृप्त हो गये।' तदनन्तर शेष अन्नको ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर एकमें मिला दे और पिण्ड बनानेके लिये पात्रसे बाहर निकाले और पितरोंके उच्छिष्ट अन्नके पास ही अवनेजन करके कुशोंपर संकल्पपूर्वक


१. यदि दूसरेकी भूमिमें श्राद्ध करते हों तो थोड़ा अन्न और जल कुशापर अपसव्यभावसे रखकर कहें—'इदमन्नमेतद्भूस्वामिपितृभ्यो नमः।'
२. देवताओं, पितरों, महायोगियों, स्वधा और स्वाहाको मेरा सर्वदा नमस्कार है, नमस्कार है।
३. यह मन्त्र तीन ऋचाओंमें है। पूरा मन्त्र इस प्रकार है—ॐ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥ १॥ ॐ मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिव रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता॥ २॥ ॐ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँऽस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः॥ ३॥ (यजु० १३। २७-२९) ॐ मधु मधु मधु॥
४. उक्त ऋचाके अतिरिक्त भी 'उदीरतामवर०' (यजु० १९।४९) इत्यादि पितृमन्त्रोंका 'ॐ कृणुष्व पाजः०' (यजु० १३।९) इत्यादि रक्षोघ्न-मन्त्रोंका, 'सहस्रशीर्षाः०' (यजु० ३१) इत्यादि पुरुषसूक्तका तथा 'ॐ आशुः शिशानः०' (यजु० १७। ३३) इत्यादि मन्त्रोंका एवं शतरुद्रियका पाठ भी किया जाता है।
'नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष नमस्तेऽनेकचक्षुषे। नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय वै नमः॥' इस श्लोकको भी पढ़ना चाहिये।

  • अध्याय ११७ * २५१

तीन पिण्डदान करे।$^१$ दूसरोंका मत है कि ब्राह्मण जब भोजनके पश्चात् हाथ-मुँह धोकर आचमन कर लें, तब पिण्डदान देना चाहिये। आचमनके पश्चात् जल, फूल और अक्षत दे॥ २२—२५$\frac{१}{२}$॥

फिर अक्षय्योदक देकर मनुष्य आशीर्वादकी प्रार्थना करे$^२$। ‘ॐ अघोराः पितरः सन्तु।’ (मेरे पितर सौम्य हों।) ऐसा कहकर जल गिरावे, फिर प्रार्थना करे—‘हमारा गोत्र सदा ही बढ़ता रहे, हमारे दाता भी निरन्तर अभ्युदयशील हों, वेदोंकी पठन-पाठन-प्रणाली बढ़े। संतानोंकी भी वृद्धि हो। हमारी श्रद्धांमें कमी न आवे; हमारे पास देने योग्य बहुत सामान संचित रहे; हमारे यहाँ अन्न भी अधिक हो। हम अतिथियोंको प्राप्त करते रहें अर्थात् हमारे घरपर अतिथियोंका शुभागमन होता रहे। हमारे पास माँगनेवाले आवें, किंतु हम किसीसे न माँगें।’ फिर स्वधा-वाचनके लिये पिण्डोंपर पवित्रकसहित कुश बिछावे और ब्राह्मणोंसे पूछे—‘मैं स्वधा-वाचन कराऊँगा।’ ब्राह्मण आज्ञा दें—‘स्वधा-वाचन कराओ।’ तब श्राद्धकर्ता पुरुष इस प्रकार कहे—

‘ब्राह्मणो! आपलोग मेरे पिता, पितामह और प्रपितामहके लिये स्वधा-वाचन करें।’ ब्राह्मण कहें—‘अस्तु स्वधा।’ तदनन्तर ‘ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिस्रुतम् स्वधा स्थ तर्पयत मे पितॄन्’ (यजु० २। ३४)—इस मन्त्रसे कुशोंपर दुग्ध-मिश्रित जलकी दक्षिणाग्रधारा गिरावे,$^३$ फिर (सव्य होकर देवार्घ्यपात्रको हिला दे और पितरोंके) अर्घ्यपात्रको उत्तान करके देवश्राद्ध


१. इसके पहले कुछ दूरपर दक्षिणाग्र कुश बिछाकर भूमिको सींच दे और तिल-घृतसहित अन्न एवं जल लेकर—
‘ॐ अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु परां गतिम्॥’
यह पढ़कर पूर्वोक्त कुशोंपर वह अन्न-जल बिखेर दे। तदनन्तर आचमन करके भगवान्‌का स्मरण कर तीन बार गायत्री-मन्त्रका जप करे। इसके बाद अपसव्यभावसे बालूकी चौकोर वेदी बनाकर उसके ऊपर कुशके मूलसे प्रादेशमात्र तीन रेखा खींचे; उस समय ‘ॐ अपहता०’ इत्यादि मन्त्र पढ़े। फिर रेखाके चारों ओर उल्मुकसे अङ्गार-भ्रमण करावे। इसका मन्त्र इस प्रकार है—‘ॐ ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति। परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टाँल्लोकात्प्रणुदात्यस्मात्॥’ (यजु० २। ३०) तत्पश्चात् रेखापर तीन कुश बिछाकर सव्यभावसे गायत्री-जप करके फिर अपसव्यभावसे दोनेमें जल, तिल, गन्ध-पुष्प लेकर ‘ॐ अद्यामुकगोत्र पितः अमुकशर्मन् अमुकश्राद्धे पिण्डस्थानेऽत्रावनेनिक्ष्व ते स्वधा’ ऐसा कहकर कुशपर जल गिरावे। यह ‘अवनेजन’ है। पिण्ड देनेके बाद पिण्डके ऊपर उसी पात्रसे जल गिराकर उसी प्रकार संकल्प पढ़कर प्रत्यवनेजन किया जाता है। उसमें ‘प्रत्यवनेनिक्ष्व’ कहना चाहिये। पिण्डदानका संकल्प इस प्रकार है—ओम्द्यामुकगोत्र पितः अमुकशर्मन् अमुकश्राद्धे एष पिण्डस्ते स्वधा।’ इसी प्रकार पितामह आदिको भी देना चाहिये। पिण्डदानके अनन्तर पिण्डके आधारभूत कुशोंमें अपने हाथ पोंछकर कहे—‘ॐ लेपभागभुजः पितरस्तृप्यन्तु।’ फिर सव्यभावसे तीन बार आचमन करके श्रीहरिका स्मरण करे। तदनन्तर अपसव्यभावसे दक्षिणकी ओर मुँह करके कहे—‘अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्।’ (यजु० २। ३१) फिर वामावर्तसे उत्तरकी ओर मुँहकर श्वास रोककर प्रसन्नचित्त हो प्रकाशमान मूर्तिवाले पितरोंका ध्यान करते हुए फिर उसी मार्गसे लौटकर दक्षिणाभिमुख हो जाय और कहे—‘अमीमदन्त पितरो यथाभागमावृषायिषत।’ (यजु० २। ३१) इसके बाद पहलेके अवनेजनपात्रमें जो शेष जल हो, उसे पिण्डपर गिराकर प्रत्यवनेजन दें। उसका संकल्प अवनेजनकी ही भाँति है। ‘अवनेनिक्ष्व’को ‘प्रत्यवनेनिक्ष्व’ कहना चाहिये। बहुवचनमें ‘प्रत्यवनेनिग्ध्वम्’ का उच्चारण करना उचित है।

२. प्रत्यवनेजनके बाद नीवी-विस्रंसन करके सव्यभावसे आचमन करे। फिर अपसव्य हो बायें हाथसे दाहिने हाथमें सूत्र लेकर ‘ॐ नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरः शोषाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः पितरो नमो वो गृहान्नः पितरो दत्तसतो वःपितरो देष्म’ (यजु० २। ३२)—इस मन्त्रका पाठ करके ‘एतद् वः पितरो वासः’ (यजु० २। ३२)—ऐसा कहते हुए छहों पिण्डोंपर सूत्र रखकर संकल्प करे—‘अद्यामुकगोत्र पितः (पितामह, प्रपितामह आदि) अमुकशर्मन् अमुकश्राद्धे पिण्डे एतत्ते वासः स्वधा।’ तत्पश्चात् ‘ॐ शिवा आपः सन्तु।’ कहकर जल, ‘ॐ सौमनस्यम् अस्तु।’ इस वाक्यका उच्चारण करके फूल, ‘ॐ अक्षतं चारिष्टमस्तु।’ कहकर अक्षत अन्नपात्रोंपर डाले। फिर मोटक, तिल और जल लेकर ‘ॐ अद्यामुकगोत्रस्य पितुः अमुकशर्मणः अमुकश्राद्धे दत्तान्येतान्यन्नपानादिकानि अक्षय्याणि सन्तु।’ इस प्रकार संकल्प पढ़कर छोड़ दे। तत्पश्चात् सव्य हो दक्षिण दिशाकी ओर देखते हुए पिण्डोंके ऊपर पूर्वाग्र जलधारा गिरावे और पढ़े—‘ॐ अघोराः पितरः सन्तु।’ इसके बाद हाथ जोड़ पूर्वाभिमुख हो मूलमें कहे अनुसार आशीः-प्रार्थना करे।

३. इसके बाद स्वयं झुककर सब पिण्डोंको नाकसे सूँघ ले और उठा दे। पिण्डोंके आधारभूत कुशोंको तथा उल्मुक (जिससे अङ्गार-भ्रमण कराया गया था)—को अग्निमें डाल दे।

२५२ * अग्निपुराण *


तथा पितृश्राद्धकी प्रतिष्ठाके लिये यथाशक्ति क्रमशः सुवर्ण और रजतकी दक्षिणा दे।* इसके बाद ‘विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम्।’—ऐसा कहकर देवताओंका विसर्जन करे और ‘वाजेवाजेऽवत वाजिनो नो धनेषु विप्रा अमृता ऋतज्ञाः। अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः॥’ (यजु० २१।१९)—इस मन्त्रसे पिता आदिका विसर्जन करे॥ २६—३२॥

(तत्पश्चात् सव्यभावसे ‘देवताभ्यश्च०’ इत्यादि पढ़कर भगवान्‌का स्मरण करे। फिर अपसव्यभावसे रक्षादीपको बुझा दे। उसके बाद सव्यभावसे भगवान्‌से प्रार्थना करे—‘प्रमादात्कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद् विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः॥ यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु। न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥’ इत्यादि) तदनन्तर ‘आ मा वाजस्य०’ (यजु० ९।१९) इत्यादि मन्त्र पढ़कर ब्राह्मणके पीछे-पीछे जाय और ब्राह्मणकी परिक्रमा करके अपने घरमें जाय। प्रत्येक मासकी अमावस्याको इसी प्रकार पार्वण-श्राद्ध करना चाहिये॥ ३३॥

अब मैं एकोद्दिष्ट श्राद्धका वर्णन करूँगा। यह श्राद्ध पूर्ववत् ही करे। इसमें इतनी ही विशेषता है कि एक ही पवित्रक, एक ही अर्घ्य और एक ही पिण्ड देना चाहिये। इसमें आवाहन, अग्निकरण और विश्वेदेव-पूजन नहीं होता। जहाँ तृप्ति पूछनी हो, वहाँ ‘स्वदितम्?’ ऐसा प्रश्न करे। ब्राह्मण उत्तर दे—‘सुस्वदितम्।’, ‘उपतिष्ठताम्’—कहकर अर्पण करे। अक्षय्योदक भी दे। विसर्जनके समय ‘अभिरम्यताम्’ का उच्चारण करे। ब्राह्मण कहें—‘अभिरताः स्मः।’ शेष सभी बातें पूर्ववत् करनी चाहिये॥ ३४—३६॥

अब सपिण्डीकरणका वर्णन करूँगा। यह वर्षके अन्तमें और मध्यमें भी होता है। इसमें पितरोंके लिये तीन पात्र होते हैं और प्रेतके लिये एक पात्र अलग होता है। चारों अर्घ्यपात्रोंमें पवित्री, तिल, फूल, चन्दन और जल डालकर भर दिया जाता है। फिर उन्हींसे श्राद्धकर्ता पुरुष अर्घ्य देता है। ‘ये समानाः०’ (यजु० १९।४५-४६) इत्यादि दो मन्त्रोंसे प्रेतके अर्घ्यपात्रको क्रमशः तीनों पितरोंके अर्घ्यपात्रमें मिलाया जाता है। इसी प्रकार पिण्डदान, दान आदि पूर्ववत् करके प्रेतके पिण्डको पितरोंके पिण्डमें मिलाया जाता है। इससे प्रेतको ‘पितृ’ पदवी प्राप्त होती है॥ ३७—३९॥

अब ‘आभ्युदयिक’ श्राद्ध बतलाता हूँ। इसकी सब विधि पूर्ववत् है। इसमें पितृसम्बन्धी मन्त्रके अतिरिक्त अन्य मन्त्रोंका जप करना चाहिये। पूर्वाह्नकालमें आभ्युदयिक श्राद्ध और उसकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। इसमें कोमल कुश ही उपचार है। यहाँ तिलके स्थानपर जौका ही उपयोग होता है। ब्राह्मणोंसे पितरोंकी तृप्तिके लिये प्रश्न करते समय ‘सम्पन्नम्?’ का प्रयोग करना चाहिये। ब्राह्मण उत्तर दे ‘सुसम्पन्नम्’। इसमें दही, अक्षत और बेर आदिके ही पिण्ड होते हैं। आवाहनके समय पूछे—‘मैं ‘नान्दीमुख’ नामवाले


* दक्षिणाका संकल्प इस प्रकार है—त्रिकुशा, जौ और जल हाथमें लेकर—‘ॐ अद्यामुकगोत्राणां पितृपितामहप्रपितामहानाम् (मातामहप्रमातामहवृद्धप्रमातामहानां च) अमुकामुकशर्मणाम् अमुकश्राद्धसम्बन्धिनां विश्वेषां देवानां कृतैतदमुकश्राद्धप्रतिष्ठार्थं हिरण्यमग्निदैवत्यं तन्मूल्योपकल्पितं द्रव्यं वा यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणात्वेन दातुमहमुत्सृजे।’ तुरंत दिया जाता हो तो ‘सम्पददे’ कहना चाहिये। मोटक, तिल, जल लेकर ‘ओमद्यामुकगोत्रस्य पितुः अमुकशर्मणः कृतैतच्छ्राद्धप्रतिष्ठार्थं रजतं चन्द्रदैवत्यं तन्मूल्योपकल्पितं द्रव्यं यथानाम’ इत्यादि कहकर पिता आदिके लिये दक्षिणा दें।

* अध्याय ११७ * २५३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

पितरोंका आवाहन करूँगा।' इसी प्रकार अक्षय्य-तृप्तिके लिये 'प्रीयताम्' ऐसा कहे। फिर पूछे—'मैं नान्दीमुख पितरोंका तृप्ति-वाचन कराऊँगा।' ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर कहे—'नान्दीमुखाः पितरः प्रीयन्ताम्।' (नान्दीमुख पितर तृप्त एवं प्रसन्न हों।) (माता, पितामही, प्रपितामही) पिता, पितामह, प्रपितामह और (सपत्नीक) मातामह, प्रमातामह तथा वृद्धप्रमातामह—ये नान्दीमुख पितर हैं॥ ४०—४४॥

आभ्युदयिक श्राद्धमें 'स्वधा' का प्रयोग न करे और युग्म ब्राह्मणोंको भोजन करावे। अब मैं पितरोंकी तृप्ति बतलाता हूँ। ग्राम्य अन्नसे तथा जंगली कन्द, मूल, फल आदिसे एक मासतक पितरोंकी तृप्ति बनी रहती है और गायके दूध एवं खीरसे एक वर्षतक पितरोंकी तृप्ति रहती है तथा वर्षा ऋतुमें त्रयोदशीको विशेषतः मघा-नक्षत्रमें किया हुआ श्राद्ध अक्षय होता है।$^१$ मन्त्रका पाठ करनेवाला, अग्निहोत्री, शाखाका अध्ययन करनेवाला, छहों अङ्गोंका विद्वान्, त्रिणाचिकेत$^२$, त्रिमधु$^३$, धर्मद्रोणका$^४$ पाठ करनेवाला, त्रिसुपर्ण$^५$ तथा बृहत् सामका ज्ञाता—ये ब्राह्मण पंक्तिपावन (पंक्तिको पवित्र करनेवाले) माने गये हैं॥ ४५—४७॥

अब काम्य श्राद्धकल्पका वर्णन करूँगा। प्रतिपदाको श्राद्ध करनेसे बहुत धन प्राप्त होता है। द्वितीयाको श्राद्ध करनेसे श्रेष्ठ स्त्री मिलती है। चतुर्थीको किया हुआ श्राद्ध धर्म और कामको देनेवाला है। पुत्रकी इच्छावाला पुरुष पञ्चमीको श्राद्ध करे। षष्ठीके श्राद्धसे मनुष्य श्रेष्ठ होता है। सप्तमीके श्राद्धसे खेतीमें लाभ होता और अष्टमीके श्राद्धसे अर्थकी प्राप्ति होती है। नवमीको श्राद्धका अनुष्ठान करनेसे एक खुरवाले घोड़े आदि पशु प्राप्त होते हैं। दशमीके श्राद्धसे गो-समुदायकी उपलब्धि होती है। एकादशीके श्राद्धसे परिवार और द्वादशीके श्राद्धसे धन-धान्य बढ़ता है। त्रयोदशीको श्राद्ध करनेसे अपनी जातिमें श्रेष्ठता प्राप्त होती है। चतुर्दशीको उसीका श्राद्ध किया जाता है, जिसका शस्त्रद्वारा वध हुआ है। अमावास्याको सम्पूर्ण मृत व्यक्तियोंके लिये श्राद्ध करनेका विधान है॥ ४८—५१॥

'जो दशार्णदेशके वनमें सात व्याध थे, वे कालंजर गिरिपर मृग हुए, शरद्वीपमें चक्रवाक हुए तथा मानस सरोवरमें हंस हुए। वे ही अब कुरुक्षेत्रमें वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण हुए हैं। अब उन्होंने दूरतकका मार्ग तय कर लिया है; तुमलोग उनसे बहुत पीछे रहकर कष्ट पा रहे


१. कुछ लोग श्राद्धमें मांसका भी विधान मानते हैं, परंतु श्राद्धकर्ममें मांस कितना निन्दनीय है, यह श्रीमद्भागवत, सप्तम स्कन्ध, अध्याय १५ के इन श्लोकोंसे स्पष्ट हो जाता है—

न दद्यादामिषं श्राद्धे न चाद्याद्धर्मतत्त्ववित् । मुन्यन्नैः स्यात्परा प्रीतिर्यथा न पशुहिंसया ॥ नैतादृशः परो धर्मो नृणां सद्धर्ममिच्छताम् । न्यासो दण्डस्य भूतेषु मनोवाक्कायजस्य यः ॥ द्रव्ययज्ञैर्यक्ष्यमाणं दृष्ट्वा भूतानि बिभ्यति । एष माकरुणो हन्यादतज्ज्ञो ह्यसुतृब् ध्रुवम् ॥ (७-८, १०)

"धर्मके मर्मको समझनेवाला पुरुष श्राद्धमें (खानेके लिये) मांस न दे और न स्वयं ही खाय; क्योंकि पितृगणकी तृप्ति जैसी मुनिजनोचित आहारसे होती है, वैसी पशुहिंसासे नहीं होती। सद्धर्मकी इच्छावाले पुरुषोंके लिये 'सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति मन, वाणी और शरीरसे दण्डका त्याग कर देना'—इसके समान और कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं है। पुरुषको द्रव्ययज्ञसे यजन करते देखकर जीव डरते हैं कि 'यह अपने ही प्राणोंका पोषण करनेवाला निर्दय अज्ञानी मुझे अवश्य मार डालेगा।' अतएव श्राद्धकर्ममें मांसका उपयोग कभी नहीं करना चाहिये।

२. द्वितीय कठके अन्तर्गत 'अयं वाव यः पवते' इत्यादि 'त्रिणाचिकेत' नामक तीन अनुवाकोंको पढ़ने या उसका अनुष्ठान करनेवाला। ३. 'मधुवाता०' इत्यादि तीन ऋचाओंका अध्ययन और मधुव्रतका आचरण करनेवाला। ४. 'धर्मव्याधा दशार्णेषु' इत्यादि प्रसंगका नाम यहाँ 'धर्मद्रोण' कहा गया है। ५. 'ब्रह्म मेतु माम्' इत्यादि तीन अनुवाकोंका अध्ययन और तत्सम्बन्धी व्रत करनेवाला।

२५४ * अग्निपुराण *

हो।'* श्राद्ध आदिके अवसरपर इसका पाठ करनेसे श्राद्ध पूर्ण एवं ब्रह्मलोक देनेवाला होता है। यदि पितामह जीवित हो तो पुत्र आदि अपने पिताका तथा पितामहके पिता और उनके भी पिताका श्राद्ध करे। यदि प्रपितामह जीवित हो तो पिता, पितामह एवं वृद्धप्रपितामहका श्राद्ध करे। इसी प्रकार माता आदि तथा मातामह आदिके श्राद्धमें भी करना चाहिये। जो इस श्राद्धकल्पका पाठ करता है, उसे श्राद्ध करनेका फल मिलता है॥५२—५६॥

उत्तम तीर्थमें, युगादि और मन्वादि तिथिमें किया हुआ श्राद्ध अक्षय होता है। आश्विन शुक्ला नवमी, कार्तिककी द्वादशी, माघ तथा भाद्रपदकी तृतीया, फाल्गुनकी अमावास्या, पौष शुक्ला एकादशी, आषाढ़की दशमी, माघमासकी सप्तमी, श्रावण कृष्णपक्षकी अष्टमी, आषाढ़, कार्तिक, फाल्गुन तथा ज्येष्ठकी पूर्णिमा—ये तिथियाँ स्वायम्भुव आदि मनुसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं। इनके आदिभागमें किया हुआ श्राद्ध अक्षय होता है। गया, प्रयाग, गङ्गा, कुरुक्षेत्र, नर्मदा, श्रीपर्वत, प्रभास, शालग्रामतीर्थ (गण्डकी), काशी, गोदावरी तथा श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्र आदि तीर्थोंमें श्राद्ध उत्तम होता है॥५७-६२॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'श्राद्ध-कल्पका वर्णन' नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥११७॥ ~~

एक सौ अठारहवाँ अध्याय भारतवर्षका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं— समुद्रके उत्तर और हिमालयके दक्षिण जो वर्ष है, उसका नाम 'भारत' है। उसका विस्तार नौ हजार योजन है। स्वर्ग तथा अपवर्ग पानेकी इच्छावाले पुरुषोंके लिये यह कर्मभूमि है। महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, हिमालय, विन्ध्य और पारियात्र—ये सात यहाँके कुल-पर्वत हैं। इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गान्धर्व और वारुण—ये आठ द्वीप हैं। समुद्रसे घिरा हुआ भारत नवाँ द्वीप है॥१-४॥

भारतद्वीप उत्तरसे दक्षिणकी ओर हजारों योजन लंबा है। भारतके उपर्युक्त नौ भाग हैं। भारतकी स्थिति मध्यमें है। इसमें पूर्वकी ओर किरात और (पश्चिममें) यवन रहते हैं। मध्यभागमें ब्राह्मण आदि वर्णोंका निवास है। वेद-स्मृति आदि नदियाँ पारियात्र पर्वतसे निकली हैं। विन्ध्याचलसे नर्मदा आदि प्रकट हुई हैं। सह्य पर्वतसे तापी, पयोष्णी, गोदावरी, भीमरथी और कृष्णवेणा आदि नदियोंका प्रादुर्भाव हुआ है॥५—७॥

मलयसे कृतमाला आदि और महेन्द्र पर्वतसे त्रिसामा आदि नदियाँ निकली हैं। शुक्तिमान्से कुमारी आदि और हिमालयसे चन्द्रभागा आदिका प्रादुर्भाव हुआ है। भारतके पश्चिमभागमें कुरु, पाञ्चाल और मध्यदेश आदिकी स्थिति है॥८॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'भारतवर्षका वर्णन' नामक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥११८॥


* सप्तव्याधा दशारण्ये मृगाः कालञ्जरे गिरौ। चक्रवाकाः शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे॥
तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः। प्रस्थिता दूरमध्वानं यूयं तेभ्योऽवसीदत॥
(अग्नि पु० ११७।५६-५७)

  • अध्याय ११९ * २५५

एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय

जम्बू आदि महाद्वीपों तथा समस्त भूमिके विस्तारका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—जम्बूद्वीपका विस्तार एक लाख योजन है। वह सब ओरसे एक लाख योजन विस्तृत खारे पानीके समुद्रसे घिरा है। उस क्षारसमुद्रको घेरकर प्लक्षद्वीप स्थित है। मेधातिथिके सात पुत्र प्लक्षद्वीपके स्वामी हैं। शान्तभय, शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेम तथा ध्रुव—ये सात ही मेधातिथिके पुत्र हैं; उन्हींके नामसे उक्त सात वर्ष हैं। गोमेध, चन्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमना और शैल—ये उन वर्षोंके सुन्दर मर्यादापर्वत हैं। वहाँके सुन्दर निवासी 'वैभ्राज' नामसे विख्यात हैं। इस द्वीपमें सात प्रधान नदियाँ हैं। प्लक्षसे लेकर शाकद्वीपतकके लोगोंकी आयु पाँच हजार वर्ष है। वहाँ वर्णाश्रम-धर्मका पालन किया जाता है॥ १-५॥

आर्य, कुरु, विविंश तथा भावी—यही वहाँके ब्राह्मण आदि वर्णोंकी संज्ञाएँ हैं। चन्द्रमा उनके आराध्यदेव हैं। प्लक्षद्वीपका विस्तार दो लाख योजन है। वह उतने ही बड़े इक्षुरसके समुद्रसे घिरा है। उसके बाद शाल्मलद्वीप है, जो प्लक्षद्वीपसे दुगुना बड़ा है। वपुष्मान्‌के सात पुत्र शाल्मलद्वीपके स्वामी हुए। उनके नाम हैं—श्वेत, हरित, जीमूत, लोहित, वैद्युत, मानस और सुप्रभ। इन्हीं नामोंसे वहाँके सात वर्ष हैं। वह प्लक्षद्वीपसे दुगुना है तथा उससे दुगुने परिमाणवाले 'सुरोद' नामक (मदिराके) समुद्रसे घिरा हुआ है। कुमुद, अनल, बलाहक, द्रोण, कङ्क, महिष और ककुद्मान्—ये मर्यादापर्वत हैं। सात ही वहाँ प्रधान नदियाँ हैं। कपिल, अरुण, पीत और कृष्ण—ये वहाँके ब्राह्मण आदि वर्ण हैं। वहाँके लोग वायु-देवताकी पूजा करते हैं। वह मदिराके समुद्रसे घिरा है॥ ६—१० $\frac{१}{२}$ ॥

इसके बाद कुशद्वीप है। ज्योतिष्मान्‌के पुत्र उस द्वीपके अधीश्वर हैं। उद्भिद, धेनुमान्, द्वैरथ, लम्बन, धैर्य, कपिल और प्रभाकर—ये सात उनके नाम हैं। इन्हींके नामपर वहाँ सात वर्ष हैं। दमी$^१$ आदि वहाँके ब्राह्मण हैं, जो ब्रह्मरूपधारी भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं। विद्रुम, हेमशैल, द्युतिमान्, पुष्पवान्, कुशेशय, हरि और मन्दराचल—ये सात वहाँ के वर्षपर्वत हैं। यह कुशद्वीप अपने ही बराबर विस्तारवाले घीके समुद्रसे घिरा हुआ है और वह घृतसमुद्र क्रौञ्चद्वीपसे परिवेष्टित है। राजा द्युतिमान्‌के पुत्र क्रौञ्चद्वीपके स्वामी हैं। उन्हींके नामपर वहाँके वर्ष प्रसिद्ध हैं॥ ११—१४॥

कुशल, मनोनुग, उष्ण, प्रधान, अन्धकारक, मुनि और दुन्दुभि—ये सात द्युतिमान्‌के पुत्र हैं। उस द्वीपके मर्यादापर्वत और नदियाँ भी सात ही हैं। पर्वतोंके नाम इस प्रकार हैं—क्रौञ्च, वामन, अन्धकारक, रत्नशैल$^२$, देवावृत, पुण्डरीक और दुन्दुभि। ये द्वीप परस्पर उत्तरोत्तर दुगुने विस्तारवाले हैं। उन द्वीपोंमें जो वर्ष पर्वत हैं, वे भी द्वीपोंके समान ही पूर्ववर्ती द्वीपके पर्वतोंसे दुगुने विस्तारवाले हैं। वहाँके ब्राह्मण आदि वर्ण क्रमशः पुष्कर, पुष्कल, धन्य और तिष्य—इन नामोंसे प्रसिद्ध हैं। वे वहाँ श्रीहरिकी आराधना करते हैं। क्रौञ्चद्वीप दधिमण्डोदक (मट्ठे)-के समुद्रसे घिरा हुआ है और वह समुद्र शाकद्वीपसे परिवेष्टित है। वहाँके राजा भव्यके जो सात पुत्र हैं, वे ही शाकद्वीपके शासक हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—जलद, कुमार, सुकुमार, मणीवक, कुशोत्तर, मोदाकी और द्रुम। इन्हींके नामसे वहाँके वर्ष


१. दमी, शुषुमी, स्नेह और मन्दे—ये क्रमशः वहाँके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंकी संज्ञाएँ हैं।
२. यहाँ मूलमें छः नाम ही आये हैं, तथापि पुराणान्तरमें आये हुए 'चतुर्थो रत्नशैलश्च' के अनुसार अर्थमें रत्नशैल बढ़ा दिया गया है।

२५६ * अग्निपुराण *


प्रसिद्ध हैं॥ १५-१९॥

उदयगिरि, जलधर, रैवत, श्याम, कोद्रक, आम्बिकेय और सुरम्य पर्वत केसरी—ये सात वहाँके मर्यादापर्वत हैं तथा सात ही वहाँकी प्रसिद्ध नदियाँ हैं$^१$। मग, मगध, मानस्य और मन्दग—ये वहाँके ब्राह्मण आदि वर्ण हैं, जो सूर्यरूपधारी भगवान् नारायणकी आराधना करते हैं। शाकद्वीप क्षीरसागरसे घिरा हुआ है। क्षीरसागर पुष्करद्वीपसे परिवेष्टित है। वहाँके अधिकारी राजा सवनके दो पुत्र हुए, जिनके नाम थे—महावीत और धातकि। उन्हींके नामसे वहाँके दो वर्ष प्रसिद्ध हैं॥ २०-२२॥

वहाँ एक ही मानसोत्तर नामक वर्षपर्वत विद्यमान है, जो उस वर्षके मध्यभागमें वलयाकार स्थित है। उसका विस्तार कई सहस्र योजन है$^२$। ऊँचाई भी विस्तारके समान ही है। वहाँके लोग दस हजार वर्षोंतक जीवन धारण करते हैं। वहाँ देवता लोग ब्रह्माजीकी पूजा करते हैं। पुष्करद्वीप स्वादिष्ट जलवाले समुद्रसे घिरा हुआ है। उस समुद्रका विस्तार उस द्वीपके समान ही है। महामुने! समुद्रोंमें जो जल है, वह कभी घटता-बढ़ता नहीं है। शुक्ल और कृष्ण—दोनों पक्षोंमें चन्द्रमाके उदय और अस्तकालमें केवल पाँच सौ दस अङ्गुलतक समुद्रके जलका घटना और बढ़ना देखा जाता है (परंतु इससे जलमें न्यूनता या अधिकता नहीं होती है)॥ २३-२६॥

मीठे जलवाले समुद्रके चारों ओर उससे दुगुने परिमाणवाली भूमि सुवर्णमयी है, किंतु वहाँ कोई भी जीव-जन्तु नहीं रहते हैं। उसके बाद लोकालोकपर्वत है, जिसका विस्तार दस हजार योजन है। लोकालोकपर्वत एक ओरसे अन्धकारद्वारा आवृत है और वह अन्धकार अण्डकटाहसे आवृत है। अण्डकटाहसहित सारी भूमिका विस्तार पचास करोड़ योजन है॥ २७-२८॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'महाद्वीप आदिका वर्णन' नामक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११९॥


एक सौ बीसवाँ अध्याय

भुवनकोश-वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! भूमिका विस्तार सत्तर हजार योजन बताया गया है। उसकी ऊँचाई दस हजार योजन है। पृथ्वीके भीतर सात पाताल हैं। एक-एक पाताल दस-दस हजार योजन विस्तृत है। सात पातालोंके नाम इस प्रकार हैं—अतल, वितल, नितल, प्रकाशमान महातल, सुतल, तलातल और सातवाँ रसातल या पाताल। इन पातालोंकी भूमियाँ क्रमशः काली, पीली, लाल, सफेद, कँकरीली, पथरीली और सुवर्णमयी हैं। वे सभी पाताल बड़े रमणीय हैं। उनमें दैत्य और दानव आदि सुखपूर्वक निवास करते हैं। समस्त पातालोंके नीचे शेषनाग विराजमान हैं, जो भगवान् विष्णुके तमोगुण-प्रधान विग्रह हैं। उनमें अनन्त गुण हैं, इसीलिये उन्हें 'अनन्त' भी कहते हैं। वे अपने मस्तकपर इस पृथ्वीको धारण करते हैं॥ १-४॥

पृथ्वीके नीचे अनेक नरक हैं, परंतु जो भगवान् विष्णुका भक्त है, वह उन नरकोंमें नहीं पड़ता है। सूर्यदेवसे प्रकाशित होनेवाली पृथ्वीका जितना विस्तार है, उतना ही नभोलोक (अन्तरिक्ष या भुवर्लोक)—का विस्तार माना गया है। वसिष्ठ! पृथ्वीसे एक लाख योजन दूर सूर्यमण्डल है।


१. पुराणान्तरमें इन नदियोंके नाम इस प्रकार मिलते हैं—सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, धेनुका, इक्षु, वेणुका और गभस्ति।
२. विष्णुपुराणमें इसकी ऊँचाई और विस्तार—दोनों ही पचास हजार योजन बताये गये हैं। देखिये विष्णुपुराण २।४।७६।

  • अध्याय १२० * २५७

सूर्यसे लाख योजनकी दूरीपर चन्द्रमा विराजमान हैं। चन्द्रमासे एक लाख योजन ऊपर नक्षत्र-मण्डल प्रकाशित होता है। नक्षत्रमण्डलसे दो लाख योजन ऊँचे बुध विराजमान हैं। बुधसे दो लाख योजन ऊपर शुक्र हैं। शुक्रसे दो लाख योजनकी दूरीपर मङ्गलका स्थान है। मङ्गलसे दो लाख योजन ऊपर बृहस्पति हैं। बृहस्पतिसे दो लाख योजन ऊपर शनैश्चरका स्थान है। उनसे लाख योजन ऊपर सप्तर्षियोंका स्थान है। सप्तर्षियोंसे लाख योजन ऊपर ध्रुव प्रकाशित होता है। त्रिलोकीकी इतनी ही ऊँचाई है, अर्थात् त्रिलोकी (भूर्भुवः स्वः)-के ऊपरी भागकी चरम सीमा ध्रुव ही है॥५-८॥

ध्रुवसे कोटि योजन ऊपर 'महर्लोक' है, जहाँ कल्पान्तजीवी भृगु आदि सिद्धगण निवास करते हैं। महर्लोकसे दो करोड़ ऊपर 'जनलोक'की स्थिति है, जहाँ सनक, सनन्दन आदि सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। जनलोकसे आठ करोड़ योजन ऊपर 'तपोलोक' है, जहाँ वैराज नामवाले देवता निवास करते हैं। तपोलोकसे छानबे करोड़ योजन ऊपर 'सत्यलोक' विराजमान है। सत्यलोकमें पुनः मृत्युके अधीन न होनेवाले पुण्यात्मा देवता एवं ऋषि-मुनि निवास करते हैं। उसीको 'ब्रह्मलोक' भी कहा गया है। जहाँतक पैरोंसे चलकर जाया जाता है, वह सब 'भूलोक' है। भूलोकसे सूर्यमण्डलके बीचका भाग 'भुवर्लोक' कहा गया है। सूर्यलोकसे ऊपर ध्रुवलोकतकके भागको 'स्वर्गलोक' कहते हैं। उसका विस्तार चौदह लाख योजन है। यही त्रैलोक्य है और यही अण्डकटाहसे घिरा हुआ विस्तृत ब्रह्माण्ड है। यह ब्रह्माण्ड क्रमशः जल, अग्नि, वायु और आकाशरूप आवरणोंद्वारा बाहरसे घिरा हुआ है। इन सबके ऊपर अहंकारका आवरण है। ये जल आदि आवरण उत्तरोत्तर दसगुने बड़े हैं। अहंकाररूप आवरण महत्तत्त्वमय आवरणसे घिरा हुआ है॥९-१३॥

महामुने! ये सारे आवरण एकसे दूसरेके क्रमसे दसगुने बड़े हैं। महत्तत्त्वको भी आवृत्त करके प्रधान (प्रकृति) स्थित है। वह अनन्त है; क्योंकि उसका कभी अन्त नहीं होता। इसीलिये उसकी कोई संख्या अथवा माप नहीं है। मुने! वह सम्पूर्ण जगत्का कारण है। उसे ही 'अपरा प्रकृति' कहते हैं। उसमें ऐसे-ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुए हैं। जैसे काठमें अग्नि और तिलमें तेल रहता है, उसी प्रकार प्रधानमें स्वयंप्रकाश चेतनात्मा व्यापक पुरुष विराजमान है॥१४-१६$\frac{१}{२}$॥

महाज्ञान मुने! ये संश्रयधर्मी (परस्पर संयुक्त हुए) प्रधान और पुरुष सम्पूर्ण भूतोंकी आत्मभूता विष्णुशक्तिसे आवृत्त हैं। महामुने! भगवान् विष्णुकी स्वरूपभूता वह शक्ति ही प्रकृति और पुरुषके संयोग और वियोगमें कारण है। वही सृष्टिके समय उनमें क्षोभका कारण बनती है। जैसे जलके सम्पर्कमें आयी हुई वायु उसकी कणिकाओंमें व्यास शीतलताको धारण करती है, उसी प्रकार भगवान् विष्णुकी शक्ति भी प्रकृति-पुरुषमय जगत्को धारण करती है। विष्णु-शक्तिका आश्रय लेकर ही देवता आदि प्रकट होते हैं। वे भगवान् विष्णु स्वयं ही साक्षात् ब्रह्म हैं, जिनसे इस सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति होती है॥१७-२०$\frac{१}{२}$॥

मुनिश्रेष्ठ! सूर्यदेवके रथका विस्तार नौ सहस्र योजन है तथा उस रथका ईषादण्ड (हरसा) इससे दूना बड़ा अर्थात् अठारह हजार योजनका है। उसका धुरा डेढ़ करोड़ सात लाख योजन लंबा है, जिसमें उस रथका पहिया लगा हुआ है। उसमें पूर्वाह्न, मध्याह्न और अपराह्नरूप तीन नाभियाँ हैं। संवत्सर, परिवत्सर, इडावत्सर, अनुवत्सर और वत्सर-ये पाँच प्रकारके वर्ष उसके पाँच अरे हैं। छहों ऋतुएँ उसकी छः नेमियाँ हैं और उत्तर-दक्षिण दो अयन उसके शरीर हैं। ऐसे संवत्सरमय रथचक्रमें सम्पूर्ण कालचक्र प्रतिष्ठित है। महामते! भगवान् सूर्यके रथका दूसरा धुरा साढ़े पैंतालीस हजार योजन लंबा है। दोनों धुरोंके परिमाणके तुल्य ही उसके

२५८ * अग्निपुराण *

युगार्द्धोंका* परिमाण है॥ २१-२५॥

उस रथके दो धुरोंमेंसे जो छोटा है वह, और उसका युगार्द्ध ध्रुवके आधारपर स्थित है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुने! गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पंक्ति—ये सात छन्द ही सूर्यदेवके सात घोड़े कहे गये हैं। सूर्यका दिखायी देना उदय है और उनका दृष्टिसे ओझल हो जाना ही अस्तकाल है, ऐसा जानना चाहिये। वसिष्ठ! जितने प्रदेशमें ध्रुव स्थित है, पृथ्वीसे लेकर उस प्रदेश-पर्यन्त सम्पूर्ण देश प्रलयकालमें नष्ट हो जाता है। सप्तर्षियोंसे उत्तर दिशामें ऊपरकी ओर जहाँ ध्रुव स्थित है, आकाशमें वह दिव्य एवं प्रकाशमान स्थान ही विराड्रूपधारी भगवान् विष्णुका तीसरा पद है। पुण्य और पापके क्षीण हो जानेपर दोषरूपी पङ्कसे रहित संयतचित्त महात्माओंका यही परम उत्तम स्थान है। इस विष्णुपदसे ही गङ्गाका प्राकट्य हुआ है, जो स्मरणमात्रसे सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली हैं॥ २६-२९$\frac{१}{२}$॥

आकाशमें जो शिशुमार (सूँस)—की आकृतिवाला ताराओंका समुदाय देखा जाता है, उसे भगवान् विष्णुका स्वरूप जानना चाहिये। उस शिशुमारचक्रके पुच्छभागमें ध्रुवकी स्थिति है। यह ध्रुव स्वयं घूमता हुआ चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रहोंको घुमाता है। भगवान् सूर्यका वह रथ प्रतिमास भिन्न-भिन्न आदित्य-देवता, श्रेष्ठ ऋषि, गन्धर्व, अप्सरा, ग्रामणी (यक्ष), सर्प तथा राक्षसोंसे अधिष्ठित होता है। भगवान् सूर्य ही सर्दी, गर्मी तथा जल-वर्षाके कारण हैं। वे ही ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदमय भगवान् विष्णु हैं; वे ही शुभ और अशुभके कारण हैं॥ ३०-३२$\frac{१}{२}$॥

चन्द्रमाका रथ तीन पहियोंसे युक्त है। उस रथके बायें और दायें भागमें कुन्द-कुसुमकी भाँति श्वेत रंगके दस घोड़े जुते हुए हैं। उसी रथके द्वारा वे चन्द्रदेव नक्षत्रलोकमें विचरण करते हैं। तैंतीस हजार तैंतीस सौ तैंतीस (३६३३३) देवता चन्द्रदेवकी अमृतमयी कलाओंका पान करते हैं। अमावास्याके दिन 'अमा' नामक एक रश्मि (कला)—में स्थित हुए पितृगण चन्द्रमाकी बची हुई दो कलाओंमेंसे एकमात्र अमृतमयी कलाका पान करते हैं। चन्द्रमाके पुत्र बुधका रथ वायु और अग्निमय द्रव्यका बना हुआ है। उसमें आठ शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए हैं। उसी रथसे बुध आकाशमें विचरण करते हैं॥ ३३-३६॥

शुक्रके रथमें भी आठ घोड़े जुते होते हैं। मङ्गलके रथमें भी उतने ही घोड़े जोते जाते हैं। बृहस्पति और शनैश्चरके रथ भी आठ-आठ घोड़ोंसे युक्त हैं। राहु और केतुके रथोंमें भी आठ-आठ ही घोड़े जोते जाते हैं। विप्रवर! भगवान् विष्णुका शरीरभूत जो जल है, उससे पर्वत और समुद्रादिके सहित कमलके समान आकारवाली पृथ्वी उत्पन्न हुई। ग्रह, नक्षत्र, तीनों लोक, नदी, पर्वत, समुद्र और वन—ये सब भगवान् विष्णुके ही स्वरूप हैं। जो है और जो नहीं है, वह सब भगवान् विष्णु ही हैं। विज्ञानका विस्तार भी भगवान् विष्णु ही हैं। विज्ञानसे अतिरिक्त किसी वस्तुकी सत्ता नहीं है। भगवान् विष्णु ज्ञानस्वरूप ही हैं। वे ही परमपद हैं। मनुष्यको वही करना चाहिये, जिससे चित्तशुद्धिके द्वारा विशुद्ध ज्ञान प्राप्त करके वह विष्णुस्वरूप हो जाय। सत्य एवं अनन्त ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही 'विष्णु' हैं॥ ३७-४० $\frac{१}{२}$॥

जो इस भुवनकोशके प्रसंगका पाठ करेगा, वह सुखस्वरूप परमात्मपदको प्राप्त कर लेगा। अब ज्योतिषशास्त्र आदि विद्याओंका वर्णन करूँगा। उसमें विवेचित शुभ और अशुभ—सबके स्वामी भगवान् श्रीहरि ही हैं॥ ४१-४२॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'भुवनकोशका वर्णन' नामक
एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२०॥


* आधे जुएको युगार्द्ध कहते हैं।

  • अध्याय १२१ *

एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय

ज्योतिःशास्त्रका कथन

[ वर-वधूके गुण और विवाहादि संस्कारोंके कालका विचार; शत्रुके वशीकरण एवं स्तम्भन-सम्बन्धी मन्त्र; ग्रहण-दान; सूर्य-संक्रान्ति एवं ग्रहोंकी महादशा ]

अग्निदेव कहते हैं—मुने! अब मैं शुभ-अशुभका विवेक प्रदान करनेवाले संक्षिप्त ज्योतिष-शास्त्रका वर्णन करूँगा, जो चार लक्ष श्लोकवाले विशाल ज्योतिषशास्त्रका सारभूत अंश है, जिसे जानकर मनुष्य सर्वज्ञ हो सकता है। यदि कन्याकी राशिसे वरकी राशिसंख्या परस्पर छः-आठ, नौ-पाँच और दो-बारह हो तो विवाह शुभ नहीं होता है। शेष दस-चार, ग्यारह-तीन और सम सप्तक (सात-सात) हो तो विवाह शुभ होता है। यदि कन्या और वरकी राशिके स्वामियोंमें परस्पर मित्रता हो या दोनोंकी राशियोंका एक ही स्वामी हो, अथवा दोनोंकी ताराओं (जन्म-नक्षत्रों)-में मैत्री हो तो नौ-पाँच तथा दो-बारहका दोष होनेपर भी विवाह कर लेना चाहिये; किंतु षडष्टक (छः-आठ)-के दोषमें तो कदापि विवाह नहीं हो सकता।<sup></sup> गुरु-शुक्रके अस्त रहनेपर विवाह करनेसे वधूके पतिका निधन हो जाता है। गुरु-क्षेत्र (धनु, मीन)-में सूर्य हो एवं सूर्यके क्षेत्र (सिंह)-में गुरु हो तो विवाहको अच्छा नहीं मानते हैं; क्योंकि वह विवाह कन्याके लिये वैधव्यकारक होता है॥ १—५॥

(संस्कार-मुहूर्त) बृहस्पतिके वक्र रहनेपर तथा अतिचारी होनेपर विवाह तथा उपनयन नहीं करना चाहिये। आवश्यक होनेपर अतिचारके समय त्रिपक्ष अर्थात् डेढ़ मास तथा वक्र होनेपर चार मास छोड़कर शेष समयमें विवाह-उपनयनादि शुभ संस्कार करने चाहिये। चैत्र-पौषमें, रिक्ता तिथियोंमें, भगवान्‌के सोनेपर, मङ्गल तथा रविवारमें, चन्द्रमाके क्षीण रहनेपर भी विवाह शुभ नहीं होता है। संध्याकाल (गोधूलि-समय) शुभ होता है। रोहिणी, तीनों उत्तरा, मूल, स्वाती, हस्त, रेवती—इन नक्षत्रोंमें, तुला लग्नको छोड़कर मिथुनादि द्विस्वभाव एवं स्थिर लग्नोंमें विवाह करना शुभ होता है। विवाह, कर्णवेध, उपनयन तथा पुंसवन संस्कारोंमें, अन्न-प्राशन तथा प्रथम चूड़ाकर्ममें विद्धनक्षत्रको<sup></sup> त्याग देना चाहिये॥ ६—९॥


१. नारदपुराण, पूर्वभाग, द्वितीयपाद, अध्याय ५६, श्लोक ५०४ में भी यही बात कही गयी है।
२. विद्धनक्षत्रके परिज्ञानके लिये नारदपुराण, अध्याय ५६ के श्लोक ४८३-८४ में पञ्चशलाका-वेधका इस प्रकार वर्णन है—पाँच रेखाएँ पड़ी और पाँच रेखाएँ खड़ी खींचकर, दो-दो रेखाएँ कोणोंमें खींचने (बनाने)-से पञ्चशलाका-चक्र बनता है। इस चक्रके ईशानकोणवाली दूसरी रेखामें कृत्तिकाको लिखकर आगे प्रदक्षिणक्रमसे रोहिणी आदि अभिजित्सहित सम्पूर्ण नक्षत्रोंका उल्लेख करे। जिस रेखामें ग्रह हो, उसी रेखाकी दूसरी ओरवाला नक्षत्र विद्ध समझा जाता है। इस विषयको भलीभाँति समझनेके लिये निम्नाङ्कित चक्रपर दृष्टिपात करें—

        ध०  श०   पू०    उ०    रे०   अ०  भ०
   श्र० \    |     |     |     |     / कृ०
   अ० ----\--+-----+-----+-----+----/--- रो०
          |  \  |     |     |  /  |
   उ० ----+----\----+-----+--/----+----- मृ०
          |     \     |     /     |
   पू० ---+-----+---\-+---/--+----+----- आ०
          |     |     X     |     |
   मू० ---+-----+---/-+---\--+----+----- पु०
          |     /     |     \     |
  ज्ये० --+----/----+-----+---\---+----- पु०
          |  /  |     |     |   \ |
   अ० ----/-+-----+-----+-----+---\----- आ०
   वि०  स्वा०  चि०    ह०    उ०   पू०  म०

२६० * अग्निपुराण *

श्रवण, मूल, पुष्य—इन नक्षत्रोंमें, रवि, मङ्गल, बृहस्पति—इन वारोंमें तथा कुम्भ, सिंह, मिथुन—इन लग्नोंमें पुंसवन-कर्म करनेका विधान है। हस्त, मूल, मृगशिरा और रेवती नक्षत्रोंमें, बुध और शुक्र वारमें बालकोंका निष्कासन शुभ होता है। रवि, सोम, बृहस्पति तथा शुक्र—इन दिनोंमें, मूल नक्षत्रमें प्रथम बार ताम्बूल-भक्षण करना चाहिये। शुक्र तथा बृहस्पति वारको, मकर और मीन लग्नमें, हस्तादि पाँच नक्षत्रोंमें, पुष्यमें तथा कृत्तिकादि तीन नक्षत्रोंमें अन्न-प्राशन करना चाहिये। अश्विनी, रेवती, पुष्य, हस्त, ज्येष्ठा, रोहिणी और श्रवण नक्षत्रोंमें नूतन अन्न और फलका भक्षण शुभ होता है। स्वाती तथा मृगशिरा नक्षत्रमें औषध-सेवन करना शुभ होता है।

(रोग-मुक्त-स्नान) तीनों पूर्वा, मघा, भरणी, स्वाती तथा श्रवणसे तीन नक्षत्रोंमें, रवि, शनि और मङ्गल—इन वारोंमें रोग-विमुक्त व्यक्तिको स्नान करना चाहिये ॥ १०-१४$\frac{१}{२}$ ॥

(यन्त्र-प्रयोग) मिट्टीके चौकोर पट्टपर आठ दिशाओंमें आठ 'हीं' कार और बीचमें अपना नाम लिखे अथवा पार्थिव पट्ट या भोजपत्रपर आठों दिशाओंमें 'हीं' लिखकर मध्यमें अपना नाम गोरोचन तथा कुङ्कुमसे लिखे। ऐसे यन्त्रको वस्त्रमें लपेटकर गलेमें धारण करनेसे शत्रु निश्चय ही वशमें हो जाते हैं। इसी तरह गोरोचन तथा कुङ्कुमसे 'श्रीं' 'हीं' मन्त्रद्वारा सम्पुटित नामको आठ भूर्जपत्र-खण्डपर लिखकर पृथ्वीमें गाड़ दे तो शीघ्र विदेश गया हुआ व्यक्ति वापस आता है और उसी यन्त्रको हल्दीके रससे शिलापट्टपर लिखकर नीचे मुख करके पृथ्वीपर रख दे तो शत्रु का स्तम्भन होता है। 'ॐ' 'हूं' 'सः' मन्त्रसे सम्पुटित नाम गोरोचन तथा कुङ्कुमसे आठ भूर्जपत्रोंपर लिखकर रखा जाय तो मृत्युका निवारण होता है। यह यन्त्र एक, पाँच और नौ बार लिखनेसे परस्पर प्रेम होता है। दो, छः या बारह बार लिखनेसे वियुक्त व्यक्तियोंका संयोग होता है और तीन, सात या ग्यारह बार लिखनेसे लाभ होता है और चार, आठ और बारह बार लिखनेसे परस्पर शत्रुता होती है ॥ १५-२० ॥

(भाव और तारा) मेषादि लग्नोंसे तनु, धन, सहज, सुहृत्, सुत, रिपु, जाया, निधन, धर्म, कर्म, आय, व्यय—ये बारह भाव होते हैं। अब नौ ताराओंका बल बतलाता हूँ। जन्म, संपत्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, मृत्यु, मैत्र और अतिमैत्र—ये नौ तारे होते हैं। बुध, बृहस्पति, शुक्र, रवि तथा सोम वारको और माघ आदि छः मासोंमें प्रथम क्षौर-कर्म (बालकका मुण्डन) कराना शुभ कहा गया है। बुधवार तथा गुरुवारको एवं पुष्य, श्रवण और चित्रा नक्षत्रमें कर्णवेध-संस्कार शुभ होता है। पाँचवें वर्षमें प्रतिपदा, षष्ठी, रिक्ता और पूर्णिमा तिथियोंको एवं मङ्गलवारको छोड़कर शेष वारोंमें सरस्वती, विष्णु और लक्ष्मीका पूजन करके अध्ययन (अक्षरारम्भ) करना चाहिये। माघसे लेकर छः मासतक अर्थात् आषाढ़तक उपनयन-संस्कार शुभ होता है। चूडाकरण आदि कर्म श्रावण आदि छः मासोंमें प्रशस्त नहीं माने गये हैं। गुरु तथा शुक्र अस्त हो गये हों और चन्द्रमा क्षीण हों तो यज्ञोपवीत-संस्कार करनेसे बालककी मृत्यु अथवा जडता होती है, ऐसा संकेत कर दे। क्षौरमें कहे हुए नक्षत्रोंमें तथा शुभ ग्रहके दिनोंमें समावर्तन-संस्कार करना शुभ होता है ॥ २१-२८ ॥

(विविध मुहूर्त—) लग्नमें शुभ ग्रहोंकी राशि हो और लग्नमें शुभ ग्रह बैठे हों या उसे देखते हों तथा अश्विनी, मघा, चित्रा, स्वाती, भरणी, तीनों उत्तरा, पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र हों तो ऐसे समयमें धनुर्वेदका आरम्भ शुभ होता है। भरणी, आर्द्रा, मघा, आश्लेषा, कृत्तिका, पूर्वाफाल्गुनी—इन नक्षत्रोंमें जीवनकी इच्छा रखनेवाला पुरुष नवीन वस्त्र धारण न करे। बुध, बृहस्पति तथा शुक्र—इन दिनोंमें वस्त्र धारण करना चाहिये। विवाहादि माङ्गलिक कार्योंमें वस्त्र-

  • अध्याय १२१ * | २६१ --- | --- धारणके लिये नक्षत्रादिका विचार नहीं करना चाहिये। रेवती, अश्विनी, धनिष्ठा और हस्तादि पाँच नक्षत्रोंमें चूड़ी, मूँगा तथा रत्नोंका धारण करना शुभ होता है॥ २९—३२॥<br><br>(क्रय-विक्रय-मुहूर्त्त—) भरणी, आश्लेषा, धनिष्ठा, तीनों पूर्वा और कृत्तिका—इन नक्षत्रोंमें खरीदी हुई वस्तु हानिकारक (घाटा देनेवाली) होती है और बेचना लाभदायक होता है। अश्विनी, स्वाती, चित्रा, रेवती, शतभिषा, श्रवण—इन नक्षत्रोंमें खरीदा हुआ सामान लाभदायक होता है और बेचना अशुभ होता है। भरणी, तीनों पूर्वा, आर्द्रा, आश्लेषा, मघा, स्वाती, कृत्तिका, ज्येष्ठा और विशाखा—इन नक्षत्रोंमें स्वामीकी सेवाका आरम्भ नहीं करना चाहिये। साथ ही इन नक्षत्रोंमें दूसरेको द्रव्य देना, ब्याजपर द्रव्य देना, थाती या धरोहरके रूपमें रखना आदि कार्य भी नहीं करने चाहिये। तीनों उत्तरा, श्रवण और ज्येष्ठा—इन नक्षत्रोंमें राज्याभिषेक करना चाहिये। चैत्र, ज्येष्ठ, भाद्रपद, आश्विन, पौष और माघ—इन मासोंको छोड़कर शेष मासोंमें गृहारम्भ शुभ होता है। अश्विनी, रोहिणी, मूल, तीनों उत्तरा, मृगशिरा, स्वाती, हस्त और अनुराधा—ये नक्षत्र और मङ्गल तथा रविवारको छोड़कर शेष दिन गृहारम्भ, तड़ाग, वापी एवं प्रासादारम्भके लिये शुभ होते हैं। गुरु सिंह-राशिमें हों तब, गुर्वादित्यमें (अर्थात् जब सिंह राशिके गुरु और धन एवं मीन राशियोंके सूर्य हों,) अधिक मासमें और शुक्रके बाल, वृद्ध तथा अस्त रहनेपर गृह-सम्बन्धी कोई कार्य नहीं करना चाहिये। श्रवणसे पाँच नक्षत्रोंमें तृण तथा काष्ठोंके संग्रह करनेसे अग्निदाह, भय, रोग, राजपीडा तथा धन-क्षति होती है। (गृह-प्रवेश—) धनिष्ठा, तीनों उत्तरा, शतभिषा—इन नक्षत्रोंमें गृहप्रवेश करना चाहिये।<br><br>(नौका-निर्माण—) द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, त्रयोदशी—इन तिथियोंमें नौका बनवाना शुभ होता है। (नृपदर्शन—) धनिष्ठा, हस्त, | रेवती, अश्विनी—इन नक्षत्रोंमें राजाका दर्शन करना शुभ होता है। (युद्धयात्रा—) तीनों पूर्वा, धनिष्ठा, आर्द्रा, कृत्तिका, मृगशिरा, विशाखा, आश्लेषा और अश्विनी—इन नक्षत्रोंमें की हुई युद्धयात्रा सम्पत्ति-लाभपूर्वक सिद्धिदायिनी होती है। (गौओंके गोष्ठसे बाहर ले जाने या गोष्ठके भीतर लानेका मुहूर्त्त—) अष्टमी, सिनीवाली (अमावास्या) तथा चतुर्दशी तिथियोंमें, तीनों उत्तरा, रोहिणी, श्रवण, हस्त और चित्रा—इन नक्षत्रोंमें बेचनेके लिये गोशालासे पशुको बाहर नहीं ले जाना चाहिये और खरीदे हुए पशुओंका गोशालामें प्रवेश भी नहीं कराना चाहिये। (कृषि-कर्म-मुहूर्त्त—) स्वाती, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, मूल, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त तथा श्रवण—इन नक्षत्रोंमें सामान्य कृषि-कर्म करना चाहिये। पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, स्वाती, पूर्वाफाल्गुनी, मूल, ज्येष्ठा और शतभिषा—इन नक्षत्रोंमें, रवि, सोम, गुरु तथा शुक्र—इन वारोंमें, वृष, मिथुन, कन्या—इन लग्नोंमें, द्वितीया, पञ्चमी, दशमी, सप्तमी, तृतीया और त्रयोदशी—इन तिथियोंमें (हल-प्रवहणादि) कृषि-कर्म करना चाहिये।<br><br>रेवती, रोहिणी, ज्येष्ठा, कृत्तिका, हस्त, अनुराधा, तीनों उत्तरा—इन नक्षत्रोंमें, शनि एवं मङ्गलवारोंको छोड़कर दूसरे दिनोंमें सभी सम्पत्तियोंकी प्राप्तिके लिये बीज-वपन करना चाहिये।<br><br>(धान्य काटने तथा घरमें रखनेका मुहूर्त्त—) रेवती, हस्त, मूल, श्रवण, पूर्वाफाल्गुनी, अनुराधा, मघा, मृगशिरा—इन नक्षत्रोंमें तथा मकर लग्नमें धान्य-छेदन-(धान काटनेका) मुहूर्त शुभ होता है और हस्त, चित्रा, पुनर्वसु, स्वाती, रेवती तथा श्रवणादि तीन नक्षत्रोंमें भी धान्य-छेदन शुभ है। स्थिर लग्न तथा बुध, गुरु, शुक्रवारोंमें, भरणी, पुनर्वसु, मघा, ज्येष्ठा, तीनों उत्तरा—इन नक्षत्रोंमें अनाजको डेहरी या बखार आदिमें रखे॥ ३३-५१॥<br><br>(धान्य-वृद्धिके लिये मन्त्र—) 'ॐ

२६२ * अग्निपुराण *

धनदाय सर्वधनेशाय देहि मे धनं स्वाहा।'— 'ॐ नवे वर्षे इलादेवि! लोकसंवर्द्धिनि! कामरूपिणि! देहि मे धनं स्वाहा।'—इन मन्त्रोंको पत्ते या भोजपत्रपर लिखकर धान्यकी राशिमें रख दे तो धान्यकी वृद्धि होती है। तीनों पूर्वा, विशाखा, धनिष्ठा और शतभिषा—इन छः नक्षत्रोंमें बखारसे धान्य निकालना चाहिये। (देवादि-प्रतिष्ठा-मुहूर्त्त—) सूर्यके उत्तरायणमें रहनेपर देवता, बाग, तड़ाग, वापी आदिकी प्रतिष्ठा करनी चाहिये। भगवान्के शयन, पार्श्व-परिवर्तन और जागरणका उत्सव—) मिथुन-राशिमें सूर्यके रहनेपर अमावास्याके बाद जब द्वादशी तिथि होती है, उसीमें सदैव भगवान् चक्रपाणिके शयनका उत्सव करना चाहिये। सिंह तथा तुला-राशिमें सूर्यके रहनेपर अमावास्याके बाद जो दो द्वादशी तिथियाँ होती हैं, उनमें क्रमसे भगवान्‌का पार्श्व-परिवर्तन तथा प्रबोधन (जागरण) होता है। कन्या-राशिका सूर्य होनेपर अमावास्याके बाद जो अष्टमी तिथि होती है, उसमें दुर्गाजी जागती हैं। (त्रिपुष्करयोग—) जिन नक्षत्रोंके तीन चरण दूसरी राशिमें प्रविष्ट हों (जैसे कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, विशाखा, उत्तराषाढ़ा और पूर्वभाद्रपदा—इन नक्षत्रोंमें, जब भद्रा द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी तिथियाँ हों एवं रवि, शनि तथा मङ्गलवार हों तो त्रिपुष्करयोग होता है। (चन्द्र-बल—) प्रत्येक व्यावहारिक कार्यमें चन्द्र तथा ताराकी शुद्धि देखनी चाहिये। जन्मराशिमें तथा जन्मराशिसे तृतीय, षष्ठ, सप्तम, दशम, एकादश स्थानोंपर स्थित चन्द्रमा शुभ होते हैं। शुक्ल पक्षमें द्वितीय, पञ्चम, नवम चन्द्रमा भी शुभ होता है। (तारा-शुद्धि—) मित्र, अतिमित्र, साधक, सम्पत् और क्षेम आदि ताराएँ शुभ हैं। 'जन्म-तारा' से मृत्यु होती है, 'विपत्ति-तारा'से धनका विनाश होता है, 'प्रत्यरि' और 'मृत्युतारा' में निधन होता है। (अतः इन ताराओंमें कोई नया काम या यात्रा नहीं करनी चाहिये।) (क्षीण और पूर्ण चन्द्र—) कृष्ण पक्षकी अष्टमीसे शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथितक चन्द्रमा क्षीण रहता है; इसके बाद वह पूर्ण माना जाता है। (महाज्येष्ठी—) वृष तथा मिथुन राशिका सूर्य हो, गुरु मृगशिरा अथवा ज्येष्ठा नक्षत्रमें हो और गुरुवारको पूर्णिमा तिथि हो तो वह पूर्णिमा 'महाज्येष्ठी' कही जाती है। ज्येष्ठामें गुरु तथा चन्द्रमा हों, रोहिणीमें सूर्य हो एवं ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमा हो तो वह पूर्णिमा 'महाज्येष्ठी' कहलाती है। स्वाती नक्षत्रके आनेसे पूर्व ही यन्त्रपर इन्द्रदेवका पूजन करके उनका ध्वजारोपण करना चाहिये; श्रवण अथवा अश्विनीमें या सप्ताहके अन्तमें उसका विसर्जन करना चाहिये ॥ ५२-६४ ॥

(ग्रहणमें दानका महत्त्व—) सूर्यके राहुद्वारा ग्रस्त होनेपर अर्थात् सूर्यग्रहण लगनेपर सब प्रकारका दान सुवर्ण-दानके समान है, सब ब्राह्मण ब्रह्माके समान होते हैं और सभी जल गङ्गाजलके समान हो जाते हैं। (संक्रान्तिका कथन—) सूर्यकी संक्रान्ति रविवारसे लेकर शनिवारतक किसी-न-किसी दिन होती है। इस क्रमसे उस संक्रान्तिके सात भिन्न-भिन्न नाम होते हैं। यथा—घोरा, ध्वाङ्क्षी, महोदरी, मन्दा, मन्दाकिनी, युता (मिश्रा) तथा राक्षसी। कौलव, शकुनि और किंस्तुघ्न करणोंमें सूर्य यदि संक्रमण करे तो लोग सुखी होते हैं। गर, वव, वणिज्, विष्टि और बालव—इन पाँच करणोंमें यदि सूर्य-संक्रान्ति बदले तो प्रजा राजाके दोषसे सम्पत्तिके साथ पीड़ित होती है। चतुष्पात्, तैतिल और नाग—इन करणोंमें सूर्य यदि संक्रमण करे तो देशमें दुर्भिक्ष होता है, राजाओंमें संग्राम होता है तथा पति-पत्नीके जीवनके लिये भी संशय उपस्थित होता है ॥ ६६-७० ॥

(रोगकी स्थितिका विचार—) जन्म नक्षत्र या आधान (जन्मसे उन्नीसवें) नक्षत्रमें रोग उत्पन्न हो जाय, तो अधिक क्लेशदायक होता है। कृत्तिका नक्षत्रमें रोग उत्पन्न हो तो नौ दिनतक,

* अध्याय १२२ * २६३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

रोहिणीमें उत्पन्न हो तो तीन राततक तथा मृगशिरामें हो तो पाँच राततक रहता है। आर्द्रा में रोग हो तो प्राणनाशक होता है। पुनर्वसु तथा पुष्य नक्षत्रोंमें रोग हो तो सात राततक बना रहता है। आश्लेषाका रोग नौ राततक रहता है। मघाका रोग अत्यन्त घातक या प्राणनाशक होता है। पूर्वाफाल्गुनीका रोग दो मासतक रहता है। उत्तराफाल्गुनीमें उत्पन्न हुआ रोग तीन दिनोंतक रहता है। हस्त तथा चित्राका रोग पंद्रह दिनोंतक पीड़ा देता है। स्वातीका रोग दो मासतक, विशाखाका बीस दिन, अनुराधाका रोग दस दिन और ज्येष्ठाका पंद्रह दिन रहता है। मूल नक्षत्रमें रोग हो तो वह छूटता ही नहीं है। पूर्वाषाढ़ाका रोग पाँच दिन रहता है। उत्तराषाढ़ाका रोग बीस दिन, श्रवणका दो मास, धनिष्ठाका पंद्रह दिन और शतभिषाका रोग दस दिनोंतक रहता है। पूर्वाभाद्रपदाका रोग छूटता ही नहीं। उत्तराभाद्रपदाका रोग सात दिनोंतक रहता है*। रेवतीका रोग दस रात और अश्विनीका रोग एक दिन-रात मात्र रहता है; किंतु भरणीका रोग प्राणनाशक होता है। (रोग-शान्तिका उपाय—) पञ्चधान्य, तिल और घृत आदि हवनीय सामग्रीद्वारा गायत्री-मन्त्रसे हवन करनेपर रोग छूट जाता है और शुभ फलकी प्राप्ति होती है तथा ब्राह्मणको दूध देनेवाली गौका दान करनेसे रोगका शमन हो जाता है॥ ७१—७७$\frac{१}{२}$॥

(अष्टोत्तरी-क्रमसे) सूर्यकी दशा छः वर्षकी होती है। इसी प्रकार चन्द्रदशा पंद्रह वर्ष, मङ्गलकी आठ वर्ष, बुधकी सत्रह वर्ष, शनिकी दस वर्ष, बृहस्पतिकी उन्नीस वर्ष, राहुकी बारह वर्ष और शुक्रकी इक्कीस वर्ष महादशा चलती है॥ ७८-७९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'ज्योतिषशास्त्रका कथन' नामक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२१॥


एक सौ बाईसवाँ अध्याय

कालगणना—पञ्चाङ्गमान-साधन

**अग्निदेव कहते हैं—**मुने! (अब मैं) वर्षोंके समुदायस्वरूप 'काल' का वर्णन कर रहा हूँ और उस कालको समझनेके लिये मैं गणित बतला रहा हूँ। (ब्रह्म-दिनादिकालसे अथवा सृष्ट्यारम्भकालसे अथवा व्यवस्थित शकारम्भसे) वर्षसमुदाय-संख्याको १२ से गुणा करे। उसमें चैत्रादि गत मास-संख्या मिला दे। उसे दोसे गुणा करके दो स्थानोंमें रखे। प्रथम स्थानमें चार मिलाये, दूसरे स्थानमें आठ सौ पैंसठ मिलाये। इस तरह जो अङ्क सम्पन्न हो, वह 'सगुण' कहा गया है। उसे तीन स्थानोंमें रखे; उसमें बीचवालेको आठसे गुणा करके फिर चारसे गुणित करे। इस तरह मध्यका संस्कार करके गोमूत्रिका-क्रमसे रखे हुए तीनोंका यथास्थान संयोजन करे। उसमें प्रथम स्थानका नाम 'ऊर्ध्व', बीचका नाम 'मध्य' और तृतीय स्थानका नाम 'अधः' ऐसा रखे। अधः-अङ्कमें ३८८ और मध्याङ्कमें ८७ घटाये। तत्पश्चात् उसे ६० से विभाजित करके शेषको (अलग) लिखे। फिर लब्धिको आगेवाले अङ्कमें मिलाकर ६० से विभाजित करे। इस प्रकार तीन स्थानोंमें स्थापित अङ्कोंमेंसे प्रथम स्थानके अङ्कमें ७ से भाग देनेपर शेष बची हुई


* 'बुधायेंमेज्यादितिधातुभे नगाः' (मुहू० चिन्ता०, नक्षत्र० प्रक० ४६)-के अनुसार उत्तराभाद्रपदामें उत्पन्न रोग सात दिन रहता है।

२६४ * अग्निपुराण *

संख्याके अनुसार रवि आदि वार निकलते हैं। शेष दो स्थानोंका अङ्क तिथिका ध्रुवा होता है। सगुणको दोसे गुणा करे। उसमें तीन घटाये। उसके नीचे सगुणको लिखकर उसमें तीस जोड़े। फिर भी ६, १२, ८- इन पलोंको भी क्रमसे तीनों स्थानोंमें मिला दे। फिर ६० से विभाजित करके प्रथम स्थानमें २८ से भाग देकर शेषको लिखे। उसके नीचे पूर्वानीत तिथि-ध्रुवाको लिखे। सबको मिलानेपर ध्रुवा हो जायगा। फिर भी उसी सगुणको अर्द्ध करे। उसमें तीन घटा दे। दोसे गुणा करे। मध्यको एकादशसे गुणा करे। नीचेमें एक मिलाये। द्वितीय स्थानमें उनतालीससे भाग देकर लब्धिको प्रथम स्थानमें घटाये, उसीका नाम 'मध्य' है। मध्यमें बाईस घटाये। उसमें ६० से भाग देनेपर शेष 'ऋण' है। लब्धिको ऊर्ध्वमें अर्थात् नक्षत्र-ध्रुवामें मिलाना चाहिये। २७ से भाग देनेपर शेष नक्षत्र तथा योगका ध्रुवा हो जाता है॥१-७$\frac{१}{२}$॥

अब तिथि तथा नक्षत्रका मासिक ध्रुवा कह रहे हैं। (२।३२।००) यह तिथि-ध्रुवा है और (२।१९।००) यह नक्षत्र-ध्रुवा है। इस ध्रुवाको प्रत्येक मासमें जोड़कर, वार-स्थानमें ७ से भाग देकर शेष वारमें तिथिका दण्ड-पल समझना चाहिये। नक्षत्रके लिये २७ से भाग देकर अश्विनीसे शेष संख्यावाले नक्षत्रका दण्डादि जानना चाहिये॥ ८-१०॥

(पूर्वोक्त प्रकारसे तिथ्यादिका मान मध्यममानसे निश्चित हुआ। उसे स्पष्ट करनेके लिये संस्कार कहते हैं।) चतुर्दशी आदि तिथियोंमें कही हुई घटियोंको क्रमसे ऋण-धन तथा धन-ऋण करना चाहिये। जैसे चतुर्दशीमें शून्य घटी तथा त्रयोदशी और प्रतिपदामें पाँच घटी क्रमसे ऋण तथा धन करना चाहिये। एवं द्वादशी तथा द्वितीयामें दस घटी ऋण-धन करना चाहिये। तृतीया तथा एकादशीमें पंद्रह घटी, चतुर्थी और दशमीमें १९ घटी, पञ्चमी और नवमीमें २२ घटी, षष्ठी तथा अष्टमीमें २४ घटी तथा सप्तमीमें २५ घटी धन-ऋण-संस्कार करना चाहिये। यह अंशात्मक फल चतुर्दशी आदि तिथिपिण्डमें करना होता है॥ ११-१३$\frac{१}{२}$॥

(अब कलात्मक फल-संस्कारके लिये कहते हैं-) कर्कादि तीन राशियोंमें छः, चार, तीन (६।४।३) तथा तुलादि तीन राशियोंमें विपरीत तीन, चार, छः (३।४।६) संस्कार करनेके लिये 'खण्डा' होता है। "खेषवः-५०", "खयुगाः-४०", "मैत्रं-१२"-इनको मेषादि तीन राशियोंमें धन करना चाहिये। कर्कादि तीन राशियोंमें विपरीत १२, ४०, ५० का संस्कार करना चाहिये। तुलादि छः राशियोंमें इनका ऋण संस्कार करना चाहिये। चतुर्गुणित तिथिमें विकलात्मक फल-संस्कार करना चाहिये। 'गत' तथा 'एष्य' खण्डाओंके अन्तरसे कलाको गुणित करे। ६० से भाग दे। लब्धिको प्रथमोच्चारमें ऋण-फल रहनेपर भी धन करे और धन रहनेपर भी धन ही करे। द्वितीयोच्चारित वर्ग रहनेपर विपरीत करना चाहिये। तिथिको द्विगुणित करे। उसका छठा भाग उसमें घटाये। सूर्य-संस्कारके विपरीत तिथि-दण्डको मिलाये। ऋण-फलको घटानेपर स्पष्ट तिथिका दण्डादि मान होता है। यदि ऋण-फल नहीं घटे तो उसमें ६० मिलाकर संस्कार करना चाहिये। यदि फल ही ६० से अधिक हो तो उसमें ६० घटाकर शेषका ही संस्कार करना चाहिये। इससे तिथिके साथ-साथ नक्षत्रका मान होगा। फिर भी चतुर्गुणित तिथिमें तिथिका त्रिभाग मिलाये। उसमें ऋण-फलको भी मिलाये। तद्विष्ट करनेपर योगका मान होता है। तिथिका मान तो स्पष्ट ही है, अथवा सूर्य-चन्द्रमाको योग करके भी 'योग' का मान निश्चित आता है। तिथिकी संख्यामेंसे एक घटाकर

  • अध्याय १२२ * २६५

उसे द्विगुणित करनेपर फिर एक घटाये तो भी चर आदि करण निकलते हैं। कृष्णपक्षकी चतुर्दशीके परार्धसे शकुनि, चतुरङ्घ्रि (चतुष्पद), किंस्तुघ्न और अहि (नाग)—ये चार स्थिर करण होते हैं। इस तरह शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिके पूर्वार्द्धमें किंस्तुघ्न करण होता है* ॥ १४—२४ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'ज्योतिष-शास्त्रके अन्तर्गत कालगणना' नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२२ ॥


* इस अध्यायमें वर्णित गणितको उदाहरण देकर समझाया जाता है—
कल्पना कीजिये कि वर्तमान वर्षगण-संख्या = २१ है और वर्तमान शकमें वैशाख शुक्ल प्रतिपदाको पञ्चाङ्ग-मान-साधन करना है तो चैत्र शुक्लादि गतमास १ हुआ। वर्षगण २१ को १२ से गुणा करके उसमें चैत्र शुक्लादि गतमासकी संख्या १ मिलानेसे २१×१२+१= २५३ हुआ। इसे द्विगुणित करके दो स्थानोंमें रखा। प्रथम स्थानमें ४ और दूसरे स्थानमें ८६५ मिलाया।
यथा—२५३×२=५०६।

$$\begin{array}{rccr} ५०६ & । & ५०६ \ ४ & । & ८६५ \ \hline ५१० & । & १३७१ \end{array}$$
इसे (६० से) तष्टित (विभाजित) किया तो ५३२।५१ हुआ अर्थात् (१३७१) में ६० से भाग देनेपर लब्धि २२ शेष ५१ आता है। लब्धिको (५१०) में मिलाया तो (५३२।५१) हुआ। इसका नाम सगुण या गुणसंज्ञ रखा।

फिर इस गुणसंज्ञको तीन स्थानोंमें रखा—
$$\begin{array}{rccl} ५३२ & । & ५१ & \text{ऊर्ध्व संख्या} \ & ५३२ & । & ५१ & \text{मध्य संख्या} \ && ५३२ & । & ५१ & \text{अधः संख्या} \end{array}$$

इसमें मध्य (५३२।५१)-को आठसे गुणा किया तो (४२५६।४०८) हुआ, फिर इसे ४ से गुणा किया तो (१७०२४।१६३२) हुआ। इसे ६० से तष्टित किया अर्थात् (१६३२) में ६० से भाग देकर शेष १२ को अपने स्थानपर रखा, लब्धि २७ को बायें अङ्कमें मिलाया तो (१७०५१ । १२) हुआ। इस तरह मध्यका संस्कार करके उसे मध्यके स्थानमें रखकर न्यास किया—

$$\begin{array}{rccl} ५३२ & । & ५१ \ & १७०५१ & । & १२ \ && ५३२ & । & ५१ \end{array}$$

$$\begin{array}{ccccccl} \text{ऊर्ध्व} && \text{मध्य} &&& \text{अधः} & \text{सबोंको यथास्थानीय योग किया} \ ५३२ & । & १७१०२ & । & ५४४ & । & ५१ & \text{इस (५१) को छोड़ दिया तो—} \ \text{ऊर्ध्व} && \text{मध्य} &&& \text{अधः} \ ५३२ & । & १७१०२ & । && ५४४ & \text{हुआ। यहाँपर तृतीय स्थानीय (अधः अङ्कमें ३८८ और} \ \text{मध्यमें} & \text{'सैकरसाष्टक'} &&&&& \ && ८७ &&& ३८८ & \text{= ८७ घटाया तो—} \ \hline \text{शेष रहा—} &&&&&& \ ५३२ & । & १७०१५ & । && १५६ & \text{इसे ६० से तष्टित किया तो—} \ \hline ८१५ & । & ३७ & । && ३६ & \text{हुआ न्यूनः सप्तकृतः अर्थात् वार-स्थानमें ७ से भाग दिया} \ &&&&&& \text{शेष = ३} \ \hline ३ & । & ३७ & । && ३६ & \text{यह तिथिका ध्रुवा-मान हुआ, जिसे तिथि-नाड़ी कहते हैं।} \end{array}$$

फिर गुणसंज्ञ (५३२।५१) को २ से गुणा किया तो १०६४।१०२ हुआ। ६० से तष्टित किया तो १०६५।४२ हुआ। प्रथम

२६६ * अग्निपुराण *


एक सौ तेईसवाँ अध्याय

युद्धजयार्णव-सम्बन्धी विविध योगोंका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—(अब स्वरके द्वारा विजय-साधन कह रहे हैं—) मैं इस पुराणके युद्धजयार्णव-प्रकरणमें विजय आदि शुभ कार्योंकी सिद्धिके लिये सार वस्तुओंको कहूँगा। जैसे अ,

स्थानमें ३ घटाया तो १०६२।४२ हुआ। (पुनर्गुणः) फिर भी इसके साथ गुणसंज्ञ (५३२।५१) का न्यास किया और जोड़ा तो—

१०६२४२
५३२५१
१०६२५७४५१हुआ। यहाँ तृतीय स्थानीय (५१) में ३० मिलाया तो—
३०
१०६२५७४८१हुआ। इसमें 'रसार्काष्टपलैर्युतः' के अनुसार (६।१२।८)
१२तीनों स्थानोंमें मिलाया
१०६८५८६८९हुआ। इसे ६० से तष्टित किया तो—
१०७७४७२९हुआ। यहाँ प्रथम स्थानमें २८ से भाग देकर शेष १३ को रखा तो
१३४७२९हुआ। इसमें पूर्वानीत तिथि-नाड़ी (३।३७।३६) को मिलाया तो
३७३६
१७२५यह भी सम्पन्नाङ्क हुआ अर्थात् दूसरा ऊर्ध्वाङ्क हुआ।

फिर गुणसंज्ञ (५३२।५१)-को आधा किया तो (२६६।२५) हुआ। दूसरे स्थानमें ३ घटाया तो (२६६।२२) हुआ। इसे दोसे गुणा किया तो (५३२।४४) हुआ। यहाँ (५३२) को ११ से गुणा किया और ४४ में १ मिलाया तो (५८५२।४५) हुआ। यहाँ (४५)-में ३९ से भाग देकर शेष ६ को अपने स्थानमें लिखा। लब्धिको प्रथम स्थानमें घटाया तो (५८५१।६) हुआ। प्रथम स्थानमें २२ घटाया तो (५८२९।६) हुआ। इसे ६० से तष्टित करके लब्धाङ्क (९७।९।६) हुआ। इसमें दूसरे ऊर्ध्वाङ्क (१७।२५।५)-को मिलाया तो (११४।३४।११) हुआ। प्रथम स्थानमें २७ से भाग देनेपर (६।३४।११) हुआ—यह नक्षत्र तथा योगका ध्रुवा हुआ।

व्यवस्थित शकादिमें तिथिका ध्रुवा (२।३२।००) यह है और नक्षत्र-ध्रुवा (२।१९।००) यह है, इसको प्रत्येक मासमें अपने-अपने मानमें जोड़ना चाहिये। जैसे कि पूर्वानीत तिथिके वारादि (३।३७।३६)-में तिथिका वारादि ध्रुवा (२।३२।००)-को मिलाया तो वैशाख शुक्ल प्रतिपदाका मान वारादि (६।९।३६) मध्यम मानसे हुआ एवं पूर्वानीत नक्षत्र-मान (६।३४।११)-में नक्षत्र-ध्रुवा (२।१९।००) को जोड़ा तो (८।४५।११) हुआ अर्थात् पुष्य नक्षत्रका मान मध्यम दण्डादि (४५।११) हुआ।

अब तिथि आदिका स्पष्ट मान जाननेके लिये संस्कार-विधि कह रहे हैं। इसे ११ वें श्लोकसे २० वें श्लोकतककी व्याख्याके अनुसार समझना चाहिये।

$$\begin{matrix} & \text{ति.} & & & \ & \text{१४} & = & \text{०} & \ \text{ति.} & \text{ति.} & & \text{क्रमसे ऋण-धन} & \ \text{१३} & \text{१} & & = \text{५} & \text{अर्थात् त्रयोदशीके साधित} \ \text{१२} & \text{२} & ,, & = \text{१०} & \text{घटीमानमें ५ घटी ऋण} \ \text{११} & \text{३} & ,, & = \text{१५} & \text{और प्रतिपदाकी घटीमें ५} \ \text{१०} & \text{४} & ,, & = \text{१९} & \text{घटी अंशात्मक फल धन} \ \text{९} & \text{५} & ,, & = \text{२२} & \text{करना चाहिये।} \ \text{८} & \text{६} & ,, & = \text{२४} & \ & \text{७} & ,, & = \text{२५} & \end{matrix}$$