अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अध्याय ३६४ * ८०१
मस्तिष्क दिमागको और दूषिका आँखोंकी कीचड़को कहते हैं। अन्त्र और पुरीतत्—ये आँतके अर्थमें आते हैं। गुल्म और प्लीहा—बरवट (तिल्ली)—को कहते हैं। प्लीहा 'प्लीहन्' शब्दका पुँल्लिङ्गरूप है। अङ्ग-प्रत्यङ्गकी संधियोंके बन्धनको स्नायु और वस्रसा कहते हैं। कालखण्ड और यकृत्—जिगर या कलेजेके नाम हैं। कर्पर और कपाल शब्द ललाटके वाचक हैं। 'कपाल' शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग—दोनोंमें आता है। कीकस, कुल्य और अस्थि—ये हड्डीके नाम हैं। रक्त-मांससे रहित शरीरकी हड्डीको कङ्काल कहते हैं। पीठकी हड्डी (मेरुदण्ड)—का नाम कशेरुका है। 'करोटि' शब्द स्त्रीलिङ्ग है और यह मस्तककी हड्डी (खोपड़ी)—के अर्थमें आता है। पँसलीकी हड्डीको पर्शुका कहते हैं। अङ्ग, प्रतीक, अवयव, शरीर, वर्ष्म तथा विग्रह—ये शरीरके पर्याय हैं। कट और श्रोणिफलक—ये चूतड़के अर्थमें आते हैं। 'कट' शब्द पुँल्लिङ्ग है। कटि, श्रोणि और ककुद्मती—ये कमरका बोध करानेवाले हैं। (किन्हीं-किन्हींके मतमें उपर्युक्त पाँचों ही शब्द पर्यायवाची हैं।) स्त्रीकी कमरके पिछले भागको नितम्ब और अगले भागको जघन कहते हैं। 'जघन' शब्द नपुंसकलिङ्ग है। नितम्बके ऊपर जो दो गड्ढे-से होते हैं, उन्हें कूपक एवं ककुन्दर कहते हैं। 'ककुन्दर' शब्द केवल नपुंसकलिङ्ग है। कटिके मांस-पिण्डका नाम स्फिच् और कटिप्रोथ है। 'स्फिच्' शब्दका प्रयोग स्त्रीलिङ्गमें होता है। नीचे बताये जानेवाले भग और लिङ्ग—दोनोंको उपस्थ कहा जाता है। भग और योनि—ये स्त्री-चिह्नके बोधक पर्यायवाची शब्द हैं। शिश्न, मेढ्र, मेहन और शेफस्—ये पुरुषचिह्न (लिङ्ग)—के वाचक हैं। पिचण्ड, कुक्षि, जठर, उदर और तुन्द—ये पेटके अर्थमें आते हैं। कुच और स्तन पर्यायवाची शब्द हैं। कुचोंके अग्रभागका नाम चूचुक है। नपुंसकलिङ्ग क्रोड तथा भुजान्तर शब्द गोदीके वाचक हैं। स्कन्ध, भुजशिरस् और अंस—ये कंधेके अर्थमें आते हैं। 'अंस' शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग है। कंधेकी संधियों अर्थात् हँसलीकी हड्डीको जत्रु कहते हैं। पुनर्भव, कररुह, नख और नखर—ये नखोंके नाम हैं। इनमें 'नखर' और 'नख' शब्द स्त्रीलिङ्गके सिवा अन्य दो लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। अँगूठेसे लेकर तर्जनीतक फैलाये हुए हाथको प्रादेश, अँगूठेसे मध्यमातकको ताल और अनामिकातक फैलाये हुए हाथको गोकर्ण कहते हैं। इसी प्रकार अँगूठेसे कनिष्ठिका अँगुलीतक फैले हुए हाथका नाम वितस्ति (बालिस्त या बित्ता) है। इसकी लंबाई बारह अंगुलकी होती है। जब हाथकी सभी अँगुलियाँ फैली हों, तब उसे चपेट, तल और प्रहस्त कहते हैं। मुट्ठी बँधे हुए हाथका नाम रत्नि है। (कोहनीसे लेकर मुट्ठी बँधे हुए हाथतकके मापको भी 'रत्नि' कहते हैं।) कोहनीसे कनिष्ठा अँगुलीतककी लंबाईका नाम अरत्नि है। शङ्खके समान आकारवाली ग्रीवाका नाम कम्बुग्रीवा और त्रिरेखा है। गलेकी घाँटीको अवटु, घाटा और कृकाटिका कहते हैं। ओठसे नीचेके हिस्सेका नाम चिबुक है। गण्ड और गल्ल गालके वाचक हैं। गालोंके निचले भागको हनु कहते हैं। नेत्रोंके दोनों प्रान्तोंको अपाङ्ग कहा जाता है। उन्हें दिखानेकी चेष्टाको कटाक्ष कहा जाता है। चिकुर, कुन्तल और वाल—ये केशके वाचक हैं। प्रतिकर्म और प्रसाधन शब्द सँवारने और शृङ्गार करनेके अर्थमें आते हैं। आकल्प, वेश और नेपथ्य—ये शब्द प्रत्यक्ष नाटक आदिके खेलमें भिन्न-भिन्न वेष धारण करनेके अर्थमें आते हैं। मस्तकपर धारण किये जानेवाले रत्नका नाम चूडामणि और शिरोरत्न है। हारके बीच-बीचमें पिरोये हुए रत्नको तरल कहते हैं।
८०२ * अग्निपुराण *
कर्णिका और तालपत्र—ये कानके आभूषणके नाम हैं। लम्बन और ललन्तिका गलेमें नीचेतक लटकनेवाले हारको कहते हैं। मञ्जीर और नूपुर—ये पैरके आभूषण हैं। किङ्किणी और क्षुद्रघण्टिका घुँघुरूके नाम हैं। दैर्घ्य, आयाम और आनाह—ये वस्त्र आदिकी लंबाईके बोधक हैं। परिणाह और विशालता—ये चौड़ाई (पनहा या अर्ज) के अर्थमें आते हैं। पुराने वस्त्रको पटच्चर कहते हैं। संख्यान और उत्तरीय—ये चादर या दुपट्टेके अर्थमें आते हैं। फूल आदिसे बालोंका शृङ्गार करने या कपोल आदिपर पत्रभङ्ग आदि बनानेको रचना और परिस्पन्द कहते हैं। प्रत्येक उपचारकी पूर्णताका नाम आभोग है। ढक्कनदार पेटीको समुद्गक और सम्पुटक कहते हैं। प्रतिग्राह और पतद्ग्रह—ये पीकदानके नाम हैं॥ १—२९ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोशगत मनुष्य-वर्गका वर्णन' नामक तीन सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६४ ॥
तीन सौ पैंसठवाँ अध्याय
ब्रह्म-वर्ग
अग्निदेव कहते हैं—वंश, अन्ववाय, गोत्र, कुल, अभिजन और अन्वय—ये वंशके नाम हैं। मन्त्रकी व्याख्या करनेवाले ब्राह्मणको आचार्य कहते हैं। जिसने यज्ञमें व्रतकी दीक्षा ग्रहण की हो, वह आदेष्टा, यष्टा और यजमान कहलाता है। समझ-बूझकर आरम्भ करनेका नाम उपक्रम है। एक गुरुके यहाँ साथ-साथ विद्या पढ़नेवाले छात्र परस्पर सतीर्थ्य और एकगुरु कहलाते हैं। सभ्य, सामाजिक, सभासद और सभास्तार—ये यज्ञके सदस्योंके नाम हैं। ऋत्विक् और याजक—ये यज्ञ करानेवाले ऋत्विजोंके वाचक हैं। यजुर्वेदके ज्ञाता ऋत्विज्को अध्वर्यु, सामवेदके जाननेवालेको उद्गाता और ऋग्वेदके ज्ञाताको होता कहते हैं। चषाल और यूपकटक—ये यज्ञीय स्तम्भपर लगाये जानेवाले काठके छल्लेके नाम हैं। स्थण्डिल और चत्वर—ये दोनों शब्द समान लिङ्ग और समान अर्थके बोधक हैं। खौलाये हुए दूधमें दही मिला देनेसे जो हवनके योग्य वस्तु तैयार होती है, उसे आमिक्षा कहते हैं। दही मिलाये हुए घीका नाम पृषदाज्य है। परमान्न और पायस—ये खीरके वाचक हैं। जो पशु यज्ञमें अभिमन्त्रित करके मारा गया हो, उसको उपाकृत कहते हैं। परम्पराक, शमन और प्रोक्षण—ये शब्द यज्ञीय पशुका वध करनेके अर्थमें आते हैं। पूजा, नमस्या, अपचिति, सपर्य्या, अर्चा और अर्हणा—ये समानार्थक शब्द हैं। वरिवस्या, शुश्रूषा, परिचर्या और उपासना—ये सेवाके नाम हैं। नियम और व्रत—ये एक-दूसरेके पर्यायवाची शब्द हैं। इनमें 'व्रत' शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिंग—दोनोंमें प्रयुक्त होता है। उपवास आदिके रूपमें किये जानेवाले व्रतका नाम पुण्यक है। जिसका प्रथम या प्रधानरूपसे विधान किया गया हो, उसे 'मुख्यकल्प' कहते हैं और उसकी अपेक्षा अधम या अप्रधानरूपसे जिसकी विधि हो, उसका नाम अनुकल्प है। कल्पके अर्थमें विधि और क्रम—इन शब्दोंका प्रयोग समझना चाहिये। वस्तुका पृथक्-पृथक् ज्ञान (अथवा जड़-चेतन या द्रष्टा-दृश्यके पार्थक्यका निश्चय) विवेक कहलाता है। (श्रावणीपूर्णिमा आदिके दिन)
* अध्याय ३६६ * ८०३
संस्कारपूर्वक वेदका स्वाध्याय आरम्भ करना उपकरण या उपाकर्म कहलाता है। भिक्षु, परिव्राट्, कर्मन्दी, पाराशरी तथा मस्करी—संन्यासीके पर्यायवाची शब्द हैं। जिनकी वाणी सदा सत्य होती है, वे ऋषि और सत्यवचा कहलाते हैं। जिसने वेदाध्ययन और ब्रह्मचर्यके व्रतको विधिवत् समाप्त कर लिया है, किंतु अभी दूसरे आश्रमको स्वीकार नहीं किया है, उसको स्नातक कहते हैं। जिन्होंने अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है, वे ‘यती’ और ‘यति’ कहलाते हैं। शरीर-साध्य नित्यकर्मका नाम यम है तथा जो कर्म अनित्य एवं कभी-कभी आवश्यकतानुसार किये जानेयोग्य होता है, वह (जप, उपवास आदि) नियम कहलाता है। ब्रह्मभूय, ब्रह्मत्व और ब्रह्मसायुज्य—ये ब्रह्मभावकी प्राप्तिके नाम हैं॥ १–११॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘कोशगत ब्रह्मवर्गका वर्णन’ नामक तीन सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६५ ॥
तीन सौ छाछठवाँ अध्याय
क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-वर्ग
अग्निदेव कहते हैं—मूर्धाभिषिक्त, राजन्य बाहुज, क्षत्रिय और विराट्—ये क्षत्रियके वाचक हैं। जिस राजाके सामने सभी सामन्त-नरेश मस्तक झुकाते हैं, उसे अधीश्वर कहते हैं। जिसका समुद्रपर्यन्त समूची भूमिपर अधिकार हो, उस सम्राट्का नाम चक्रवर्ती और सार्वभौम है तथा दूसरे राजाओंको (जो छोटे-छोटे मण्डलोंके शासक हैं, उन्हें) मण्डलेश्वर कहते हैं। मन्त्रीके तीन नाम हैं—मन्त्री, धीसचिव और अमात्य। महामात्र और प्रधान—ये सामान्य मन्त्रियोंके वाचक हैं। व्यवहारके द्रष्टा अर्थात् मामले-मुकदमेमें फैसला देनेवालेको प्राड्विवाक और अक्षदर्शक कहते हैं। सुवर्णकी रक्षा जिसके अधिकारमें हो वह भौरिक और कनकाध्यक्ष कहलाता है। अध्यक्ष और अधिकृत—ये अधिकारीके वाचक हैं। इन दोनोंका समान लिङ्ग है। जिसे अन्तःपुरकी रक्षाका अधिकार सौंपा गया हो, उसका नाम अन्तर्वशिक¹ है। सौविदल, कञ्चुकी, स्थापत्य और सौविद—ये रनिवासकी रक्षामें नियुक्त सिपाहियोंके नाम हैं। अन्तःपुरमें रहनेवाले नपुंसकोंको षण्ढ और वर्षवर कहते हैं। सेवक, अर्थी और अनुजीवी—ये सेवा करनेवालेके अर्थमें आते हैं। अपने राज्यकी सीमापर रहनेवाला राजा शत्रु होता है और शत्रुकी राज्य-सीमापर रहनेवाला नरेश अपना मित्र होता है। शत्रु और मित्र दोनोंकी राज्यसीमाओंके बाद जिसका राज्य हो, वह (न शत्रु, न मित्र) उदासीन² होता है। विजिगीषु राजाके पृष्ठभागमें रहनेवाले राजाको पाणिग्राह कहते हैं। चर, स्पश और प्रणिधि—ये गुप्तचरके नाम हैं। भविष्यकालको आयति कहते हैं। तत्काल और तदात्व—ये वर्तमान कालके वाचक हैं। भावी कर्मफलको उदर्क कहते हैं। आग लगने या पानीकी बाढ़ आदिके कारण होनेवाले
१. ‘अन्तर्वशिक’के स्थानमें ‘अन्तर्वेष्मिक’ नाम भी प्रयुक्त होता है।
२. रामोक्त नीतिके उपदेशानुसार विजिगीषुके सम्मुखवर्ती पाँच राज्य क्रमशः शत्रु, मित्र, अरिमित्र, मित्रमित्र तथा अरिमित्र-मित्र होते हैं; आगे भी ऐसा ही क्रम है। दोनों पार्श्वगत राज्योंमें क्रमशः मध्यम तथा उदासीन होते हैं।
८०४ * अग्निपुराण *
भयको अदृष्टभय कहते हैं। अपने या शत्रुके राज्यमें रहनेवाले सैनिकों या चोरों आदिके कारण जो संकट उपस्थित होता है, उसका नाम दृष्टभय है। भरे हुए घड़ेको भद्रकुम्भ और पूर्णकुम्भ कहते हैं। सोनेके गडुए या झारीका नाम भृङ्गार और कनकालुका है। मतवाले हाथीको प्रभिन्न, गर्जित और मत्त कहते हैं। हाथीकी सूँड़से निकलनेवाले जलकणको वमथु और करशीकर कहते हैं। सृणि और अङ्कुश—ये दो हाथीको हाँकनेके काममें लाये जानेवाले लोहेके काँटेका बोध कराते हैं। इनमें सृणि तो स्त्रीलिङ्ग और अङ्कुश पुँल्लिङ्ग एवं नपुंसकलिङ्ग है। परिस्तोम और कुथ हाथीकी गद्दी और झूलके वाचक हैं। स्त्रियोंके बैठनेयोग्य पर्देवाली गाड़ीको कर्णीरथ और प्रवहण कहते हैं। दोला और प्रेङ्खा—ये झूला अथवा डोलीके नाम हैं। इनका स्त्रीलिङ्गमें प्रयोग होता है। आधोरण, हस्तिपक, हस्त्यारोह और निषादी—ये हाथीवानके अर्थमें आते हैं। लड़नेवाले सिपाहियोंको भट और योद्धा कहते हैं। कञ्चुक और वारण—ये कवच (बख्तर)-के नाम हैं। इनका प्रयोग स्त्रीलिङ्गके सिवा अन्य लिङ्गोंमें होता है। शीर्षण्य और शिरस्त्र—ये सिरपर रखे जानेवाले टोपके नाम हैं। तनुत्र, वर्म और दंशन—ये भी कवचके अर्थमें आते हैं। आमुक्त, प्रतिमुक्त, पिनद्ध और अपिनद्ध—ये पहने हुए कवचके वाचक हैं। सेनाकी मोर्चाबंदीका नाम व्यूह और बल-विन्यास है। चक्र और अनीक—ये नपुंसकलिङ्ग शब्द सेनाके वाचक हैं। जिस सेनामें एक हाथी, एक रथ, तीन घोड़े और पाँच पैदल हों, उसे पत्ति कहते हैं। पत्तिके समस्त अङ्गोंको लगातार सात बार तीन गुना करते जायें तो उत्तरोत्तर उसके ये नाम होंगे—सेनामुख, गुल्म, गण, वाहिनी, पृतना, चमू और अनीकिनी। हाथी आदि सभी अङ्गोंसे युक्त दस अनीकिनी सेनाको अक्षौहिणी* कहते हैं। धनुष, कोदण्ड और इष्वास—ये धनुषके नाम हैं। धनुषके दोनों कोणोंको कोटि और अटनी कहते हैं। उसके मध्य भागका नाम नस्तक (या लस्तक) है। प्रत्यञ्चाको मौर्वी, ज्या, शिञ्जिनी और गुण कहते हैं। पृषत्क, बाण, विशिख, अजिह्मग, खग और आशुग—ये वाचक पर्याय शब्द हैं॥ १-१६॥
तूण, उपासङ्ग, तूणीर, निषङ्ग और इषुधि—ये तरकसके नाम हैं। इनमें इषुधि शब्द पुँल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों लिङ्गोंमें आता है। असि, ऋष्टि, निस्त्रिंश, करवाल और कृपाण—ये तलवारके वाचक हैं। तलवारकी मुष्टिको सरु कहते हैं। ईली और करपालिका (करवालिका)—ये गुप्तीके नाम हैं। कुठार और सुधिति (या स्वधिति)—ये कुल्हाड़ीके अर्थमें आते हैं। इनमें कुठार शब्दका प्रयोग पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग—दोनोंमें होता है। छुरीको क्षुरिका और असिपुत्रिका कहते हैं। प्रास और कुन्त भालेके नाम हैं। सर्वला और तोमर गँड़ासेके अर्थमें आते हैं। तोमर शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग—दोनोंमें प्रयुक्त होता है। (यह बाण-विशेषका भी बोधक है)। जो प्रातःकाल मङ्गल-गान करके राजाको जगाते हैं, उन्हें वैतालिक और बोधकर कहते हैं। स्तुति
* सेनामुख आदि विभागोंमें हाथी, रथ आदिकी संख्या जाननेके लिये यह नक्शा दिया जा रहा है—
| सेना | पत्ति | सेनामुख | गुल्म | गण | वाहिनी | पृतना | चमू | अनीकिनी | अक्षौहिणी |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| हाथी और रथ | १ | ३ | ९ | २७ | ८१ | २४३ | ७२९ | २१८७ | २१८७० |
| घोड़े | ३ | ९ | २७ | ८१ | २४३ | ७२९ | २१८७ | ||
| पैदल | ५ | १५ | ४५ | १३५ | ४०५ | १२१५ | ३६४५ | १०९३५० |
- अध्याय ३६६ * ८०५
करनेवालोंका नाम मागध और वन्दी है। जो शपथ लेकर संग्रामसे पीछे पैर नहीं हटाते, उन योद्धाओंको संशप्तक कहते हैं। पताका और वैजयन्ती—ये पताकाके नाम हैं। केतन और ध्वज—ये ध्वजाके वाचक हैं और इनका प्रयोग नपुंसकलिङ्ग तथा पुँल्लिङ्गमें भी होता है। 'मैं पहले' 'मैं पहले' ऐसा कहते हुए जो योद्धाओंकी युद्ध आदिमें प्रवृत्ति होती है, उसे अहम्पूविका कहते हैं। इसका प्रयोग स्त्रीलिङ्गमें होता है। 'मैं समर्थ हूँ' ऐसा कहकर जो परस्पर अहंकार प्रकट किया जाता है, उसका नाम अहमहमिका है। शक्ति, पराक्रम, प्राण, शौर्य, स्थान (स्थामन्) सहस् और बल—ये सभी शब्द बलके वाचक हैं। मूर्च्छाके तीन नाम हैं—मूर्च्छा, कश्मल और मोह। विपक्षीको अच्छी तरह रगड़ने या कष्ट पहुँचानेको अवमर्द तथा पीडन कहते हैं। शत्रुको धर दबानेका नाम अभ्यवस्कन्दन तथा अभ्यासादन है। जीतको विजय और जय कहते हैं। निर्वासन, संज्ञपन, मारण और प्रतिघातन—ये मारनेके नाम हैं। पञ्चता और कालधर्म—ये मृत्युके अर्थमें आते हैं। दिष्टान्त, प्रलय और अत्यय—इनका भी वही अर्थ है॥ १७-२२$\frac{१}{२}$॥
विश्, भूमिस्पृश् और वैश्य—ये शब्द वैश्यजातिका बोध करानेवाले हैं। वृत्ति, वर्तन और जीवन—ये जीविकाके वाचक हैं। कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य—ये वैश्यकी जीविका-वृत्तियाँ हैं। ब्याज (सूद)-से चलायी जानेवाली जीविकाका नाम कुसीद-वृत्ति है। ब्याजके लिये धन देनेको उद्धार और अर्थप्रयोग कहते हैं। अनाजकी बालका नाम 'कणिश' है। जौ आदिके तीखे अग्रभागको किशारु तथा सस्यशूक कहते हैं। तृण आदिके गुच्छका नाम स्तम्ब है। धान्य, व्रीहि और स्तम्बकरि—ये अनाजके वाचक हैं। अनाजके डंठलोंसे होनेवाले भूसेको कडंगर और बुष कहते हैं। शमीधान्य अर्थात् फली या छीमीसे निकलनेवाले अनाजके अंदर उड़द, चना और मटर आदिकी गणना है तथा शूकधान्यमें जौ आदिकी गिनती है। तृणधान्य अर्थात् तीनाको नीवार कहते हैं। सूपका नाम है—शूर्प और प्रस्फोटन। सन या वस्त्रके बने हुए झोले अथवा थैलेको स्यूत और प्रसेव कहते हैं। कण्डोल और पिट टोकरीके तथा कट और किलिञ्जक चटाईके नाम हैं। इन दोनोंका एक ही लिङ्ग है। रसवती, पाकस्थान और महानस—ये रसोईघरके अर्थमें आते हैं। रसोईके अध्यक्षका नाम पौरोगव है। रसोई बनानेवालेको सूपकार, बल्लव, आरालिक, आन्धसिक, सूद, औदनिक तथा गुण कहते हैं। नपुंसकलिङ्ग अम्बरीष तथा पुँल्लिङ्ग भ्राष्ट्रशब्द भाड़के वाचक हैं। कर्करी, आलु तथा गलन्तिका—ये कठौतेके नाम हैं। बड़े घड़े या माटको आलिञ्जर एवं मणिक कहते हैं। काले जीरेका नाम सुषवी है। आरनाल और कुल्माष—ये काँजीके नाम हैं। वाहीक, हिङ्गु तथा रामठ—ये हींगके अर्थमें आते हैं। निशा, हरिद्रा और पीता—ये हल्दीके वाचक हैं। खाँड़को मत्स्यण्डि तथा फाणित कहते हैं। दूधके विकार अर्थात् खोवा या मावाका नाम कूर्चिका और क्षीरविकृति है। स्निग्ध, मसृण और चिक्कण—ये तीनों शब्द चिकनेके अर्थमें आते हैं। पृथुक और चिपिटक—ये चिउड़ाके वाचक हैं। भूने हुए जौको धाना कहते हैं। यह स्त्रीलिङ्ग शब्द है। जेमन, लेह (लेप) और आहार—ये भोजनका बोध करानेवाले हैं। माहेयी, सौरभी और गौ—ये गायके पर्याय हैं। कंधेपर जुआ ढोनेवाले बैलको युग्य और प्रसङ्ग्य तथा गाड़ी खींचनेवालेको शाकट कहते हैं। बहुत दिनोंकी ब्यायी हुई गायका नाम
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वष्क्यणी (बकेना) तथा थोड़े दिनोंकी बयायी हुईका नाम धेनु है। साँड़से लगी हुई गौको संधिनी कहते हैं। गर्भ गिरानेवाली गायकी 'वेहद्' संज्ञा है॥ २३—३३॥
पण्याजीव तथा आपणिक व्यापारीके अर्थमें आते हैं। न्यास और उपनिधि—ये धरोहरके वाचक हैं। ये दोनों शब्द पुँल्लिङ्ग हैं। बेचनेका नाम है विपण और विक्रय। संख्यावाचक शब्द एकसे लेकर 'दश' शब्दके श्रवण होनेतक (अर्थात् एकसे अष्टादशतक) केवल संख्येय द्रव्यका बोध करानेके लिये प्रयुक्त होते हैं, अतः उनका तीनों लिङ्गोंमें प्रयोग होता है। जैसे— एकः पटः, एका स्त्री, एकं पुष्पम् इत्यादि; परंतु 'पञ्चन्' से 'दशन्' शब्दतकके रूप तीनों लिङ्गोंमें समान होते हैं। यथा—दश स्त्रियः, दश पुरुषाः, दश पुष्पाणि इत्यादि। इसी प्रकार अष्टादशतक समझना चाहिये। संख्यामात्रका बोध करानेके लिये इन शब्दोंका प्रयोग नहीं होता; अतएव 'विप्राणां शतम्' इत्यादिके समान 'विप्राणां दश' यह प्रयोग नहीं हो सकता। विंशति आदि सभी संख्यावाची शब्द संख्या और संख्येय दोनों अर्थोंमें आते हैं तथा वे नित्य एक वचनान्त माने जाते हैं। (यथा संख्येयमें—विंशतिः पटाः। संख्यामात्रमें—विंशतिः पटानाम् इत्यादि। परंतु इनकी एकवचनान्तता केवल संख्येय अर्थमें ही मानी गयी है।) संख्यामात्रमें ये द्विवचन और बहुवचन भी होते हैं (यथा दो बीस, तीन बीस आदिके अर्थमें—द्वे विंशती, त्रयो विंशतयः— इत्यादि)। ऊनविंशतिसे लेकर नवनवतितक सभी संख्याशब्द स्त्रीलिङ्ग हैं (अतएव 'विंशत्या पुरुषैः' इत्यादि प्रयोग होते हैं)। 'पङ्क्ति' से लेकर शत, सहस्र आदि शब्द क्रमशः दसगुने अधिक हैं (यथा पङ्क्तिः (१०), शतम् (१००), सहस्रम् (१०००), अयुतम् (१००००) इत्यादि)। मान तीन प्रकारके होते हैं—तुलामान, अङ्गुलिमान और प्रस्थमान। पाँच गुंजे (रत्ती)—का एक माषक (माशा) होता है॥ ३४—३६॥
सोलह माषकका एक अक्ष होता है, इसीको कर्ष भी कहते हैं। कर्ष पुँल्लिङ्ग भी है और नपुंसकलिङ्ग भी। चार कर्षका एक पल होता है। एक अक्ष सोनेको 'सुवर्ण' और बिस्त कहते हैं तथा एक पल सुवर्णका नाम 'कुरुबिस्त' है। सौ पलकी एक 'तुला' होती है, यह स्त्रीलिङ्ग शब्द है। बीस तुलाको 'भार' कहते हैं। चाँदीके रुपयेका नाम कार्षापण और कार्षिक है। ताँबेके पैसेको 'पण' कहते हैं। द्रव्य, वित्त, स्वापतेय, रिक्थ, ऋक्थ, धन और वसु—ये धनके वाचक हैं। स्त्रीलिङ्ग रीति शब्द और पुँल्लिङ्ग आरकूट—ये पीतलके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। ताँबाका नाम—ताम्रक, शुल्ब तथा औदुम्बर है। तीक्ष्ण, कालायस और आयस—ये लोहेके अर्थमें आते हैं। क्षार और काँच—ये काँचके नाम हैं। चपल, रस, सूत और पारद—ये पाराके वाचक हैं। भैंसेके सींगका नाम गरल (या गवल) है। त्रपु, सीसक और पिच्चट—ये सीसाके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं।* हिण्डीर, अब्धिकफ तथा फेन—ये समुद्रफेनके वाचक हैं। मधूच्छिष्ट और सिक्थक—ये मोमके नाम हैं। रंग और वंग— राँगाके, पिचु और तूल—रुईके तथा कूलटी (कुनटी) और मनःशिला—मैनसिलके नाम हैं। यवक्षार और पाक्य—पर्यायवाची शब्द हैं। त्वक्क्षीरा और वंशलोचना—वंशलोचनके वाचक हैं॥ ३७—४२॥
वृषल, जघन्यज और शूद्र—ये शूद्रजातिके
* अमरकोशमें इस श्लोकके 'त्रपु' और 'पिच्चट' शब्दको राँगेके अर्थमें लिया गया है तथा सीसकके नाग, योगेष्ट और वप्र—ये तीन पर्याय अन्य दिये गये हैं।
| * अध्याय ३६७ * | ८०७ |
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नाम हैं। चाण्डाल एवं अन्त्यज जातियाँ वर्णसंकर कहलाती हैं। शिल्पकर्मके ज्ञाताको कारु और शिल्पी कहते हैं (इनमें बढ़ई, थवई आदि सभी आ जाते हैं।) समान जातिके शिल्पियोंके एकत्रित हुए समुदायको श्रेणि कहते हैं। यह स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्ग दोनोंमें प्रयुक्त होता है। चित्र बनानेवालेको रङ्गाजीव और चित्रकार कहते हैं। त्वष्टा, तक्षा और वर्धकि—ये बढ़ईके नाम हैं। नाडिन्धम और स्वर्णकार—ये सुनारके वाचक हैं। नाई (हजाम)–का नाम है नापित तथा अन्तावसायी। बकरी बेंचनेवाले गडरियेका नाम जाबाल और अजाजीव है। देवाजीव और देवल—ये देवपूजासे जीविका चलानेवालेके अर्थमें आते हैं। अपनी स्त्रियोंके साथ नाटक दिखाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले नटको जायाजीव और शैलूष कहते हैं। रोजाना मजदूरी लेकर गुजर करनेवाले मजूरका नाम भृतक और भृतिभुक् है। | विवर्ण, पामर, नीच, प्राकृत, पृथग्जन, विहीन, अपसद और जाल्म—ये नीचके वाचक हैं। दासको भृत्य, दासेर और चेटक भी कहते हैं। पटु, पेशल और दक्ष—ये चतुरके अर्थमें आते हैं। मृगयु और लुब्धक—ये व्याधके नाम हैं। चाण्डालको चाण्डाल और दिवाकीर्ति कहते हैं। पुताई आदिके काममें पुस्त शब्दका प्रयोग होता है। पञ्चालिका और पुत्रिका—ये पुतली या गुड़ियाके नाम हैं। वर्कर शब्द जवान पशुमात्रके अर्थमें आता है (साथ ही वह बकरेका भी वाचक है)। गहना रखनेके डब्बेको या कपड़े रखनेकी पेटीको मञ्जूषा, पेटक तथा पेडा कहते हैं। तुल्य और साधारण—ये समान अर्थके वाचक हैं। इनका सामान्यतः तीनों लिङ्गोंमें प्रयोग होता है। प्रतिमा और प्रतिकृति—ये पत्थर आदिकी मूर्तिके वाचक हैं। इस प्रकार ब्राह्मण आदि वर्गोंका वर्णन किया गया॥ ४३–४९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोशगत क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रवर्गका वर्णन' नामक तीन सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६६ ॥
तीन सौ सड़सठवाँ अध्याय
सामान्य नाम-लिङ्ग
अग्निदेव कहते हैं—मुनिवर! अब मैं सामान्यतः नामलिङ्गोंका वर्णन करूँगा (इस प्रकरणमें आये हुए शब्द प्रायः ऐसे होंगे, जो अपने विशेष्यके अनुसार तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त हो सकते हैं), आप उन्हें ध्यान देकर सुनें। सुकृति, पुण्यवान् और धन्य—ये शब्द पुण्यात्मा और सौभाग्यशाली पुरुषके लिये आते हैं। जिनकी अभिलाषा, आशय या अभिप्राय महान् हो, उन्हें महेच्छ और महाशय कहते हैं। (जिनके हृदय शुद्ध, सरल, कोमल, दयालु एवं भावुक हों, वे | हृदयालु, सहृदय और सुहृदय कहलाते हैं।) प्रवीण, निपुण, अभिज्ञ, विज्ञ, निष्णात और शिक्षित—सुयोग्य एवं कुशलके अर्थमें आते हैं। वदान्य, स्थूललक्ष, दानशौण्ड और बहुप्रद—ये अधिक दान करनेवालेके वाचक हैं। कृती, कृतज्ञ और कुशल—ये भी प्रवीण, चतुर एवं दक्षके ही अर्थमें आते हैं। आसक्त, उद्युक्त और उत्सुक—ये उद्योगी एवं कार्यपरायण पुरुषके लिये प्रयुक्त होते हैं। अधिक धनवान्को इभ्य और आढ्य कहते हैं। परिवृढ, अधिभू, नायक
८०८ * अग्निपुराण *
और अधिप—ये स्वामीके वाचक हैं। लक्ष्मीवान्, लक्ष्मण तथा श्रील—ये शोभा और श्रीसे सम्पन्न पुरुषके अर्थमें आते हैं। स्वतन्त्र, स्वैरी और अपावृत शब्द स्वाधीन अर्थके बोधक हैं। खलपू और बहुकर—खलिहान या मैदान साफ करनेवाले पुरुषके अर्थमें आते हैं। दीर्घसूत्र और चिरक्रिय—ये आलसी तथा बहुत विलम्बसे काम पूरा करनेवाले पुरुषके बोधक हैं। बिना विचारे काम करनेवालेको जाल्म और असमीक्ष्यकारी कहते हैं। जो कार्य करनेमें ढीला हो, वह कुण्ठ कहलाता है। कर्मशूर और कर्मठ—ये उत्साहपूर्वक कर्म करनेवालेके वाचक हैं। खानेवालेको भक्षक, घस्मर और अद्मर कहते हैं। लोलुप, गर्धन और गृध्नु—ये लोभीके पर्याय हैं। विनीत और प्रश्रित—ये विनययुक्त पुरुषका बोध करानेवाले हैं। धृष्णु और वियात—ये धृष्टके लिये प्रयुक्त होते हैं। प्रतिभाशाली पुरुषके अर्थमें निभृत और प्रगल्भ शब्दका प्रयोग होता है। भीरुक और भीरु—डरपोकके, बन्दारु और अभिवादक प्रणाम करनेवालेके, भूष्णु, भविष्णु और भविता होनेवालेके तथा ज्ञाता, विदुर और विन्दुक—ये जानकारके वाचक हैं। मत्त, शौण्ड, उत्कट और क्षीब—ये मतवालेके अर्थमें आते हैं (क्षीब शब्द नान्त भी होता है, इसके क्षीबा, क्षीबाणौ, क्षीबाणः इत्यादि रूप होते हैं)। चण्ड और अत्यन्त कोपन—ये अधिक क्रोध करनेवाले पुरुषके बोधक हैं। देवताओंका अनुसरण करनेवालेको देवद्र्यङ् और सब ओर जानेवालेको विष्वग्द्र्यङ् कहते हैं। इसी प्रकार साथ चलनेवाला सध्र्यङ् और तिरछा चलनेवाला तिर्यङ् कहलाता है। वाचोयुक्ति पटु, वाग्मी और वावदूक—ये कुशल वक्ताके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। बहुत अनाप-शनाप बकनेवालेको जल्पाक, वाचाल, वाचाट और बहुगर्ह्यवाक् कहते हैं। अपध्वस्त और धिक्कृत—ये धिक्कारे हुए पुरुषके वाचक हैं। कीलित और संयत शब्द बद्ध (बँधे हुए)-का बोध करानेवाले हैं॥ १—१०॥
रवण और शब्दन—ये आवाज करनेवालेके अर्थमें आते हैं। (नाटक आदिके आरम्भमें जो मङ्गलके लिये आशीर्वादयुक्त स्तुतिका पाठ किया जाता है, उसका नाम नान्दी है।) नान्दीपाठ करनेवालेको नान्दीवादी और नान्दीकर कहते हैं। व्यसनार्त और उपरक्त—ये पीड़ितके अर्थमें आते हैं। विहस्त और व्याकुल—ये शोकाकुल पुरुषका बोध करानेवाले हैं। नृशंस, क्रूर, घातक और पाप—ये दूसरोंसे द्रोह करनेवाले निर्दय मनुष्यके वाचक हैं। ठगको धूर्त और वञ्चक कहते हैं। वैदेह (वैधेय) और वालिश—ये मूर्खके वाचक हैं। कृपण और क्षुद्र—ये कदर्य (कंजूस)-के अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। मार्गण, याचक और अर्थी—ये याचना करनेवालेके अर्थमें आते हैं। अहंकारीको अहंकारवान् और अहंयु तथा शुभके भागीको शुभान्वित और शुभंयु कहते हैं। कान्त, मनोरम और रुच्य—ये सुन्दर अर्थके वाचक हैं। हृद्य, अभीष्ट और अभीप्सित—ये प्रियके समानार्थक शब्द हैं। असार, फल्गु तथा शून्य—ये निस्सार अर्थका बोध करानेवाले हैं। मुख्य, वर्य, वरेण्यक, श्रेयान्, श्रेष्ठ और पुष्कल—ये श्रेष्ठके वाचक हैं। प्राग्र्य, अग्र्य, अग्रीय तथा अग्रिय शब्द भी इसी अर्थमें आते हैं। वड्र, उरु और विपुल—ये विशाल अर्थके बोधक हैं। पीन, पीवन्, स्थूल और पीवर—ये स्थूल या मोटे अर्थका बोध करानेवाले हैं। स्तोक, अल्प, क्षुल्लक, सूक्ष्म, श्लक्ष्ण, दभ्र, कृश, तनु, मात्रा, त्रुटि, लव और कण—ये स्वल्प या सूक्ष्म अर्थके वाचक हैं। भूयिष्ठ, पुरुह और पुरु—ये अधिक अर्थके बोधक हैं। अखण्ड, पूर्ण और सकल—ये
- अध्याय ३६७ * ८०९
समग्रके वाचक हैं। उपकण्ठ, अन्तिक, अभितः, संनिधि और अभ्यास—ये समीपके अर्थमें आते हैं। अत्यन्त निकटको नेदिष्ठ कहते हैं। बहुत दूरके अर्थमें दविष्ठ शब्दका प्रयोग होता है। वृत्त, निस्तल और वर्तुल—ये गोलाकारके वाचक हैं। उच्च, प्रांशु, उन्नत और उदग्र—ये ऊँचेके अर्थमें आते हैं। ध्रुव, नित्य और सनातन—ये नित्य अर्थके बोधक हैं। आविद्ध, कुटिल, भुग्न, वेल्लित और वक्र—ये टेढ़ेका बोध करानेवाले हैं। चञ्चल और तरल—ये चपलके अर्थमें आते हैं। कठोर, जरठ और दृढ़—ये समानार्थक शब्द हैं। प्रत्यग्र, अभिनव, नव्य, नवीन, नूतन और नव—ये नयेके अर्थमें आते हैं। एकतान और अनन्यवृत्ति—ये एकाग्रचित्तवाले पुरुषके बोधक हैं। उच्छण्ड और अविलम्बित—ये फुर्तीके वाचक हैं। उच्चावच और नैकभेद—ये अनेक प्रकारके अर्थमें आते हैं। सम्बाध और कलित—ये संकीर्ण एवं गहनके बोधक हैं। तिमित, स्तिमित और क्लिन्न—ये आर्द्र या भीगे हुएके अर्थमें आते हैं। अभियोग और अभिग्रह—ये दूसरेपर किये हुए दोषारोपणके नाम हैं। स्फाति शब्द वृद्धिके और प्रथा शब्द ख्यातिके अर्थमें आता है। समाहार और समुच्चय—ये समूहके वाचक हैं। अपहार और अपचय—ये ह्रासका बोध करानेवाले हैं। विहार और परिक्रम—ये घूमनेके अर्थमें आते हैं। प्रत्याहार और उपादान—ये इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। निर्हार तथा अभ्यवकर्षण—ये शरीरमें धँसे हुए शस्त्रादिको युक्तिपूर्वक निकालनेके अर्थमें आते हैं। विघ्न, अन्तराय और प्रत्यूह—ये विघ्नका बोध करानेवाले हैं। आस्या, आसना और स्थिति—ये बैठनेकी क्रियाके बोधक हैं। संनिधि और संनिकर्ष—ये समीप रहनेके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। किलेमें प्रवेश करनेकी क्रियाको संक्रम और दुर्गसंचार कहते हैं। उपलम्भ और अनुभव—ये अनुभूतिके नाम हैं। प्रत्यादेश और निराकृति—ये दूसरेके मतका खण्डन करनेके अर्थमें आते हैं। परिरम्भ, परिष्वङ्ग, संश्लेष और उपगूहन—ये आलिङ्गनके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। पक्ष* और हेतु आदिके द्वारा निश्चित होनेवाले ज्ञानका नाम अनुमा या अनुमान है। बिना हथियारकी लड़ाई तथा भयभीत होनेपर किये हुए शब्दका नाम डिम्ब, भ्रमर (या डमर) तथा विप्लव है। शब्दके द्वारा जो परोक्ष अर्थका ज्ञान होता है, उसे शाब्दज्ञान कहते हैं। समानता देखकर जो उसके तुल्यवस्तुका बोध होता है, उसका नाम उपमान है। जहाँ कोई कार्य देखकर कारणका निश्चय किया जाय, अर्थात् अमुक कारणके बिना यह कार्य नहीं हो सकता—इस प्रकार विचार करके जो दूसरी वस्तु अर्थात् कारणका ज्ञान प्राप्त किया जाय, उसे अर्थापत्ति कहते हैं। प्रतियोगीका ग्रहण न होनेपर जो ऐसा कहा जाता है कि 'अमुक वस्तु पृथ्वीपर नहीं है, उसका नाम अभाव है। इस प्रकार मनुष्योंका ज्ञान बढ़ानेके लिये मैंने नाम और लिङ्ग-स्वरूप श्रीहरिका वर्णन किया है॥ ११—२८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोशगत सामान्य नामलिङ्गोंका कथन' नामक तीन सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६७॥
* जहाँ साध्यका संदेह हो अर्थात् जहाँ किसी वस्तुको सिद्ध करनेकी चेष्टा की जा रही हो—उसको 'पक्ष' कहते हैं तथा साध्यको सिद्ध करनेके लिये जो युक्ति दी जाती है, उसे 'हेतु' कहते हैं। जैसे 'पर्वतो वह्निमान् धूमवत्वात्' (पर्वतपर आग है; क्योंकि वहाँ धुँआ उठता है)। यहाँ वह्नि साध्य, पर्वत पक्ष और धूम हेतु है।
८१० * अग्निपुराण *
तीन सौ अड़सठवाँ अध्याय
नित्य, नैमित्तिक और प्राकृत प्रलयका वर्णन
**अग्निदेव कहते हैं—**मुनिवर! 'प्रलय' चार प्रकारका होता है—नित्य, नैमित्तिक, प्राकृत और आत्यन्तिक। जगत्में उत्पन्न हुए प्राणियोंकी जो सदा ही मृत्यु होती रहती है, उसका नाम 'नित्य प्रलय' है। एक हजार चतुर्युग बीतनेपर जब ब्रह्माजीका दिन समाप्त होता है, उस समय जो सृष्टिका लय होता है, वह 'ब्राह्म लय'के नामसे प्रसिद्ध है। इसीको 'नैमित्तिक प्रलय' भी कहते हैं। पाँचों भूतोंका प्रकृतिमें लीन होना 'प्राकृत प्रलय' कहलाता है तथा ज्ञान हो जानेपर जब आत्मा परमात्माके स्वरूपमें स्थित होता है, उस अवस्थाका नाम 'आत्यन्तिक प्रलय' है। कल्पके अन्तमें जो नैमित्तिक प्रलय होता है, इसके स्वरूपका मैं आपसे वर्णन करता हूँ। जब चारों युग एक हजार बार व्यतीत हो जाते हैं, उस समय यह भूमण्डल प्रायः क्षीण हो जाता है, तब सौ वर्षोंतक यहाँ बड़ी भयंकर अनावृष्टि होती है। उससे भूतलके सम्पूर्ण जीव-जन्तुओंका विनाश हो जाता है। तदनन्तर जगत्के स्वामी भगवान् विष्णु सूर्यकी सात किरणोंमें स्थित होकर पृथ्वी, पाताल और समुद्र आदिका सारा जल पी जाते हैं। इससे सर्वत्र जल सूख जाता है। तत्पश्चात् भगवान्की इच्छासे जलका आहार करके पुष्ट हुई वे ही सातों किरणें सात सूर्यके रूपमें प्रकट होती हैं। वे सातों सूर्य पातालसहित समस्त त्रिलोकीको जलाने लगते हैं।$^१$ उस समय यह पृथ्वी कछुएक़ी पीठके समान दिखायी देती है। फिर भगवान् शेषके श्वासोंसे 'कालाग्नि रुद्र'का प्रादुर्भाव होता है और वे नीचेके समस्त पातालोंको भस्म कर डालते हैं। पातालके पश्चात् भगवान् विष्णु भूलोकको, फिर भुवर्लोकको तथा सबके अन्तमें स्वर्गलोकको भी दग्ध कर देते हैं। उस समय समस्त त्रिभुवन जलते हुए भाड़-सा प्रतीत होता है। तदनन्तर भुवर्लोक और स्वर्ग—इन दो लोकोंके निवासी अधिक तापसे संतप्त होकर 'महर्लोक'में चले जाते हैं तथा महर्लोकसे जनलोकमें जाकर स्थित होते हैं। शेषरूपी भगवान् विष्णुके मुखोच्छ्वाससे प्रकट हुए कालाग्निरुद्र जब सम्पूर्ण जगत्को जला डालते हैं, तब आकाशमें नाना प्रकारके रूपवाले बादल उमड़ आते हैं, उनके साथ बिजलीकी गड़गड़ाहट भी होती है। वे बादल लगातार सौ वर्षोंतक वर्षा करके बढ़ी हुई आगको शान्त कर देते हैं। जब सप्तर्षियोंके स्थानतक पानी पहुँच जाता है, तब विष्णुके मुखसे निकली हुई साँससे सौ वर्षोंतक प्रचण्ड वायु चलती रहती है, जो उन बादलोंको नष्ट कर डालती है। फिर ब्रह्मारूपधारी भगवान् उस वायुको पीकर एकार्णवके जलमें शयन करते हैं। उस समय सिद्ध और महर्षिगण जलमें स्थित होकर भगवान्की स्तुति करते हैं और भगवान् मधुसूदन अपने 'वासुदेव' संज्ञक आत्माका चिन्तन करते हुए, अपनी ही दिव्य मायामयी योगनिद्राका आश्रय ले एक कल्पतक सोते रहते हैं। तदनन्तर जागनेपर वे ब्रह्माके रूपमें स्थित होकर पुनः जगत्की सृष्टि करते हैं। इस प्रकार जब ब्रह्माजीके दो परार्द्धकी आयु समाप्त हो जाती है, तब यह सारा स्थूल प्रपञ्च प्रकृतिमें लीन हो जाता है॥ १—१५॥
इकाई-दहाईके क्रमसे एकके बाद दसगुने स्थान नियत करके यदि गुणा करते चले जायँ तो अठारहवें स्थानतक पहुँचनेपर जो संख्या बनती है, उसे 'परार्द्ध' कहते हैं*। परार्द्धका दूना समय
* अध्याय ३६९ * ८११
व्यतीत हो जानेपर 'प्राकृत प्रलय' होता है। उस समय वर्षाके एकदम बंद हो जाने और सब ओर प्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित होनेके कारण सब कुछ भस्म हो जाता है। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त सभी विकारों (कार्यों)-का नाश हो जाता है। भगवान्के संकल्पसे होनेवाले उस प्राकृत प्रलयके प्राप्त होनेपर जल पहले पृथ्वीके गन्ध आदि गुणको ग्रस लेता है—अपनेमें लीन कर लेता है। तब गन्धहीन पृथ्वीका प्रलय हो जाता है—उस समय जलमें घुल-मिलकर वह जलरूप हो जाती है। उसके बाद रसमय जलकी स्थिति रहती है। फिर तेजस्तत्त्व जलके गुण रसको पी जाता है। इससे जलका लय हो जाता है। जलके लीन हो जानेपर अग्नितत्त्व प्रज्वलित होता रहता है। तत्पश्चात् तेजके प्रकाशमय गुण रूपको वायुतत्त्व ग्रस लेता है। इस प्रकार तेजके शान्त हो जानेपर अत्यन्त प्रबल एवं प्रचण्ड वायु बड़े वेगसे चलने लगती है। फिर वायुके गुण स्पर्शको आकाश अपनेमें लीन कर लेता है। गुणके साथ ही वायुका नाश होनेपर केवल नीरव आकाशमात्र रह जाता है। तदनन्तर भूतादि (तामस अहंकार) आकाशके गुण शब्दको ग्रस लेता है तथा तैजस अहंकार इन्द्रियोंको अपनेमें लीन कर लेता है। इसके बाद महत्तत्त्व अभिमान स्वरूप भूतादि एवं तैजस अहंकारको ग्रस लेता है। इस तरह पृथ्वी जलमें लीन होती है, जल तेजमें समा जाता है, तेजका वायुमें, वायुका आकाशमें और आकाशका अहंकारमें लय होता है। फिर अहंकार महत्तत्त्वमें प्रवेश कर जाता है। ब्रह्मन्! उस महत्तत्त्वको भी प्रकृति ग्रस लेती है। प्रकृतिके दो स्वरूप हैं—'व्यक्त' और 'अव्यक्त'। इनमें व्यक्त प्रकृतिका अव्यक्त प्रकृतिमें लय होता है। एक, अविनाशी और शुद्धस्वरूप जो पुरुष है, वह भी परमात्माका ही अंश है, अतः अन्तमें प्रकृति और पुरुष—ये दोनों परमात्मामें लीन हो जाते हैं। परमात्मा सत्स्वरूप ज्ञेय और ज्ञानमय है। वह आत्मा (बुद्धि आदि)-से सर्वथा परे है। वही सबका ईश्वर—'सर्वेश्वर' कहलाता है। उसमें नाम और जाति आदिकी कल्पनाएँ नहीं हैं॥ १६—२७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नित्य, नैमित्तिक तथा प्राकृत प्रलयका वर्णन' नामक तीन सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६८॥
तीन सौ उनहत्तरवाँ अध्याय
आत्यन्तिक प्रलय एवं गर्भकी उत्पत्तिका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठजी! अब मैं 'आत्यन्तिक प्रलय' का वर्णन करूँगा। जब जगत्के आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक संतापोंको जानकर मनुष्यको अपनेसे भी वैराग्य हो जाता है, उस समय उसे ज्ञान होता है और ज्ञानसे इस सृष्टिका आत्यन्तिक प्रलय होता है (यही जीवात्माका मोक्ष है)। आध्यात्मिक संताप 'शारीरिक' और 'मानसिक' भेदसे दो प्रकारका
*इन अठारह संख्याओंमें यदि एकको भी गिन लें, अर्थात् एकके बाद सत्रह शून्य लगावें तो वर्तमान गणनाके अनुसार यह संख्या एक शंखके बराबर होती है और यदि एकके बाद अठारह शून्य लगाये जायें तो यह संख्या महाशंखके बराबर होती है। यह शंख और महाशंख ही 'परार्द्ध' है।
८१२ * अग्निपुराण *
होता है। ब्रह्मन्! शारीरिक तापके भी अनेकों भेद हैं, उन्हें श्रवण कीजिये। जीव भोगदेहका परित्याग करके अपने कर्मोंके अनुसार पुनः गर्भमें आता है। वसिष्ठजी! एक 'आतिवाहिक' संज्ञक शरीर होता है, वह केवल मनुष्योंको मृत्युकाल उपस्थित होनेपर प्राप्त होता है। विप्रवर! यमराजके दूत मनुष्यके उस आतिवाहिक शरीरको यमलोकके मार्गसे ले जाते हैं। मुने! दूसरे प्राणियोंको न तो आतिवाहिक शरीर मिलता है और न वे यमलोकके मार्गसे ही ले जाये जाते हैं। तदनन्तर यमलोकमें गया हुआ जीव कभी स्वर्गमें और कभी नरकमें जाता है। जैसे रहट नामक यन्त्रमें लगे हुए घड़े कभी पानीमें डूबते हैं और कभी ऊपर आते हैं, उसी तरह जीवको कभी स्वर्ग और कभी नरकमें चक्कर लगाना पड़ता है। ब्रह्मन्! यह लोक कर्मभूमि है और परलोक फलभूमि। यमराज जीवको उसके कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियों तथा नरकोंमें डाला करते हैं। यमराज ही जीवोंद्वारा नरकोंको परिपूर्ण बनाये रखते हैं। यमराजको ही इनका नियामक समझना चाहिये। जीव वायुरूप होकर गर्भमें प्रवेश करते हैं। यमदूत जब मनुष्यको यमराजके पास ले जाते हैं, तब वे उसकी ओर देखते हैं। (उसके कर्मोंपर विचार करते हैं—) यदि कोई धर्मात्मा होता है तो उसकी पूजा करते हैं और यदि पापी होता है तो अपने घरपर उसे दण्ड देते हैं। चित्रगुप्त उसके शुभ और अशुभ कर्मोंका विवेचन करते हैं। धर्मके ज्ञाता वसिष्ठजी! जबतक बन्धु-बान्धवोंका अशौच निवृत्त नहीं होता, तबतक जीव आतिवाहिक शरीरमें ही रहकर दिये हुए पिण्डोंको भोजनके रूपमें अपने साथ ले जाता है। तत्पश्चात् प्रेतलोकमें पहुँचकर प्रेतदेह (आतिवाहिक शरीर)-का त्याग करता है और दूसरा शरीर (भोगदेह) पाकर वहाँ भूख-प्याससे युक्त हो निवास करता है। उस समय उसे वही भोजनके लिये मिलता है, जो श्राद्धके रूपमें उसके निमित्त कच्चा अन्न दिया गया होता है। प्रेतके निमित्त पिण्डदान किये बिना उसको आतिवाहिक शरीरसे छुटकारा नहीं मिलता, वह उसी शरीरमें रहकर केवल पिण्डोंका भोजन करता है। सपिण्डीकरण श्राद्ध करनेपर एक वर्षके पश्चात् वह प्रेतदेहको छोड़कर भोगदेहको प्राप्त होता है। 'भोगदेह' दो प्रकारके बताये गये हैं— शुभ और अशुभ। भोगदेहके द्वारा कर्मजनित बन्धनोंको भोगनेके पश्चात् जीव मर्त्यलोकमें गिरा दिया जाता है। उस समय उसके त्यागे हुए भोगदेहको निशाचर खा जाते हैं। ब्रह्मन्! यदि जीव भोगदेहके द्वारा पहले पुण्यके फलस्वरूप स्वर्गका सुख भोग लेता है और पाप भोगना शेष रह जाता है तो वह पापियोंके अनुरूप दूसरा भोगशरीर धारण करता है। परंतु जो पहले पापका फल भोगकर पीछे स्वर्गका सुख भोगता है, वह भोग समाप्त होनेपर स्वर्गसे भ्रष्ट होकर पवित्र आचार-विचारवाले धनवानोंके घरमें जन्म लेता है। वसिष्ठजी! यदि जीव पुण्यके रहते हुए पहले पाप भोगता है तो उसका भोग समाप्त होनेपर वह पुण्यभोगके लिये उत्तम (देवोचित) शरीर धारण करता है। जब कर्मका भोग थोड़ा-सा ही शेष रह जाता है तो जीवको नरकसे भी छुटकारा मिल जाता है। नरकसे निकला हुआ जीव पशु-पक्षी आदि तिर्यग्योनिमें ही जन्म लेता है; इसमें तनिक भी संदेह नहीं है॥ १-१८॥
(मानवयोनिके) गर्भमें प्रविष्ट हुआ जीव पहले महीनेमें कलल (रज-वीर्यके मिश्रित बिन्दु)-के रूपमें रहता है, दूसरे महीनेमें वह घनीभूत
- अध्याय ३६९ * ८१३
होता है (कठोर मांसपिण्डका रूप धारण करता है और) तीसरे महीने शरीरके अवयव प्रकट हो जाते हैं। चौथे महीनेमें हड्डी, मांस और त्वचाका प्राकट्य होता है। पाँचवेंमें रोएँ निकल आते हैं। छठे महीनेमें उसके भीतर चेतना आती है और सातवेंसे वह दुःखका अनुभव करने लगता है। उसका सारा शरीर झिल्लियोंमें लिपटा होता है और मस्तकके पास उसके जुड़े हुए हाथ बँधे रहते हैं। यदि गर्भका बालक नपुंसक हो तो वह उदरके मध्यभागमें रहता है, कन्या हो तो वामभागमें और पुत्र हो तो दायें भागमें रहा करता है। पेटके विभिन्न भागोंमें रहकर वह पीठकी ओर मुँह किये रहता है। जिस योनिमें वह रहता है, उसका उसे अच्छी तरह ज्ञान होता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। इतना ही नहीं, वह मनुष्यजन्मसे लेकर वर्तमान जन्मतकके अपने सभी वृत्तान्तोंका स्मरण करता है। गर्भके उस अन्धकारमें जीवको बड़े कष्टका अनुभव होता है। सातवें महीनेमें वह माताके खाये-पीये हुए पदार्थोंका रस पीने लगता है। आठवें और नवें महीनेमें उसको गर्भके भीतर बड़ा उद्वेग होता है। मैथुन होनेपर तो उसे और भी वेदना होती है। माताके अधिक परिश्रम करनेपर भी गर्भके बालकको कष्ट होता है। यदि माँ रोगिणी हो जाय तो बालकको भी रोगका कष्ट भोगना पड़ता है। उसके लिये एक मुहूर्त (दो घड़ी) भी सौ वर्षोंके समान हो जाता है ॥ १९-२५ ॥
जीव अपने कर्मोंके अनुसार गर्भमें संतप्त होता है। फिर वह ऐसे मनोरथ करने लगता है, मानो गर्भसे निकलते ही मोक्षके साधनभूत ज्ञानके प्रयत्नमें लग जायगा। प्रसूति-वायुकी प्रेरणासे उसका सिर नीचेकी ओर हो जाता है और वह योनियन्त्रसे पीड़ित होता हुआ गर्भसे बाहर निकल आता है। बाहर आनेपर एक महीनेतक उसकी ऐसी स्थिति रहती है कि कोई हाथसे छूता है तो भी उसे कष्ट होता है। 'ख' शब्दवाच्य आकाशसे शरीरके भीतर छोटे-छोटे छेद, कान तथा शून्यता (अवकाश आदि) उत्पन्न होते हैं। श्वासोच्छ्वास, गति और अङ्गोंको टेढ़ा- मेढ़ा करके किसीका स्पर्श करना - ये सब वायुके कार्य हैं। रूप, नेत्र, गर्मी, पाचन-क्रिया, पित्त, मेधा, वर्ण, बल, छाया, तेज और शौर्य- ये शरीरमें अग्नितत्त्वसे प्रकट होते हैं। पसीना, रसना (स्वादका अनुभव करनेवाली जिह्वा), क्लेद (गलना), वसा (चर्बी), रसा (रस- ग्रहणकी शक्ति), शुक्र (वीर्य), मूत्र और कफ आदिका जो देहमें प्रादुर्भाव होता है, वह जलका कार्य है। घ्राणेन्द्रिय, केश, नख और शिराएँ (नाड़ियाँ) भूमितत्त्वसे प्रकट होती हैं। शरीरमें जो कोमल पदार्थ - त्वचा, मांस, हृदय, नाभि, मज्जा, मल, मेदा, क्लेदन और आमाशय आदि हैं, वे माताके रजसे उत्पन्न होते हैं। शिरा, स्नायु और शुक्रका प्रादुर्भाव पितासे होता है तथा काम, क्रोध, भय, हर्ष, धर्माधर्ममें प्रवृत्ति, आकृति, स्वर, वर्ण और मेहन (मूत्रादिकी क्रिया) आदि जीवके शरीरमें स्वतः प्रकट होते हैं (ये दोष और गुण उसके अपने हैं)। अज्ञान, प्रमाद, आलस्य, क्षुधा, तृषा, मोह, मात्सर्य, वैगुण्य, शोक, आभास और भय आदि भाव तमोगुणसे होते हैं। महामुने ! काम, क्रोध, शौर्य, यज्ञकी अभिलाषा, बहुत बोलनेकी आदत, अहंकार तथा दूसरोंका अनादर करना - ये रजोगुणके कार्य हैं। धर्मकी अभिलाषा, मोक्षकी आकाङ्क्षा, भगवान् विष्णुमें पराभक्तिका होना, उदारता और उद्योगशीलता - इन्हें सत्त्वगुणसे उत्पन्न समझना चाहिये ॥ २६-३६ ॥
चञ्चल, क्रोधी, डरपोक, अधिक बातूनी, कलहमें रुचि रखनेवाला तथा स्वप्नमें आकाश-
८९४ * अग्निपुराण *
मार्गसे उड़नेवाला मनुष्य अधिक वातवाला होता है—उसमें वातकी प्रधानता होती है। जिसके असमयमें ही बाल सफेद हो जायँ, जो क्रोधी, महाबुद्धिमान् और युद्धको पसंद करनेवाला हो, जिसे सपनेमें प्रकाशमान वस्तुएँ अधिक दिखायी देती हों, उसे पित्तप्रधान प्रकृतिका मनुष्य समझना चाहिये। जिसकी मैत्री, उत्साह और अङ्ग सभी स्थिर हों, जो धन आदिसे सम्पन्न हो तथा जिसे स्वप्नमें जल एवं श्वेत पदार्थोंका अधिक दर्शन होता हो, उस मनुष्यमें कफकी प्रधानता है। प्राणियोंके शरीरमें रस जीवन देनेवाला होता है, रक्त लेपनका कार्य करता है तथा मांस मेहन एवं स्नेहन क्रियाका प्रयोजक है। हड्डी और मज्जाका काम है शरीरको धारण करना। वीर्यकी वृद्धि शरीरको पूर्ण बनानेवाली होती है। ओज शुक्र एवं वीर्यका उत्पादक है; वही जीवकी स्थिति और प्राणकी रक्षा करनेवाला है। ओज शुक्रकी अपेक्षा भी अधिक सार वस्तु है। वह हृदयके समीप रहता है और उसका रंग कुछ-कुछ पीला होता है। दोनों जंघे (ये समस्त पैरके उपलक्षण हैं), दोनों भुजाएँ, उदर और मस्तक—ये छः अङ्ग बताये गये हैं। त्वचाके छः स्तर हैं। एक तो वही है, जो बाहर दिखायी देती है। दूसरी वह है, जो रक्त धारण करती है। तीसरी किलास (धातुविशेष) और चौथी कुण्ड (धातुविशेष)— को धारण करनेवाली है। पाँचवीं त्वचा इन्द्रियोंका स्थान है और छठी प्राणोंको धारण करनेवाली मानी गयी है। कला भी सात प्रकारकी है—पहली मांस धारण करनेवाली, दूसरी रक्तधारिणी, तीसरी जिगर एवं प्लीहाको आश्रय देनेवाली, चौथी मेदा और अस्थि धारण करनेवाली, पाँचवीं मज्जा, श्लेष्मा और पुरीषको धारण करनेवाली, जो पक्वाशयमें स्थित रहती है, छठी पित्त धारण करनेवाली और सातवीं शुक्र धारण करनेवाली है। वह शुक्राशयमें स्थित रहती है॥ ३७—४५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'आत्यन्तिक प्रलय तथा गर्भकी उत्पत्तिका वर्णन' नामक तीन सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६९॥
तीन सौ सत्तरवाँ अध्याय
शरीरके अवयव
अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठजी! कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। आकाश सभी भूतोंमें व्यापक है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये क्रमशः आकाश आदि पाँच भूतोंके गुण हैं। गुदा, उपस्थ (लिङ्ग या योनि), हाथ, पैर और वाणी—ये 'कर्मेन्द्रिय' कहे गये हैं। मलत्याग, विषयजनित आनन्दका अनुभव, ग्रहण, चलन तथा वार्तालाप—ये क्रमशः उपर्युक्त इन्द्रियोंके कार्य हैं। पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच इन्द्रियोंके विषय, पाँच महाभूत, मन, बुद्धि, आत्मा (महत्तत्त्व), अव्यक्त (मूल प्रकृति)—ये चौबीस तत्त्व हैं। इन सबसे परे है—पुरुष। वह इनसे संयुक्त भी रहता है और पृथक् भी; जैसे मछली और जल—ये दोनों एक साथ संयुक्त भी रहते हैं और पृथक् भी। रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण—ये अव्यक्तके आश्रित हैं। अन्तःकरणकी उपाधिसे युक्त पुरुष 'जीव' कहलाता है, वही निरुपाधिक स्वरूपसे 'परब्रह्म' कहा गया है, जो सबका कारण है। जो मनुष्य इस परम पुरुषको जान लेता है, वह
- अध्याय ३७० * ८१५
परमपदको प्राप्त होता है। इस शरीरके भीतर सात 'आशय' माने गये हैं—पहला रुधिराशय, दूसरा श्लेष्माशय, तीसरा आमाशय, चौथा पित्ताशय, पाँचवाँ पक्वाशय, छठा वाताशय और सातवाँ मूत्राशय। स्त्रियोंके इन सातके अतिरिक्त एक आठवाँ आशय भी होता है, जिसे 'गर्भाशय' कहते हैं। अग्निसे पित्त और पित्तसे पक्वाशय होता है। ऋतुकालमें स्त्रीकी योनि कुछ फैल जाती है। उसमें स्थापित किया हुआ वीर्य गर्भाशयतकत पहुँच जाता है। गर्भाशय कमलके आकारका होता है। वही अपनेमें रज और वीर्यको धारण करता है। वीर्यसे शरीर और समयानुसार उसमें केश प्रकट होते हैं। ऋतुकालमें भी यदि योनि वात, पित्त और कफसे आवृत हो तो उसमें विकास (फैलाव) नहीं आता। (ऐसी दशामें वह गर्भ-धारणके योग्य नहीं रहती।) महाभाग! बुक्कसे पुक्कस, प्लीहा, यकृत्, कोष्ठाङ्ग, हृदय, व्रण तथा तण्डक होते हैं। ये सभी आशयमें निबद्ध हैं। प्राणियोंके पकाये जानेवाले रसके सारसे प्लीहा और यकृत् होते हैं। धर्मके ज्ञाता वसिष्ठजी! रक्तके फेनसे पुक्कसकी उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार रक्त, पित्त तथा तण्डक भी उत्पन्न होते हैं। मेदा और रक्तके प्रसारसे बुक्काकी उत्पत्ति होती है। रक्त और मांसके प्रसारसे देहधारियोंकी आँतें बनती हैं। पुरुषकी आँतोंका परिमाण साढ़े तीन व्याम बताया जाता है और वेदवेत्ता पुरुष स्त्रियोंकी आँतें तीन व्याम लंबी बतलाते हैं। रक्त और वायुके संयोगसे कामका उदय होता है। कफके प्रसारसे हृदय प्रकट होता है। उसका आकार कमलके समान है। उसका मुख नीचेकी ओर होता है तथा उसके मध्यका जो आकाश है, उसमें जीव स्थित रहता है। चेतनतासे सम्बन्ध रखनेवाले सभी भावोंकी स्थिति वही है। हृदयके वामभागमें प्लीहा और दक्षिणभागमें यकृत् है तथा इसी प्रकार हृदयकमलके दक्षिणभागमें क्लोम (फुप्फुस)-की भी स्थिति बतायी गयी है। इस शरीरमें कफ और रक्तको प्रवाहित करनेवाले जो-जो स्रोत हैं, उनके भूतानुमानसे इन्द्रियोंकी उत्पत्ति होती है। नेत्रमण्डलका जो श्वेतभाग है, वह कफसे उत्पन्न होता है। उसका प्राकट्य पिताके वीर्यसे माना गया है तथा नेत्रोंका जो कृष्ण-भाग है, वह माताके रज एवं वातके अंशसे प्रकट होता है। त्वचामण्डलकी उत्पत्ति पित्तसे होती है। इसे माता और पिता—दोनोंके अंशसे उत्पन्न समझना चाहिये। मांस, रक्त और कफसे जिह्वाका निर्माण होता है। मेदा, रक्त, कफ और मांससे अण्डकोषकी उत्पत्ति होती है। प्राणके दस आश्रय जानने चाहिये—मूर्द्धा, हृदय, नाभि, कण्ठ, जिह्वा, शुक्र, रक्त, गुद, वस्ति (मूत्राशय) और गुल्फ (पाँवकी गाँठ या घुट्टी) तथा 'कण्डरा' (नसें) सोलह बतायी गयी हैं। दो हाथमें, दो पैरमें, चार पीठमें, चार गलेमें तथा चार पैरसे लेकर सिरतक समूचे शरीरमें हैं। इसी प्रकार 'जाल' भी सोलह बताये गये हैं। मांसजाल, स्नायुजाल, शिराजाल और अस्थिजाल—ये चारों पृथक्-पृथक् दोनों कलाइयों और पैरकी दोनों गाँठोंमें परस्पर आबद्ध हैं। इस शरीरमें छः कूर्च माने गये हैं। मनीषी पुरुषोंने दोनों हाथ, दोनों पैर, गला और लिङ्ग—इन्हींमें उनका स्थान बताया है। पृष्ठके मध्यभागमें जो मेरुदण्ड है, उसके निकट चार मांसमयी डोरियाँ हैं तथा उतनी ही पेशियाँ भी हैं, जो उन्हें बाँधे रखती हैं। सात सीरणियाँ हैं। इनमेंसे पाँच तो मस्तकके आश्रित हैं और एक-एक मेढ्र (लिङ्ग) तथा जिह्वामें है। हड्डियाँ अठारह हजार हैं। सूक्ष्म और स्थूल—दोनों मिलाकर चौंसठ दाँत हैं। बीस नख हैं। इनके अतिरिक्त हाथ और पैरोंकी शलाकाएँ हैं, जिनके चार स्थान हैं। अँगुलियोंमें
८१६ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
साठ, एड़ियोंमें दो, गुल्फोंमें चार, अरत्नियोंमें चार और जंघोंमें भी चार ही हड्डियाँ हैं। घुटनोंमें दो, गालोंमें दो, ऊरूओंमें दो तथा फलकोंके मूलभागमें भी दो ही हड्डियाँ हैं। इन्द्रियोंके स्थानों तथा श्रोणिफलकमें भी इसी प्रकार दो-दो हड्डियाँ बतायी गयी हैं। भगमें भी थोड़ी-सी हड्डियाँ हैं। पीठमें पैंतालीस और गलेमें भी पैंतालीस हैं। गलेकी हसली, ठोड़ी तथा उसकी जड़में दो-दो अस्थियाँ हैं। ललाट, नेत्र, कपोल, नासिका, चरण, पसली, तालु तथा अर्बुद—इन सबमें सूक्ष्मरूपसे बहत्तर हड्डियाँ हैं। मस्तकमें दो शङ्ख और चार कपाल हैं तथा छातीमें सत्रह हड्डियाँ हैं। संधियाँ दो सौ दस बतायी गयी हैं। इनमेंसे शाखाओंमें अड़सठ तथा उनसठ हैं और अन्तरामें तिरासी संधियाँ बतायी गयी हैं। स्नायुकी संख्या नौ सौ है, जिनमेंसे अन्तराधिमें दो सौ तीस हैं, सत्तर ऊर्ध्वगामी हैं और शाखाओंमें छः सौ स्नायु हैं। पेशियाँ पाँच सौ बतलायी गयी हैं। इनमें चालीस तो ऊर्ध्वगामिनी हैं, चार सौ शाखाओंमें हैं और साठ अन्तराधिमें हैं। स्त्रियोंकी मांसपेशियाँ पुरुषोंकी अपेक्षा सत्ताईस अधिक हैं। इनमें दस दोनों स्तनोंमें, तेरह योनिमें तथा चार गर्भाशयमें स्थित हैं। देहधारियोंके शरीरमें तीस हजार नौ तथा छप्पन हजार नाड़ियाँ हैं। जैसे छोटी-छोटी नालियाँ क्यारियोंमें पानी बहाकर ले जाती हैं, उसी प्रकार वे नाड़ियाँ सम्पूर्ण शरीरमें रसको प्रवाहित करती हैं। क्लेद और लेप आदि उन्हींके कार्य हैं। महामुने ! इस देहमें बहत्तर करोड़ छिद्र या रोमकूप हैं तथा मज्जा, मेदा, वसा, मूत्र, पित्त, श्लेष्मा, मल, रक्त और रस—इनकी क्रमशः 'अञ्जलियाँ' मानी गयी हैं। इनमेंसे पूर्व-पूर्व अञ्जलीकी अपेक्षा उत्तरोत्तर सभी अञ्जलियाँ मात्रामें डेढ़-गुनी अधिक हैं। एक अञ्जलिमें आधी वीर्यकी और आधी ओजकी है। विद्वानोंने स्त्रियोंके रजकी चार अञ्जलियाँ बतायी हैं। यह शरीर मल और दोष आदिका पिण्ड है, ऐसा समझकर अपने अन्तःकरणमें इसके प्रति होनेवाली आसक्तिका त्याग करना चाहिये ॥ १—४३ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शरीरावयवविभागका वर्णन' नामक तीन सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३७० ॥
तीन सौ इकहत्तरवाँ अध्याय
प्राणियोंकी मृत्यु, नरक तथा पापमूलक जन्मका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—मुने! मैं यमराजके मार्गकी पहले चर्चा कर चुका हूँ, इस समय मनुष्योंकी मृत्युके विषयमें कुछ निवेदन करूँगा। शरीरमें जब वातका वेग बढ़ जाता है तो उसकी प्रेरणासे ऊष्मा अर्थात् पित्तका भी प्रकोप हो जाता है। वह पित्त सारे शरीरको रोककर सम्पूर्ण दोषोंको आवृत कर लेता है तथा प्राणोंके स्थान और मर्मोंका उच्छेद कर डालता है। फिर शीतसे वायुका प्रकोप होता है और वायु अपने निकलनेके लिये छिद्र ढूँढ़ने लगती है। दो नेत्र, दो कान, दो नासिका और एक ऊपरका ब्रह्मरन्ध्र—ये सात छिद्र हैं तथा आठवाँ छिद्र मुख है। शुभ कार्य करनेवाले मनुष्योंके प्राण प्रायः इन्हीं सात मार्गोंसे निकलते हैं। नीचे भी दो छिद्र हैं—गुदा और उपस्थ। पापियोंके प्राण इन्हीं छिद्रोंसे बाहर होते हैं, परंतु योगीके प्राण मस्तकका भेदन
- अध्याय ३७१ * ८१७
करके निकलते हैं और वह जीव इच्छानुसार लोकोंमें जाता है। अन्तकाल आनेपर प्राण अपानमें स्थित होता है। तमके द्वारा ज्ञान आवृत्त हो जाता है, मर्मस्थान आच्छादित हो जाते हैं। उस समय जीव वायुके द्वारा बाधित हो नाभिस्थानसे विचलित कर दिया जाता है; अतः वह आठ अङ्गोंवाली प्राणोंकी वृत्तियोंको लेकर शरीरसे बाहर हो जाता है। देहसे निकलते, अन्यत्र जन्म लेते अथवा नाना प्रकारकी योनियोंमें प्रवेश करते समय जीवको सिद्ध पुरुष और देवता ही अपनी दिव्यदृष्टिसे देखते हैं। मृत्युके बाद जीव तुरंत ही आतिवाहिक शरीर धारण करता है। उसके त्यागे हुए शरीरसे आकाश, वायु और तेज—ये ऊपरके तीन तत्त्वोंमें मिल जाते हैं तथा जल और पृथ्वीके अंश नीचेके तत्त्वोंसे एकीभूत हो जाते हैं। यही पुरुषका ‘पञ्चत्वको प्राप्त होना’ माना गया है। मरे हुए जीवको यमदूत शीघ्र ही आतिवाहिक शरीरमें पहुँचाते हैं। यमलोकका मार्ग अत्यन्त भयंकर और छियासी हजार योजन लंबा है। उसपर ले जाया जानेवाला जीव अपने बन्धु-बान्धवोंके दिये हुए अन्न-जलका उपभोग करता है। यमराजसे मिलनेके पश्चात् उनके आदेशसे चित्रगुप्त जिन भयंकर नरकोंको बतलाते हैं, उन्हींको वह जीव प्राप्त होता है। यदि वह धर्मात्मा होता है, तो उत्तम मागोंसे स्वर्गलोकको जाता है॥ १-१२॥
अब पापी जीव जिन नरकों और उनकी यातनाओंका उपभोग करते हैं, उनका वर्णन करता हूँ। इस पृथ्वीके नीचे नरककी अट्ठाईस ही श्रेणियाँ हैं। सातवें तलके अन्तमें घोर अन्धकारके भीतर उनकी स्थिति है। नरककी पहली कोटि ‘घोरा’के नामसे प्रसिद्ध है। उसके नीचे ‘सुघोरा’की स्थिति है। तीसरी ‘अतिघोरा’, चौथी ‘महाघोरा’ और पाँचवीं ‘घोररूपा’ नामकी कोटि है। छठीका नाम ‘तरलतारा’ और सातवींका ‘भयानका’ है। आठवीं ‘भयोत्कटा’, नवीं ‘कालरात्रि’ दसवीं ‘महाचण्डा’, ग्यारहवीं ‘चण्डा’, बारहवीं ‘कोलाहला’, तेरहवीं ‘प्रचण्डा’, चौदहवीं ‘पद्मा’ और पंद्रहवीं ‘नरकनायिका’ है। सोलहवीं ‘पद्मावती’, सत्रहवीं ‘भीषणा’, अठारहवीं ‘भीमा’, उन्नीसवीं ‘करालिका’, बीसवीं ‘विकराला’, इक्कीसवीं ‘महावज्रा’, बाईसवीं ‘त्रिकोणा’ और तेईसवीं ‘पञ्चकोणिका’ है। चौबीसवीं ‘सुदीर्घा’, पचीसवीं ‘वर्तुला’, छब्बीसवीं ‘सप्तभूमा’, सत्ताईसवीं ‘सुभूमिका’ और अट्ठाईसवीं ‘दीप्तमाया’ है। इस प्रकार ये अट्ठाईस कोटियाँ पापियोंको दुःख देनेवाली हैं॥ १३-१८॥
नरकोंकी अट्ठाइस कोटियोंके पाँच-पाँच नायक हैं (तथा पाँच उनके भी नायक हैं)। वे ‘रौरव’ आदिके नामसे प्रसिद्ध हैं। उन सबकी संख्या एक सौ पैंतालीस है—तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, रौरव, असिपत्रवन, लोहभार, कालसूत्रनरक, महानरक, संजीवन, महावीचि, तपन, सम्प्रतापन, संघात, काकोल, कुड़मल, पूतमृत्युक, लोहशङ्कु, ऋजीष, प्रधान, शाल्मली वृक्ष और वैतरणी नदी आदि सभी नरकोंको ‘कोटि-नायक’ समझना चाहिये। ये बड़े भयंकर दिखायी देते हैं। पापी पुरुष इनमेंसे एक-एकमें तथा अनेकमें भी डाले जाते हैं। यातना देनेवाले यमदूतोंमें किसीका मुख बिलावके समान होता है तो किसीका उल्लूके समान, कोई गीदड़के समान मुखवाले हैं तो कोई गृध्र आदिके समान। वे मनुष्यको तेलके कड़ाहेमें डालकर उसके नीचे आग जला देते हैं। किन्हींको भाड़में, किन्हींको ताँबे या तपाये हुए लोहेके बर्तनोंमें तथा बहुतोंको आगकी चिनगारियोंमें डाल देते हैं। कितनोंको वे शूलीपर चढ़ा देते हैं। बहुत-से पापियोंको नरकमें डालकर उनके टुकड़े-टुकड़े किये जाते
८१८ * अग्निपुराण *
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हैं। कितने ही कोड़ोंसे पीटे जाते हैं और कितनोंको तपाये हुए लोहेके गोले खिलाये जाते हैं। बहुत-से यमदूत उनको धूलि, विष्ठा, रक्त और कफ आदि भोजन कराते तथा तपायी हुई मदिरा पिलाते हैं। बहुत-से जीवोंको वे आरेसे चीर डालते हैं। कुछ लोगोंको कोल्हूमें पेरते हैं। कितनोंको कौवे आदि नोच-नोचकर खाते हैं। किन्हीं-किन्हींके ऊपर गरम तेल छिड़का जाता है तथा कितने ही जीवोंके मस्तकके अनेकों टुकड़े किये जाते हैं। उस समय पापी जीव 'अरे बाप रे' कहकर चिल्लाते हैं और हाहाकार मचाते हुए अपने पापकर्मोंकी निन्दा करते हैं। इस प्रकार बड़े-बड़े पातकोंके फलस्वरूप भयंकर एवं निन्दित नरकोंका कष्ट भोगकर कर्म क्षीण होनेके पश्चात् वे महापापी जीव पुनः इस मर्त्यलोकमें जन्म लेते हैं ॥ १९-२९ १/२ ॥
ब्रह्महत्यारा पुरुष मृग, कुत्ते, सूअर और ऊँटोंकी योनिमें जाता है। मदिरा पीनेवाला गदहे, चाण्डाल तथा म्लेच्छोंमें जन्म पाता है। सोना चुरानेवाले कीड़े-मकोड़े और पतंगे होते हैं तथा गुरुपत्नीसे गमन करनेवाला मनुष्य तृण एवं लताओंमें जन्म ग्रहण करता है। ब्रह्महत्यारा राजयक्ष्माका रोगी होता है, शराबीके दाँत काले हो जाते हैं, सोना चुरानेवालेका नख खराब होता है तथा गुरुपत्नीगामीके चमड़े दूषित होते हैं (अर्थात् वह कोढ़ी हो जाता है)। जो जिस पापसे सम्पर्क रखता है, वह उसीका कोई चिह्न लेकर जन्म ग्रहण करता है। अन्न चुरानेवाला मायावी होता है। वाणी (कविता आदि)-की चोरी करनेवाला गूँगा होता है। धान्यका अपहरण करनेवाला जब जन्म ग्रहण करता है, तब उसका कोई अङ्ग अधिक होता है, चुगलखोरकी नासिकासे बदबू आती है, तेल चुरानेवाला पुरुष तेल पीनेवाला कीड़ा होता है तथा जो इधरकी बातें उधर लगाया करता है, उसके मुँहसे दुर्गन्ध आती है। दूसरोंकी स्त्री तथा ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाला पुरुष निर्जन वनमें ब्रह्मराक्षस होता है। रत्न चुरानेवाला नीच जातिमें जन्म लेता है। उत्तम गन्धकी चोरी करनेवाला छछूंदर होता है। शाक-पात चुरानेवाला मुर्गा तथा अनाजकी चोरी करनेवाला चूहा होता है। पशुका अपहरण करनेवाला बकरा, दूध चुरानेवाला कौवा, सवारीकी चोरी करनेवाला ऊँट तथा फल चुराकर खानेवाला बन्दर होता है। शहदकी चोरी करनेवाला डाँस, फल चुरानेवाला गृध्र तथा घरका सामान हड़प लेनेवाला गृहकाक होता है। वस्त्र हड़पनेवाला कोढ़ी, चोरी-चोरी रसका स्वाद लेनेवाला कुत्ता और नमक चुरानेवाला झींगुर होता है ॥ ३०-३७ १/२ ॥
यह 'आधिदैविक ताप' का वर्णन किया गया है। शस्त्र आदिसे कष्टकी प्राप्ति होना 'आधिभौतिक ताप' है तथा ग्रह, अग्नि और देवता आदिसे जो कष्ट होता है, वह 'आधिदैविक ताप' बतलाया गया है। इस प्रकार यह संसार तीन प्रकारके दुःखोंसे भरा हुआ है। मनुष्यको चाहिये कि ज्ञानयोगसे, कठोर व्रतोंसे, दान आदि पुण्योंसे तथा विष्णुकी पूजा आदिसे इस दुःखमय संसारका निवारण करे ॥ ३८-४० ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नरकादि-निरूपण' नामक तीन सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३७१ ॥
- अध्याय ३७२ * ८९९
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तीन सौ बहत्तरवाँ अध्याय
यम और नियमोंकी व्याख्या; प्रणवकी महिमा तथा भगवत्पूजनका माहात्म्य
अग्निदेव कहते हैं—मुने! अब मैं 'अष्टाङ्गयोग'का वर्णन करूँगा, जो जगत्के त्रिविध तापसे छुटकारा दिलानेका साधन है। ब्रह्मको प्रकाशित करनेवाला ज्ञान भी 'योग'से ही सुलभ होता है। एकचित्त होना—चित्तको एक जगह स्थापित करना 'योग' है। चित्तवृत्तियोंके निरोधको भी 'योग' कहते हैं। जीवात्मा एवं परमात्मामें ही अन्तःकरणकी वृत्तियोंको स्थापित करना उत्तम 'योग' है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—ये पाँच 'यम' हैं। ब्रह्मन्! 'नियम' भी पाँच ही हैं, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। उनके नाम ये हैं—शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वराराधन (ईश्वरप्रणिधान)। किसी भी प्राणीको कष्ट न पहुँचाना 'अहिंसा' है। 'अहिंसा' सबसे उत्तम धर्म है। जैसे राह चलनेवाले अन्य सभी प्राणियोंके पदचिह्न हाथीके चरणचिह्नमें समा जाते हैं, उसी प्रकार धर्मके सभी साधन 'अहिंसा'में गतार्थ माने जाते हैं। 'हिंसा'के दस भेद हैं—किसीको उद्वेगमें डालना, संताप देना, रोगी बनाना, शरीरसे रक्त निकालना, चुगली खाना, किसीके हितमें अत्यन्त बाधा पहुँचाना, उसके छिपे हुए रहस्यका उद्घाटन करना, दूसरेको सुखसे वञ्चित करना, अकारण कैद करना और प्राणदण्ड देना। जो बात दूसरे प्राणियोंके लिये अत्यन्त हितकर है, वह 'सत्य' है। 'सत्य'का यही लक्षण है—सत्य बोले, किंतु प्रिय बोले; अप्रिय सत्य कभी न बोले। इसी प्रकार प्रिय असत्य भी मुँहसे न निकाले; यह सनातन धर्म है। 'ब्रह्मचर्य' कहते हैं—'मैथुनके त्यागको'। 'मैथुन' आठ प्रकारका होता है—स्त्रीका स्मरण, उसकी चर्चा, उसके साथ क्रीड़ा करना, उसकी ओर देखना, उससे लुक-छिपकर बातें करना, उसे पानेका संकल्प, उसके लिये उद्योग तथा क्रियानिर्वृत्ति (स्त्रीसे साक्षात् समागम)—ये मैथुनके आठ अङ्ग हैं—ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है। 'ब्रह्मचर्य' ही सम्पूर्ण शुभ कर्मोंकी सिद्धिका मूल है; उसके बिना सारी क्रिया निष्फल हो जाती है। वसिष्ठ, चन्द्रमा, शुक्र, देवताओंके आचार्य बृहस्पति तथा पितामह ब्रह्माजी—ये तपोवृद्ध और वयोवृद्ध होते हुए भी स्त्रियोंके मोहमें फँस गये। गौड़ी, पैष्टी और माध्वी—ये तीन प्रकारकी सुरा जाननी चाहिये। इनके बाद चौथी सुरा 'स्त्री' है, जिसने सारे जगत्को मोहित कर रखा है। मदिराको तो पीनेपर ही मनुष्य मतवाला होता है, परंतु युवती स्त्रीको देखते ही उन्मत्त हो उठता है। नारी देखनेमात्रसे ही मनमें उन्माद करती है, इसलिये उसके ऊपर दृष्टि न डाले। मन, वाणी और शरीरद्वारा चोरीसे सर्वथा बचे रहना 'अस्तेय' कहलाता है। यदि मनुष्य बलपूर्वक दूसरेकी किसी भी वस्तुका अपहरण करता है, तो उसे अवश्य तिर्यग्योनिमें जन्म लेना पड़ता है। यही दशा उसकी भी होती है, जो हवन किये बिना ही (बलिवैश्वदेवके द्वारा देवता आदिका भाग अर्पण किये बिना ही) हविष्य (भोज्यपदार्थ)—का भोजन कर लेता है। कौपीन, अपने शरीरको ढकनेवाला वस्त्र, शीतका कष्ट-निवारण करनेवाली कन्था (गुदड़ी) और खड़ाऊँ—इतनी ही वस्तुएँ साथ रखे। इनके सिवा और किसी वस्तुका संग्रह न करे—(यही अपरिग्रह है)। शरीरकी रक्षाके साधनभूत वस्त्र आदिका संग्रह किया जा सकता है। धर्मके अनुष्ठानमें लगे हुए शरीरकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये॥ १-१६$\frac{१}{२}$॥
'शौच' दो प्रकारका बताया गया है—'बाह्य'
८२० * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
और 'आभ्यन्तर'। मिट्टी और जलसे 'बाह्यशुद्धि' होती है और भावकी शुद्धिको 'आभ्यन्तर शुद्धि' कहते हैं। दोनों ही प्रकारसे जो शुद्ध है, वही शुद्ध है, दूसरा नहीं। प्रारब्धके अनुसार जैसे-तैसे जो कुछ भी प्राप्त हो जाय, उसीमें हर्ष मानना 'संतोष' कहलाता है। मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रताको 'तप' कहते हैं। मन और इन्द्रियोंपर विजय पाना सब धर्मोंसे श्रेष्ठ धर्म कहलाता है। 'तप' तीन प्रकारका होता है—वाचिक, मानसिक और शारीरिक। मन्त्रजप आदि 'वाचिक', आसक्तिका त्याग 'मानसिक' और देवपूजन आदि 'शारीरिक' तप हैं। यह तीनों प्रकारका तप सब कुछ देनेवाला है। वेद प्रणवसे ही आरम्भ होते हैं, अतः प्रणवमें सम्पूर्ण वेदोंकी स्थिति है। वाणीका जितना भी विषय है, सब प्रणव है; इसलिये प्रणवका अभ्यास करना चाहिये (यह स्वाध्यायके अन्तर्गत है)। 'प्रणव' अर्थात् 'ओंकार' में अकार, उकार तथा अर्धमात्राविशिष्ट मकार है। तीन मात्राएँ तीनों वेद, भूः आदि तीन लोक, तीन गुण, जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीन अवस्थाएँ तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव—ये तीनों देवता प्रणवरूप हैं। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र, स्कन्द, देवी और महेश्वर तथा प्रद्युम्न, श्री और वासुदेव—ये सब क्रमशः ॐकारके ही स्वरूप हैं। ॐकार मात्रासे रहित अथवा अनन्त मात्राओंसे युक्त है। वह द्वैतकी निवृत्ति करनेवाला तथा शिवस्वरूप है। ऐसे ॐकारको जिसने जान लिया, वही मुनि है, दूसरा नहीं। प्रणवकी चतुर्थीमात्रा (जो अर्धमात्राके नामसे प्रसिद्ध है) 'गान्धारी' कहलाती है। वह प्रयुक्त होनेपर मूर्द्धा में लक्षित होती है। वही 'तुरीय' नामसे प्रसिद्ध परब्रह्म है। वह ज्योतिर्मय है। जैसे घड़ेके भीतर रखा हुआ दीपक वहाँ प्रकाश करता है, वैसे ही मूर्द्धा में स्थित परब्रह्म भी भीतर अपनी ज्ञानमयी ज्योति छिटकाये रहता है। मनुष्यको चाहिये कि मनसे हृदयकमलमें स्थित आत्मा या ब्रह्मका ध्यान करे और जिह्वासे सदा प्रणवका जप करता रहे। (यही 'ईश्वरप्रणिधान' है।) 'प्रणव' धनुष है, 'जीवात्मा' बाण है तथा 'ब्रह्म' उसका लक्ष्य कहा जाता है। सावधान होकर उस लक्ष्यका भेदन करना चाहिये और बाणके समान उसमें तन्मय हो जाना चाहिये। यह एकाक्षर (प्रणव) ही ब्रह्म है, यह एकाक्षर ही परम तत्त्व है, इस एकाक्षर ब्रह्मको जानकर जो जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसको उसीकी प्राप्ति हो जाती है। इस प्रणवका देवी गायत्री छन्द है, अन्तर्यामी ऋषि हैं, परमात्मा देवता हैं तथा भोग और मोक्षकी सिद्धिके लिये इसका विनियोग किया जाता है। इसके अङ्ग-न्यासकी विधि इस प्रकार है—'ॐ भूः अग्न्यात्मने हृदयाय नमः। '—इस मन्त्रसे हृदयका स्पर्श करे। 'ॐ भुवः प्रजापत्यात्मने शिरसे स्वाहा।' ऐसा कहकर मस्तकका स्पर्श करे। 'ॐ स्वः सर्वात्मने शिखायै वषट्। '—इस मन्त्रसे शिखाका स्पर्श करे। अब कवच बताया जाता है—'ॐ भूर्भुवः स्वः सत्यात्मने कवचाय हुम्।' इस मन्त्रसे दाहिने हाथकी अँगुलियोंद्वारा बायीं भुजाके मूलभागका और बायें हाथकी अँगुलियोंसे दाहिनी बाँहके मूलभागका एक ही साथ स्पर्श करे। तत्पश्चात् पुनः 'ॐ भूर्भुवः स्वः सत्यात्मने अस्त्राय फट्।' कहकर चुटकी बजाये। इस प्रकार अङ्गन्यास करके भोग और मोक्षकी सिद्धिके लिये भगवान् विष्णुका पूजन, उनके नामोंका जप तथा उनके उद्देश्यसे तिल और घी आदिका हवन करे; इससे मनुष्यकी समस्त कामनाएँ पूर्ण होती हैं। (यही ईश्वरपूजन है; इसका निष्कामभावसे ही अनुष्ठान