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अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

* अध्याय २८० * ५६५


दूर्वाका गायत्री-मन्त्रसे हवन करनेपर मनुष्य सब रोगोंसे छूट जाता है। जिस नक्षत्रमें रोग पैदा हो, उसी शुभ नक्षत्रमें स्नान करे तथा बलि दे। भगवान् विष्णुका स्तोत्र 'मानस-रोग' आदिको हर लेनेवाला है। अब वात, पित्त एवं कफ—इन दोषोंका तथा रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र आदि धातुओंका वर्णन सुनो॥ १—६॥

सुश्रुत! खाया हुआ अन्न पक्वाशयसे दो भागोंमें विभक्त हो जाता है। एक अंशसे वह किट्ट होता है और दूसरे अंशसे रस। किट्टभाग मल है, जो विष्ठा, मूत्र तथा स्वेदरूपमें परिणत होता है। वही नेत्रमल, नासामल, कर्णमल तथा देहमल कहलाता है। रस अपने समस्त भागसे रुधिररूपमें परिणत हो जाता है। रुधिरसे मांस, मांससे मेद, मेदसे अस्थि, अस्थिसे मज्जा, मज्जासे शुक्र, शुक्रसे राग (रंग या वर्ण) तथा ओजस् उत्पन्न होता है। चिकित्सकको चाहिये कि देश, काल, पीड़ा, बल, शक्ति, प्रकृति तथा भेषजके बलको समझकर तदनुकूल चिकित्सा करे। औषध प्रारम्भ करनेमें रिक्ता (४, ९, १४) तिथि, भौमवार एवं मन्द, दारुण तथा उग्र नक्षत्रको त्याग देवे। विष्णु, गौ, ब्राह्मण, चन्द्रमा, सूर्य आदि देवोंकी पूजा करके रोगीके उद्देश्यसे निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करते हुए औषध प्रारम्भ करे—॥ ७—१२॥

ब्रह्मदक्षाश्विरुद्रेन्द्रभूचन्द्रार्कानिलानलाः ।
ऋषयश्चौषधीग्रामा भूतसंघाश्च पान्तु ते॥
रसायनमिवर्षीणां देवानाममृतं यथा।
सुधैवोत्तमानागानां भैषज्यमिदमस्तु ते॥

'ब्रह्मा, दक्ष, अश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र, भूमि, चन्द्रमा, सूर्य, अनिल, अनल, ऋषि, ओषधिसमूह तथा भूतसमुदाय—ये तुम्हारी रक्षा करें। जैसे ऋषियोंके लिये रसायन, देवताओंके लिये अमृत तथा श्रेष्ठ नागोंके लिये सुधा ही उत्तम एवं गुणकारी है, उसी प्रकार यह औषध तुम्हारे लिये आरोग्यकारक एवं प्राणरक्षक हो'॥ १३-१४॥

देश— बहुत वृक्ष तथा अधिक जलवाला देश 'अनूप' कहलाता है। वह वात और कफ उत्पन्न करनेवाला होता है। जांगल देश 'अनूप' देशके गुण-प्रभावसे रहित होता है। थोड़े वृक्ष तथा थोड़े जलवाला देश 'साधारण' कहा जाता है। जांगल देश अधिक पित्त उत्पन्न करनेवाला तथा साधारण देश मध्यमपित्तका उत्पादक है॥ १५-१६॥

वात, पित्त, कफके लक्षण— वायु रूक्ष, शीत तथा चल है। पित्त उष्ण है तथा कटुत्रय (सोंठ, मिर्च, पीपली) पित्तकर हैं। कफ स्थिर, अम्ल, स्निग्ध तथा मधुर है। समान वस्तुओंके प्रयोगसे इनकी वृद्धि तथा असमान वस्तुओंके प्रयोगसे हानि होती है। मधुर, अम्ल एवं लवण रस कफकारक तथा वायुनाशक हैं। कटु, तिक्त एवं कषाय रस वायुकी वृद्धि करते हैं तथा कफनाशक हैं। इसी तरह कटु, अम्ल तथा लवण रस पित्त बढ़ानेवाले हैं। तिक्त, स्वादु (मधुर) तथा कषाय रस पित्तनाशक होते हैं। यह गुण या प्रभाव रसका नहीं, उसके विपाकका माना गया है। उष्णवीर्य कफनाशक तथा शीतवीर्य पित्तनाशक होते हैं। सुश्रुत! ये सब प्रभावसे ही वैसा कार्य करते हैं॥ १७—२१॥

शिशिर, वसन्त तथा शरदमें क्रमशः कफके चय, प्रकोप तथा प्रशमन बताये गये हैं। अर्थात् कफका चय शिशिर-ऋतुमें, प्रकोप वसन्त-ऋतुमें तथा प्रशमन ग्रीष्म-ऋतुमें होता है। सुश्रुत! वायुका संचय ग्रीष्ममें, प्रकोप वर्षा तथा रात्रिमें और शमन शरदमें कहा गया है। इसी प्रकार पित्तका संचय वर्षामें, प्रकोप शरदमें तथा शमन हेमन्तमें कहा गया है। वर्षासे हेमन्तपर्यन्त (वर्षा, शरद्, हेमन्त—ये) तीन ऋतुएँ 'विसर्ग-काल' कही गयी हैं तथा शिशिरसे ग्रीष्मपर्यन्त तीन

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ऋतुओंको (औषध लेनेके निमित्त) 'आदान (काल)' कहा गया है। विसर्ग-कालको 'सौम्य' और आदानकालको 'आग्नेय' कहा गया है। वर्षा आदि तीन ऋतुओंमें चलता हुआ चन्द्रमा ओषधियोंमें क्रमशः अम्ल, लवण तथा मधुर रसोंको उत्पन्न करता है। शिशिर आदि तीन ऋतुओंमें विचरता हुआ सूर्य क्रमशः तिक्त, कषाय तथा कटु रसोंको बढ़ाता है। रातें ज्यों-ज्यों बढ़ती हैं, त्यों-त्यों ओषधियोंका बल बढ़ता है॥ २२-२८॥

जैसे-जैसे रातें घटती हैं, वैसे-वैसे मनुष्योंका बल क्रमशः घटता है। रातमें, दिनमें तथा भोजनके बाद, आयुके आदि, मध्य और अवसान-कालमें कफ, पित्त एवं वायु प्रकुपित होते हैं। प्रकोपके आदिकालमें इनका संचय होता है तथा प्रकोपके बाद इनका शमन कहा गया है। विप्रवर! अधिक भोजन और अधिक उपवाससे तथा मल-मूत्र आदिके वेगोंको रोकनेसे सभी रोग उत्पन्न होते हैं। इसलिये पेटके दो भागोंको अन्नसे तथा एक भागको जलसे पूरा करे। अवशिष्ट एक भागको वायु आदिके संचरणके लिये रिक्त रखे। व्याधिका निदान तथा विपरीत औषध करना चाहिये, इन सबका सार यही है, जो मैंने बतलाया है॥ २९-३३ $\frac{१}{२}$॥

नाभिके ऊपर पित्तका स्थान है तथा नीचे श्रोणी एवं गुदाको वातका स्थान कहा गया है। तथापि ये सभी समस्त शरीरमें घूमते हैं। उनमें भी वायु विशेषरूपसे सम्पूर्ण शरीरमें संचरण करती है। (इस विषयका सुस्पष्ट वर्णन सुश्रुतमें इस प्रकार है-दोषस्थानान्यत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः। तत्र समासेन वातः श्रोणिगुदसंश्रयः, तदुपर्यधो नाभेः पक्वाशयः, पक्वामाशयमध्यं पित्तस्य, आमाशयः श्लेष्मणः। (सुश्रुत, सूत्र-स्थान अध्याय २१, सूत्र) 'इसके बाद दोषोंके स्थानोंका वर्णन करूँगा-उनमें संक्षेपसे (रहस्य यह है कि) वायुका स्थान श्रोणि एवं गुदा है, उसके ऊपर एवं नाभि (ग्रहणी)-के नीचे पक्वाशय है, पक्वाशय एवं आमाशयके मध्यमें पित्तका स्थान है। श्लेष्माका स्थान आमाशय है')॥ ३४-३५॥

देहके मध्यमें हृदय है, जो मनका स्थान है। जो स्वभावतः दुर्बल, थोड़े बालवाला, चञ्चल, अधिक बोलनेवाला तथा विषमानल है-जिसकी जठराग्नि कभी ठीकसे पाचनक्रिया करती है, कभी नहीं करती तथा जो स्वप्नमें आकाशमें उड़नेवाला है, वह वात प्रकृतिका मनुष्य है। समय (अवस्था)-से पूर्व ही जिसके बाल पकने-झरने लगे, जो क्रोधी हो, जिसे पसीना अधिक होता हो, जो मीठी वस्तुएँ खाना पसंद करता हो और स्वप्नमें अग्निको देखनेवाला हो, वह पित्त प्रकृतिका है। जो दृढ़ अङ्गोंवाला, स्थिरचित्त, सुन्दर, कान्तियुक्त, चिकने केश तथा स्वप्नमें स्वच्छ जलको देखनेवाला है, वह कफ प्रकृतिवाला मनुष्य कहा जाता है। इसी प्रकार तामस, राजस तथा सात्त्विक-तीन प्रकारके मनुष्य होते हैं॥ ३६-३९॥

मुनिश्रेष्ठ! सभी मनुष्य वात, पित्त और कफवाले हैं। मैथुनसे और भारी काममें लगे रहनेसे रक्तपित्त होता है। कदन्नके भोजनसे तथा शोकसे वायु कुपित होती है। द्विजोत्तम! जलन पैदा करनेवाले पदार्थों तथा कटु, तिक्त, कषायरससे युक्त पदार्थोंके सेवनसे, मार्गमें चलनेसे तथा भयसे पित्त प्रकुपित होता है। अधिक जल पीनेवालों, भारी अन्न भोजन करनेवालों, खाकर तुरंत सो जानेवालों तथा आलसियोंका कफ प्रकुपित होता है। उत्पन्न हुए वातादि रोगोंको लक्षणोंसे जानकर उनका शमन करे॥ ४०-४३॥

अस्थिभङ्ग (हड्डियोंका टूटना या व्यथित होना), मुखका कसैला स्वाद होना, मुँह सूखना,

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जँभाई आना तथा रोएँ खड़े हो जाना—ये वायुजनित रोगके लक्षण हैं। नाखून, आँखें एवं नस-नाड़ियोंका पीला हो जाना, मुखमें कड़वापन प्रतीत होना, प्यास लगना तथा शरीरमें दाह या गर्मी मालूम होना—ये पित्तव्याधिके लक्षण हैं॥ ४४-४५॥

आलस्य, प्रसेक (मुँहमें पानी आना), भारीपन, मुँहका मीठा होना, उष्णकी अभिलाषा (धूपमें या आगके पास बैठनेकी इच्छा होना या उष्णपदार्थोंको ही खानेकी कामना)—ये कफज व्याधिके लक्षण हैं। स्निग्ध और गरम-गरम भोजन करनेसे, तेलकी मालिशसे तथा तैल-पान आदिसे वातरोगका निवारण होता है। घी, दूध, मिश्री आदि एवं चन्द्रमाकी किरण आदि पित्तको दूर करता है। शहदके साथ त्रिफलाका तैल लेने तथा व्यायाम आदिसे कफका शमन होता है। सब रोगोंकी शान्तिके लिये भगवान् विष्णुका ध्यान एवं पूजन सर्वोत्तम औषध है॥ ४६-४८॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सर्वरोगहर ओषधियोंका वर्णन' नामक दो सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८०॥


दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय

रस आदिके लक्षण*

भगवान् धन्वन्तरिने कहा—सुश्रुत! अब मैं ओषधियोंके रस आदिके लक्षणों और गुणोंका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो। जो ओषधियोंके रस, वीर्य और विपाकको जानता है, वही चिकित्सक राजा आदिकी रक्षा कर सकता है॥ १॥

महाबाहो! मधुर, अम्ल और लवण रस चन्द्रमासे उत्पन्न कहे गये हैं। कटु, तिक्त एवं कषाय रस अग्निसे उत्पन्न माने गये हैं। द्रव्यका विपाक तीन प्रकारका होता है—कटु, अम्ल और लवणरूप। वीर्य दो प्रकारके कहे गये हैं—शीत और उष्ण। द्विजोत्तम! ओषधियोंका प्रभाव अकथनीय है। मधुर, तिक्त और कषायरस 'शीतवीर्य' कहे गये हैं एवं शेष रस 'उष्णवीर्य' माने गये हैं; किंतु गुडूची (गिलोय) तिक्तरसवाली होनेपर भी अत्यन्त वीर्यप्रद होनेसे उष्ण है॥ २-५॥

मानद! इसी प्रकार हरड़ कषायरससे युक्त होनेपर भी 'उष्णवीर्य' होती है तथा मांस (जटामांसी) मधुररससे युक्त होनेपर भी 'उष्णवीर्य' ही कहा गया है। लवण और मधुर—ये दोनों रस विपाकमें मधुर माने गये हैं। अम्लोष्णका विपाक भी मधुर होता है। शेष रस विपाकमें कटु हैं। इसमें संशय नहीं है कि विशेष वीर्ययुक्त द्रव्यके विपाकमें उसके प्रभावके कारण विपरीतता भी हो जाती है; क्योंकि शहद मधुर होनेपर भी विपाकमें कटु माना गया है॥ ६-८॥

द्रव्यसे सोलहगुना जल लेकर क्वाथ करे। प्रक्षिप्त द्रव्यसे चारगुना जल शेष रहनेपर (क्वाथको) छानकर पीवे। यह क्वाथके निर्माणकी विधि है। जहाँ क्वाथकी विधि न बतलायी गयी हो, वहाँ इसीको प्रमाण जानना चाहिये॥ ९॥

स्नेह (तैल या घृत) पाककी विधिमें स्नेहसे


* दो सौ इक्यासीवें अध्यायमें कथित 'रस, वीर्य, विपाक एवं प्रभावका वर्णन' विस्तारपूर्वक 'सुश्रुतसंहिता'के सूत्रस्थानके ४० एवं ४२ वें अध्यायोंमें तथा 'चरकसंहिता'के सूत्रस्थानके २६ वें अध्यायमें है। तदनुसार ही यहाँका वर्णन है।

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चौगुना$^१$ कषाय (क्वथित द्रव्य) अथवा बराबर-बराबर तैल एवं विभिन्न द्रव्योंके क्वाथ लेने चाहिये। तैलका परिपाक तब समझना चाहिये, जब कि उसमें डाली हुई ओषधियाँ उफनते हुए तैलमें गलकर ऐसी हो जायँ, कि उन्हें ठंडा करके यदि हाथपर रगड़ा जाय तो उनकी बत्ती-सी बन जाय। विशेष बात यह है कि उस बत्तीका सम्बन्ध अग्निसे किया जाय तो चिड़चिड़ाहटकी प्रतीति न हो, तब सिद्धतैल मानना चाहिये॥ १०-११$\frac{१}{२}$॥

सुश्रुत! लेह्य (चाटनेयोग्य) औषधद्रव्योंमें भी इसीके समान प्रक्षेप आदि होते हैं। निर्मल तथा उचित औषध-प्रक्षेपद्वारा निर्मित क्वाथ उत्तम होता है (तथा उसका प्रयोग लेह्य आदिमें करना चाहिये)। चूर्णकी मात्रा एक अक्ष (तोला) और क्वाथकी मात्रा चार पल$^२$ है। यह मध्यम मात्रा (साधारण मात्रा) बतलायी गयी है। वैसे मात्राका परिमाण कोई निश्चित परिमाण नहीं है। महाभाग! रोगीकी अवस्था, बल, अग्नि, देश, काल, द्रव्य और रोगका विचार करके मात्राकी कल्पना होती है। उसमें सौम्य रसोंको प्रायः धातुवर्द्धक जानना चाहिये॥ १२-१५॥

मधुर रस तो विशेषतया शरीरके धातुओंकी वृद्धिके लिये जानना चाहिये। दोष, धातु और द्रव्य$^३$ समानगुणयुक्त होनेपर शरीरकी वृद्धि करते हैं और इसके विपरीत होनेपर क्षयकारक होते हैं। नरश्रेष्ठ! इस शरीरमें तीन प्रकारके उपस्तम्भ (खंभे) कहे गये हैं—आहार, मैथुन और निद्रा। मनुष्य इनके प्रति सदा सावधानी रखे। इनके पूर्णतया परित्याग या अत्यन्त सेवनसे शरीर क्षयको प्राप्त होता है। कृश शरीरका 'बृंहण' (पोषण), स्थूल शरीरका 'कर्षण' और मध्यम शरीरका 'रक्षण' करना चाहिये। ये शरीरके तीन भेद माने गये हैं। 'तर्पण' और 'अतर्पण'—इस प्रकार आहारादि उपक्रमोंके दो भेद होते हैं। मनुष्यको सदा 'हिताशी' होना चाहिये (हितकारी पदार्थोंको ही खाना चाहिये) और 'मिताशी' बनना चाहिये (परिमित भोजन करना चाहिये) तथा 'जीर्णाशी' होना चाहिये (पूर्वभुक्त अन्नका परिपाक हो जानेपर ही पुनः भोजन करना चाहिये)॥ १६-२०॥

नरश्रेष्ठ! ओषधियोंकी निर्माण-विधि पाँच प्रकारकी मानी गयी है—रस, कल्क, क्वाथ, शीतकषाय तथा फाण्ट। औषधोंको निचोड़नेसे 'रस' होता है, मन्थनसे 'कल्क' बनता है, औटानेसे 'क्वाथ' होता है, रात्रिभर रखनेसे 'शीत' और तत्काल जलमें कुछ गरम करके छान लेनेसे 'फाण्ट' होता है॥ २१-२२$\frac{१}{२}$॥


१. २८१ अध्यायके १० वें श्लोकमें दो प्रकारकी युक्तियाँ मिल रही हैं—(१) तैल-निर्माणमें तैलसे चौगुना कषाय, (२) तैलके समान। इसमें संशयकी कोई बात नहीं है, यदि एक ही प्रकारका कषाय मिलाना हो तो चौगुना चाहिये एवं यदि अनेक प्रकारके कषायोंका सम्मिश्रण करना हो तो तैलके बराबर-बराबर भी ले सकते हैं, किंतु एक बात ध्यानमें रहे कि योगमें कषाय तैलसे चतुर्गुण अवश्य होना चाहिये।
२. कलिङ्गमानसे एक 'पल' चार तोलेका होता है।
३. २८१ वें अध्यायके १६-१७ श्लोकोंपर विमर्श—
(१) सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्। (२) ह्रासहेतुर्विशेषश्च प्रवृत्तिरुभयस्य तु। (३) तुल्यार्थता हि सामान्यं विशेषस्तु विपर्ययः।
उक्त तीनों सूत्र 'चरकसंहिता', सूत्र-स्थानके हैं। तथा—'अष्टाङ्ग-हृदय'कार लिखते हैं—'वृद्धिः समानैः सर्वेषां विपरीतेर्विपर्ययः।'
उक्त पङ्क्तियोंका निष्कर्ष यही है कि समान द्रव्य, गुण या कर्मवाली वस्तुओंसे समान गुण-धर्मवाले रस-रक्तादिकी वृद्धि होती है तथा विपरीतसे इनका ह्रास होता है।

* अध्याय २८२ * ५६९

(इस प्रकार) चिकित्साके एक सौ आठ साधन हैं। जो वैद्य उनको जानता है, वह अजेय होता है। अर्थात् वह चिकित्सामें कहीं असफल नहीं होता है। वह ‘बाहुशौण्डिक’ कहा जाता है। आहार-शुद्धि अग्निके संरक्षण, संवर्द्धन एवं संशुद्धि आदिके लिये आवश्यक है; क्योंकि मनुष्योंके बलका अग्नि ही मूल आधार है। बलके लिये सैन्धव लवणसे युक्त त्रिफला, कान्तिप्रद उत्तम पेय, जाङ्गल-रस, सैन्धवयुक्त दही और दुग्ध तथा पिप्पली (पीपल)-का सेवन करना चाहिये॥ २३—२५॥

मनुष्यको चाहिये कि जो रस (या धातु आदि) अधिक हो गये, अर्थात् बढ़ गये हैं, उन्हें सम करे—साम्यावस्थामें लावे। वातप्रधान प्रकृतिके मनुष्यको अपनी परिस्थितिके अनुसार ग्रीष्म-ऋतुमें अङ्गमर्दन करना चाहिये। शिशिर-ऋतुमें साधारण या अधिक, वसन्त-ऋतुमें मध्यम और ग्रीष्म-ऋतुमें विशेषरूपसे अङ्गोंका मर्दन करे। पहले त्वचाका, उसके बाद मर्दन करनेयोग्य अङ्गका मर्दन करे॥ २६-२७॥

स्नायु एवं रुधिरसे परिपूर्ण शरीरमें अस्थिसमूह अत्यन्त मांसल-सा प्रतीत होता है। इसी प्रकार कंधे, बाहु, जानुद्वय तथा जङ्घाद्वय भी मांसल प्रतीत होते हैं। बुद्धिमान् मनुष्य शत्रुके समान इनका मर्दन करे। जत्रु (हँसलीका भाग), वक्षःस्थल (छाती) इन्हें पूर्ववत् साधारण प्रकारसे मले तथा समस्त अङ्ग-संधियोंको खूब मलकर उन्हें (अङ्ग-संधियोंको) फैला दे। किंतु उनका प्रसारण हठात् एवं क्रमविरुद्ध न करे। मनुष्य अजीर्णमें, भोजनोपरान्त और तत्काल जल पीकर परिश्रम न करे॥ २८—३०॥

दिनके चार भाग (प्रहर) होते हैं। प्रथम प्रहरार्धके व्यतीत हो जानेपर व्यायाम न करे। शीतल जलसे एक बार स्नान करे। उष्ण जल थकावटको दूर करता है। हृदयके श्वासको अवरुद्ध न करे। व्यायाम कफको नष्ट करता है तथा मर्दन वायुका नाश करता है। स्नान पित्ताधिक्यका शमन करता है। स्नानके पश्चात् धूपका सेवन प्रिय है। व्यायामका सेवन करनेवाले मनुष्य धूप और परिश्रमयुक्त कार्यको सहन करनेमें समर्थ होते हैं॥ ३१—३३॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘रसादि लक्षणोंका वर्णन’ नामक दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८१॥


दो सौ बयासीवाँ अध्याय

आयुर्वेदोक्त वृक्ष-विज्ञान

धन्वन्तरि कहते हैं—सुश्रुत! अब मैं वृक्षायुर्वेदका वर्णन करूँगा। क्रमशः गृहके उत्तर दिशामें प्लक्ष (पाकड़), पूर्वमें वट (बरगद), दक्षिणमें आम्र और पश्चिममें अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष मङ्गल माना गया है। घरके समीप दक्षिण दिशामें उत्पन्न हुए काँटेदार वृक्ष भी शुभ हैं। आवास-स्थानके आसपास उद्यानका निर्माण करे अथवा सब ओरका भाग पुष्पित तिलोंसे सुशोभित करे॥ १-२॥

ब्राह्मण और चन्द्रमाका पूजन करके वृक्षोंका आरोपण करे। वृक्षारोपणके लिये तीनों उत्तरा, स्वाती, हस्त, रोहिणी, श्रवण और मूल—ये नक्षत्र अत्यन्त प्रशस्त हैं। उद्यानमें पुष्करिणी (बावली)-का निर्माण करावे और उसमें नदीके प्रवाहका प्रवेश करावे। जलाशयारम्भके लिये हस्त, मघा, अनुराधा, पुष्य, ज्येष्ठा, शतभिषा,

५७० * अग्निपुराण *


उत्तराषाढ़ा, उत्तरा-भाद्रपदा और उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र उपयुक्त हैं॥ ३–५॥

वरुण, विष्णु और इन्द्रका पूजन करके इस कर्मको आरम्भ करे। नीम, अशोक, पुन्नाग (नागकेसर), शिरीष, प्रियङ्गु, अशोक$^१$, कदली (केला), जम्बू (जामुन), वकुल (मौलसिरी) और अनार वृक्षोंका आरोपण करके ग्रीष्म-ऋतुमें प्रातःकाल और सायंकाल, शीत-ऋतुमें दिनके समय एवं वर्षा-ऋतुमें रात्रिके समय भूमिके सूख जानेपर वृक्षोंको सींचे। वृक्षोंके मध्यमें बीस हाथका अन्तर 'उत्तम', सोलह हाथका अन्तर 'मध्यम' और बारह हाथका अन्तर 'अधम' कहा गया है। बारह हाथ अन्तरवाले वृक्षोंको स्थानान्तरित कर देना चाहिये। घने वृक्ष फलहीन होते हैं। पहले उन्हें काट-छाँटकर शुद्ध करे॥ ६–९॥

फिर विडङ्ग, घृत और पङ्क-मिश्रित शीतल जलसे उनको सींचे। वृक्षोंके फलोंका नाश होनेपर कुलथी, उड़द, मूँग, जौ, तिल और घृतसे मिश्रित शीतल जलके द्वारा यदि सेचन किया जाय तो वृक्षोंमें सदा फलों एवं पुष्पोंकी वृद्धि होती है। भेड़ और बकरीकी विष्ठाका चूर्ण, जौका चूर्ण, तिल और जल—इनको एकत्र करके सात दिनतक एक स्थानपर रखे। उसके बाद इससे सींचना सभी वृक्षोंके फल और पुष्पोंको बढ़ानेवाला है॥ १०–१२॥

मछलीके जल (जिसमें मछली रहती हों)-से सींचनेपर वृक्षोंकी वृद्धि होती है। विडंगचावलके साथ यह जल वृक्षोंका दोहद (अभिलषित-पदार्थ) है। इसका सेचन साधारणतया सभी वृक्ष-रोगोंका विनाश करनेवाला है॥ १३–१४॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘वृक्षायुर्वेदका वर्णन’ नामक दो सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८२॥


दो सौ तिरासीवाँ अध्याय

नाना रोगनाशक ओषधियोंका वर्णन

भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं—अडूसा, मुलहठी या कचूर$^२$, दोनों प्रकारकी हल्दी और इन्द्रयव—इनका क्वाथ बालकोंके सभी प्रकारके अतिसारमें तथा स्तन्य (माताके दूधके) दोषोंमें प्रशस्त है। पीपल और अतीसके सहित काकड़ाशृंगीका अथवा केवल एक अतीसका चूर्ण करके बालकोंको मधुके साथ चटावे। इससे खाँसी, वमन और ज्वर नष्ट होता है। बालकोंको दुग्ध, घृत अथवा तैलके साथ वचका सेवन करावे अथवा मुलहठी और शङ्खपुष्पीको दूधके साथ बालक पिये। इससे बालकोंकी वाक्शक्ति एवं रूपसम्पत्तिके साथ-साथ आयु, बुद्धि और कान्तिकी भी वृद्धि होती है। वच, कलिहारी, अडूसा, सोंठ, पीपल, हल्दी, कूट, मुलहठी और सैन्धव—इनका चूर्ण बालकोंको प्रातःकाल पिलावे। इसका सेवन बुद्धिवर्द्धक है। देवदारु, बड़ा सहजन, त्रिफला और नागरमोथा—इनका


१. २८२ वें अध्यायमें ६-७ दोनों श्लोकोंमें अशोक वृक्षका नाम है, पुनरुक्ति-दोष नहीं है। कारण यह है कि अशोक 'श्वेत' तथा 'रक्त' दो प्रकारका होता है। दोनों भवनके पास प्रशस्त हैं।
२. प्रथम श्लोकमें 'सिंही शटी' तथा 'सिंही यष्टी' दोनों पाठ हैं, जो युक्तियुक्त हैं। 'शटी'का अर्थ 'कचूर' है तथा 'यष्टी'का अर्थ 'मुलहठी' है।

  • अध्याय २८३ * ५७१

क्वाथ अथवा पीपल और मुनक्काका कल्क सभी प्रकारके कृमिरोगोंका नाशक है। शुद्ध राँगेको त्रिफला, भृङ्गराज तथा अदरखके रस या मधु-घृतमें अथवा भेड़के मूत्र या गोमूत्रमें अञ्जन करनेसे नेत्ररोगोंमें लाभ होता है। दूर्वारसका नस्य नाकसे बहनेवाले रक्तरोग (नाशा)-को शान्त करनेमें उत्तम है॥ १-७॥

लहसुन, अदरख और सहजनके रससे कानको भर देनेपर अथवा अदरखके रस या तैलसे कानको भर देनेपर वह कर्णशूलका नाशक तथा ओष्ठ-रोगोंको दूर करनेवाला होता है। जायफल, त्रिफला, व्योष (सोंठ, मिर्च, पीपल), गोमूत्र, हल्दी, गोदुग्ध तथा बड़ी हर्रेके कल्कसे सिद्ध किया हुआ तिलका तैल कवल (कुल्ला) करनेसे दन्तपीड़ाका नाशक है। काँजी, नारियलका जल, गोमूत्र, सुपारी तथा सोंठ—इनके क्वाथका कवल मुखमें रखनेसे जिह्वाके रोगका नाश होता है। कलिहारीके कल्क (पिसे हुए द्रव्य)-में निर्गुण्डीके रसके साथ सिद्ध किया हुआ तैलका नस्य लेने (नाकमें डालने)-से गण्डमाला और गलगण्डरोगका नाश होता है। सभी चर्मरोगोंको नष्ट करनेवाले आक, काटा, करञ्ज, थूहर, अमलतास और चमेलीके पत्तोंको गोमूत्रके साथ पीसकर उबटन लगाना चाहिये। वाकुचीको तिलोंके साथ एक वर्षतक खाया जाय तो वह सालभरमें कुष्ठरोगका नाश कर देती है। हर्रे, भिलावा, तैल, गुड़ और पिण्डखजूर—ये कुष्ठनाशक औषध हैं। पाठा, चित्रक, हल्दी, त्रिफला और व्योष (सोंठ, मिर्च, पीपल)—इनका चूर्ण तक्रके साथ पीनेसे अथवा गुड़के साथ हरीतकी खानेसे अर्शरोगका नाश होता है। प्रमेह-रोगीको त्रिफला, दारुहल्दी, बड़ी इन्द्रायण और नागरमोथा—इनका क्वाथ या आँवलेका रस हल्दी, कल्क और मधुके साथ पीना चाहिये। अडूसेकी जड़ गिलोय और अमलतासके क्वाथमें शुद्ध एरण्डका तेल मिलाकर पीनेसे वातरक्तका नाश होता है और पिप्पली प्लीहारोगको नष्ट करती है॥ ८-१६॥

पेटके रोगीको थूहरके दूधमें अनेक बार भावना दी हुई पिप्पलीका सेवन करना चाहिये। चित्रक, विडङ्ग तथा त्रिकटु (सोंठ, मिर्च, पीपल)-के कल्कसे सिद्ध दूध अरुचिरोगका निवारण करता है। पीपलामूल, वच, हर्रे, पीपल और विडङ्गको घीमें मिलाकर रखे। (उसके सेवनसे) या केवल तक्रके एक मासतक सेवनसे ग्रहणी, अर्श, पाण्डु, गुल्म और कृमिरोगोंका नाश होता है। त्रिफला, गिलोय, अडूसा, कुटकी, चिरायता—इनका क्वाथ शहदके साथ पीनेसे कामलासहित पाण्डुरोगका नाश होता है। अडूसेके रसको मिश्री और शहद मिलाकर पीनेसे या शतावरी, दाख, खरेटी और सोंठ—इनसे सिद्ध किया हुआ दूध पीनेसे रक्त-पित्तरोगका नाश होता है। क्षयरोगके रोगीको शतावरी, विदारीकंद, बड़ी हर्रे, तीनों खरेटी, असगन्ध, गदहपूर्ना तथा गोखरूके चूर्णको शहद और घीके साथ चाटना चाहिये॥ १७—२१॥

हर्रे, सहजन, करञ्ज, आक, दालचीनी, पुनर्नवा, सोंठ और सैन्धव—इनका गोमूत्रके साथ योग करके लेप किया जाय तो यह विद्रधिकी गाँठको पकानेके लिये उत्तम उपाय है। निशोथ, जीवन्ती, दन्तीमूल, मञ्जिष्ठा, दोनों हल्दी, रसाञ्जन और नीमके पत्तेका लेप भगन्दरमें श्रेष्ठ है। अमलतास, हरिद्रा, लाक्षा और अडूसा—इनके चूर्णको गोघृत और शहदके साथ बत्ती बनाकर नासूरमें देवे। इससे नासूरका शोधन होकर घाव भर जाता है। पिप्पली, मुलहठी, हल्दी, लोध, पद्मकाष्ठ, कमल, लालचन्दन एवं मिर्च—इनके साथ गोदुग्धमें सिद्ध किया हुआ

५७२ * अग्निपुराण *


तैल घावको भरता है। श्रीताड़, कपासकी पत्तियोंकी भस्म, त्रिफला, गोलमिर्च, खरेटी और हल्दी—इनका गोला बनाकर घावका स्वेदन करे और इन ओषधियोंके तेलको घावपर लगाये। दूधके साथ कुम्भीसार* (गुग्गुलसार)-को आगपर जलाकर व्रणपर लेप करे। (अथवा गुग्गुलसारको दूधमें मिलाकर आगसे जले हुए व्रणपर लेप करे।) अथवा जलकुम्भीको जलाकर दूधमें मिलाकर लगानेसे सभी प्रकारके व्रण ठीक होते हैं। इसी प्रकार नारियलके जड़की मिट्टीमें घृत मिलाकर सेक करनेसे व्रणका नाश होता है॥ २२—२७॥

सोंठ, अजमोद, सेंधानमक, इमलीकी छाल—इन सबके समान भाग हर्रैको तक्र या गरम जलके साथ पीनेसे अतिसारका नाश होता है। इन्द्रयव, अतीस, सोंठ, बेलगिरि और नागरमोथाका क्वाथ आमसहित जीर्ण अतिसारमें और शूलसहित रक्तातिसारमें भी पिलाना चाहिये। ठंडे थूहरमें सेंधानमक भरकर आगमें जला ले। फिर यथोचित मात्रामें उदरशूलवालेको गरम जलके साथ दे। अथवा सेंधानमक, हींग, पीपल, हर्रै—इनका गरम जलके साथ सेवन करावे॥ २८—३०॥

वरकी वरोह, कमल और धानकी खीलका चूर्ण—इनको शहदमें भिगोकर, कपड़ेमें पोटली बनाकर, मुखमें रखकर उसे चूसे तो इससे प्यास दूर होती है। अथवा कुटकी, पीपल, मीठा कूट एवं धानका लावा मधुके साथ मिलाकर, पोटलीमें रखकर मुँहमें रखे और चूसे तो प्यास दूर हो जाती है। पाठा, दारुहल्दी, चमेलीके पत्र, मुनक्काकी जड़ और त्रिफला—इनका क्वाथ बनाकर उसमें शहद मिला दे। इसको मुखमें धारण करनेसे मुखपाक-रोग नष्ट होता है। पीपल, अतीस, कुटकी, इन्द्रयव, देवदारु, पाठा और नागरमोथा—इनका गोमूत्रमें बना क्वाथ मधुके साथ लेनेपर सब प्रकारके कण्ठरोगोंका नाश होता है। हर्रै, गोखरू, जवासा, अमलतास एवं पाषाण-भेद—इनके क्वाथमें शहद मिलाकर पीनेसे मूत्रकृच्छ्रका कष्ट दूर होता है। बाँसका छिल्का और वरुणकी छालका क्वाथ शर्करा और अश्मरी-रोगका विनाश करता है। श्लीपद-रोगसे युक्त मनुष्य शाखोटक (सिंहोर)-की छालका क्वाथ मधु और दुग्धके साथ पान करे। उड़द, मदारकी पत्ती तथा दूध, तैल, मोम एवं सैंधव लवण—इनका योग पादरोगनाशक है। सोंठ, काला नमक और हींग—इनका चूर्ण या सोंठके रसके साथ सिद्ध किया घी अथवा इनका क्वाथ पीनेसे मलबन्ध-दोष और तत्सम्बन्धी रोग नष्ट होते हैं। गुल्मरोगी सर्जक्षार, चित्रक, हींग और अजमोद—इनके रसके साथ या विडंग एवं चित्रकके साथ तक्रपान करे। आँवला, परवल और मूँग—इनके क्वाथका घृतके साथ सेवन विसर्परोगका अपहरण करनेवाला है। अथवा सोंठ, देवदारु और पुनर्नवा या बंशलोचन—इनका दुग्धयुक्त क्वाथ उपकारक है। गोमूत्रके साथ सोंठ, मिर्च, पीपल, लोहचूर, यवक्षार तथा त्रिफलाका क्वाथ शोथ (सूजन)-को शान्त करता है। गुड़, सहिजन एवं निशोथ, सैंधव


* दो सौ तिरासीवें अध्यायके २७ वें श्लोकमें दो प्रकारके पाठ सम्भव तथा युक्तियुक्त हैं—(१) कुम्भीसारं पयोयुक्तं वह्निदग्धव्रणे लिपेत्। (२) कुम्भीसारं पयोयुक्तं वह्निदग्धे व्रणे लिपेत्। यहाँ 'कुम्भीसार' पदका अर्थ है—गुग्गुलका सार; क्योंकि 'वाचस्पत्यम्' कोषमें औषधवर्गमें 'कुम्भी'से गुग्गुलका ग्रहण किया जाता है तथा 'कुम्भं त्रिवृति गुग्गुलौ'—यह 'विश्वप्रकाश'में भी मिलता है। मेरे गुरुदेव प्रातःस्मरणीय श्रीसत्यनारायण शास्त्रीजी अग्निदग्धमें इस प्रकारका लेप बतलाया करते थे—राल, चूनेका पानी, तीसीका तेल, धवका फूल—इनसे एक प्रकारका मलहम बनाकर अग्निदग्धपर लेप किया जाय तो दाहप्रशमनके साथ-साथ आगे सफेद दाग होनेका भी भय नहीं रहता तथा अग्निदाहका दिखायी देना भी बंद हो जाता है।

* अध्याय २८४ * ५७३


लवण—इनका चूर्ण (या क्वाथ) भी शोथको शान्त करता है॥ ३१—४०॥

निशोथ एवं गुड़के साथ त्रिफलाका क्वाथ विरेचन करनेवाला है। वच और मैनफलके क्वाथका जल वमनकारक होता है। भृङ्गराजके रसमें भावित त्रिफला सौ पल, बायविडंग और लोहचूर दस भाग एवं शतावरी, गिलोय और चिच्चक पचीस पल ग्रहण करके उसका चूर्ण बना ले। उस चूर्णको मधु, घृत और तेलके साथ चाटनेसे मनुष्य वली और पलितसे रहित होता है। अर्थात् उसके मुँहपर झुर्रियाँ नहीं होतीं और बाल नहीं पकते। इसके सिवा वह सम्पूर्ण रोगोंसे मुक्त होकर सौ वर्षोंतक जीवित रहता है। मधु और शर्कराके साथ त्रिफलाका सेवन सर्वरोगनाशक है। त्रिफला और पीपलका मिश्री, मधु और घृतके साथ भक्षण करनेपर भी पूर्वोक्त सभी फल या लाभ प्राप्त होते हैं। हर्रे, चित्रक, सोंठ, गिलोय और मुसलीका चूर्ण गुड़के साथ खानेपर रोगोंका नाश होता है और तीन सौ वर्षोंकी आयु प्राप्त होती है। जपा-पुष्पको थोड़ा मसलकर जलमें मिला ले। उस चूर्णजलको थोड़ी-सी मात्रामें तेलमें मिला देनेपर तैल घृताकार हो जाता है। जलगोह* (बिल्ली)-की जरायु (गर्भकी झिल्ली)-की धूप देनेसे चित्र दिखलायी नहीं देता। फिर शहदकी धूप देनेसे पूर्ववत् दिखायी देने लगता है। पाड़रकी जड़, कपूर, जोंक और मेढकका तेल—इनको पीसकर दोनों पैरोंमें लगाकर मनुष्य जलते हुए अङ्गारोंपर चल सकता है। तृणोत्थापन (तृणोंको आगमें ऊपर फेंकता-उछालता हुआ) आश्चर्यजनक खेल दिखलाता हुआ चल सकता है। विषोंका रोकना (अथवा विष एवं ग्रह-निवारण), रोगका नाश एवं तुच्छ क्रीड़ाएँ कामनापरक हैं। इहलौकिक तथा पारलौकिक दोनों सिद्धियोंके देनेवाले कर्मोंको मैंने तुम्हें बतलाया है, जो छः कर्मोंसे युक्त हैं। मन्त्र, ध्यान, औषध, कथा, मुद्रा और यज्ञ—ये छः जहाँ मुष्टि (भुजाके रूपसे सहायक) हैं, वह कार्य धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षरूप चतुर्वर्ग फलको देनेवाला कर्म बताया गया। इसे जो पढ़ेगा वह स्वर्गमें जायगा॥ ४१—५१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नानारोगहारी ओषधियोंका वर्णन' नामक दो सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८३॥


दो सौ चौरासीवाँ अध्याय

मन्त्ररूप औषधोंका कथन

धन्वन्तरिजी कहते हैं—सुश्रुत ! 'ओंकार' आदि मन्त्र आयु देनेवाले तथा सब रोगोंको दूर करके आरोग्य प्रदान करनेवाले हैं। इतना ही नहीं, देह छूटनेके पश्चात् वे स्वर्गकी भी प्राप्ति करानेवाले हैं। 'ओंकार' सबसे उत्कृष्ट मन्त्र है। उसका जप करके मनुष्य अमर हो जाता है—आत्माके अमरत्वका बोध प्राप्त करता है, अथवा देवरूप हो जाता है। गायत्री भी उत्कृष्ट मन्त्र है। उसका जप करके मनुष्य भोग और मोक्षका भागी होता है। 'ॐ नमो नारायणाय।'—यह अष्टाक्षर-मन्त्र समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।'—यह द्वादशाक्षर-मन्त्र सब कुछ देनेवाला है। 'ॐ हूं विष्णवे नमः।'—यह मन्त्र उत्तम औषध है। इस मन्त्रका जप करनेसे देवता और असुर श्रीसम्पन्न तथा नीरोग


* 'श्रोतुर्विडालो मार्जारो वृषदंशक आखुभाक्।' (अमरकोष, सिंहादिवर्ग)

५७४ * अग्निपुराण *


हो गये। जगत्के समस्त प्राणियोंका उपकार तथा धर्माचरण—यह महान् औषध है। ‘धर्मः, सद्धर्मकृत्, धर्मी'—इन धर्म-सम्बन्धी नामोंके जपसे मनुष्य निर्मल (शुद्ध) हो जाता है। श्रीदः, श्रीशः, श्रीनिवासः, श्रीधरः, श्रीनिकेतनः, श्रियःपतिः तथा श्रीपरमः'—इन श्रीपति-सम्बन्धी नामात्मक मन्त्रपदोंके जपसे मनुष्य लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति)-को पा लेता है॥ १—५$\frac{१}{२}$॥

'कामी, कामप्रदः, कामः, कामपालः, हरिः, आनन्दः, माधवः'—श्रीहरिके इन नाम-मन्त्रोंके जप और कीर्तनसे समस्त कामनाओंकी पूर्ति हो जाती है। 'रामः, परशुरामः, नृसिंहः, विष्णुः, त्रिविक्रमः'—ये श्रीहरिके नाम युद्धमें विजयकी इच्छा रखनेवाले योद्धाओंको जपने चाहिये। नित्य विद्याभ्यास करनेवाले छात्रोंको सदा 'श्रीपुरुषोत्तम' नामका जप करना चाहिये। 'दामोदरः' नाम बन्धन दूर करनेवाला है। 'पुष्कराक्षः'—यह नाम-मन्त्र नेत्र-रोगोंका निवारण करनेवाला है। 'हृषीकेशः'—इस नामका स्मरण भयहारी है। औषध देते और लेते समय इन सब नामोंका जप करना चाहिये॥ ६—९॥

औषधकर्ममें ‘अच्युत'—इस अमृत-मन्त्रका भी जप करे। संग्राममें 'अपराजित'का तथा जलसे पार होते समय ‘श्रीनृसिंह'का स्मरण करे। जो पूर्वादि दिशाओंकी यात्रामें क्षेत्रकी कामना रखनेवाला हो, वह क्रमशः 'चक्री', 'गदी', 'शार्ङ्गी' और 'खड्गी'का चिन्तन करे। व्यवहारोंमें (मुकदमोंमें) भक्ति-भावसे 'सर्वेश्वर अजित'का स्मरण करे। 'नारायण'का स्मरण हर समय करना चाहिये। भगवान् 'नृसिंह'को याद किया जाय तो वे सम्पूर्ण भीतियोंको भगानेवाले हैं। 'गरुडध्वजः'—यह नाम विषका हरण करनेवाला है। 'वासुदेव' नामका तो सदा ही जप करना चाहिये। धान्य आदिको घरमें रखते समय तथा शयन करते समय भी ‘अनन्त' और 'अच्युत'का उच्चारण करे। दुःस्वप्न दीखनेपर 'नारायण'का तथा दाह आदिके अवसरपर 'जलशायी'का स्मरण करे। विद्यार्थी 'हयग्रीव'का चिन्तन करे। पुत्रकी प्राप्तिके लिये 'जगत्सूति (जगत्-स्रष्टा)'-का तथा शौर्यकी कामना हो तो 'श्रीबलभद्र'का स्मरण करे। इनमेंसे प्रत्येक नाम अभीष्ट मनोरथको सिद्ध करनेवाला है॥ १०—१४॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मन्त्ररूप औषधका कथन' नामक दो सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८४॥


दो सौ पचासीवाँ अध्याय

मृतसंजीवनकारक सिद्ध योगोंका कथन

धन्वन्तरि कहते हैं—सुश्रुत! अब मैं आत्रेयके द्वारा वर्णित मृतसंजीवनकारक दिव्य सिद्ध योगोंको कहता हूँ, जो सम्पूर्ण व्याधियोंका विनाश करनेवाले हैं॥ १॥

आत्रेयने कहा—वातज्वरमें बिल्वादि पञ्चमूल—बेल, सोनापाठा, गम्भार, पाटल एवं अरणीका काढ़ा दे और पाचनके लिये पिप्पलीमूल, गिलोय और सोंठ—इनका क्वाथ दे। आँवला, अभया (बड़ी हर्रै), पीपल एवं चित्रक—यह आमलक्यादि क्वाथ सब प्रकारके ज्वरोंका नाश करनेवाला है। बिल्वमूल, अरणी, सोनापाठा, गम्भारी, पाटल, शालपर्णी, गोखरू, पृष्ठपर्णी, बृहती (बड़ी कटेर) और कण्टकारिका (छोटी कटेर)—ये दशमूल कहे गये हैं। इनका क्वाथ

* अध्याय २८५ * ५७५


तथा कुशके मूलका क्वाथ ज्वर, अपाचन, पार्श्वशूल और कास (खाँसी)-का नाश करनेवाला है। गिलोय, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, चिरायता और सोंठ—यह ‘पञ्चभद्र क्वाथ’ वात और पित्तज्वरमें देना चाहिये॥ २–५॥

निशोथ, विशाला (इन्द्रवारुणी), कुटकी, त्रिफला और अमलतास—इनका क्वाथ यवक्षार मिलाकर पिलावे। यह विरेचक और सम्पूर्ण ज्वरोंको शान्त करनेवाला है। देवदारु, खरेटी, अडूसा, त्रिफला और व्योष (सोंठ, काली मिर्च, पीपल), पद्मकाष्ठ, वायविडङ्ग और मिश्री—इन सबका समान भाग चूर्ण पाँच प्रकारके कास-रोगोंका मर्दन करता है। रोगी मनुष्य हृदयरोग, ग्रहणी, पार्श्वरोग, हिक्का, श्वास और कासरोगके विनाशके लिये दशमूल, कचूर, रास्ना, पीपल, बिल्व, पोकरमूल, काकड़ासिंगी, भुईं आँवला, भार्गी, गिलोय और पान—इनसे विधिवत् सिद्ध किया हुआ क्वाथ या यवागूका पान करे। मुलहठी (चूर्ण)-के साथ मधु, शर्कराके साथ पीपल, गुड़के साथ नागर (सोंठ) और तीनों लवण (सेंधानमक, विड्नमक और कालानमक)—ये हिक्का (हिचकी)-का नाश करनेवाले हैं। कारवी अजाजी (कालाजीरा, सफेदजीरा), काली मिर्च, मुनक्का, वृक्षाम्ल (इमली), अनारदाना, कालानमक और गुड़—इन सबके समानभागसे तैयार चूर्णका शहदके साथ निर्मित ‘कारव्यादि बटी’ सब प्रकारके अरुचिरोगोंका नाश करती है। अदरखके रसके साथ मधु मिलाकर रोगीको पिलाये। इससे अरुचि, श्वास, कास, प्रतिश्याय (जुकाम) और कफविकारोंका नाश होता है॥ ६–१२॥

वट—वटाङ्कुर, काकड़ासिंगी, शिलाजीत, लोध, अनारदाना और मुलहठी—इनका चूर्ण बनाकर उस चूर्णके समान मात्रामें मिश्री मिला मधुके साथ अवलेह (चटनी)-का निर्माण करे। इस ‘वटशृङ्गादि’के अवलेहको चावलके पानीके साथ लिया जाय तो उससे प्यास और छर्दि (वमन)-का प्रशमन होता है। गिलोय, अडूसा, लोध और पीपल—इनका चूर्ण शहदके साथ कफयुक्त रक्त, प्यास, खाँसी एवं ज्वरको नष्ट करनेवाला है। इसी प्रकार समभाग मधुसे मिश्रित अडूसेका रस और ताम्रभस्म कासको नष्ट करता है। शिरीषपुष्पके स्वरसमें भावित सफेद मिर्चका चूर्ण कासमें (तथा सर्पविषमें) हितकर है। मसूर सभी प्रकारकी वेदनाको नष्ट करनेवाला है तथा चौंराईका साग पित्तदोषको दूर करनेवाला है। मेउड़, शारिवा, सेरुकी एवं अङ्कोल—ये विषनाशक औषध हैं। सोंठ, गिलोय, छोटी कटेरी, पोकरमूल, पीपलामूल और पीपल—इनका क्वाथ मूर्च्छा और मदात्यय रोगमें लेना चाहिये। हींग, कालानमक एवं व्योष (सोंठ, मिर्च, पीपल)—ये सब दो-दो पल लेकर चार सेर घृत और घृतसे चौगुने गोमूत्रमें सिद्ध करनेपर उन्मादका नाश करते हैं। शङ्खपुष्पी, वच और मीठा कूटसे सिद्ध ब्राह्मी रसको मिलाकर इन सबकी गुटिका बना ले तो वह पुराने उन्माद और अपस्मार रोगका नाश करती है और उत्तम मेधावर्धक औषध है। हरेंके साथ पञ्चगव्य या घृतका प्रयोग कुष्ठनाशक है। परवलकी पत्ती, त्रिफला, नीमकी छाल, गिलोय, पृश्निपर्णी, अडूसेके पत्ते तथा करञ्ज—इनसे सिद्ध किया घृत कुष्ठरोगका मर्दन करता है। इसे ‘वज्रक’ कहते हैं। नीमकी छाल, परवल, कण्टकारि-पञ्चाङ्ग, गिलोय और अडूसा—सबको दस-दस पल लेकर भलीभाँति कूट ले। फिर सोलह सेर जलमें क्वाथ बनाकर उसमें सेरभर घृत और (बीस तोले) त्रिफला-चूर्णका कल्क बनाकर डाल दे और चतुर्थांश शेष रहनेतक पकाये। यह ‘पञ्चतिक्त घृत’ कुष्ठनाशक है। यह अस्सी

५७६ * अग्निपुराण *

प्रकारके वातरोग, चालीस प्रकारके पित्तरोग और बीस प्रकारके कफरोग, खाँसी, पीनस (बिगड़ी जुकाम), बवासीर और व्रणरोगोंका नाश करता है। जैसे सूर्य अन्धकारको नष्ट कर डालता है, उसी प्रकार यह योगराज निःसंदेह अन्य रोगोंका भी विनाश कर देता है॥१३-२४$\frac{१}{२}$॥

उपदंशकी शान्तिके लिये त्रिफलाके क्वाथ या भृङ्गराजके रससे व्रणोंका प्रक्षालन करे (धोये)। परवलकी पत्तीके चूर्णके साथ अनारकी छालका चूर्ण अथवा गजपीपर या त्रिफलाका चूर्ण पाउडरके रूपमें ही उसपर छोड़े। त्रिफला, लोहचूर्ण, मुलहठी, आर्कव (कुकुरमाँगरा), नील कमल, कालीमिर्च और सैन्धव-नमकसहित पकाये हुए तैलके मर्दनसे वमनकी शान्ति होती है। दुग्ध, मार्कव-रस, मुलहठी और नील कमल—इनको दो सेर लेकर तबतक पकाये, जबतक एक पाव तैल शेष रह जाय। इस तैलका नस्य (वृद्धावस्थाके चिह्न) पलित (बाल पकने)-का नाशक है। नीमकी छाल, परवलकी पत्ती, त्रिफला, गिलोय, खैरकी छाल, अडूसा अथवा चिरायता, पाठा, त्रिफला और लाल चन्दन-ये दोनों योग ज्वरको नष्ट करते हैं तथा कुष्ठ, फोड़ा-फुन्सी, चकत्ते आदिको भी मिटा देते हैं। परवलकी पत्ती, गिलोय, चिरायता, अडूसा, मजीठ एवं पित्तपापड़ा—इनके क्वाथमें खदिर मिलाकर लिया जाय तो वह ज्वर तथा विस्फोटक रोगोंको शान्त करता है॥२५-३१॥

दशमूल, गिलोय, हरें, दारुहल्दी, गदहपूर्णा, सहजना एवं सोंठ ज्वर, विद्रधि तथा शोथ-रोगोंमें हितकर है। महुवा और नीमकी पत्तीका लेप व्रणशोधक होता है। त्रिफला (आँवला, हर्रा, बहेरा), खैर (कत्था), दारुहल्दी, बरगदकी छाल, बरियार, कुशा, नीमके पत्ते तथा मूलीके पत्ते—इनका क्वाथ शरीरके बाह्य-शोधनके लिये हितकर है। करञ्ज, नीम तथा मेउड़का रस घावके कृमियोंको नष्ट करता है। धायका फूल, सफेद चन्दन, खरेटी, मजीठ, मुलहठी, कमल, देवदारु तथा मेदाका घृतसहित लेप व्रणरोपण (घावको भरनेवाला) है। गुग्गुल, त्रिफला, पीपल, सोंठ, मिर्च, पीपर—इनका समान भाग ले और इन सबके समान घृत मिलाकर प्रयोग करे। इस प्रयोगसे मनुष्य नाड़ीव्रण, दुष्टव्रण, शूल और भगन्दर आदि रोगोंको दूर करे। गोमूत्रमें भिगोकर शुद्ध की हुई हरीतकी (छोटी हर्रें)-को (रेडीके) तेलमें भूनकर सेंधा नमकके साथ प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करे। ऐसी हरीतकी कफ और वातसे होनेवाले रोगोंको नष्ट करती है। सोंठ, मिर्च, पीपल और त्रिफलाका क्वाथ यवक्षार और लवण मिलाकर पीये। कफप्रधान और वातप्रधान प्रकृतिवाले मनुष्योंके लिये यह विरेचन है और कफवृद्धिको दूर करता है। पीपल, पीपलामूल, वच, चित्रक, सोंठ-इनका क्वाथ अथवा किसी प्रकारका पेय बनाकर पीये। यह आमवातका नाशक है। रास्ना, गिलोय, रेंड़की छाल, देवदारु और सोंठ-इनका क्वाथ सर्वाङ्ग-वात तथा संधि, अस्थि और मज्जागत आमवातमें पीना चाहिये। अथवा सोंठके जलके साथ दशमूल-क्वाथ पीना चाहिये। सोंठ एवं गोखरूका क्वाथ प्रतिदिन प्रातः-प्रातः सेवन किया जाय तो वह आमवातके सहित कटिशूल और पाण्डुरोगका नाश करता है। शाखा एवं पत्रसहित प्रसारिणी (छुईमुई)-का तैल भी उक्त रोगमें लाभकर है। गिलोयका स्वरस, कल्क, चूर्ण या क्वाथ दीर्घकालतक सेवन करके रोगी वातरक्त-रोगसे छुटकारा पा जाता है। वर्धमान पिप्पली या गुड़के साथ हर्रैंका सेवन करना चाहिये। (यह भी वात-रक्तनाशक है।)

  • अध्याय २८५ * ५७७

पटोलपत्र, त्रिफला, राई, कुटकी और गिलोय— इनका पाक तैयार करके उसके सेवनसे दाहयुक्त वात-रक्तरोग शीघ्र नष्ट होता है। गुग्गुलको ठंडे- गरमजलसे और त्रिफलाको समशीतोष्ण जलसे, अथवा खरेटी, पुनर्नवा, एरण्डमूल, दोनों कटेरी, गोखरूका क्वाथ हींग तथा लवणके साथ लेनेपर वह वातजनित पीड़ाको शीघ्र ही दूर कर देता है। एक तोला पीपलामूल, सैन्धव, सौवर्चल, विड्, सामुद्र एवं औद्भिद—पाँचों नमक, पिप्पली, चित्ता, सोंठ, त्रिफला, निशोथ, वच, यवक्षार, सर्जक्षार, शीतला, दन्ती, स्वर्णक्षीरी (सत्यनाशी) और काकड़ासिंगी—इनकी बेरके समान गुटिका बनाये और काँजीके साथ उसका सेवन करे। शोथ तथा उससे हुए पाकमें भी इसका सेवन करे। उदरवृद्धिमें भी निशोथका प्रयोग विहित है। दारुहल्दी, पुनर्नवा तथा सोंठ—इनसे सिद्ध किया हुआ दुग्ध शोथनाशक है तथा मदार, गदहपूर्ना एवं चिरायताके क्वाथसे सेक (करनेपर) शोथका हरण होता है॥ ३२—५१॥

जो मनुष्य त्रिकटुयुक्त घृतको तिगुने पलाशभस्म- युक्त जलमें सिद्ध करके पीता है, उसका अर्शरोग निस्संदेह नष्ट हो जाता है। फूल प्रियङ्गु, कमल, सँभालू, वायविडङ्ग, चित्रक, सैन्धवलवण, रास्ना, दुग्ध, देवदारु और वचसे सिद्ध चौगुना कटुद्रव्ययुक्त तैल मर्दन करनेसे (या जलके साथ ही पीसकर लेप करनेसे) गलगण्ड और गण्डमाल-रोगोंका नाश हो जाता है॥ ५२—५४॥

कचूर, नागकेसर, कुमुदका पकाया हुआ क्वाथ तथा क्षीरविदारी, पीपल और अडूसाका कल्क दूधके साथ पकाकर लेनेसे क्षयरोगमें लाभ होता है॥ ५५॥

वचा, विड्लवण, अभया (बड़ी हर्रें), सोंठ, हींग, कूठ, चित्रक और अजवाइन—इनके क्रमशः दो, तीन, छः, चार, एक, सात, पाँच और चार भाग ग्रहण करके चूर्ण बनावे। वह चूर्ण गुल्मरोग, उदररोग, शूल और कासरोगको दूर करता है। पाठा, दन्तीमूल, त्रिकटु (सोंठ, मिर्च, पीपल), त्रिफला और चित्ता—इनका चूर्ण गोमूत्रके साथ पीसकर गुटिका बना ले। यह गुटिका गुल्म और प्लीहा आदिका नाश करनेवाली है। अडूसा, नीम और परवलके पत्तोंके चूर्णका त्रिफलाके साथ सेवन करनेपर वात-पित्त रोगोंका शमन होता है। वायविडङ्गका चूर्ण शहदके साथ लिया जाय तो वह कृमिनाशक है। विडङ्ग, सेंधानमक, यवक्षार एवं गोमूत्रके साथ ली गयी हर्रें भी (कृमिघ्न है)। शल्लकी (शालविशेष), बेर, जामुन, प्रियाल, आम्र और अर्जुन—इन वृक्षोंकी छालका चूर्ण मधुमें मिलाकर दूधके साथ लेनेसे रक्तातिसार दूर होता है। कच्चे बेलका सूखा गूदा, आमकी छाल, धायका फूल, पाठा, सोंठ और मोचरस (कदली स्वरस)—इन सबका समान भाग लेकर चूर्ण बना ले और गुड़मिश्रित तक्रके साथ पीये। इससे दुस्साध्य अतिसारका भी अवरोध हो जाता है। चाँगेरी, बेर, दहीका पानी, सोंठ और यवक्षार—इनका घृतसहित क्वाथ पीनेसे गुदभ्रंश रोग दूर होता है। वायबिडंग, अतीस, नागरमोथा, देवदारु, पाठा तथा इन्द्रयव—इनके क्वाथमें मिर्चका चूर्ण मिलाकर पीनेसे शोथयुक्त अतिसारका नाश होता है॥ ५६—६३॥

शर्करा, सैन्धव और सोंठके साथ अथवा पीपल, मधु एवं गुड़के सहित प्रतिदिन दो हर्रेंका भक्षण करे तो इससे मनुष्य सौ वर्ष (अधिक काल)-तक सुखपूर्वक जीवित रह सकता है। पिप्पलीयुक्त त्रिफला भी मधु और घृतके साथ प्रयोगमें लायी जानेपर वैसा ही फल देती है। आँवलेके स्वरससे भावित आँवलेके चूर्णको

५७८ * अग्निपुराण *


मधु, घृत तथा शर्कराके साथ चाटकर दुग्धपान करे। इससे मनुष्य स्त्रियोंका (प्रिय) प्रभु बन सकता है। उड़द, पीपल, अगहनीका चावल, जौ और गेहूँ—इन सबका चूर्ण समान मात्रामें लेकर घृतमें उसकी पूरी बना ले। उसका भोजन करके शर्करायुक्त मधुर दुग्धपान करे। निस्संदेह इस प्रयोगसे मनुष्य गौरैया पक्षीके समान दस बार स्त्री-सम्भोग करनेमें समर्थ हो सकता है। मजीठ, धायके फूल, लोध, नीलकमल—इनको दूधके साथ देना चाहिये। यह स्त्रियोंके प्रदररोगको दूर करता है। पीली कटसरैया, मुलहठी और श्वेतचन्दन—ये भी प्रदररोगनाशक हैं। श्वेतकमल और नीलकमलकी जड़ तथा मुलहठी, शर्करा और तिल—इनका चूर्ण गर्भपातकी आशङ्का होनेपर गर्भको स्थिर करनेमें उत्तम योग है। देवदारु, अभ्रक, कूठ, खस और सोंठ—इनको काँजीमें पीसकर तैल मिलाकर लेप करनेसे शिरोरोगका नाश करता है। सैन्धव-लवणको तैलमें सिद्ध करके छान ले। जब तैल थोड़ा गरम रह जाय तो उसको कानमें डालनेसे कर्णशूलका शमन होता है। लहसुन, अदरक, सहजन और केला—इनमेंसे प्रत्येकका रस (कर्णशूलहारी है।) बरियार, शतावरी, रास्ना, गिलोय, कटसरैया और त्रिफला—इनसे सिद्ध घृतका या इनके सहित घृतका पान तिमिररोगका नाश करनेमें परम उत्तम माना गया है। त्रिफला, त्रिकटु एवं सैन्धवलवण—इनसे सिद्ध किये हुए घृतका पान मनुष्यको करना चाहिये। यह चक्षुष्य (आँखोंके लिये हितकर), हृद्य (हृदयके लिये हितकर), विरेचक, दीपन और कफरोगनाशक है। गायके गोबरके रसके साथ नीलकमलके परागकी गुटिकाका अञ्जन दिनौंधी और रतौंधीके रोगियोंके लिये हितकर है। मुलहठी, बच, पिप्पली-बीज, कुरैयाकी छालका कल्क और नीमका क्वाथ घोट देनेसे वह वमनकारक होता है। खूब चिकना तथा रेड़ी-जैसे तैलसे स्निग्ध किया गया या पकाया हुआ यवका पानी विरेचक होता है। किंतु इसका अनुचित प्रयोग मन्दाग्नि, उदरमें भारीपन और अरुचिको उत्पन्न करता है। हर्रे, सैन्धवलवण और पीपल—इनके समान भागका चूर्ण गर्म जलके साथ ले। यह नाराज-संज्ञक चूर्ण सर्वरोगनाशक तथा विरेचक है॥ ६४–७८॥

महर्षि आत्रेयने मुनिजनोंके लिये जिन सिद्ध योगोंका वर्णन किया था, समस्त योगोंमें श्रेष्ठ उन सर्वरोगनाशक योगोंका ज्ञान सुश्रुतने प्राप्त किया॥ ७९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मृतसंजीवनीकारक सिद्ध योगोंका कथन' नामक दो सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८५॥


दो सौ छियासीवाँ अध्याय

मृत्युञ्जय योगोंका वर्णन

भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं— सुश्रुत! अब मैं मृत्युञ्जय-कल्पोंका वर्णन करता हूँ, जो आयु देनेवाले एवं सब रोगोंका मर्दन करनेवाले हैं। मधु, घृत, त्रिफला और गिलोयका सेवन करना चाहिये। यह रोगको नष्ट करनेवाली है तथा तीन सौ वर्षतककी आयु दे सकती है। चार तोले, दो तोले अथवा एक तोलेकी मात्रामें त्रिफलाका सेवन वही फल देता है। एक मासतक बिल्व-तैलका नस्य लेनेसे पाँच सौ वर्षकी आयु और कवित्व-शक्ति उपलब्ध होती है। भिलावा एवं

* अध्याय २८६ * ५७९

तिलका सेवन रोग, अपमृत्यु और वृद्धावस्थाको दूर करता है। वाकुचीके पञ्चाङ्गके चूर्णको खैर (कत्था)-के क्वाथके साथ छः मासतक प्रयोग करनेसे रोगी कुष्ठपर विजयी होता है। नीली कटसरैयाके चूर्णका मधु या दुग्धके साथ सेवन हितकर है। खाँडयुक्त दुग्धका पान करनेवाला सौ वर्षोंकी आयु प्राप्त करता है। प्रतिदिन प्रातःकाल मधु, घृत और सोंठका चार तोलेकी मात्रामें सेवन करनेवाला मनुष्य मृत्युविजयी होता है। ब्राह्मीके चूर्णके साथ दूधका सेवन करनेवाले मनुष्यके चेहरेपर झुर्रियाँ नहीं पड़ती हैं और उसके बाल नहीं पकते हैं; वह दीर्घजीवन लाभ करता है। मधुके साथ उच्चटा (भुईं आँवला)-को एक तोलेकी मात्रामें खाकर दुग्धपान करनेवाला मनुष्य मृत्युपर विजय पाता है। मधु, घी अथवा दूधके साथ मेउड़के रसका सेवन करनेवाला रोग एवं मृत्युको जीतता है। छः मासतक प्रतिदिन एक तोलेभर पलाश-तैलका मधुके साथ सेवन करके दुग्धपान करनेवाला पाँचे सौ वर्षोंकी आयु प्राप्त करता है। दुग्धके साथ काँगनीके पत्तोंके रसका या त्रिफलाका प्रयोग करे। इससे मनुष्य एक हजार वर्षोंकी आयु प्राप्त कर सकता है। इसी प्रकार मधुके साथ घृत और चार तोलेभर शतावरी-चूर्णका सेवन करनेसे भी सहस्रों वर्षोंकी आयु प्राप्त हो सकती है। घी अथवा दूधके साथ मेउड़की जड़का चूर्ण या पत्रस्वरस रोग एवं मृत्युका नाश करता है। नीमके पञ्चाङ्ग-चूर्णको खैरके क्वाथ (काढ़े)-की भावना देकर भृङ्गराजके रसके साथ एक तोलाभर सेवन करनेसे मनुष्य रोगको जीतकर अमर हो सकता है। रुदन्तिकाचूर्ण घृत और मधुके साथ सेवन करनेसे या केवल दुग्धाहारसे मनुष्य मृत्युको जीत लेता है। हरीतकीके चूर्णको भृङ्गराजरसकी भावना देकर एक तोलेकी मात्रामें घृत और मधुके साथ सेवन करनेवाला रोगमुक्त होकर तीन सौ वर्षोंकी आयु प्राप्त कर सकता है। गेठी, लोहचूर्ण, शतावरी समान भागसे भृङ्गराज-रस तथा घीके साथ एक तोला मात्रामें सेवन करनेसे मनुष्य पाँच सौ वर्षकी आयु प्राप्त करता है। लौहभस्म तथा शतावरीको भृङ्गराजके रसमें भावना देकर मधु एवं घीके साथ लेनेसे तीन सौ वर्षकी आयु प्राप्त होती है। ताम्राभस्म, गिलोय, शुद्ध गन्धक समान भाग घीकुँवारके रसमें घोटकर दो-दो रत्तीकी गोली बनाये। इसका घृतसे सेवन करनेसे मनुष्य पाँच सौ वर्षकी आयु प्राप्त करता है। असगन्ध, त्रिफला, चीनी, तैल और घृतमें सेवन करनेवाला सौ वर्षतक जीता है। गदहपूर्नाका चूर्ण एक पल मधु, घृत और दुग्धके साथ भक्षण करनेवाला भी शतायु होता है। अशोककी छालका एक पल चूर्ण मधु और घृतके साथ खाकर दुग्धपान करनेसे रोगनाश होता है। निम्बके तैलकी मधुसहित नस्य लेनेसे मनुष्य सौ वर्ष जीता है और उसके केश सदा काले रहते हैं। बहेड़ेके चूर्णको एक तोला मात्रामें शहद, घी और दूधसे पीनेवाला शतायु होता है। मधुरादिगणकी ओषधियों और हरीतकीको गुड़ और घृतके साथ खाकर दूधके सहित अन्न भोजन करनेवालोंके केश सदा काले रहते हैं तथा वह रोगरहित होकर पाँच सौ वर्षोंका जीवन प्राप्त करता है। एक मासतक सफेद पेठेके एक पल चूर्णको मधु, घृत और दूधके साथ सेवन करते हुए दुग्धान्नका भोजन करनेवाला नीरोग रहकर एक सहस्र वर्षकी आयुका उपभोग करता है। कमलगन्धका चूर्ण भाँगरके रसकी भावना देकर मधु और घृतके साथ लिया जाय तो वह सौ वर्षोंकी आयु प्रदान करता है। कड़वी तुम्बीके एक तोलेभर

५८० * अग्निपुराण *


तेलका नस्य दो सौ वर्षोंकी आयु प्रदान करता है। त्रिफला, पीपल और सोंठ—इनका प्रयोग तीन सौ वर्षोंकी आयु प्रदान करता है। इनका शतावरीके साथ सेवन अत्यन्त बलप्रद और सहस्र वर्षोंकी आयु प्रदान करनेवाला है। इनका चित्रकके साथ तथा सोंठके साथ विडंगका प्रयोग भी पूर्ववत् फलप्रद है। त्रिफला, पीपल और सोंठ—इनका लोह, भृङ्गराज, खरेटी, निम्ब-पञ्चाङ्ग, खैर, निर्गुण्डी, कटेरी, अडूसा और पुनर्नवाके साथ या इनके रसकी भावना देकर या इनके संयोगसे बटी या चूर्णका निर्माण करके उसका घृत, मधु, गुड़ और जलादि अनुपानोंके साथ सेवन करनेसे पूर्वोक्त फलकी प्राप्ति होती है। 'ॐ हूं स:'—इस मन्त्रसे* अभिमन्त्रित योगराज मृतसंजीवनीके समान होता है। उसके सेवनसे मनुष्य रोग और मृत्युपर विजय प्राप्त करता है। देवता, असुर और मुनियोंने इन कल्प-सागरोंका सेवन किया है॥ १—२३॥

गजायुर्वेदका वर्णन पालकाप्यने अङ्गराज (लोमपाद)-से किया था॥ २४॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मृत्युञ्जय-कल्प-कथन' नामक दो सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८६॥


दो सौ सत्तासीवाँ अध्याय

गज-चिकित्सा

**पालकाप्यने कहा—**लोमपाद! मैं तुम्हारे सम्मुख हाथियोंके लक्षण और चिकित्साका वर्णन करता हूँ। लम्बी सूँड़वाले, दीर्घ श्वास लेनेवाले, आघातको सहन करनेमें समर्थ, बीस या अठारह नखोंवाले एवं शीतकालमें मदकी धारा बहानेवाले हाथी प्रशस्त माने गये हैं। जिनका दाहिना दाँत उठा हो, गर्जना मेघके समान गम्भीर हो, जिनके कान विशाल हों तथा जो त्वचापर सूक्ष्म-बिन्दुओंसे चित्रित हों, ऐसे हाथियोंका संग्रह करना चाहिये; किंतु जो ह्रस्वाकार और लक्षणहीन हों, ऐसे हाथियोंका संग्रह कदापि नहीं करना चाहिये। पार्श्वगर्भिणी हस्तिनी और मूढ़ उन्मत्त हाथियोंको भी न रखे। वर्ण, सत्त्व, बल, रूप, कान्ति, शारीरिक संगठन एवं वेग—इस प्रकारके सात गुणोंसे युक्त गजराज सम्मुख युद्धमें शत्रुओंपर विजय प्राप्त करता है। गजराज ही शिबिर और सेनाकी परम शोभा हैं। राजाओंकी विजय हाथियोंके अधीन है॥ १—५$\frac{१}{२}$॥

हाथियोंके सभी प्रकारके ज्वरोंमें अनुवासन देना चाहिये। घृत और तैलके अभ्यङ्गके साथ स्नान वात-रोगको नष्ट करनेवाला है। राजाओंको हाथियोंके स्कन्धरोगोंमें पूर्ववत् अनुवासन देना चाहिये। द्विजश्रेष्ठ! पाण्डुरोगमें गोमूत्र, हरिद्रा और घृत दे। बद्धकोष्ठ (कब्जियत)-में तैलसे पूरे शरीरका मर्दन करके स्नान कराना या क्षरण कराना प्रशस्त है। हाथीको पञ्चलवण (कालानमक, सेंधानमक, संचर नोन, समुद्रलवण और काचलवण) युक्त वारुणी मदिराका पान करावे। मूर्च्छा-रोगमें हाथीको वायविडंग, त्रिफला, त्रिकटु और सैन्धव लवणके ग्रास बनाकर खिलाये तथा मधुयुक्त जल पिलाये। शिरश्शूलमें अभ्यङ्ग और नस्य प्रशस्त है। हाथियोंके पैरके रोगोंमें तैलयुक्त पोटलीसे मर्दनरूप चिकित्सा करे। तदनन्तर कल्क और कषायसे उनका शोधन करना


* 'ॐ हूं स:'—ऐसा पाठ ही प्रतियोंमें उपलब्ध है। परंतु मृत्युञ्जय मन्त्र 'ॐ जूं सः' ऐसा है।

* अध्याय २८७ * ५८१

चाहिये। जिस हाथीको कम्पन होता हो, उसको पीपल और मिर्च मिलाकर मोर, तीतर और बटेरके मांसके साथ भोजन करावे अतिसाररोगके शमनके लिये गजराजको नेत्रबाला, बेलका सूखा गूदा, लोध, धायके फूल और मिश्रीकी पिंडी बनाकर खिलावे। करग्रह (सूँडके रोग)-में लवणयुक्त घृतका नस्य देना चाहिये। उत्कर्णक-रोगमें पीपल, सोंठ, कालाजीरा और नागरमोथासे साधित यवागू एवं वाराहीकंदका रस दे। दशमूल, कुलथी, अम्लवेत और काकमाचीसे सिद्ध किया हुआ तैल मिर्चके साथ प्रयोग करनेसे गलग्रह-रोगका नाश होता है। मूत्रकृच्छ्र-रोगमें अष्टलवणयुक्त सुरा एवं घृतका पान करावे अथवा खीरेके बीजोंका क्वाथ दे। हाथीको चर्मदोषमें नीम या अडूसेका क्वाथ पिलावे। कृमियुक्त कोष्ठकी शुद्धिके लिये गोमूत्र और वायविडंग प्रशस्त हैं। सोंठ, पीपल, मुनक्का और शर्करासे श्रुत जलका पान क्षतदोषका क्षय करनेवाला है तथा मांस-रस भी लाभदायक है। अरुचिरोगमें सोंठ, मिर्च एवं पिप्पलीयुक्त मूँग-भात प्रशंसित है। निशोथ, त्रिकटु, चित्रक, दन्ती, आक, पीपल, दुग्ध और गजपीपल—इनसे सिद्ध किया हुआ स्नेह गुल्मरोगका अपहरण करता है। इसी प्रकार (गजचिकित्सक) भेदन, द्रावण, अभ्यङ्ग, स्नेहपान और अनुवासनके द्वारा सभी प्रकारके विद्रधिरोगोंका विनाश करे॥ ६—२१॥

हाथीके कटुरोगोंमें मूँगकी दाल या मूँगके साथ मुलहठी मिलावे और नेत्रबाला एवं बेलकी छालका लेप करे। सभी प्रकारके शूलोंका शमन करनेके लिये दिनके पूर्वभागमें इन्द्रयव, हींग, धूपसरल, दोनों हल्दी और दारुहल्दीकी पिंडी दे। हाथियोंके उत्तम भोजनमें साठी चावल, मध्यम भोजनमें जौ और गेहूँ एवं अधम भोजनमें अन्य भक्ष्य-पदार्थ माने गये हैं। जौ और ईख हाथियोंका बल बढ़ानेवाले हैं तथा सूखा तृण उनके धातुको प्रकुपित करनेवाला है। मदक्षीण हाथीको दुग्ध पिलाना प्रशस्त है तथा दीपनीय द्रव्योंसे पकाया हुआ मांभरस भी लाभप्रद है। गुग्गुल, गठिवन, करकोल्यादिगण और चन्दन—इनका मधुके साथ प्रयोग करे। इससे पिण्डोद्रेक-रोगका नाश होता है। कुटकी, मत्स्य, वायविडंग, लवण, कोशातकी (झिमनी)-का दूध और हल्दी—इनका धूप हाथियोंके लिये विजयप्रद है। पीपल और चावल तथा तेल, माध्वीक (महुआ या अङ्गुरके रससे निर्मित सुरा) तथा मधु—इनका नेत्रोंमें परिकेष दीपनीय माना गया है। गौरैया चिड़िया और कबूतरकी बीट, गूलर, सूखा गोबर एवं मदिरा—इनका मञ्जन हाथियोंको अत्यन्त प्रिय है। हाथीके नेत्रोंको इससे अञ्जित करनेपर वह संग्रामभूमिमें शत्रुओंको मसल डालता है। नीलकमल, नागरमोथा और तगर—इनको चावलके जलमें पीस ले। यह हाथियोंके नेत्रोंको परम शान्ति प्रदान करता है। नख बढ़नेपर उनके नख काटने चाहिये और प्रतिमास तैलका सेक करना चाहिये। हाथियोंका शयन-स्थान सूखे गोबर और धूलसे युक्त होना चाहिये। शरद् और ग्रीष्म-ऋतुमें इनके लिये घृतका सेक उपयुक्त है॥ २२—३३॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गज-चिकित्साका कथन' नामक दो सौ सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८७॥

५८२ * अग्निपुराण *

दो सौ अठासीवाँ अध्याय

अश्ववाहन-सार

भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं— सुश्रुत ! अब मैं अश्ववाहनका रहस्य और अश्वोंकी चिकित्साका वर्णन करूँगा। धर्म, कर्म और अर्थकी सिद्धिके लिये अश्वोंका संग्रह करना चाहिये। घोड़ेके ऊपर प्रथम बार सवारी करनेके लिये अश्विनी, श्रवण, हस्त, उत्तराषाढ़, उत्तरभाद्रपद और उत्तरफाल्गुनी नक्षत्र प्रशस्त माने गये हैं। घोड़ोंपर चढ़नेके लिये हेमन्त, शिशिर और वसन्त ऋतु उत्तम हैं। ग्रीष्म, शरद् एवं वर्षा ऋतुमें घुड़सवारी निषिद्ध है। घोड़ोंको तीखे और लचीले डंडोंसे न मारे। उनके मुखपर प्रहार न करे। जो मनुष्य घोड़ेके मनको नहीं समझता तथा उपायोंको जाने बिना ही उसपर सवारी करता है तथा घोड़ेको कीलों और अस्थियोंसे भरे हुए दुर्गम, कण्टकयुक्त, बालू और कीचड़से आच्छन्न पथपर, गड्ढों या उन्नत भूमियोंसे दूषित मार्गपर ले जाता है एवं पीठपर काठीके बिना ही बैठ जाता है, वह मूर्ख अश्वका ही वाहन बनता है, अर्थात् वह अश्वके अधीन होकर विपत्तिमें फँस जाता है। कोई बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सुकृती अश्ववाहक अश्वशास्त्रको पढ़े बिना भी केवल अभ्यास और अध्यवसायसे ही अश्वको अपना अभिप्राय समझा देता है। अथवा घोड़ेके अभिप्रायको समझकर दूसरोंको उसका ज्ञान करा देता है॥ १—६ $\frac{१}{२}$ ॥

अश्वको नहलाकर पूर्वाभिमुख खड़ा करे। फिर उसके शरीरमें आदिमें 'ॐ' और अन्तमें 'नमः' शब्द जोड़कर अपने बीजाक्षरसे युक्त मन्त्र बोलकर देवताओंकी क्रमशः योजना (न्यास या भावना) करे*। अश्वके चित्तमें ब्रह्मा, बलमें विष्णु, पराक्रममें गरुड, पार्श्वभागमें रुद्रगण, बुद्धिमें बृहस्पति, मर्मस्थानमें विश्वेदेव, नेत्रावर्त और नेत्रमें चन्द्रमा-सूर्य, कानोंमें अश्विनीकुमार, जठराग्निमें स्वधा, जिह्वामें सरस्वती, वेगमें पवन, पृष्ठभागमें स्वर्गपृष्ठ, खुराग्रमें समस्त पर्वत, रोमकूपोंमें नक्षत्रगण, हृदयमें चन्द्रकला, तेजमें अग्नि, श्रोणिदेशमें रति, ललाटमें जगत्पति, हेषित (हिनहिनाहट)-में नवग्रह एवं वक्षःस्थलमें वासुकिका न्यास करे। अश्वारोही उपवासपूर्वक अश्वकी अर्चना करे एवं उसके दक्षिण कर्णमें निम्नलिखित मन्त्रका जप करे— ॥ ७—१२ ॥

‘‘तुरंगम ! तुम गन्धर्वराज हो। मेरे वचनको सुनो। तुम गन्धर्वकुलमें उत्पन्न हुए हो। अपने कुलको दूषित न करना। अश्व ! ब्राह्मणोंके सत्यवचन, सोम, गरुड, रुद्र, वरुण और पवनके बल एवं अग्निके तेजसे युक्त अपनी जातिका स्मरण करो। याद करो कि ‘तुम राजेन्द्रपुत्र हो।’ सत्यवाक्यका स्मरण करो। वरुणकन्या वारुणी और कौस्तुभमणिको याद करो। जब दैत्यों और देवताओंद्धारा क्षीरसमुद्रका मन्थन हो रहा था, उस समय तुम देवकुलमें प्रादुर्भूत हुए थे। अपने वाक्यका पालन करो। तुम अश्ववंशमें उत्पन्न हुए हो। सदाके लिये मेरे मित्र बनो। मित्र ! तुम यह सुनो। मेरे लिये सिद्ध वाहन बनो। मेरी रक्षा करते हुए मेरी विजयकी रक्षा करो। समराङ्गणमें मेरे लिये तुम सिद्धिप्रद हो जाओ। पूर्वकालमें तुम्हारे पृष्ठभागपर आरूढ़ होकर देवताओंने दैत्योंका संहार किया था। आज मैं तुम्हारे ऊपर आरूढ़ होकर शत्रुसेनाओंपर विजय प्राप्त करूँगा’’ ॥ १३—१९ ॥

अश्वारोही वीर अश्वके कर्णमें उसका जप


* यथा ‘ॐ ब्रह्मणे नमः चित्ते’, ‘ॐ विं विष्णवे नमः बले।’ इत्यादि।

  • अध्याय २८८ * ५८३

करके शत्रुओंको मोहित करता हुआ अश्वको युद्धस्थलमें लाये और उसपर आरूढ़ हो युद्ध करते हुए विजय प्राप्त करे। श्रेष्ठ अश्वारोही घोड़ोंके शरीरसे उत्पन्न दोषोंको भी प्रायः यत्नपूर्वक नष्ट कर देते हैं तथा उनमें पुनः गुणोंका विकास करते हैं। श्रेष्ठ अश्वारोहियोंद्वारा अश्वमें उत्पादित गुण स्वाभाविक-से दीखने लगते हैं। कुछ अश्वारोही तो घोड़ोंके सहज गुणोंको भी नष्ट कर देते हैं। कोई अश्वोंके गुण और कोई उनके दोषोंको जानता है। वह बुद्धिमान् पुरुष धन्य है, जो अश्व-रहस्यको जानता है। मन्दबुद्धि मनुष्य उनके गुण-दोष दोनोंको ही नहीं जानता। जो कर्म और उपायसे अनभिज्ञ है, अश्वका वेगपूर्वक वाहन करनेमें प्रयत्नशील है, क्रोधी एवं छोटे अपराधपर कठोर दण्ड देता है, वह अश्वारोही कुशल होनेपर भी प्रशंसित नहीं होता है। जो अश्वारोही उपायका जानकार है, घोड़ेके चित्तको समझनेवाला है, विशुद्ध एवं अश्वदोषोंका नाश करनेवाला है, वह सम्पूर्ण कर्मोंमें निपुण सवार सदा गुणोंके उपार्जनमें लगा रहता है। उत्तम अश्वारोही अश्वको उसकी लगाम पकड़कर बाह्यभूमिमें ले जाय। वहाँ उसकी पीठपर बैठकर दायें-बायेंके भेदसे उसका संचालन करे। उत्तम घोड़ेपर चढ़कर सहसा उसपर कोड़ा नहीं लगाना चाहिये; क्योंकि वह ताड़नासे डर जाता है और भयभीत होनेसे उसको मोह भी हो जाता है। अश्वारोही प्रातःकाल अश्वको उसकी वल्गा (लगाम) उठाकर प्लुतगतिसे चलाये। संध्याकालमें यदि घोड़ेके पैरमें नाल न हो तो लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलाये, अधिक वेगसे न दौड़ाये ॥ २०-२८॥

ऊपर जो कानमें जपनेकी बात तथा अश्व-संचालनके सम्बन्धमें आवश्यक विधि कही गयी है, इससे अश्वको आश्वासन प्राप्त होता है, इसलिये उसके प्रति यह 'सामनीति' का प्रयोग हुआ। जब एक अश्व दूसरे अश्वके साथ (रथ आदिमें) नियोजित होता है, तो उसके प्रति यह 'भेद-नीति' का बर्ताव हुआ। कोड़े आदिसे अश्वको पीटना—यह उसके ऊपर 'दण्डनीति' का प्रयोग है। अश्वको अनुकूल बनानेके लिये जो काल-विलम्ब सहन किया जाता है या उसे चाल सीखनेका अवसर दिया जाता है, यह उस अश्वके प्रति 'दान-नीति' का प्रयोग समझना चाहिये ॥ २९ ॥

पूर्व-पूर्व नीतिकी शुद्धि (सफल उपयोग) हो जानेपर उत्तरोत्तर नीतिका प्रयोग करे। घोड़ेकी जिह्वाके नीचे बिना योगके ग्रन्थि बाँधे। अधिक-से-अधिक सौगुने सूतको बँटकर बनायी गयी वल्गा (लगामको) घोड़ेके दोनों गल्फरोंमें घुसा दे। फिर धीरे-धीरे वाहनको भुलावा देकर लगाम ढीली करे। जब घोड़ेकी जिह्वा आहीनावस्थाको प्राप्त हो, तब जिह्वातलकी ग्रन्थि खोल दे। जबतक अश्व स्तोभ (स्थिरता)-का त्याग न करे, तबतक गाढ़ताका मोचन करे—लगामको अधिक न कसे। उरस्त्राणको तबतक खूब कसा-कसा रखे, जबतक अश्व मुखसे लार गिराता रहे। जो स्वभावसे ही ऊपर मुँह किये रहे, उसी अश्वका उरस्त्राण खूब कसकर श्रेष्ठ घुड़सवार उसे अपनी दृष्टिके संकेतपर लीलापूर्वक चला सकता है ॥ ३०—३३ $\frac{१}{२}$ ॥

जो पहले घोड़ेके पिछले दायें पैरसे दाईं वल्गा संयोजित कर देता है, उसने उसके दायें पैरको काबूममें कर लिया। इसी क्रमसे जो बायीं वल्गासे घोड़ेके बायें पैरको संयुक्त कर देता है, उसने भी उसके वाम पैरपर नियन्त्रण पा लिया। यदि अगले पैर परित्यक्त हुए तो आसन सुदृढ़ होता है। जो पैर दुष्कर मोटनकर्ममें अपहृत हो गये, अथवा बायें पैरमें हीन अवस्था आ गयी, उस स्थितिका नाम 'नाटकायन' है। हनन और गुणन कर्मोंमें 'खलीकार' होता है। बारंबार मुख-व्यावर्तन अश्वका स्वभाव

५८४

  • अग्निपुराण *

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है। ये सब लक्षण उसके पैरोंपर नियन्त्रण पानेके कारणभूत नहीं हैं। जब देख ले कि घोड़ा पूर्णतः विश्वस्त हो गया है, तब आसनको जोरसे दबाकर अपना पैर उसके मुखसे अड़ा दे; ऐसा करके उसकी ग्राह्यताका अवलोकन हितकारी होता है। रानोंद्वारा जोरसे दबाकर लगाम खींचकर उसके बन्धनसे जो घोड़ेके दो पैरोंको गृहीत-आकर्षित किया जाता है, वह 'उद्वक्कन' कहलाता है। लगामसे घोड़ेके चारों पैरोंको संयुक्त कर उसे यथेष्ट ढीली करके बाह्य पाणिभागोंके प्रयोगसे जहाँ घोड़ेको मोड़ा जाता है, उसे 'मोट्टन' (या ताड़न) माना गया है ॥ ३४-४१॥

बुद्धिमान् घुड़सवार इस क्रमसे प्रलय तथा अविप्लवको जान ले। फिर चतुर्थ मोटन क्रियाद्वारा इस विधिका सम्पादन होता है। जो घोड़ा लघुमण्डलमें मोटन और उद्वक्कनद्वारा अपने पैरको भूमिपर नहीं रखता-भूमिस्पर्शके बिना ही चक्कर पूरा कर लेता है, वह सफल माना गया है; उसे इस प्रकारकी पादगति ग्रहण करानी-सिखानी चाहिये। आसनमें खूब कसकर निबद्ध करके जिसे शिक्षा दी जाती है, तथापि जो मन्दगतिसे ही चलता है, फिर संग्रहण करके (पकड़कर) जिसे अभीष्ट चाल ग्रहण करायी जाती है, उसकी उस शिक्षणक्रियाको 'संग्रहण' कहा गया है। जो घोड़ा स्थानमें स्थित होकर भी व्यग्रचित्त हो जाय और उसके पार्श्वभागमें ऐंड़ लगाकर लगाम खींचकर उसे कण्टकपान (लगामके लोहेका आस्वादन) कराया जाय तथा इस प्रकार पार्श्वभागमें किये गये इस पाद-प्रहारसे जो खलीकृत होकर चाल सीखे, उसका वह शिक्षण 'खलीकार' माना गया है। तीनों प्रकारकी गतियोंसे भी जो मनोवाञ्छित पैर (चाल) नहीं पकड़ पाता है, उस दशामें डंडेसे मारकर जहाँ वह पादग्रहण कराया जाता है, वह क्रिया 'हनन' कही गयी है ॥ ४२-४७॥

जब दूसरी वल्गा (लगाम)-के द्वारा चार बार खलीकृत करके अश्वको अन्यत्र ले जाकर उच्छ्वासित करके वह चाल ग्रहण करायी जाती है, तब उस क्रियाको 'उच्छ्वास' नाम दिया जाता है। स्वभावसे ही अश्व अपना मुख बाह्य दिशाकी ओर घुमा देता है। उसे यत्नपूर्वक उसी दिशाकी ओर मोड़कर, वहीं नियुक्त करके जब अश्वको वैसी गति ग्रहण करायी जाती है, तब इस यत्नको 'मुखव्यावर्तन' कहते हैं। क्रमशः तीनों ही गतियोंमें चलनेकी रीति ग्रहण कराकर फिर उसे मण्डल आदि पञ्चधाराओंमें चलनेका अभ्यास कराये। ऊपर उठे हुए मुखसे लेकर घुटनोंतक जब अश्व शिथिल हो जाय, तब उसे गतिकी शिक्षा देनेके लिये बुद्धिमान् पुरुष उसके ऊपर सवारी करे तथा जबतक उसके अङ्गोंमें हल्कापन या फुर्ती न आ जाय, तबतक उसे दौड़ाता रहे। जब घोड़ेकी गर्दन कोमल, मुख हलका और शरीरकी सारी संधियाँ शिथिल हो जायँ, तब वह सवारके वशमें होता है; उसी अवस्थामें अश्वका संग्रह करे। जब वह पिछला पाद (गति-ज्ञान) न छोड़े, तब वह साधु (अच्छा) अश्व होता है। उस समय दोनों हाथोंसे लगाम खींचे। लगाम खींचकर ऐसा कर दे, जिससे घोड़ा ऊपरकी ओर गर्दन उठाकर एक पैरसे खड़ा हो जाय। जब भूतलपर स्थित हुए पिछले दोनों पैर आकाशमें उठे हुए दोनों अग्रिम पैरोंके आश्रय बन जायँ, उस समय अश्वको मुट्ठीसे संधारण करे। सहसा इस प्रकार खींचनेपर जो घोड़ा खड़ा नहीं होता, शरीरको झकझोरने लगता है, तब उसको मण्डलाकार दौड़ाकर साधे-वशमें करे। जो घोड़ा कंधा कँपाने लगे, उसे लगामसे खींचकर