अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अध्याय २८९ * ५८५
खड़ा कर देना चाहिये ॥ ४८-५६ ॥
गोबर, नमक और गोमूत्रका क्वाथ बनाकर उसमें मिट्टी मिला दे और घोड़ेके शरीरपर उसका लेप करे। यह मक्खी आदिके काटनेकी पीड़ा तथा थकावटको दूर करनेवाला है। सवारको चाहिये कि वह 'भद्र' आदि जातिके घोड़ोंको माँड़ दे। इससे सूक्ष्म कीट आदिके दंशनका कष्ट दूर होता है। भूखके कारण घोड़ा उत्साहशून्य हो जाता है, अतः माँड़ देना इसमें भी लाभदायक है। घोड़ेको उतनी ही शिक्षा देनी चाहिये, जिससे वह वशीभूत हो जाय। अधिक सवारीमें जोते जानेपर घोड़े नष्ट हो जाते हैं। यदि सवारी ली ही न जाय तो वे सिद्ध नहीं होते। उनके मुखको ऊपरकी ओर रखते हुए ही उनपर सवारी करे। मुट्ठीको स्थिर रखते हुए दोनों घुटनोंसे दबाकर अश्वको आगे बढ़ाना चाहिये। गोमूत्राकृति, वक्रता, वेणी, पद्ममण्डल और मालिका—इन चिह्नोंसे युक्त अश्व 'पञ्चोलूखलिक' कहे गये हैं। ये कार्यमें अत्यन्त गर्वीले कहे गये हैं। इनके छः प्रकारके लक्षण बताये जाते हैं—संक्षिप्त, विक्षिप्त, कुञ्चित, आञ्चित, वल्गित और अवल्गित। गलीमें या सड़कपर सौ धनुषकी दूरीतक दौड़ानेपर 'भद्र' जातीय अश्व सुसाध्य होता है। 'मन्द' अस्सी धनुषतक और 'दण्डैकमानस' नब्बे धनुषतक चलाया जाय तो साध्य होता है। 'मृगजङ्घ्य' या मृगजातीय अश्व संकर होता है; वह इन्हींके समन्वयके अनुसार अस्सी या नब्बे धनुषकी दूरीतक हाँकनेपर साध्य होता है ॥ ५७-६३ ॥
शक्कर, मधु और लाजा (धानका लावा) खानेवाला ब्राह्मणजातीय अश्व पवित्र एवं सुगन्धयुक्त होता है, क्षत्रिय-अश्व तेजस्वी होता है, वैश्य-अश्व विनीत और बुद्धिमान् हुआ करता है और शूद्र-अश्व अपवित्र, चञ्चल, मन्द, कुरूप, बुद्धिहीन और दुष्ट होता है। लगामद्वारा पकड़ा जानेपर जो अश्व लार गिराने लगे, उसे रस्सी और लगाम खोलकर पानीकी धारासे नहलाना चाहिये। अब अश्वके लक्षण बताऊँगा, जैसा कि शालिहोत्रने कहा था ॥ ६४-६६ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अश्ववाहन-सार-वर्णन' नामक दो सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८८ ॥
दो सौ नवासीवाँ अध्याय
अश्व-चिकित्सा
शालिहोत्र कहते हैं— सुश्रुत ! अब मैं अश्वोंके लक्षण एवं चिकित्साका वर्णन करता हूँ। जो अश्व हीनदन्त, विषमदन्तयुक्त या बिना दाँतका, कराली (दोसे अधिक दन्तपङ्क्तियोंसे युक्त, कृष्णतालु, कृष्णवर्णकी जिह्वासे युक्त, युग्मज (जुड़वाँ पैदा), जन्मसे ही बिना अण्डकोषका, दो खुरोंवाला, शृङ्गयुक्त, तीन रङ्गोंवाला, व्याघ्रवर्ण, गर्दभवर्ण, भस्मवर्ण, सुवर्ण या अग्निवर्ण, ऊँचे ककुदवाला, श्वेतकुष्ठग्रस्त, कौवे जिसपर आक्रमण करते हों, जो खरसार* अथवा वानरके समान
* नकुलकृत अश्वशास्त्रमें 'खरसार' अश्वका वर्णन इस प्रकार है— नगरे राष्ट्रे निवसेद् यस्य विनश्यत्यसौ राजा। खरसारः खरवर्णस्तु मण्डलैयों भवेत्तथा हानैः ॥ 'गर्दभके समान वर्ण एवं उसीके समान रंगवाले आवतोंसे युक्त अश्व 'खरसार' कहलाता है। ऐसा अश्व जिस राजाके नगर या राष्ट्रमें निवास करता है, वह राजा नाशको प्राप्त होता है।'
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नेत्रोंवाला हो या जिसके अयाल, गुह्याङ्ग तथा नथुने कृष्णवर्णके हों, यवके टूँड़के समान कठोर केश हों, जो तीतरके समान रंगवाला हो, विषमाङ्ग हो, श्वेत चरणवाला हो तथा जो ध्रुव (स्थिर) आवर्तोंसे रहित हो तथा अशुभ आवर्तोंसे युक्त हो, ऐसे अश्वका परित्याग करना चाहिये॥ १–५॥
नाक तथा नाकके पास (ऊपर) दो-दो, मस्तक एवं वक्षःस्थलमें दो-दो तथा प्रयाण (पीठ और पिछले भाग), ललाट और कण्ठदेशमें (भी दो-दो)—इस प्रकार अश्वोंके दस आवर्त (भँवरी-चिह्न) शुभ माने गये हैं। ओष्ठ-प्रान्तमें, ललाटमें, कानके मूलमें, निगालक (गर्दन)-में, अगले पैरोंके ऊपर मूलमें तथा गलेमें स्थित आवर्त श्रेष्ठ कहे जाते हैं। शेष अङ्गोंके आवर्त अशुभ होते हैं। शुक, इन्द्रगोप (बीरबहूटी), एवं चन्द्रमाके समान कान्तिसे युक्त, काकवर्ण, सुवर्णवर्ण तथा चिकने घोड़े सदैव प्रशस्त माने जाते हैं। जिन राजाओंके पास लंबी ग्रीवावाले, भीतरकी ओर धँसी आँखवाले, छोटे कानवाले, किंतु देखनेमें मनोहर घोड़े हों, वहाँ विजयकी अभिलाषा छोड़ दे। घोड़े-हाथी यदि पाले जायँ तो शुभप्रद होते हैं; परंतु यदि उचित पालन न हो तो दुःखप्रद होते हैं। घोड़े लक्ष्मीके पुत्र, गन्धर्वरूपमें पृथ्वीके उत्तम रत्न हैं। अश्वमेधमें पवित्र होनेके कारण ही अश्वका उपयोग किया जाता है॥ ६–१०$\frac{१}{२}$॥
मधुके साथ अडूसा, नीमकी छाल, बड़ी कटेरी और गिलोय—इनकी पिण्डी तथा सिरका स्वेद—ये नासिकामलको नाश करनेवाले हैं। हींग, पीकरमूल, सोंठ, अम्लवेत, पीपल तथा सैन्धवलवण—ये गरम जलके साथ देनेपर शूलका नाश करते हैं। सोंठ, अतीस, मोथा, अनन्तमूल या दूब और बेल—इनका क्वाथ घोड़ेको पिलाया जाय तो वह उसके सभी प्रकारके अतिसारको नष्ट करता है। प्रियङ्गु, कालीसर तथा पर्याप्त शर्करासे युक्त बकरीका गरम किया हुआ दूध पी लेनेपर घोड़ेकी थकावट दूर हो जाती है। अश्वको द्रोणीमें तैलबस्ति देनी चाहिये अथवा कोष्ठमें उत्पन्न शिराओंका वेधन करना चाहिये। इससे उसको सुख प्राप्त होता है॥ ११–१५$\frac{१}{२}$॥
अनारकी छाल, त्रिफला, त्रिकटु तथा गुड़—इनको सम मात्रामें ग्रहण करके इनका पिण्ड बनाकर घोड़ेको दे। यह अश्वोंकी कृशताको दूर करनेवाला है। घोड़ा प्रियङ्गु, लोध्र तथा मधुके साथ अडूसेके रस या पञ्चकोलादि (पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता तथा सोंठ) युक्त दुग्धका पान करे तो वह कासरोगसे मुक्त हो जाता है। प्रस्कन्ध (छलाँग आदि दौड़)-से हुए सभी प्रकारके कष्टमें पहले शोधन श्रेयस्कर होता है। तदनन्तर अभ्यङ्ग, उद्वर्तन, स्नेहन, नस्य और वर्तिकाका प्रयोग श्रेष्ठ माना जाता है। ज्वरयुक्त अश्वोंकी दुग्धसे ही चिकित्सा करे। लोध्रमूल, करञ्जमूल, बिजौरा नीबू, चित्रक, सोंठ, कूट, वच एवं रास्ना—इनका लेप शोथ, (सूजन)-का नाश करनेवाला है। घोड़ेको निराहार रखकर मजीठ, मुलहठी, मुनक्का, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी, लाल चन्दन, खीरेके मूल और बीज, सिंघाड़ेके बीज और कसेरू—इनसे युक्त बकरीका दूध पकाकर अत्यन्त शीतल करके शक्करके साथ पिलानेसे वह घोड़ा रक्तप्रमेहसे छुटकारा पाता है॥ १६–२२॥
मन्या, ठुड्डी तथा ग्रीवाकी शिराओंके शोथ तथा गलग्रहरोगमें उन-उन स्थानोंपर कटुतैलका अभ्यङ्ग प्रशस्त है। गलग्रहरोग और शोथ प्रायः गलदेशमें ही होते हैं। चिरचिरा, चित्रक, सैन्धव तथा सुगन्ध घासका रस, पीपल और हींगके साथ इनका नस्य देनेसे अश्व कभी विषादयुक्त
- अध्याय २८९ * ५८७
नहीं होता है। हल्दी, दारुहल्दी, मालकाँगनी, पाठा, पीपल, कूट, बच तथा मधु—इनका गुड़ एवं गोमूत्रके साथ जिह्वापर लेप जिह्वास्तम्भमें हितकर है। तिल, मुलहठी, हल्दी और नीमके पत्तोंसे निर्मित पिण्डी मधुके साथ प्रयोग करनेपर व्रणका शोधन और घृतके साथ प्रयुक्त होनेपर घावको भरती है। जो घोड़े अधिक चोटके कारण तीव्र वेदनासे युक्त होकर लँगड़ाने लगते हैं, उनके लिये तैलसे परिषेक-क्रिया शीघ्र ही रोगनाश करनेवाली होती है। वात, पित्त, कफ दोषोंके द्वारा अथवा क्रोधके कारण चोट पा जानेसे पके, फूटे स्थानोंके व्रणके लिये यह क्रम है। पीपल, गूलर, पाकर, मुलहठी, बट और बेल—इनका अत्यधिक जलमें सिद्ध क्वाथ थोड़ा गरम हो तो वह व्रणका शोधन करनेवाला है। सौंफ, सोंठ, रास्ना, मजीठ, कूट, सैन्धव, देवदारु, वच, हल्दी, दारुहल्दी, रक्तचन्दन—इनका स्नेह क्वाथ करके गिलोयके जलके साथ या दूधके साथ उद्वर्तन, बस्ति अथवा नस्यरूपमें प्रयोग सभी लिङ्गित दोषोंमें करना चाहिये। नेत्ररोगयुक्त अश्वके नेत्रान्तमें जोंकद्वारा अभिस्रावण कराना चाहिये। खैर, गूलर और पीपलकी छालके क्वाथसे नेत्रोंका शोधन होता है॥ २३—३२ १/२ ॥
युक्तावलम्बी अश्वके लिये आँवला, जवासा, पाठा, प्रियङ्गु, कुङ्कुम और गिलोय—इनका समभाग ग्रहण करके निर्मित किया हुआ कल्क हितकर है। कर्णसम्बन्धी दोषमें एवं उपद्रवमें, शिल (अनियमित वृत्ति)—में, शुष्क-शेपमें (लिङ्ग सूखनेकी दशामें) और शीघ्र (हानि) करनेवाले दोषमें तत्काल वेधन करना चाहिये। गायका गोबर, मजीठ, कूट, हल्दी, तिल और सरसों—इनको गोमूत्रमें पीसकर मर्दन करनेसे खुजलीका नाश होता है। शालकी छालका क्वाथ शीतल हो जानेपर मधु और शर्करासहित नासिकामें डालनेसे एवं उसी प्रकार पिलानेसे घोड़ेका रक्तपित्त नष्ट होता है। घोड़ोंको सातवें-सातवें दिन नमक देना चाहिये॥ ३३—३७॥
अश्वोंके अधिक भोजन हो जानेपर वारुणी (मदिरा), शरद् ऋतुमें जीवनीगण*के द्रव्य (जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्गपर्णी (वनमूँग), माषपर्णी (वनउरद), जीवन्ती तथा मुलहठी), मधु, दाख, शक्कर, पिपली और पद्माखसहित प्रतिपानमें देना चाहिये। हेमन्त ऋतुमें अश्वोंको वायबिडंग, पीपल, धनियाँ, सौंफ, लोध, सैन्धवलवण और चित्रकसे समन्वित प्रतिपान देना चाहिये। वसन्त ऋतुमें लोध, प्रियङ्गु, मोथा, पीपल, सोंठ और मधुसे युक्त प्रतिपान कफनाशक माना गया है। ग्रीष्म ऋतुमें प्रतिपानके लिये प्रियङ्गु, पीपल, लोध, मुलहठी, सोंठ और गुड़के सहित मदिरा दे। वर्षा ऋतुमें अश्वोंके लिये प्रतिपान तैल, लोध, लवण, पीपल और सोंठसे समन्वित होना चाहिये। ग्रीष्म ऋतुमें बढ़े हुए पित्तके प्रकोपसे पीड़ित, शरत्कालमें रक्तघनत्वसे युक्त अश्वको एवं प्रावृट् (वर्षाके प्रारम्भ)—में जिन घोड़ोंका गोबर फूट गया है, उन्हें घृत पिलाना चाहिये। कफ एवं वातकी अधिकता होनेपर अश्वोंको तैलपान कराना चाहिये। जिनके शरीरमें स्नेहतत्त्वके प्राबल्यसे कोई कष्ट उत्पन्न हो, उनका रूक्षण करना चाहिये। मट्ठाके साथ भोजन तथा तीन दिनतक यवागू पिलानेसे अश्वोंका रूक्षण होता है। अश्वोंके बस्तिकर्मके लिये शरद्-ग्रीष्ममें घृत,
* जीवकर्षभको मेदा महामेदा काकोली क्षीरकाकोली मुद्गपर्णी माषपर्णी जीवन्ती मधुकमिति दशेमानि जीवनीयानि भवन्ति।
(च० सं०, सू० स्था० ४ अ०)
५८८ * अग्निपुराण *
हेमन्त-वसन्तमें तैल तथा वर्षा एवं शिशिर ऋतुओंमें घृत-तैल दोनोंका प्रयोग करना चाहिये। जिन घोड़ोंको स्नेह (तैल-घृतादि) पान कराया गया है, उनके लिये (गुरु-भारी) या अभिष्यन्दी (कफकारक) भोजन—भात आदि, व्यायाम, स्नान, धूप तथा वायुरहित स्थान वर्जित हैं। वर्षा ऋतुमें घोड़ेको दिनमें एक बार स्नान और पान कराये, किंतु घोर दुर्दिनके समय केवल पान ही प्रशस्त है। समशीतोष्ण ऋतुमें दो बार और एक बार स्नान विहित है। ग्रीष्म ऋतुमें तीन बार स्नान और प्रतिपान उचित होता है। पूर्णजलमें बहुत देरतक स्नान कराना चाहिये॥ ३८—४९॥
घोड़ेको प्रतिदिन चार आढक भूसासे रहित जौ खिलावे। उसको चना, धान, मूँग या मटर भी खानेको दे। अश्वको (एक) दिन-रातमें पाँच सेर दूब खिलावे। सूखी दूब होनेपर आठ सेर अथवा भूसा हो तो चार सेर देना चाहिये। दूर्वा पित्तका, जौ कासका, भूसी कफाधिक्यका, अर्जुन श्वासका एवं मानकन्द बलक्षयका नाश करता है। दूर्वाभोजी अश्वको कफज, वातज, पित्तज और संनिपातज रोग पीड़ित नहीं कर सकते। दुष्ट घोड़ोंके आगे-पीछे दोनों ओर दो रज्जुबन्धन करने चाहिये। गर्दनमें भी बन्धन करना चाहिये। घोड़े आस्तरणयुक्त और धूपित स्थानमें बसाने चाहिये। जहाँ कि उपायपूर्वक घासें रखी हों। (वह अश्वशाला) प्रदीपसे आलोकित तथा सुरक्षित होनी चाहिये। घुड़सालमें मयूर, अज, वानर और मृगोंको रखना चाहिये॥ ५०—५६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अश्व-चिकित्साका कथन' नामक दो सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८९॥
दो सौ नब्बेवाँ अध्याय
अश्व-शान्ति
शालिहोत्र कहते हैं—सुश्रुत! अब मैं घोड़ोंके रोगोंका मर्दन करनेवाली 'अश्वशान्ति' का वर्णन करूँगा; जो नित्य, नैमित्तिक और काम्यके भेदसे तीन प्रकारकी मानी गयी है; इसे सुनो। किसी शुभ दिनको श्रीधर (विष्णु), श्री (लक्ष्मी) तथा उच्चैःश्रवाके पुत्र हयराजकी पूजा करके सविता-देवता-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा घीका हवन करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। इससे अश्वोंकी वृद्धि होती है। (शुभ दिनसे आरम्भ करके इस कर्मको प्रतिदिन चालू रखा जाय तो यह 'नित्य अश्व-शान्ति' है) ॥ १—२ $\frac{१}{२}$ ॥
(अश्व-समृद्धिकी कामनासे) आश्विनके शुक्लपक्षकी पूर्णिमाको नगरके बाह्यदेशमें शान्ति-कर्म करे। उसमें विशेषतः अश्विनीकुमारों तथा वरुण-देवताका पूजन करे। तत्पश्चात् श्रीदेवीको वेदीपर पद्मासनके ऊपर अङ्कित करके उन्हें चारों ओरसे वृक्षकी शाखाओंद्वारा आवृत कर दे। उनकी सभी दिशाओंमें समस्त रसोंसे परिपूर्ण कलशोंको वस्त्रसहित स्थापित करे। इसके बाद श्रीदेवीका पूजन करके उनकी प्रसन्नताके लिये जौ और घीका हवन करे। फिर अश्विनीकुमारों और अश्वोंकी अर्चना करे तथा ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। (यह काम्य शान्ति हुई)। अब नैमित्तिक शान्तिका वर्णन सुनो॥ ३—५ $\frac{१}{२}$ ॥
मकर आदिकी संक्रान्तियोंमें अश्वोंका पूजन करे। साथ ही कमलपुष्पोंद्वारा विष्णु, लक्ष्मी, ब्रह्मा, शंकर, चन्द्रमा, सूर्य, अश्विनीकुमार, रेवन्त तथा उच्चैःश्रवाकी अर्चना करे। इसके
- अध्याय २९१ * ५८९
सिवा कमलके दस दलोंपर दस दिक्पालोंकी भी पूजा करे। प्रत्येक अर्चनीय देवताके निमित्त वेदीपर जलपूर्ण कलश स्थापित करे और उन कलशोंमें अधिष्ठित देवोंकी पूजा करे। इन देवताओंके उत्तरभागमें इन सबके निमित्त तिल, अक्षत, घी और पीली सरसोंकी आहुतियाँ दे। एक-एक देवताके निमित्त सौ-सौ आहुतियाँ देनी चाहिये। अश्वसम्बन्धी रोगोंके निवारणके लिये उपवासपूर्वक यह शान्तिकर्म करना उचित है॥ ६-८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अश्व-शान्तिका कथन' नामक दो सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९०॥
दो सौ इक्यान्बेवाँ अध्याय
गज-शान्ति
शालिहोत्र कहते हैं—मैं गजरोगोंका प्रशमन करनेवाली गज-शान्तिके विषयमें कहूँगा। किसी भी शुक्ला पञ्चमीको विष्णु, लक्ष्मी तथा नागराज ऐरावतकी पूजा करे। फिर ब्रह्मा, शिव, विष्णु, इन्द्र, कुबेर, यमराज, चन्द्रमा, सूर्य, वरुण, वायु, अग्नि, पृथिवी, आकाश, शेषनाग, पर्वत, विरूपाक्ष, महापद्म, भद्र, सुमनस और देवजातीय आठ हाथियोंका पूजन करे। उन आठ नागोंके नाम ये हैं—कुमुद, ऐरावत, पद्म, पुष्पदन्त, वामन, सुप्रतीक, अञ्जन और नील। तत्पश्चात् होम करे और दक्षिणा दे। शान्ति-कलशके जलसे हाथियोंका अभिषेक किया जाय तो वे वृद्धिको प्राप्त होते हैं। (यह नित्य विधि है) अब नैमित्तिक शान्तिकर्मके विषयमें सुनो॥ १-४$\frac{१}{२}$॥
मकर आदिकी संक्रान्तियोंमें हाथियोंका नगरके बहिर्भागमें ईशानकोणमें (पूजन करे)। वेदी या पद्मासनपर अष्टदल कमलका निर्माण करके उसमें केसरके स्थानपर श्रीविष्णु और लक्ष्मीकी अर्चना करे। तदनन्तर अष्टदलोंमें क्रमशः ब्रह्मा, सूर्य, पृथ्वी, स्कन्द, अनन्त, आकाश, शिव तथा चन्द्रमाकी पूजा करे। उन्हीं आठ दलोंमें पूर्वाधिके क्रमसे इन्द्रादि दिक्पालोंका भी पूजन करे। देवताओंके साथ कमलदलोंमें उनके वज्र, शक्ति, दण्ड, तोमर, पाश, गदा, शूल और पद्म आदि अस्त्रोंकी अर्चना करनी चाहिये। दलोंके बाह्यभागमें चक्रमें सूर्य और अश्विनीकुमारोंकी पूजा करे। अष्टवसुओं एवं साध्यदेवोंका दक्षिणभागमें तथा भार्गवाङ्गिरस देवताओंका नैर्ऋत्यकोणमें यजन करे। वायव्यकोणमें मरुद्गणोंका, दक्षिणभागमें विश्वेदेवोंका एवं रौद्रमण्डल (ईशान)-में रुद्रोंका पूजन करना चाहिये। वृत्तरेखाके द्वारा निर्मित अष्टदल कमलके बहिर्भागमें सरस्वती, सूत्रकार और देवर्षियोंकी अर्चना करे। पूर्वभागमें नदी, पर्वतों एवं ईशान आदि कोणोंमें महाभूतोंकी पूजा करे। तदनन्तर पद्म, चक्र, गदा तथा शङ्खसे सुशोभित चतुष्कोण एवं चतुर्द्वारयुक्त भूपुरमण्डलका निर्माण करके आग्नेय आदि कोणोंमें कलशोंकी भी स्थापना करे तथा चारों ओर पताकाओं और तोरणोंका निवेश करे। सभी द्वारोंपर ऐरावत आदि नागराजोंका पूजन करे। पूर्वादि दिशाओंमें समस्त देवताओंके लिये पृथक्-पृथक् सर्वौषधियुक्त पात्र रखे। हाथियोंका पूजन करके उनकी परिक्रमा करे। सभी देवताओंके उद्देश्यसे पृथक्-पृथक् सौ-सौ आहुतियाँ प्रदान करे। तदनन्तर नागराज, अग्नि और देवताओंको साथ लेकर बाजे बजाते हुए अपने घरोंको लौटना चाहिये। ब्राह्मणों एवं
५९० * अग्निपुराण *
गज-चिकित्सक आदिको दक्षिणा देनी चाहिये। तत्पश्चात् कालज्ञ विद्वान् गजराजपर आरूढ़ होकर उसके कानमें निम्नाङ्कित मन्त्र कहे। उस नागराजके मृत्युको प्राप्त होनेपर शान्ति करके दूसरे हाथीके कानमें मन्त्रका जप करे—॥५—१५॥
''महाराजने तुमको 'श्रीगज' के पदपर नियुक्त किया है। अबसे तुम इस राजाके लिये 'गजाग्रणी' (गजोंके अगुआ) हो। ये नरेश आजसे गन्ध, माल्य एवं उत्तम अक्षतोंद्वारा तुम्हारा पूजन करेंगे। उनकी आज्ञासे प्रजाजन भी सदा तुम्हारा अर्चन करेंगे। तुमको युद्धभूमि, मार्ग एवं गृहमें महाराजकी सदा रक्षा करनी चाहिये। नागराज! तिर्यग्भाव (टेढ़ापन)-को छोड़कर अपने दिव्यभावका स्मरण करो। पूर्वकालमें देवासुर-संग्राममें देवताओंने ऐरावतपुत्र श्रीमान् अरिष्ट नागको 'श्रीगज' का पद प्रदान किया था। श्रीगजका वह सम्पूर्ण तेज तुम्हारे शरीरमें प्रतिष्ठित है। नागेन्द्र! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारा अन्तर्निहित दिव्यभावसम्पन्न तेज उद्बुद्ध हो उठे। तुम रणाङ्गणमें राजाकी रक्षा करो''॥ १६—२०॥
राजा पूर्वोक्त अभिषिक्त गजराजपर शुभ मुहूर्तमें आरोहण करे। शस्त्रधारी श्रेष्ठ वीर उसका अनुगमन करें। राजा हस्तिशालामें भूमिपर अङ्कित कमलके बहिर्भागमें दिक्पालोंका पूजन करे। केसरके स्थानपर महाबली नागराज, भूदेवी और सरस्वतीका यजन करे। मध्यभागमें गन्ध, पुष्प और चन्दनसे डिण्डिमकी पूजा एवं हवन करके ब्राह्मणोंको रसपूर्ण कलश प्रदान करे। पुनः गजाध्यक्ष, गजरक्षक और ज्योतिषीका सत्कार करे। तदनन्तर, डिण्डिम गजाध्यक्षको प्रदान करे। वह भी इसको बजावे। गजाध्यक्ष नागराजके जघनप्रदेशपर आरूढ़ होकर शुभ एवं गम्भीर स्वरमें डिण्डिमवादन करे॥ २१—२४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गज-शान्तिका कथन' नामक दो सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९१॥
दो सौ बानबेवाँ अध्याय
गवायुर्वेद
धन्वन्तरि कहते हैं—सुश्रुत! राजाको गौओं और ब्राह्मणोंका पालन करना चाहिये। अब मैं 'गोशान्ति' का वर्णन करता हूँ। गौएँ पवित्र एवं मङ्गलमयी हैं। गौओंमें सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है। गौओंका गोबर और मूत्र अलक्ष्मी (दरिद्रता)-के नाशका सर्वोत्तम साधन है। उनके शरीरको खुजलाना, सींगोंको सहलाना और उनको जल पिलाना भी अलक्ष्मीका निवारण करनेवाला है। गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध, दधि, घृत और कुशोदक—यह 'षडङ्ग' (पञ्चगव्य) पीनेके लिये उत्कृष्ट वस्तु तथा दुःस्वप्नों आदिका निवारण करनेवाला है। गोरोचना विष और राक्षसोंको विनाश करती है। गौओंको ग्रास देनेवाला स्वर्गको प्राप्त होता है। जिसके घरमें गौएँ दुःखित होकर निवास करती हैं, वह मनुष्य नरकगामी होता है। दूसरेकी गायको ग्रास देनेवाला स्वर्गको और गोहितमें तत्पर ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। गोदान, गो-माहात्म्य-कीर्तन और गोरक्षणसे मानव अपने कुलका उद्धार कर देता है। यह पृथ्वी गौओंके श्वाससे पवित्र होती है। उनके स्पर्शसे पापोंका क्षय होता है। एक दिन गोमूत्र, गोमय, घृत, दूध, दधि और कुशका जल एवं एक दिन उपवास चाण्डालको
- अध्याय २९२ * ५९१
भी शुद्ध कर देता है। पूर्वकालमें देवताओंने भी समस्त पापोंके विनाशके लिये इसका अनुष्ठान किया था। इनमेंसे प्रत्येक वस्तुका क्रमशः तीन-तीन दिन भक्षण करके रहा जाय, उसे 'महासान्तपन व्रत' कहते हैं। यह व्रत सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाला और समस्त पापोंका विनाश करनेवाला है। केवल दूध पीकर इक्कीस दिन रहनेसे 'कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत' होता है। इसके अनुष्ठानसे श्रेष्ठ मानव सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्तकर पापमुक्त हो स्वर्गलोकमें जाते हैं। तीन दिन गरम गोमूत्र, तीन दिन गरम घृत, तीन दिन गरम दूध और तीन दिन गरम वायु पीकर रहे। यह 'तप्तकृच्छ्र व्रत' कहलाता है, जो समस्त पापोंका प्रशमन करनेवाला और ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाला है। यदि इन वस्तुओंको इसी क्रमसे शीतल करके ग्रहण किया जाय, तो ब्रह्माजीके द्वारा कथित 'शीतकृच्छ्र' होता है, जो ब्रह्मलोकप्रद है॥ १–११॥
एक मासतक गोव्रती होकर गोमूत्रसे प्रतिदिन स्नान करे, गोरससे जीवन चलावे, गौओंका अनुगमन करे और गौओंके भोजन करनेके बाद भोजन करे। इससे मनुष्य निष्पाप होकर गोलोकको प्राप्त करता है। गोमती विद्याके जपसे भी उत्तम गोलोककी प्राप्ति होती है। उस लोकमें मानव विमानमें अप्सराओंके द्वारा नृत्य-गीतसे सेवित होकर प्रमुदित होता है। गौएँ सदा सुरभीरूपिणी हैं। वे गुग्गुलके समान गन्धसे संयुक्त हैं। गौएँ समस्त प्राणियोंकी प्रतिष्ठा हैं। गौएँ परम मङ्गलमयी हैं। गौएँ परम अन्न और देवताओंके लिये उत्तम हविष्य हैं। वे सम्पूर्ण प्राणियोंको पवित्र करनेवाले दुग्ध और गोमूत्रका वहन एवं क्षरण करती हैं और मन्त्रपूत हविष्यसे स्वर्गमें स्थित देवताओंको तृप्त करती हैं। ऋषियोंके अग्निहोत्रमें गौएँ होमकार्यमें प्रयुक्त होती हैं। गौएँ सम्पूर्ण मनुष्योंकी उत्तम शरण हैं। गौएँ परम पवित्र, महामङ्गलमयी, स्वर्गकी सोपानभूत, धन्य और सनातन (नित्य) हैं। श्रीमती सुरभि-पुत्री गौओंको नमस्कार है। ब्रह्मसुताओंको नमस्कार है। पवित्र गौओंको बारंबार नमस्कार है। ब्राह्मण और गौएँ—एक ही कुलकी दो शाखाएँ हैं। एकके आश्रयमें मन्त्रकी स्थिति है और दूसरीमें हविष्य प्रतिष्ठित है। देवता, ब्राह्मण, गौ, साधु और साध्वी स्त्रियोंके बलपर यह सारा संसार टिका हुआ है, इसीसे वे परम पूजनीय हैं। गौएँ जिस स्थानपर जल पीती हैं, वह स्थान तीर्थ है। गङ्गा आदि पवित्र नदियाँ गोस्वरूपा ही हैं। सुश्रुत! मैंने यह गौओंके माहात्म्यका वर्णन किया; अब उनकी चिकित्सा सुनो॥ १२–२२॥
गौओंके शृङ्गरोगोंमें सोंठ, खरेटी और जटामांसीको सिलपर पीसकर उसमें मधु, सैन्धव और तैल मिलाकर प्रयोग करे। सभी प्रकारके कर्णरोगोंमें मञ्जिष्ठा, हींग और सैन्धव डालकर सिद्ध किया हुआ तैल प्रयोग करना चाहिये या लहसुनके साथ पकाया हुआ तैल प्रयोग करना चाहिये। दन्तशूलमें बिल्वमूल, अपामार्ग, धानकी पाटला और कुटजका लेप करे। वह शूलनाशक है। दन्तशूलका हरण करनेवाले द्रव्यों और कूटको घृतमें पकाकर देनेसे मुखरोगोंका निवारण होता है। जिह्वा-रोगोंमें सैन्धव लवण प्रशस्त है। गलग्रह-रोगमें सोंठ, हल्दी, दारुहल्दी और त्रिफला विहित है। हृद्रोग, वस्तिरोग, वातरोग और क्षयरोगमें गौओंको घृतमिश्रित त्रिफलाका अनुपान प्रशस्त बताया गया है। अतिसारमें हल्दी, दारुहल्दी और पाठा (नेमुक) दिलाना चाहिये। सभी प्रकारके कोष्ठगत* रोगोंमें, शाखा (पैर-पुच्छादि)-गत रोगोंमें एवं कास, श्वास एवं अन्य साधारण रोगोंमें सोंठ, भारङ्गी देनी चाहिये। हड्डी आदि टूटनेपर लवणयुक्त
* स्थानान्यामाग्निपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च। हृदुण्डकः फुफ्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते॥ (सु० चि० अ० २)
५९२ * अग्निपुराण *
प्रियङ्गुका लेप करना चाहिये। तैल वातरोगका हरण करता है। पित्तरोगमें तैलमें पकायी हुई मुलहठी, कफरोगमें मधुसहित त्रिकटु (सोंठ, मिर्च और पीपल) तथा रक्तविकारमें मजबूत नखोंका भस्म हितकर है। भग्नक्षतमें तैल एवं घृतमें पकाया हुआ हरताल दे। उड़द, तिल, गेहूँ, दुग्ध, जल और घृत—इनका लवणयुक्त पिण्ड गोवत्सोंके लिये पुष्टिप्रद है। विषाणी बल प्रदान करनेवाली है। ग्रहबाधाके विनाशके लिये धूपका प्रयोग करना चाहिये। देवदारु, वचा, जटामांसी, गुग्गुल, हिंगु और सर्षप—इनकी धूप गौओंके ग्रहजनित रोगोंका नाश करनेमें हितकर है। इस धूपसे धूपित करके गौओंके गलेमें घण्टा बाँधना चाहिये। असगन्ध और तिलोंके साथ नवनीतका भक्षण करानेसे गौ दुग्धवती होती है। जो वृष घरमें मदोन्मत्त हो जाता है, उसके लिये हिङ्गु परम रसायन है॥ २३—३५॥
पञ्चमी तिथिको सदा शान्तिके निमित्त गोमयपर भगवान् लक्ष्मी-नारायणका पूजन करे। यह 'अपरा शान्ति' कही गयी है। आश्विनके शुक्लपक्षकी पूर्णिमाको श्रीहरिका पूजन करे। श्रीविष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, सूर्य, अग्नि और लक्ष्मीका घृतसे पूजन करे। दही भलीभाँति खाकर गोपूजन करके अग्निकी प्रदक्षिणा करे। गृहके बहिर्भागमें गीत और वाद्यकी ध्वनिके साथ वृषभयुद्धका आयोजन करे। गौओंको लवण और ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। मकरसंक्रान्ति आदि नैमित्तिक पर्वोंपर भी लक्ष्मीसहित श्रीविष्णुको भूमिस्थ कमलके मध्यमें और पूर्व आदि दिशाओंमें कमल-केसरपर देवताओंकी पूजा करे। कमलके बहिर्भागमें मङ्गलमय ब्रह्मा, सूर्य, बहुरूप, बलि, आकाश, विश्वरूपका तथा ऋद्धि, सिद्धि, शान्ति और रोहिणी आदि दिग्धेनु, चन्द्रमा और शिवका कृशर (खिचड़ी)-से पूजन करे। दिक्पालोंकी कलशस्थ पद्मपत्रपर अर्चना करे। फिर अग्निमें सर्षप, अक्षत, तण्डुल और खैर-वृक्षकी समिधाओंका हवन करे। ब्राह्मणको सौ-सौ भर सुवर्ण और काँस्य आदि धातु दान करे। फिर क्षीरसंयुक्त गौओंकी पूजा करके उन्हें शान्तिके निमित्त छोड़े॥ ३६—४३॥
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! शालिहोत्रने सुश्रुतको 'अश्वायुर्वेद' और पालकाप्यने अङ्गराजको 'गवायुर्वेद'का उपदेश किया था॥ ४४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गवायुर्वेदका कथन' नामक दो सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९२॥
दो सौ तिरानबेवाँ अध्याय
मन्त्र-विद्या
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! अब मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली मन्त्र-विद्याका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर उसका श्रवण कीजिये। द्विजश्रेष्ठ! बीससे अधिक अक्षरोंवाले मन्त्र 'मालामन्त्र' दससे अधिक अक्षरोंवाले 'मन्त्र' और दससे कम अक्षरोंवाले 'बीजमन्त्र' कहे गये हैं। 'मालामन्त्र' वृद्धावस्थामें सिद्धिदायक होते हैं, 'मन्त्र' यौवनावस्थामें सिद्धिप्रद है। पाँच अक्षरसे अधिक तथा दस अक्षरतक्के मन्त्र बाल्यावस्थामें सिद्धि प्रदान करते हैं*। अन्य मन्त्र अर्थात् एकसे
* 'महाकपिल' पञ्चरात्रमें तथा 'श्रीविद्यार्णव-तन्त्र'में मालामन्त्रोंको 'वृद्ध', मन्त्रोंको 'युवा' तथा पाँचसे अधिक और दस अक्षरतक्के मन्त्रोंको 'बाल' बताया गया है। 'भैरवी-तन्त्र'में सात अक्षरवाले मन्त्रको 'बाल', आठ अक्षरवाले मन्त्रको 'कुमार', सोलह अक्षरोंके
- अध्याय २९३ * ५९३
लेकर पाँच अक्षरतकके मन्त्र सर्वदा और सबके लिये सिद्धिदायक होते हैं॥ १-२$\frac{१}{२}$॥
मन्त्रोंकी तीन जातियाँ होती हैं—स्त्री, पुरुष और नपुंसक। जिन मन्त्रोंके अन्तमें 'स्वाहा' पदका प्रयोग हो, वे स्त्रीजातीय हैं। जिनके अन्तमें 'नमः' पद जुड़ा हो, वे मन्त्र नपुंसक हैं। शेष सभी मन्त्र पुरुषजातीय हैं। वे वशीकरण और उच्चाटन-कर्ममें प्रशस्त माने गये हैं। क्षुद्रक्रिया तथा रोगके निवारणार्थ अर्थात् शान्तिकर्ममें स्त्रीजातीय मन्त्र$^२$ उत्तम माने गये हैं। इन सबसे भिन्न (विद्वेषण एवं अभिचार आदि) कर्ममें नपुंसक मन्त्र उपयोगी बताये गये हैं॥ ३-४$\frac{१}{२}$॥
मन्त्रोंके दो भेद हैं—'आग्नेय' और 'सौम्य'। जिनके आदिमें 'प्रणव' लगा हो, वे 'आग्नेय' हैं और जिनके अन्तमें 'प्रणव' का योग है, वे 'सौम्य' कहे गये हैं। इनका जप इन्हीं दोनोंके कालमें करना चाहिये (अर्थात् सूर्य-नाड़ी चलती हो तो 'आग्नेय-मन्त्र' का और चन्द्र-नाड़ी चलती हो तो 'सौम्य-मन्त्रों' का जप करे)$^३$। जिस मन्त्रमें तार (ॐ), अन्त्य (क्ष), अग्नि (र), वियत् (ह)—इनका बाहुल्येन प्रयोग हो, वह 'आग्नेय' माना गया है। शेष मन्त्र 'सौम्य' कहे गये हैं$^४$। ये दो प्रकारके मन्त्र क्रमशः क्रूर और सौम्य कर्मोंमें प्रशस्त माने गये हैं।$^५$ 'आग्नेय मन्त्र' प्रायः अन्तमें 'नमः' पदसे युक्त होनेपर 'सौम्य' हो जाता है और **'सौम्य मन्त्र भी अन्तमें 'फट्' लगा देनेपर 'आग्नेय' हो जाता है।$^६$ यदि मन्त्र सोया हो या सोकर तत्काल ही जगा हो तो वह सिद्धिदायक नहीं होता है। जब वामनाड़ी चलती हो तो वह 'आग्नेय मन्त्र' के सोनेका समय है और यदि दाहिनी नाड़ी (नासिकाके दाहिने छिद्रसे साँस) चलती हो तो वह उसके जागरणका काल है। 'सौम्य मन्त्र' के सोने और जागनेका समय इसके विपरीत है। अर्थात् वामनाड़ी (साँस) उसके जागरणका और दक्षिणनाड़ी उसके शयनका काल है। जब दोनों नाड़ियाँ साथ-साथ चल रही हों, उस समय आग्नेय और सौम्य—दोनों मन्त्र जगे रहते हैं। (अतः उस
मन्त्रको 'तरुण' तथा चालीस अक्षरोंके मन्त्रको 'प्रौढ़' बताया गया है। इससे ऊपर अक्षर-संख्यावाला मन्त्र 'वृद्ध' कहा गया है। १. 'शारदातिलक'की टीकामें उद्धृत 'प्रयोगसार' में शब्दभेदसे यही बात कही गयी है। 'श्रीनारायणीय-तन्त्र' में तो ठीक 'अग्निपुराण'की आनुपूर्वी ही प्रयुक्त हुई है। २. 'कुल प्रकाश-तन्त्र'में स्त्रीजातीय मन्त्रोंको शान्तिकर्ममें उपयोगी बताया गया है। शेष बातें अग्निपुराणके ही अनुसार हैं— स्त्रीमन्त्रा वह्निजायान्ता हृदयान्ता नपुंसकाः। शेषाः पुमांस इत्युक्ताः स्त्रीमन्त्राश्चादिशान्तिकै॥ नपुंसकाः स्मृता मन्त्रा विद्वेषे चाभिचारके। पुमांसः स्युः स्मृताः सर्वे वध्योच्चाटनकर्मसु॥ (श्रीविद्यार्णवतन्त्र २ उच्छ्वास) 'प्रयोगसार' में—'वषट्' और 'फट्' जिनके अन्तमें लगें, वे 'पुँल्लिङ्ग' 'वौषट्' और 'स्वाहा' अन्तमें लगें, वे 'स्त्रीलिङ्ग' तथा 'हुं नमः' जिनके अन्तमें लगें, वे 'नपुंसक लिङ्ग' मन्त्र कहे गये हैं। ३. 'श्रीनारायणीय-तन्त्र'में भी यह बात इसी आनुपूर्वीमें कही गयी है। ४. 'शारदातिलक' में सौम्य-मन्त्रोंकी भी सुस्पष्ट पहचान दी गयी है—जिसमें 'सकार' अथवा 'वकार'का बाहुल्य हो, वह 'सौम्य-मन्त्र' है। जैसा कि वचन है—'सौम्या भूयिष्ठेन्दुमृताक्षराः।' (२।६१) ५. 'शारदातिलक'में भी 'विज्ञेयाः क्रूरसौम्ययोः'—कहकर इसी बातकी पुष्टि की गयी है। ईशानशम्भुने भी यही बात कही है— 'स्यादाग्नेयैः क्रूरकार्यप्रसिद्धिः सौम्यैः सौम्यं कर्म कुर्याद् यथावत्'। ६. ईशानशम्भुने भी ऐसा ही कहा है—आग्नेयोऽपि स्यात्तु सौम्यो नमोऽन्तः सौम्योऽपि स्यादग्निमन्त्रः फडन्तः। 'नारायणीय-तन्त्र'में यही बात यों कही गयी है— आग्नेयमन्त्रः सौम्यः स्यात् प्रायशोऽन्ते नमोऽन्वितः। सौम्यमन्त्रस्तथाऽऽग्नेयः फट्कारेणान्वितोऽन्ततः॥
५९४ * अग्निपुराण *
समय दोनोंका जप किया जा सकता है$^{१}$।) दुष्ट नक्षत्र, दुष्ट राशि तथा शत्रुरूप आदि अक्षरवाले मन्त्रोंको अवश्य त्याग देना चाहिये$^{२}$॥ ५–९$\frac{१}{२}$ ॥
( नक्षत्र-चक्र )
राज्यलाभोपकाराय प्रारभ्यारिः स्वरः कुरून्॥
गोपालकुकुटीं प्रायात् फुल्लावित्युदिता लिपिः$^{३}$।
(साधकके नामके प्रथम अक्षरको तथा मन्त्रके आदि अक्षरको लेकर गणना करके यह जानना है कि उस साधकके लिये वह मन्त्र अनुकूल है या प्रतिकूल ? इसीके लिये उपर्युक्त श्लोक एक संकेत देता है—) 'राज्य'से लेकर 'फुल्लौ'तक लिपिका ही संकेत है। 'इत्युदिता लिपिः' इस प्रकार लिपि कही गयी है। 'नारायणीय-तन्त्र'में इसकी व्याख्या करते हुए कहा गया है कि अश्विनीसे लेकर उत्तरभाद्रपदातकके छब्बीस नक्षत्रोंमें 'अ'से लेकर 'ह' तकके अक्षरोंको बाँटना है। किस नक्षत्रमें कितने अक्षर लिये जायँगे, इसके लिये उपर्युक्त श्लोक संकेत देता है। 'रा' से 'ल्लौ' तक छब्बीस अक्षर हैं; वे छब्बीस नक्षत्रोंके प्रतीक हैं। तन्त्रशास्त्रियोंने अपने संकेतवचनोंमें केवल व्यञ्जनोंको ग्रहण किया है और समस्त व्यञ्जनोंको कवर्ग, टवर्ग, पवर्ग तथा यवर्गमें बाँटा है। संकेत-लिपिका जो अक्षर जिस वर्गका प्रथम, द्वितीय, तृतीय या चतुर्थ अक्षर है, उससे उतनी ही संख्याएँ ली जायँगी। संयुक्ताक्षरोंमेंसे अन्तिम अक्षर ही गृहीत होगा। स्वरोंपर कोई संख्या नहीं है। उपर्युक्त श्लोकमें पहला अक्षर 'रा' है। यह यवर्गका दूसरा अक्षर है, अतः उससे दो संख्या ली जायगी। इस प्रकार 'रा' यह संकेत करता है कि अश्विनी-नक्षत्रमें दो अक्षर 'अ आ' गृहीत होंगे। दूसरा अक्षर है 'ज्य', यह संयुक्ताक्षर है, इसका अन्तिम अक्षर 'य' गृहीत होगा। वह अपने वर्गका प्रथम अक्षर है, अतः एकका बोधक होगा। इस प्रकार पूर्वोक्त 'ज्य'के संकेतानुसार भरणी नक्षत्रमें एक अक्षर 'इ' लिखा जायगा। इस बातको ठीक समझनेके लिये निम्नाङ्कित
$^{१}$. 'बृहन्नारायणीय-तन्त्र'में इसी भावकी पुष्टि निम्नाङ्कित श्लोकोंद्वारा की गयी है—
सुप्तः प्रबुद्धमात्रो वा मन्त्रः सिद्धिं न यच्छति। स्वापकालो वामवहो जागरो दक्षिणावहः॥
आग्नेयस्य मनोः सौम्यमन्त्रस्यैतद्विपर्ययः। प्रबोधकालं जानीयादुभयोरुभयावहः॥
स्वापकाले तु मन्त्रस्य जपोऽनर्थफलप्रदः।
इसमें स्पष्ट कहा गया है कि मन्त्र जब सो रहा हो, उस समय उसका जप अनर्थ-फलदायक होता है। 'नारायणीय-तन्त्र'में 'स्वाप' और 'जागरणकाल'को और भी स्पष्टताके साथ बताया गया है। वामनाड़ी, इडानाड़ी और चन्द्रनाड़ी एक वस्तु है तथा दक्षिणनाड़ी, सूर्यनाड़ी एवं पिङ्गलानाड़ी एक अर्थके वाचक पद हैं। पिङ्गलानाड़ीमें श्वासवायु चलती हो तो 'आग्नेय मन्त्र' प्रबुद्ध होते हैं, इडानाड़ीमें श्वासवायु चलती हो तो 'सोममन्त्र' जाग्रत् रहते हैं। पिङ्गला और इडा दोनोंमें श्वासवायुकी स्थिति हो अर्थात् यदि सुषुम्नामें श्वासवायु चलती हो तो सभी मन्त्र प्रबुद्ध (जाग्रत्) होते हैं। प्रबुद्ध मन्त्र ही साधकोंको अभीष्ट फल देते हैं। यथा—
पिङ्गलायां गते वायौ प्रबुद्धा ह्यग्निरूपिणः। इडां गते तु पवने बुध्यन्ते सोमरूपिणः॥
पिङ्गलेडागते वायौ प्रबुद्धाः सर्व एव हि। प्रबुद्धा मनवः सर्वे साधकानां फलन्त्युमे॥
$^{२}$. जैसा कि 'भैरवी-तन्त्र'में कहा गया है—
दुष्टर्क्षराशिमूलेभूतादिवर्णप्रचुरमन्त्रकम्। सम्यक् परीक्ष्य तं यत्नाद् वर्जयेन्मतिमान् नरः॥
$^{३}$. 'श्रीरुद्रयामल'में तथा 'नारायणीय तन्त्र'में भी यह श्लोक आया है, जो लिपि (अक्षर)-का संकेतमात्र है। इसमें शब्दार्थ अपेक्षित नहीं है। 'शारदातिलक'में दूसरा श्लोक संकेतके लिये प्रयुक्त हुआ है। इसमें छब्बीस नक्षत्रोंमें अक्षरोंके विभाजनका संकेत है, जो ज्योतिषकी प्रक्रियासे भिन्न है।
- अध्याय २९३ *
५९५
चक्र देखिये—
| रा | २ | आश्विनी | अ आ |
|---|---|---|---|
| ज्य | १ | भरणी | इ |
| ला | ३ | कृत्तिका | ई उ ऊ |
| भो | ४ | रोहिणी | ऋ ॠ ऌ ॡ |
| प | १ | मृगशिरा | ए |
| का | १ | आर्द्रा | ऐ |
| रा | २ | पुनर्वसु | ओ औ |
| य | १ | पुष्य | क |
| प्रा | २ | आश्लेषा | ख ग |
| र | २ | मघा | घ ङ |
| भ्या | १ | पूर्वाफाल्गुनी | च |
| रिः | २ | उत्तराफाल्गुनी | छ ज |
| स्व | २ | हस्त | झ ञ |
| रः | २ | चित्रा | ट ठ |
| कु | १ | स्वाती | ड |
| रून् | २ | विशाखा | ढ ण |
| गो | ३ | अनुराधा | त थ द |
| पा | १ | ज्येष्ठा | ध |
| लान् | ३ | मूल | न प फ |
| कु | १ | पूर्वाषाढा | ब |
| कु | १ | उत्तराषाढा | भ |
| टी | १ | श्रवण | म |
| प्रा | २ | धनिष्ठा | य र |
| यान् | १ | शतभिषा | ल |
| फु | २ | पूर्वभाद्रपदा | व श |
| ल्लौ | ३ | उत्तरभाद्रपदा | ष स ह |
यह वर्णमाला नक्षत्रोंके साथ क्रमशः जोड़नी चाहिये। केवल 'अं अः'—ये दो अन्तिम स्वर रेवती नक्षत्रके साथ सदा जुड़े रहते हैं॥ १०-११$\frac{१}{२}$॥
(इनके द्वारा जन्म, सम्पद्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मित्र तथा अतिमित्र—इन तारोंका विचार किया जाता है। जहाँ साधकके नामका आदि अक्षर है, वहाँसे लेकर मन्त्रके आदि अक्षरतक गिने। उसमें नौका भाग देकर शेषके अनुसार जन्मादि तारोंको जाने।)
(बारह राशियोंमें वर्णोंका विभाजन)
वालं गौरं खुरं शोणं शमी शोभेति भेदिताः।
लिप्यर्णा राशिषु ज्ञेयाः षष्ठे शार्दींश्च योजयेत्॥ १२॥
(जैसा कि पूर्व श्लोकमें संकेत किया है, उसी तरह 'वा' से लेकर 'भा' तकके बारह अक्षर क्रमशः मेष आदि राशियों तथा ४ आदि संख्याओंकी ओर संकेत करते हैं—) वा ४ लं ३ गौ ३ रं २ खु २ रं २ शो ५ णं ५ भा ४। इन संख्याओंमें विभक्त हुए अकार आदि अक्षर क्रमशः मेष आदि राशियोंमें स्थित जानने चाहिये। 'श ष स ह' इन अक्षरोंको (तथा स्वरान्त्य वर्णों 'अं अः'को) छठी कन्याराशिमें संयुक्त करना चाहिये$^२$। क्षकारका मीनराशिमें प्रवेश है$^३$। यथा—
| ४ | अ आ इ ई | मेषराशि | १ |
|---|---|---|---|
| ३ | उ ऊ ऋ | वृषराशि | २ |
| ३ | ॠ ऌ ॡ | मिथुनराशि | ३ |
| २ | ए ऐ | कर्कराशि | ४ |
| २ | ओ औ | सिंहराशि | ५ |
| २ | अं अः<br>(श ष स ह ल) | कन्याराशि | ६ |
| ५ | क ख ग घ ङ | तुलाराशि | ७ |
| ५ | च छ ज झ ञ | वृश्चिकराशि | ८ |
| ५ | ट ठ ड ढ ण | धनुराशि | ९ |
| ५ | त थ द ध न | मकरराशि | १० |
| ५ | प फ ब भ म | कुम्भराशि | ११ |
| ४ | य र ल व (क्ष) | मीनराशि | १२ |
१. 'शारदातिलक'में भी यही बात कही गयी है—
'स्वरान्त्यौ तु रेवत्यंशगतौ सदा'॥ (२।१२५)
२. 'शारदातिलक' २।१२७ में यह श्लोक कुछ पाठान्तरके साथ ऐसा ही है। उसकी संस्कृत व्याख्यामें यही भाव व्यक्त किया गया है।
३. जैसा कि आचार्योंने कहा है—'अमः शवर्गलेभ्यश्च संजाता कन्यका मता।' तथा—'चतुर्भियदिभिः सार्धं स्यात् क्षकारस्तु मीनगः।'
| ५९६ | * अग्निपुराण * |
|---|
राशि-ज्ञानका उपयोग— साधकके नामका आदि अक्षर जहाँ हो, उस राशिसे मन्त्रके आदि अक्षरकी राशितक गिने। जो संख्या हो, उसके अनुसार फल जाने। यदि संख्या छठी, आठवीं अथवा बारहवीं हो तो वह निन्द्य है। इन बारह संख्याओंको 'बारह भाव' कहते हैं। उनकी विशेष संख्यासंज्ञा इस प्रकार है—तन, धन, सहज, सुहृद्, पुत्र, रिपु, जाया, मृत्यु, धर्म, कर्म, आय और व्यय। मन्त्रके अक्षर यदि मृत्यु, शत्रु तथा व्यय भावके अन्तर्गत हैं तो वे अशुभ हैं।
(सिद्धादि मन्त्र-शोधन-प्रकार)
| अ क थ ह | आ ख द क्ष | इ ग ध | ई घ न |
| उ ङ प | ऊ च फ | ऋ छ ब | ॠ ज भ |
| ऌ झ म | ॡ ञ य | ए ट र | ऐ ठ ल |
| ओ ड व | औ ढ श | अं ण ष | अः त स |
चौकोर स्थानपर पाँच रेखाएँ पूर्वसे पश्चिमकी ओर तथा पाँच रेखाएँ उत्तरसे दक्षिणकी ओर खींचे। इस प्रकार सोलह कोष्ठ बनाये। इनमें क्रमशः सोलह स्वरोंको लिखा जाय। तदनन्तर उसी क्रमसे व्यञ्जन-वर्ण भी लिखे। तीन आवृत्ति पूर्ण होनेपर चौथी आवृत्तिमें प्रथम दो कोष्ठोंके भीतर क्रमशः 'ह' और 'क्ष' लिखकर सब अक्षरोंकी पूर्ति कर ले। इन सोलहमें प्रथम कोष्ठकी चार पङ्क्तियाँ 'सिद्ध', दूसरे कोष्ठकी चार पङ्क्तियाँ 'साध्य', तीसरे कोष्ठकी चार पङ्क्तियाँ 'सुसिद्ध' तथा चौथे कोष्ठकी चार पङ्क्तियाँ 'अरि' मानी गयी हैं। जिस साधकके नामका आदि अक्षर जिस चतुष्कमें पड़े, वही उसके लिये 'सिद्ध चतुष्क' है, वहाँसे दूसरा उसके लिये 'साध्य', तीसरा 'सुसाध्य' और चौथा चतुष्क 'अरि' है। जिस चतुष्कके जिस कोष्ठमें साधकका नाम है, वह उसके लिये 'सिद्ध-सिद्ध' कोष्ठ है। फिर प्रदक्षिणक्रमसे उस चतुष्कका दूसरा कोष्ठ 'सिद्धसाध्य', 'सिद्ध-सुसिद्ध' तथा 'सिद्ध-अरि' है। इसी चतुष्कमें यदि मन्त्रका भी आदि अक्षर हो तो इसी गणनाके अनुसार उसके भी 'सिद्ध-सिद्ध', 'सिद्ध-साध्य' आदि भेद जान लेने चाहिये। यदि इस चतुष्कमें अपने नामका आदि अक्षर हो और द्वितीय चतुष्कमें मन्त्रका आदि अक्षर हो तो पूर्व चतुष्कके जिस कोष्ठमें नामका आदि अक्षर है, उस दूसरे चतुष्कमें भी उसी कोष्ठसे लेकर प्रदाक्षिण्य-क्रमसे 'साध्यसिद्ध' आदि भेदकी कल्पना करनी चाहिये। इस प्रकार सिद्धादिकी कल्पना करे। सिद्ध-मन्त्र अत्यन्त गुणोंसे युक्त होता है। 'सिद्ध-मन्त्र' जपमात्रसे सिद्ध अर्थात् सिद्धिदायक होता है; 'साध्य-मन्त्र' जप, पूजा और होम आदिसे सिद्ध होता है। 'सुसिद्ध मन्त्र' चिन्तनमात्रसे सिद्ध हो जाता है, परंतु 'अरि मन्त्र' साधकका नाश कर देता है। जिस मन्त्रमें दुष्ट अक्षरोंकी संख्या अधिक हो, उसकी सभीने निन्दा की है॥ १३—१५॥
शिष्यको चाहिये कि वह अभिषेकपर्यन्त दीक्षामें विधिवत् प्रवेश लेकर गुरुके मुखसे तन्त्रोक्त विधिका श्रवण करके गुरुसे प्राप्त हुए अभीष्ट मन्त्रकी साधना करे। जो धीर, दक्ष, पवित्र, भक्तिभावसे सम्पन्न, जप-ध्यान आदिमें तत्पर रहनेवाला, सिद्ध, तपस्वी, कुशल, तन्त्रवेत्ता, सत्यवादी तथा निग्रह-अनुग्रहमें समर्थ हो, वह 'गुरु' कहलाता है। जो शान्त (मनको वशमें रखनेवाला), दान्त (जितेन्द्रिय), पटु (सामर्थ्यवान्), ब्रह्मचारी, हविष्यान्नभोजी, गुरुकी सेवामें संलग्न और मन्त्रसिद्धिके प्रति उत्साह रखनेवाला हो, वह 'योग्य' शिष्य है। उसको तथा अपने पुत्रको मन्त्रका उपदेश देना चाहिये। शिष्य विनयी तथा गुरुको धन देनेवाला हो। ऐसे शिष्यको गुरु मन्त्रका उपदेश दे और उसकी सुसिद्धिके लिये स्वयं भी एक सहस्रकी संख्यामें जप करे। अकस्मात् कहींसे सुना हुआ, छल अथवा बलसे
* अध्याय २९३ * ५९७
प्राप्त किया हुआ, पुस्तकके पन्नेमें लिखा हुआ अथवा गाथामें कहा गया मन्त्र नहीं जपना चाहिये। यदि ऐसे मन्त्रका जप किया जाय तो वह अनर्थ उत्पन्न करता है। जो जप, होम तथा अर्चना आदि भूरि क्रियाओंद्वारा मन्त्रकी साधनामें संलग्न रहता है, उसके मन्त्र स्वल्पकालिक साधनसे ही सिद्ध हो जाते हैं। जिसने एक मन्त्रको भी विधिपूर्वक सिद्ध कर लिया है, उसके लिये इस लोकमें कुछ भी असाध्य नहीं है; फिर जिसने बहुत-से मन्त्र सिद्ध कर लिये हैं, उसके माहात्म्यका किस प्रकार वर्णन किया जाय ? वह तो साक्षात् शिव ही है। एक अक्षरका मन्त्र दस लाख जप करनेसे सिद्ध हो जाता है। मन्त्रमें ज्यों-ज्यों अक्षरकी वृद्धि हो, त्यों-ही-त्यों उसके जपकी संख्यामें कमी होती है। इस नियमसे अन्य मन्त्रोंके जपकी संख्याके विषयमें स्वयं ऊहा कर लेनी चाहिये। बीज-मन्त्रकी अपेक्षा दुगुनी-तिगुनी संख्यामें मालामन्त्रोंके जपका विधान है। जहाँ जपकी संख्या नहीं बतायी गयी हो, वहाँ मन्त्र-जपादिके लिये एक सौ आठ या एक हजार आठ संख्या जाननी चाहिये। सर्वत्र जपसे दशांश हवन एवं तर्पणका विधान मिलता है ॥ १६-२५ ॥
जहाँ किसी द्रव्य-विशेषका उल्लेख न हो, वहाँ होममें घृतका उपयोग करना चाहिये। जो आर्थिक दृष्टिसे असमर्थ हो, उसके लिये होमके निमित्त जपकी संख्यासे दशांश जपका ही सर्वत्र विधान मिलता है। अङ्ग आदिके लिये भी जप आदिका विधान है। सशक्तिक-मन्त्रके जपसे मन्त्रदेवता साधकको अभीष्ट फल देते हैं। वे साधकके द्वारा किये गये ध्यान, होम और अर्चन आदिसे तृप्त होते हैं। उच्चस्वरसे जपकी अपेक्षा उपांशु (मन्दस्वरसे किया गया) जप दसगुना श्रेष्ठ कहा गया है। यदि केवल जिह्वा हिलाकर जप किया जाय तो वह सौ गुना उत्तम माना गया है। मानस (मनके द्वारा किये जानेवाले) जपका महत्त्व सहस्रगुना उत्तम कहा गया है। मन्त्र-सम्बन्धी कर्मका सम्पादन पूर्वाभिमुख अथवा दक्षिणाभिमुख होकर करना चाहिये। मौन होकर विहित आहार ग्रहण करते हुए प्रणव आदि सभी मन्त्रोंका जप करना चाहिये। देवता तथा आचार्यके प्रति समान दृष्टि रखते हुए आसनपर बैठकर मन्त्रका जप करे। कुटी, एकान्त एवं पवित्र स्थान, देवमन्दिर, नदी अथवा जलाशय—ये जप करनेके लिये उत्तम देश हैं। मन्त्र-सिद्धिके लिये जौकी लप्सी, मालपूए, दुग्ध एवं हविष्यान्नका भोजन करे। साधक मन्त्रदेवताका उनकी तिथि, वार, कृष्णपक्षकी अष्टमी-चतुर्दशी तथा ग्रहण आदि पर्वोंपर पूजन करे। अश्विनीकुमार, यमराज, अग्नि, धाता, चन्द्रमा, रुद्र, अदिति, बृहस्पति, सर्प, पितर, भग, अर्यमा, सूर्य, त्वष्टा, वायु, इन्द्राग्नि, मित्र, इन्द्र, जल, निर्ऋति, विश्वेदेव, विष्णु, वसुगण, वरुण, अजैकपात्, अहिर्बुध्न्य और पूषा—ये क्रमशः अश्विनी आदि नक्षत्रोंके देवता हैं। प्रतिपदासे लेकर चतुर्दशीपर्यन्त तिथियोंके देवता क्रमशः निम्नलिखित हैं—अग्नि, ब्रह्मा, पार्वती, गणेश, नाग, स्कन्द, सूर्य, महेश, दुर्गा, यम, विश्वदेव, विष्णु, कामदेव और ईश, पूर्णिमाके चन्द्रमा और अमावास्याके देवता पितर हैं। शिव, दुर्गा, बृहस्पति, विष्णु, ब्रह्मा, लक्ष्मी और कुबेर—ये क्रमशः रविवार आदि वारोंके देवता हैं। अब मैं 'लिपिन्यास'का वर्णन करता हूँ॥ २६-३६$\frac{१}{२}$॥
साधक निम्नलिखित प्रकारसे लिपि (मातृका) न्यास करे— 'ॐ अं नमः, केशान्तेषु। ॐ आं नमः, मुखे। ॐ इं नमः, दक्षिणनेत्रे। ॐ ईं नमः, वामनेत्रे। ॐ उं नमः, दक्षिणकर्णे। ॐ ऊं नमः, वामकर्णे। ॐ ऋं नमः, दक्षिणनासापुटे। ॐ ॠं नमः, वामनासापुटे। ॐ लूं नमः, दक्षिणकपोले। ॐ लूं नमः, वामकपोले। ॐ एं नमः, ऊर्ध्वोष्ठे।
५९८ * अग्निपुराण *
ॐ ऐं नमः, अधरोष्ठे। ॐ ओं नमः, ऊर्ध्वदन्तपङ्क्तौ। ॐ औं नमः, अधोदन्तपङ्क्तौ। ॐ अं नमः, मूर्ध्नि। ॐ अः नमः, मुखवृत्ते। ॐ कं नमः, दक्षिणबाहुमूले। ॐ खं नमः, दक्षिणकूर्परे। ॐ गं नमः, दक्षिणमणिबन्धे। ॐ घं नमः, दक्षिणहस्ताङ्गुलिमूले। ॐ ङं नमः, दक्षिण- हस्ताङ्गुल्यग्रे। ॐ चं नमः, वामबाहुमूले। ॐ छं नमः, वामकूर्परे। ॐ जं नमः, वाममणिबन्धे। ॐ झं नमः, वामहस्ताङ्गुलिमूले। ॐ ञं नमः, वामहस्ताङ्गुल्यग्रे। ॐ टं नमः, दक्षिणपादमूले। ॐ ठं नमः, दक्षिणजानुनि। ॐ डं नमः, दक्षिणगुल्फे। ॐ ढं नमः, दक्षिणपादाङ्गुलिमूले। ॐ णं नमः, दक्षिणपादाङ्गुल्यग्रे। ॐ तं नमः, वामपादमूले। ॐ थं नमः, वामजानुनि। ॐ दं नमः, वामगुल्फे। ॐ धं नमः, वामपादाङ्गुलिमूले। ॐ नं नमः, वामपादाङ्गुल्यग्रे। ॐ पं नमः, दक्षिणपार्श्वे। ॐ फं नमः, वामपार्श्वे। ॐ बं नमः, पृष्ठे। ॐ भं नमः, नाभौ। ॐ मं नमः, उदरे। ॐ यं त्वगात्मने नमः, हृदि। ॐ रं असृगात्मने नमः, दक्षांसे। ॐ लं मांसात्मने नमः, ककुदि। ॐ वं मेदात्मने नमः, वामांसे। ॐ शं अस्थ्यात्मने नमः, हृदयादि-दक्षहस्तान्तम्। ॐ षं मज्जात्मने नमः, हृदयादि-वामहस्तान्तम्। ॐ सं शुक्रात्मने नमः, हृदयादि-दक्षपादान्तम्। ॐ हं आत्मने नमः, हृदयादिवामपादान्तम्। ॐ लं परमात्मने नमः, जठरे। ॐ क्षं प्राणात्मने नमः, मुखे।' इस प्रकार आदिमें 'प्रणव' और अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर लिपीश्वरों- मातृकेश्वरोंका न्यास किया जाता है॥ ३७-४०॥
श्रीकण्ठ, अनन्त, सूक्ष्म, त्रिमूर्ति, अमरेश्वर, अर्धीश, भारभूति, तिथीश, स्थाणुक, हर, झिण्टीश, भौतिक, सद्योजात, अनुग्रहेश्वर, अक्रूर तथा महासेन—ये सोलह 'स्वर-मूर्तिदेवता' हैं। क्रोधीश, चण्डीश, पञ्चान्तक, शिवोत्तम, एकरुद्र, कूर्म, एकनेत्र, चतुरानन, अजेश, सर्वेश, सोमेश, लाङ्गलि, दारुक, अर्द्धनारीश्वर, उमाकान्त, आषाढी, दण्डी अद्रि, मीन, मेष, लोहित, शिखी, छगलाण्ड, द्विरण्ड, महाकाल, कपाली, भुजङ्गेश, पिनाकी, खड्गीश, बक, श्वेत, भृगु, नकुली, शिव तथा संवर्तक—ये 'व्यञ्जन-मूर्तिदेवता' माने गये हैं॥ ४१-४६॥
उपर्युक्त श्रीकण्ठ आदि रुद्रोंका उनकी शक्तियोंसहित क्रमशः न्यास करे। (श्रीविद्यार्णव- तन्त्रमें इनकी शक्तियोंके नाम इस प्रकार दिये गये हैं—पूर्णोदरी, विरजा, शाल्मली, लोलाक्षी, वर्तुलाक्षी, दीर्घघोणा, सुदीर्घमुखी, गोमुखी, दीर्घजिह्वा, कुण्डोदरी, ऊर्ध्वकेशी, विकृतमुखी, ज्वालामुखी, उल्कामुखी, श्रीमुखी तथा विद्यामुखी—ये रुद्रोंकी 'स्वर-शक्तियाँ' हैं। महाकाली, महासरस्वती, सर्वसिद्धि, गौरी, त्रैलोक्यविद्या, मन्त्रशक्ति, आत्मशक्ति, भूतमाता, लम्बोदरी, द्राविणी, नागरी, खेचरी, मञ्जरी, रूपिणी, वीरिणी, काकोदरी, पूतना भद्रकाली, योगिनी, शङ्खिनी, गर्जिनी, कालरात्रि, कूर्दिनी, कपर्दिनी, वज्रिका, जया, सुमुखी, रेवती, माधवी, वारुणी, वायवी, रक्षोविदारिणी, सहजा, लक्ष्मी, व्यापिनी और महामाया—ये 'व्यञ्जनस्वरूपा रुद्रशक्तियाँ' कही गयी हैं।)
इनके न्यासकी विधि इस प्रकार है—'ह्सौं अं श्रीकण्ठाय पूर्णोदर्यै नमः। ह्सौं आं अनन्ताय विरजायै नमः।' इत्यादि। इसी तरह अन्य स्वरशक्तियोंका न्यास करना चाहिये। व्यञ्जन- शक्तियोंके न्यासके लिये यही विधि है। यथा—'ह्सौं कं क्रोधीशाय महाकाल्यै नमः। ह्सौं खं चण्डीशाय महासरस्वत्यै नमः।' इत्यादि। साधकको चाहिये कि उदयादि अङ्गोंका भी न्यास करे; क्योंकि सम्पूर्ण मन्त्र साङ्ग होनेपर ही सिद्धिदायक होते हैं। हृल्लेखाको व्योम-बीजसे युक्त करके इन अङ्गोंका न्यास करना चाहिये। हृदयादि अङ्ग मन्त्रोंको अन्तमें
* अध्याय २९४ * ५९९
जोड़कर बोलना चाहिये। यथा—'ह्वां हृदयाय नमः। ह्रीं शिरसे स्वाहा। हूं शिखायै वषट्। हैं कवचाय हुम्। ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ह्रः अस्त्राय फट्।' यह 'षडङ्गन्यास' कहा गया है। पञ्चाङ्गन्यासमें नेत्रको छोड़ दिया जाता है। निरङ्ग-मन्त्रका उसके स्वरूपसे ही अङ्गन्यास करके क्रमशः वागीश्वरी देवी (ह्रीं)-का एक लाख जप करे तथा यथोक्त (दशांश) तिलोंकी आहुति दे। लिपियोंकी अधिष्ठात्री देवी वागीश्वरी अपने चार हाथोंमें अक्षमाला, कलश, पुस्तक और कमल धारण करती हैं। कवित्व आदिकी शक्ति प्रदान करती हैं। इसलिये जपकर्मके आदिमें सिद्धिके लिये उनका न्यास करे। इससे अकवि भी निर्मल कवि होता है। मातृका-न्याससे सभी मन्त्र सिद्ध होते हैं॥ ४७–५१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मन्त्र-परिभाषाका वर्णन' नामक
दो सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९३॥
दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय
नाग-लक्षण*
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! अब मैं नागोंकी उत्पत्ति, सर्पदंशमें अशुभ नक्षत्र आदि, सर्पदंशके विविध भेद, दंशके स्थान, मर्मस्थल, सूतक और सर्पदष्ट मनुष्यकी चेष्टा—इन सात लक्षणोंको
* अग्निपुराणमें जिस धन्वन्तरि-सुश्रुत-संवादद्वारा आयुर्वेदका प्रतिपादन किया गया है, वही विस्तारपूर्वक 'सुश्रुत' ग्रन्थमें वर्णित है। सर्पोंके सम्बन्धमें 'सुश्रुत' ग्रन्थमें (पू० तन्त्र, कल्पस्थान, अध्याय ४ में) जो कुछ कहा गया है, उसका सारांश इस प्रकार है— सर्प दो प्रकारके होते हैं—'दिव्य' और 'भौम'। दिव्य सर्प वासुकि और तक्षक आदि हैं। वे इस पृथ्वीका बोझ उठानेवाले हैं; प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी होते हैं। वे कुपित हो जायें तो फुफकार और दृष्टिमात्रसे सम्पूर्ण जगत्को दग्ध कर सकते हैं। वे सदा नमस्कारके ही योग्य हैं। उनके डसनेकी कोई दवा नहीं है। चिकित्सासे उनका कोई प्रयोजन नहीं है।
परंतु जो भूमिपर उत्पन्न होनेवाले सर्प हैं, जिनकी दाढ़ोंमें विष होता है तथा जो मनुष्योंको काटते हैं, उनकी संख्या अस्सी है। उन सबके पाँच भेद हैं—दर्वीकर, मण्डली, राजिमान्, निर्विष और वैकरञ्ज। राजिमान्को ही अग्निपुराणमें 'राजिल' कहा गया है। इनमें 'दर्वीकर' छब्बीस, 'मण्डली' बाईस, 'राजिमान्' (या राजिल) दस, 'निर्विष' बारह तथा 'वैकरञ्ज' तीन प्रकारके होते हैं। वैकरञ्जोंद्वारा मण्डली तथा राजिलके संयोगसे उत्पन्न चित्रित सर्प सात प्रकारके माने गये हैं। मण्डलीके संयोगसे उत्पन्न चार और राजिलके संयोगसे उत्पन्न तीन। इस तरह इनके अस्सी प्रकार हुए।
दर्वीकर सर्प चक्र, हल, छत्र, स्वस्तिक और अङ्कुशका चिह्न धारण करनेवाले, फणयुक्त तथा शीघ्रगामी होते हैं। मण्डली सर्प विविध मण्डलोंसे चित्रित, मोटे तथा मन्दगामी हुआ करते हैं। वे अग्नि तथा सूर्यके तुल्य तेजस्वी जान पड़ते हैं। राजिमान् अथवा राजिल सर्प चिकने होते हैं। वे तिरछी, ऊर्ध्वगामिनी एवं बहुरंगी रेखाओंद्वारा चित्रित-से जान पड़ते हैं। चरकने भी इन सर्पोंके विषयमें ऐसा ही, किंतु संक्षिप्त विवरण दिया है—
दर्वीकरः फणी ज्ञेयो मण्डली मण्डलाफणः ।
बिन्दुलेखो विचित्राङ्गः पतङ्गः स्यात्तु राजिमान् ॥
'फणवाले (दर्वीकर) सर्प वायुको प्रकुपित करते हैं। मण्डली सर्पोंके दंशनसे पित्तका प्रकोप बढ़ता है तथा राजिमान् सर्प कफ-प्रकोपको बढ़ानेवाले होते हैं।' (सुश्रुत, उत्तरतन्त्र, कल्पस्थान ४।२९)
'राजिमान् सर्प रातके पिछले पहरमें, मण्डली सर्प रातके शेष तीन पहरोंमें और दर्वीकर सर्प दिनमें चरते और विचरते हैं।'
(सुश्रुत, उत्तरतन्त्र, कल्पस्थान ४।३१)
'दर्वीकर सर्प तरुणावस्थामें, मण्डली वृद्धावस्थामें और राजिमान् सर्प मध्यवयमें उग्र विषवाले होकर लोगोंकी मृत्युके कारण बनते हैं। (सुश्रुत ४।३२) मण्डली सर्पोंको गोनस भी कहते हैं।'
'सुश्रुत-संहिता'की 'आयुर्वेद-तत्त्व-संदीपिका' व्याख्यामें सर्पोंका वर्गीकरण इस प्रकार दिया गया है—
६०० * अग्निपुराण *
कहता हूँ॥ १ ॥
शेष, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंखपाल एवं कुलिक—ये आठ नागोंमें श्रेष्ठ हैं। इन नागोंमेंसे दो नाग ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वैश्य और दो शूद्र कहे गये हैं*। ये चार वर्णोंके नाग क्रमशः दस सौ, आठ सौ, पाँच सौ और तीन सौ फणोंसे युक्त हैं। इनके वंशज पाँच सौ नाग हैं। उनसे असंख्य नागोंकी उत्पत्ति हुई है। आकारभेदसे
सर्पोंका वर्गीकरण
सर्पोंका वर्गीकरण
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+---------------------+---------------------+
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भौम दिव्य
| (वासुकि आदि दिव्य दृष्टि-निश्वासवाले देवरूप और पूजनीय)
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+-------+-------+
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सविष निर्विष (१२)
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+---------------+-------------------+-------------------+
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दर्वीकर (२६) मण्डली (२२) राजिमान् (१०) वैकरञ्ज (७+३)=१०
(फणवाले) (अल्प फणवाले) (फणविहीन) दर्वीकर, मण्डली
शीघ्रगामी मन्दगामी, स्थूल विविध रंगकी रेखाओंसे तथा राजिमान् सर्पोंकी
चक्र, हल, छत्र, मण्डलाकार चकत्ते चित्रित श्लेष्मप्रकोपक, संकर संतानें होती हैं।
स्वस्तिक, अङ्कुश- शरीरपर होते हैं। रात्रिके अन्तिम प्रहरमें द्विदोष प्रकोपक,
धारी, वातप्रकोपक, चमकते सूर्यके समान विचरण करनेवाले, चित्र-विचित्र स्वभाव व
दिवाचारी, तरुणा- तेजयुक्त, पित्त- मध्यम आयुमें घातक आकृतिके, विविध प्रकारके
वस्थामें घातक प्रकोपक, पूर्वरात्रिमें प्रभावकारी
विचरनेवाले, वृद्धा-
वस्थामें घातक
‘सुश्रुत-संहिता’, पू० तन्त्र, कल्पस्थान, अध्याय ४ श्लोक २५ से २८ तक कुछ विशेष चिह्न और रंगोंके आधारपर सर्पोंमें ब्राह्मणादि जातियोंकी परिकल्पना की गयी है। जो सर्प मोती और चाँदीके समान सफेद, कपिल वर्णके सुनहरे रंगके तथा सुगन्धयुक्त होते हैं, वे जातिसे ब्राह्मण माने गये हैं। जो स्निग्ध वर्ण (चिकने), अत्यन्त क्रोधी, सूर्य और चन्द्रमाके समान आकृतिके या छत्र अथवा कमलके समान चिह्न धारण करनेवाले होते हैं, उन्हें क्षत्रिय जातिका सर्प मानना चाहिये। जो काले और वज्रके समान रंगवाले हैं अथवा जो कान्तिसे लाल, धूमिल एवं कबूतरके-से दिखायी देते हैं, वे सर्प वैश्य माने गये हैं। जिनका रंग भैसों और चीतोंके समान हो, जो कठोर त्वचावाले हों, वे भाँति-भाँतिके विचित्र रंगवाले सर्प शूद्र जातिके होते हैं।
*'तन्त्रसार-संग्रह' की 'विषनारायणीय' टीकामें ब्राह्मण आदि वर्णवाले दो-दो नागोंके क्रमके विषयमें एक श्लोक उपलब्ध होता है—
आद्यन्तौ च तदाद्यन्तौ तदाद्यन्तौ च मध्यगौ।
‘आदि और अन्तके नाग ब्राह्मण हैं। उसके बाद पुनः आदि-अन्तके नाग क्षत्रिय हैं, तत्पश्चात् पुनः आदि-अन्तके नाग वैश्य हैं और मध्यवर्ती दो नाग शूद्र हैं।’
‘शारदातिलक’ १०।७ में इन नागोंको त्वरिता देवीका आभूषण बताया गया है। उक्त श्लोककी टीकामें उद्धृत ‘नारायणीय तन्त्र'के श्लोकोंमें इन नागोंका ध्यान इस प्रकार बताया गया है—
अनन्तकुलिकौ विप्रौ वह्निवर्णावुदाहृतौ। प्रत्येकं तु सहस्रेण फणानां समलंकृतौ ॥
वासुकिः शङ्खपालश्च क्षत्रियौ पीतवर्णकौ। प्रत्येकं तु फणासप्तशतसंख्याविराजितौ ॥
तक्षकश्च महापद्मो वैश्यावेतावुभौ स्मृतौ। नीलवर्णौ फणापञ्चशतौ तुङ्गोत्तमाङ्गकौ ॥
पद्मकर्कोटकौ शूद्रौ फणात्रिशतकौ सितौ।
* अध्याय २९४ * ६०१
सर्प फणी, मण्डली और राजिल—तीन प्रकारके माने जाते हैं। ये वात, पित्त और कफप्रधान हैं। इनके अतिरिक्त व्यन्तर, दोषमिश्र तथा दर्वीकर जातिवाले सर्प भी होते हैं। ये चक्र, हल, छत्र, स्वस्तिक और अंकुशके चिह्नोंसे युक्त होते हैं। गोनस सर्प विविध मण्डलोंसे चित्रित, दीर्घकाय और मन्दगामी होते हैं। राजिल सर्प स्निग्ध तथा ऊर्ध्वभाग और पार्श्वभागमें रेखाओंसे सुशोभित होते हैं। व्यन्तर सर्प मिश्रित चिह्नोंसे युक्त होते हैं। इनके पार्थिव, आप्य (जलसम्बन्धी), आग्नेय और वायव्य—ये चार मुख्य भेद और छब्बीस अवान्तर भेद हैं। गोनस सर्पोंके सोलह, राजिलजातीय सर्पोंके तेरह और व्यन्तर सर्पोंके इक्कीस भेद हैं। सर्पोंकी उत्पत्तिके लिये जो काल बताया गया है, उससे भिन्न कालमें जो सर्प उत्पन्न होते हैं, वे ‘व्यन्तर’ माने गये हैं। आषाढ़से लेकर तीन मासोंतक सर्पोंकी गर्भस्थिति होती है। गर्भस्थितिके चार मास व्यतीत होनेपर (सर्पिणी) दो सौ चालीस अंडे प्रसव करती है। सर्प-शावकके उन अंडोंसे बाहर निकलते ही उनमें स्त्री, पुरुष और नपुंसकके लक्षण प्रकट होनेसे पूर्व ही प्रायः सर्पगण उनको खा जाते हैं। कृष्णसर्प आँख खुलनेपर एक सप्ताहमें अंडेसे बाहर आता है। उसमें बारह दिनोंके बाद ज्ञानका उदय होता है। बीस दिनोंके बाद सूर्यदर्शन होनेपर उसके बत्तीस दाँत और चार दाढ़ें निकल आती हैं। सर्पकी कराली, मकरी, कालरात्रि और यमदूतिका—ये चार विषयुक्त दाढ़ें होती हैं। ये उसके वाम और दक्षिण पार्श्वमें स्थित होती हैं। सर्प छः महीनेके बाद केंचुलको छोड़ता है और एक सौ बीस वर्षतक जीवित रहता है। शेष आदि सात नाग क्रमशः रवि आदि वारोंके स्वामी माने गये हैं। वे वारेश दिन तथा रात्रिमें भी रहते हैं। (दिनके सात भाग करनेपर पहला भाग वारेशका होता है। शेष छः भागोंका अन्य छः नाग क्रमशः उपभोग करते हैं।) शेष आदि सात नाग अपने-अपने वारोंमें उदित होते हैं, किंतु कुलिकका उदय सबके संधिकालमें होता है। अथवा महापद्म और शङ्खपालके साथ कुलिकका उदय माना जाता है। मतान्तरके अनुसार महापद्म और शङ्खपालके मध्यकी दो घड़ियोंमें कुलिक* का उदय होता है। कुलिकोदयका समय सभी कार्योंमें दोषयुक्त
‘अनन्त (शेषनाग) और कुलिक—ये दो नाग ब्राह्मण कहे गये हैं। इनकी अङ्गकान्ति अग्निके समान उज्ज्वल है। इनमेंसे प्रत्येक सहस्र फणोंसे समलंकृत हैं। वासुकि और शङ्खपाल—ये क्षत्रिय हैं। इनकी कान्ति पीली है। इनमेंसे प्रत्येक सात सौ फणोंद्वारा सुशोभित हैं। तक्षक और महापद्म—ये दो नाग वैश्य माने गये हैं। इनकी अङ्गकान्ति नीली है। इनके उन्नत मस्तक पाँच-पाँच सौ फणोंसे अलंकृत हैं। पद्म तथा कर्कोटक—ये दो नाग शूद्र हैं और उनकी कान्ति श्वेत है।’
निम्नाङ्कित रीतिसे नागोंके वर्ण आदिको जानना चाहिये—
| नागोंके नाम | वर्ण | रंग | फण |
|---|---|---|---|
| १-शेषनाग (अनन्त) | ब्राह्मण | अग्निके समान | १,००० |
| २-कुलिक | ब्राह्मण | उज्ज्वल | १,००० |
| १-वासुकि, २ शङ्खपाल | क्षत्रिय | पीत | ७०० |
| अग्निपुराणके अनुसार | ८०० | ||
| १-तक्षक, २ महापद्म | वैश्य | नील | ५०० |
| १-पद्म, २ कर्कोटक | शूद्र | श्वेत | ३०० |
* प्रतिदिन दिनमानके सात भागोंमें वारेशसे आरम्भ कर कुलिकके सिवा अन्य सात नाग क्रमशः एक-एक अंशके स्वामी होते हैं। लोकप्रचलित फलित ग्रन्थोंमें शनिका अंश ही कुलिकका अंश माना गया है। इसलिये महापद्म और शङ्खपालके मध्यकी दो घड़ी ही सर्वसम्मत ‘कुलिकोदयकाल’ प्रतीत होता है।
६०२ * अग्निपुराण *
माना गया है। सर्पदंशमें तो वह विशेषतः अशुभ है। कृत्तिका, भरणी, स्वाती, मूल, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वभाद्रपदा, अश्विनी, विशाखा, आर्द्रा, आश्लेषा, चित्रा, श्रवण, रोहिणी, हस्त नक्षत्र, शनि तथा मङ्गलवार एवं पञ्चमी, अष्टमी, षष्ठी, रिक्ता—चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी एवं शिवा (तृतीया) तिथि सर्पदंशमें निन्द्य मानी गयी हैं। पञ्चमी और चतुर्दशी तिथियोंमें सर्पका दंशन विशेषतः निन्दित है। यदि सर्प चारों संध्याओंके समय, दग्धयोग या दग्धराशिमें डँस ले, तो अनिष्टकारक होता है। एक, दो और तीन दंशनोंको क्रमशः 'दृष्ट', 'विद्ध' और 'खण्डित' कहते हैं। सर्पका केवल स्पर्श हो, परंतु वह डँसे नहीं तो उसे 'अदंश' कहते हैं। इसमें मनुष्य सुरक्षित रहता है। इस प्रकार सर्पदंशके चार भेद हुए। इनमें तीन, दो एवं एक दंश वेदनाजनक और रक्तस्राव करनेवाले हैं। एक पैर और कूर्मके समान आकारवाले दंश मृत्युसे प्रेरित होते हैं। अङ्गोंमें दाह, शरीरमें चींटियोंके रेंगनेका-सा अनुभव, कण्ठशोथ एवं अन्य पीड़ासे युक्त और व्यथाजनक गाँठवाला दंशन विषयुक्त माना जाता है, इनसे भिन्न प्रकारका सर्पदंश विषहीन होता है। देवमन्दिर, शून्यगृह, वल्मीक (बाँबी), उद्यान, वृक्षके कोटर, दो सड़कों या मार्गोंकी संधि, श्मशान, नदी-सागर-संगम, द्वीप, चतुष्पथ (चौराहा), राजप्रासाद, गृह, कमलवन, पर्वतशिखर, बिलद्वार, जीर्णकूप, जीर्णगृह, दीवाल, शोभाञ्जन, श्लेष्मातक (लिसोडा) वृक्ष, जम्बूवृक्ष, उदुम्बरवृक्ष, वेणुवन (बँसवारी), वटवृक्ष और जीर्ण प्राकार (चहारदीवारी) आदि स्थानोंमें सर्प निवास करते हैं। इन्द्रिय-छिद्र, मुख, हृदय, कक्ष, जत्रु (ग्रीवामूल), तालु, ललाट, ग्रीवा, सिर, चिबुक (ठुड्डी), नाभि और चरण—इन अङ्गोंमें सर्पदंश अशुभ है। विषचिकित्सकको सर्पदंशकी सूचना देनेवाला दूत यदि हाथोंमें फूल लिये हो, सुन्दर वाणी बोलता हो, उत्तम बुद्धिसे युक्त हो, सर्पदष्ट मनुष्यके समान लिङ्ग एवं जातिका हो, श्वेतवस्त्रधारी हो, निर्मल और पवित्र हो, तो शुभ माना गया है। इसके विपरीत जो दूत मुख्यद्वारके सिवा दूसरे मार्गसे आया हो, शस्त्रयुक्त एवं प्रमादी हो, भूमिपर दृष्टि गड़ाये हो, गंदा या बदरंग वस्त्र पहने हो, हाथमें पाश आदि लिये हो, गद्गदकण्ठसे बोल रहा हो, सूखे काठपर बैठा हो, खिन्न हो तथा जो हाथमें काले तिल लिये हो या लाल रंगके धब्बेसे युक्त वस्त्र धारण किये हो अथवा भीगे वस्त्र पहने हुए हो, जिसके मस्तकके बालोंपर काले और लाल रंगके फूल पड़े हों, अपने कुचोंका मर्दन, नखोंका छेदन या गुदाका स्पर्श कर रहा हो, भूमिको पैरसे खुरच रहा हो, केशोंको नोंच रहा हो या तिनके तोड़ रहा हो, ऐसे दूत दोषयुक्त कहे गये हैं। इन लक्षणोंमेंसे एक भी हो तो अशुभ है॥ २-२८॥
अपनी और दूतकी यदि इडा अथवा पिङ्गला या दोनों ही नाड़ियाँ चल रही हों, उन दोनोंके इन चिह्नोंसे डँसनेवाले सर्पको क्रमशः स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक जाने। दूत अपने जिस अंगका स्पर्श करे, रोगीके उसी अंगमें सर्पका दंश हुआ जाने। दूतके पैर चञ्चल हों तो अशुभ और यदि स्थिर हों तो शुभ माने गये हैं॥ २९-३०॥
किसी जीवके पार्श्वदेशमें स्थित दूत शुभ और अन्य भागोंमें स्थित अशुभ माना गया है। दूतके निवेदनके समय किसी जीवका आगमन शुभ और गमन अशुभ है। दूतकी वाणी यदि अत्यन्त दोषयुक्त हो अथवा सुस्पष्ट प्रतीत न होती हो तो वह निन्दित कही गयी है। उसके सुस्पष्ट एवं विभक्त वचनोंद्वारा यह ज्ञात होता है कि सर्पका
- अध्याय २९५ * ६०३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
दंशन विषयुक्त है अथवा विषरहित। दूतके वाक्यके आदिमें 'स्वर' और 'कादि' वर्गके भेदसे लिपिके दो प्रकार माने जाते हैं। दूतके वचनसे वाक्यके आरम्भमें स्वर प्रयुक्त हो, तो सर्पदष्ट मनुष्यकी जीवनरक्षा और कादिवर्गोंके प्रयुक्त होनेपर अशुभकी आशङ्का होती है। यह मातृका-विधान है। 'क' आदि वर्गोंमें आरम्भके चार अक्षर क्रमशः वायु, अग्नि, इन्द्र और वरुणदेवता-सम्बन्धी होते हैं। कादि वर्गोंके पञ्चम अक्षर नपुंसक माने गये हैं। 'अ' आदि स्वर ह्रस्व और दीर्घके भेदसे क्रमशः इन्द्र एवं वरुणदेवता-सम्बन्धी होते हैं। दूतके वाक्यारम्भमें वायु और अग्निदैवत्य अक्षर दूषित और ऐन्द्र अक्षर मध्यम फलप्रद हैं। वरुणदैवत्य वर्ण उत्तम और नपुंसक वर्ण अत्यन्त अशुभ हैं॥ ३१-३५॥
विषचिकित्सकके प्रस्थानकालमें मङ्गलमय वचन, मेघ और गजराजकी गर्जना, दक्षिणपार्श्वमें फलयुक्त वृक्ष हो और वामभागमें किसी पक्षीका कलरव हो रहा हो, तो वह विजय या सफलताका सूचक है। प्रस्थानकालमें गीत आदिके शब्द शुभ होते हैं। दक्षिणभागमें अनर्थसूचक वाणी, चक्रवाकका रुदन-ऐसे लक्षण सिद्धिके सूचक हैं। पक्षियोंकी अशुभ ध्वनि और छींक-ये कार्यमें असिद्धि प्रदान करते हैं। वेश्या, ब्राह्मण, राजा, कन्या, गौ, हाथी, ढोलक, पताका, दुग्ध, घृत, दही, शङ्ख, जल, छत्र, भेरी, फल, मदिरा, अक्षत, सुवर्ण और चाँदी-ये लक्षण सम्मुख होनेपर कार्यसिद्धिके सूचक हैं। काष्ठपर अग्निसे युक्त शिल्पकार, मैले कपड़ोंका बोझ ढोनेवाले पुरुष, गलेमें टंक (पाषाणभेदक शस्त्र) धारण किये हुए मनुष्य, शृगाल, गृध्र, उलूक, कौड़ी, तेल, कपाल और निषिद्ध भस्म-ये लक्षण नाशके सूचक हैं। विषके एक धातुसे दूसरे धातुमें प्रवेश करनेसे विषसम्बन्धी सात रोग होते हैं। विषदंश पहले ललाटमें, ललाटसे नेत्रमें और नेत्रसे मुखमें जाता है। मुखमें प्रविष्ट होनेके बाद वह सम्पूर्ण धमनियोंमें व्याप्त हो जाता है। फिर क्रमशः धातुओंमें प्रवेश करता है॥ ३६-४१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नागलक्षणकथन नामक दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९४॥
दो सौ पंचानबेवाँ अध्याय
दष्ट-चिकित्सा
अग्निदेव कहते हैं-वसिष्ठ! अब मैं मन्त्र, ध्यान और ओषधिके द्वारा साँपके द्वारा डँसे हुए मनुष्यकी चिकित्साका वर्णन करता हूँ। 'ॐ नमो भगवते नीलकण्ठाय'-इस मन्त्रके जपसे विषका नाश होता है*। घृतके साथ गोबरके रसका पान करे। यह ओषधि साँपके डसे हुए मनुष्यके जीवनकी रक्षा करती है। विष दो प्रकारके कहे जाते हैं-'जङ्गम' विष, जो सर्प
* 'सुश्रुत' में मन्त्रग्रहणकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है- 'स्त्री, मांस और मधु (मद्य)-का सेवन छोड़कर, मिताहारी और पवित्र होकर मन्त्र ग्रहण करना चाहिये। मन्त्र-साधकको कुशके आसनपर बैठना और सोना चाहिये। मन्त्रकी सिद्धिके लिये वह यत्नपूर्वक गन्ध, माल्य, उपहार, बलि, जप और होमके द्वारा देवताओंका पूजन करे। अविधिपूर्वक उच्चारित अथवा स्वरवर्णसे हीन मन्त्र सिद्धिप्रद नहीं होते हैं। इसलिये मन्त्रप्रयोगके साथ-साथ औषध-उपचार आदिका क्रम भी चालू रखना चाहिये।'
(सुश्रुत, उत्तर तन्त्र, कल्पस्थान ५।१३)
६०४ * अग्निपुराण *
और मूषक आदि प्राणियोंमें पाया जाता है एवं दूसरा 'स्थावर' विष, जिसके अन्तर्गत शृङ्गी (सिंगिया) आदि विषभेद हैं॥ १-२॥
शान्तस्वरसे युक्त ब्रह्मा (क्षौं), लोहित (ह्रीं), तारक (ॐ) और शिव (हौं)—यह चार अक्षरोंका वियति-सम्बन्धी नाममन्त्र है*। इसे शब्दमय तार्क्ष्य (गरुड) माना गया है॥ ३-४॥
'ॐ ज्वल महामते हृदयाय नमः, गरुड विशाल शिरसे स्वाहा, गरुड शिखायै वषट्, गरुडविषभञ्जन प्रभेदन प्रभेदन वित्रासय वित्रासय विमर्द्दय विमर्द्दय कवचाय हुम्, उग्ररूपधारक सर्वभयंकर भीषय भीषय सर्वं दह दह भस्मीकुरु कुरु स्वाहा, नेत्रत्रयाय वौषट् । अप्रतिहतशासनं वं हूं फट् अस्त्राय फट्।'
मातृकामय कमल बनावे। उसके आठों दिशाओंमें आठ दल हों। पूर्वादि दलोंमें दो-दोके क्रमसे समस्त स्वरवर्णोंको लिखे। कवार्गादि सात वर्गोंके अन्तिम दो-दो अक्षरोंका भी प्रत्येक दलमें उल्लेख करे। उस कमलके केसरभागको वर्गके आदि अक्षरोंसे अवरुद्ध करे तथा कर्णिकामें अग्निबीज 'रं' लिखे। मन्त्रका साधक उस कमलको हृदयस्थ करके बायें हाथकी हथेलीपर उसका चिन्तन करे। अङ्गुष्ठ आदिमें वियति-मन्त्रके वर्णोंका न्यास करे और उनके द्वारा भेदित कलाओंका भी चिन्तन करे। तदनन्तर चौकोर 'भू-पुर' नामक मण्डल बनावे, जो पीले रंगका हो और चारों ओरसे वज्रद्वारा चिह्नित हो। यह मण्डल इन्द्रदेवताका होता है। अर्धचन्द्राकार वृत्त जलदेवता-सम्बन्धी है। कमलका आधा भाग शुक्लवर्णका है। उसके देवता वरुण हैं। फिर स्वस्तिक-चिह्नसे युक्त त्रिकोणाकार तेजोमय वह्निदेवताके मण्डलका चिन्तन करे। वायुदेवताका मण्डल बिन्दुयुक्त एवं वृत्ताकार है। वह कृष्णमालासे सुशोभित है, ऐसा चिन्तन करे॥ ५-८॥
ये चार भूत अङ्गुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा और अनामिका—इन चार अँगुलियोंके मध्यपर्वोंमें स्थित अपने निवासस्थानोंमें विराजमान हैं और सुवर्णमय नागवाहनसे इनके वासस्थान आवेष्टित हैं। इस प्रकार चिन्तनपूर्वक क्रमशः पृथ्वी आदि तत्त्वोंका अङ्गुष्ठ आदिके मध्यपर्वमें न्यास करे। साथ ही वियति-मन्त्रके चार वर्णोंको भी क्रमशः उन्हींमें विन्यस्त करे। इन वर्णोंकी कान्ति उनके सुन्दर मण्डलोंके समान है। इस प्रकार न्यास करनेके पश्चात् रूपरहित शब्दतन्मात्रमय शिवदेवताके आकाशतत्त्वका कनिष्ठाके मध्यपर्वमें चिन्तन करके उसके भीतर वेदमन्त्रके प्रथम अक्षरका न्यास करे। पूर्वोक्त नागोंके नामके आदि अक्षरोंका उनके अपने मण्डलोंमें न्यास करे। पृथ्वी आदि भूतोंके आदि अक्षरोंका अङ्गुष्ठ आदि अँगुलियोंके अन्तिम पर्वोंपर न्यास करे तथा विद्वान् पुरुष गन्धतन्मात्रादिके गन्धादि गुणसम्बन्धी अक्षरोंका पाँचों अँगुलियोंमें न्यास करे॥ ९-१२॥
इस प्रकार न्यास-ध्यानपूर्वक तार्क्ष्य-मन्त्रसे रोगीके हाथका स्पर्शमात्र करके मन्त्रज्ञ विद्वान् उसके स्थावर-जंगम दोनों प्रकारके विषोंका नाश कर देता है। विद्वान् पुरुष पृथ्वीमण्डल आदिमें विन्यस्त वियति-मन्त्रके चारों वर्णोंका अपनी श्रेष्ठ दो अँगुलियोंद्वारा शरीरके नाभिस्थानों और पर्वोंमें न्यास करे। तदनन्तर गरुडके स्वरूपका इस प्रकार ध्यान करे—'पक्षिराज गरुड दोनों घुटनोंतक सुनहरी आभासे सुशोभित हैं। घुटनोंसे लेकर नाभितक उनकी अङ्गकान्ति बर्फके समान सफेद है। वहाँसे कण्ठतक वे कुङ्कुमके समान अरुण प्रतीत होते हैं और कण्ठसे केशपर्यन्त
* इन चारों अक्षरोंका उद्धार 'तन्त्राभिधानकोष' के अनुसार किया गया है।