अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
[Header] अकबर बीरबल विनोद ५६
[Header] अकबर बीरबल विनोद ५६ को जूँ तक न रेंगी, इसकी धृष्टता देखकर बीरबल एक दम खिसला गया और एक सिपाही को तुरत आज्ञा दी—"इस झूठे को अभी सौ कोड़े लगावो।" सिपाही कोड़ा लेकर मारने को उद्यत हुआ, इस बीच ब्योपारी का लड़का फिर बोल उठा-"वाह पिताजी ! अभी उस दिन तो आप स्वयं कह रहे थे कि इस महाजन का मुझे पाँच सौ का ऋण चुकाना है, परन्तु चिन्ता की कोई बात नहीं है इस समय रुपये मेरे पास मौजूद हैं, किसी दिन चुका दूँगा। तब आप उन रुपयों को इसे क्यों नहीं दे देते ?" लड़के की सभ्यता देखकर बाप ने हार मानली और बीरबल के सामने उन रुपयों को चुका देना स्वीकार किया। किसी ने सत्य कहा है-"मार के आगे भूत भागता है।" न सौ कोड़े की नौबत आती न रुपया बरामद होता । बीरबल ने तत्क्षण मुद्दई के रुपयों को दिलवा दिया और प्रतिवादी (मुद्दालेह) को सजा देकर रुपया मारने के अपराध में जेल भेज दिया। मुद्दई अपना धन पाकर बड़ा हर्षित हुआ और बीरबल के न्याय की भूरि भूरि प्रशंसा करने लगा। फिर बीरबल अन्य ब्योपारियों को चिताकर बोला-"यहाँ पर आप लोग अधिकतर ब्योपारी ही उपस्थित हैं, सबको उचित है की ईमानदारी का सौदा करें, बेइ- मानी करने के पहले तो भला मालूम होता है, परन्तु उसका परिणाम बुरा निकलता है। यह लड़का अभी तक बड़ा ईमानदार है, यदि इसको बुरों की सुहबत न होगी और बापका असर न आयेगा, तो आगे चलकर इसका ब्योपार
५७ अकबर बीरबल विनोद
५७ अकबर बीरबल विनोद तरक्की पर रहेगा ।'' फिर लड़के को चिताकर उसे सदैव सच बोलने की शिक्षा देकर बिदा किया। अन्य तीनों व्योपारी भी बीरबल की आज्ञा पाकर घर लौट गये।
आधी दूर धूप आधी दूर छाया।
एक दिन का हाल है कि बादशाह बीरबल पर खफा होकर उसको अपने नगर से बाहर निकाल दिया। बीरबल हरहालत में खुश रहनेवाला था, वह नगर से बाहर किसी ग्राम में जा बसा। इस प्रकार बास करते २ कई महीने व्यतीत होगये न बादशाह ने उसे बुलवाया और न वह स्वयं आया। समय समय पर बादशाह बीरबल को याद कर बड़ी चिन्ता करता, परन्तु उसका कहीं पता ठिकाना न मिलने के कारण लाचार था। जब किसी प्रकार बीरबल का पता न चला तो ढूँढ़ने के लिये बहुतेरे कर्मचारियों को गाँवों में भेजा, फिर भी बीरबल का अनुसन्धान न हो सका। तब बादशाह उसको ढूँढ़ने की एक नई तरकीब निकाली। नगर २ में ढिंढोरा फिरवा दिया कि जो सख्स-“आधी दूर धूप और आधी दूर छाया” में होकर मेरे पास आवेगा उसे एक हजार रुपये पारितोषिक दिये जायेंगे ।” बहुतों ने पारितोषिक पाने की चेष्टा की, परन्तु किसी के दिमाग में “आधी दूर धूप आधी दूर छाया” में होकर आने की युक्ति न सूझी। यह बात क्रमशः फैलते फैलते
अकबर बीरबल विनोद ९८
अकबर बीरबल विनोद ९८ बीरबल के कान में पहुँची। वह अपने पड़ोस के एक बढ़ई को बुलाकर बोला- "तुम एक चारपाई अपने मस्तक पर रखकर बादशाह के पास जाओ और कहो कि मैं-"आधी दूर धूप आधी दूर छाया" में होकर आपके पास आया हूँ अतएव मुझे पारितोषिक मिलनी चाहिये।" बढ़ई बीरबल को पहचानता था इसलिये उसकी बात मान- कर चारपाई सिरपर लेकर बादशाह के पास जा पहुँचा और एक हजार का पुरस्कार पाने का उजुरदार हुआ। बादशाह इस बात को बढ़ई के समझ से बाहर की समझ कर बोला- "सचसच बतलाना होगा, कि तुम्हें यह सलाह किसने दी है" बढ़ई बोला-"पृथिवीनाथ ! एक ब्राह्मण कुछ दिनों से हमारे ग्राम में आ बसा है, उसे लोग बीरबल के नाम से पुकारते हैं, उसीकी सम्मति से मैंने यह कार्य किया है। बादशाह किसान से बीरबल का नाम सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसको एक हजार रुपये देकर बिदा किया। उसके साथ अपना दो कर्मचारी बीरबल को लाने के लिये परवाने के साथ भेजा। इतने यत्न के पश्चात् बीरबल फिर बादशाह के हाथ लगा।
अधर महल एक दिन दरबार के काम काजों से निश्चिन्त होकर बादशाह बीरबल के साथ गप्पें मार रहा था। गप्प शप के मानी मनोरंजन के हैं। उसी दिन उसको एक अधर महल
५९ अकबर बीरबल विनोद
५९ अकबर बीरबल विनोद बनवाने की इच्छा जागृत हुई। इस अभिप्राय से प्रेरित होकर बोला-“बीरबल ! क्या तुम मेरे लिये एक अधर महल बनवा सकते हो ?” बनवा देना तुम्हारा काम है और रुपया खर्चाना मेरा।” बीरबल ने सोच विचार कर उत्तर दिया-“पृथिवी- नाथ थोड़ा ठहर कर महल बनवाने का कार्यारम्भ करूँगा। इस कार्य के लिये कुछ मुख्य सामानों के संग्रह में समय की आवश्यकता है। बादशाह इस पर राजी हो गया। फिर बीरबल ने एक दूसरी बात छेड़कर बादशाह का मन दूसरे कामों में उलझा दिया, सायंकाल अवकाश पाकर घर लौट गया। दूसरे दिन बहेलियों को रुपये देकर जंगल से तोतों को पकड़ लाने की आज्ञा दी। हुक्म की देर थी बहेलिये उसी दिन सैकड़ों तोते पकड़ लाये। बीरबल ने कुछ तोतों को चुन कर खरीद लिया। और उनके पढ़ाने का भार अपनी बुद्धिमती कन्या को सौंप आप दरबार का आवश्यक कार्य्य करने लगा। लड़की ने बुद्धिमानी से पिता के आदेशानुसार तोतों को पढ़ाकर पक्का कर दिया। जब बीरबल ने उनकी परीक्षा ली तो वे उसके मरजी के माफिक निकले। फिर क्या था बीरबल तोतों को लिये हुए दरबार में हाजिर हुआ। उन को दीवान खाने में बन्द कर आप बादशाह के पास गया। तोते पिंजड़ों से बाहर निकाल कर छोड़ दिये गये थे। सब तरफ से किवाड़ बन्द था। तोते भीतर ही भीतर अपनी शिक्षा के अनुसार अलग अलग राग अलाप रहे थे। बादशाह को सलामकर बीरबल बोला-“पृथ्वीनाथ !
अकबर बीरबल विनोद ६०
अकबर बीरबल विनोद ६० आपकी मरजी के मुवाफिक अधर महल में काम लगवा दिया है, इस समय उसमें बहुतेरे पेशराज और मिस्त्री काम कर रहे हैं, आप चलकर मुवाइना कर लें।" बादशाह महल देखने की इच्छा से बीरबल के साथ हो लिया। जब बीरबल दीवान खाने के पास पहुँचा तो उसका किवाड़ खोलवा दिया। तोते बाहर निकल कर आकाश में उड़ते हुये बोलने लगे—"ईंटा लाओ, चूना लावो, किवाड़ लाभो, चौखट तय्यार करो, दीवार चुनो।" इस प्रकार आकाश में तोतों ने खूब शोर गुल मचाया। तब बादशाह ने बीरबल से पूछा—"क्यों बीरबल! ये तोते क्या कह रहे हैं?" बीरबल अदब के साथ उत्तर दिया—"हुजूर आपका अधर महल तय्यार हो रहा है, उसमें पेशराज और बढ़ई लोग लगे हुये हैं। सब सामान एकत्रित हो जाने पर महल बनना शुरू होगा।" बीरबल की इस बुद्धिमानी पर बादशाह हर्षित हुआ और उसको बहुत सा धन देकर बिदाकिया। सेर भर मांस दिल्ली शहर में दीनदयाल नामी एक पुराना व्योपारी रहता था। उसका कारोबार बहुत बड़ा था जिस कारण उसकी ख्याति दूर देशों तक पहुँचती थी। एक समय उसको कई हुण्डियाँ एक साथ सकरनी पड़ीं और उसके पास रुपया आने में तीन चार दिनों की देर थी। जो कुछ पास था उससे रोकड़ मिलाने पर पाँच लाख रुपये की
६१ अकबर बीरबल बिनोद कमी पड़ती थी। जब दीनदयाल को मौके पर रुपयों का प्रबन्ध होना असम्भव दीख पड़ा तो अपने मुनीम को हुण्डी वालों का हिसाब किताब मिलान करने की आज्ञा देकर आप रुपये की तलाश में बाहर निकला। उस समय नगर में एक महाजन के अतिरिक्त ऐसा दूसरा कोई भी बड़ा महाजन नहीं था जो एकमुस्त पाँच लाख की थैली उधार देता। दीनदयाल ने उसी से कर्ज लेकर हुण्डी सकर देने का निश्चय किया। वह साहूकार बड़ा धूर्त, दुष्ट और निर्दय था, परन्तु लाचार, कोई दूसरी सूरत न सूझ पड़ने पर दीनदयाल को उसके द्वार पर कर्ज के निमित्त जाना पड़ा। दीनदयाल ने उस महाजन से बारह दिनों की अवधि पर पाँच लाख रुपये कर्ज माँगा। उसका विश्वास था की उपरोक्त समय के अन्तरगत उसके पास बहुत सा रुपया आ जावेगा। उसने मारवाड़ी को उसकी इच्छानुसार सूद देने का पक्का विचार कर लिया था। केशवदास बराबर दीनदयाल को समूल नष्ट करने की चेष्टा में लगा रहता कारण की उसका और दीन- दयाल का व्योपारिक द्वेष था। दीनदयाल का कारोबार इतना बड़ा और समुन्नत था कि उसके आगे दूसरे व्योपारियों का व्योपार चलना कठिन था। दीनदयाल निःसन्तान था अतएव अगले डाह के कारण मारवाड़ी इस घात में लगा हुआ था कि यदि किसी प्रकार दीन- दयाल मारा जाय तो फिर उसका कारोबार भलीभाँति रु निकले।
अकबरबीरबल विनोद ६२
अकबरबीरबल विनोद ६२ ऐसी ईर्ष्या वश केशवदास उसको अपने पंजे में फाँस लेना चाहता था। उसे विश्वास था कि यदि वह रुपये न देगा तो दीनदयाल की इतनी ख्याति है कि कहीं न कहीं से रुपये अवश्य प्राप्तकर लेगा। सुअवसर आया देख उसने अपनी दुष्ट प्रकृत्यानुसार एक तरकीब खूब सोच विचारकर निकाली और दीनदयाल से बोला—"महाशय जी ! आज आप कर्ज लेने के विचार से पहले पहल मेरे द्वार पर आये हैं अत- -एव मैं इतने अल्प समय के लिये रुपयों का सूद लेना उचित नहीं समझता; परन्तु इसके साथ आपको भी मेरी एक शर्त माननी पड़ेगी। यदि आप एक हफ्ते में मेरे रुपये वापस न करदेंगे तो मैं अपने हाथ से आपके शरीर के किसी भी भाग से एक सेर मांस काट कर निकाल लूँगा।" दीनदयाल ने रुपया लौटाने का पहले ही से इतना थोड़ा समय रक्खा था कि उसके अन्तरगत उसका लौटाया जाना कठिन था। अब तो मारवाड़ी ने तीन दिनों, की अवधि और कम कर दी। परन्तु हुण्डी सकरने की कोई दूसरी सूरत न देख दीनदयाल को लाचार होकर मारवाड़ी के शर्तनामे पर हस्ताक्षर कर रुपये लेने पड़े। घर पहुँच कर उन रुपयों से उसने हुण्डी की रकम अदा करदी। लेनदार रुपये पाकर लौट गये और ईश्वर की कृपा से उसकी धाक जस की तस बनी रही। दीनदयाल को किसी कार्य्य विशेष के कारण एक दूसरे नगर को जाना पड़ा। जब लौट कर घर आया तो उसको मारवाड़ी के रुपये चुकाने की बात याद आई। इतने अल्प
६३ अकबर'बीरबल विनोद
६३ अकबर'बीरबल विनोद समय में उसके पास पाँच लाख रुपये एकत्रित नहीं हुये थे, फिर भी इधर उधर से संग्रह कर सूद के सहित रुपये लेकर उसके पास गया। मारवाड़ी तो एक सेर मांस का भूखा था, इधर शर्तनामे की तिथि भी बीत चुकी थी इसलिये रुपया लेने से साफ इनकार कर दिया और शर्तनामे के अनुसार उससे एक सेर मांस माँगा। दीनदयाल बाहर जाकर अस्वस्थ होगया था अब मांस देने की चिन्ता से और भी बीमार हो गया। बीमारी के बहाने से टाल मटोल में दो तीन दिन का समय और निकल गया। जब महाजन ने देखा कि इस प्रकार काम बनना कठिन है तो वह शर्तनामे को पेशकर अदालत से एक सेर मांस पाने के लिये दादख्वाह हुआ। दीनदयाल तलब किया गया। वह लाचार होकर बीमारी की हालत में पालकी में बैठकर न्यायालय में उपस्थित हुआ। मुकदमा पेश हुआ, काजी ने दीनदयाल से पूछा-“क्या इस शर्तनामे के मुताबिक तुमने इस मारवाड़ी से एक हफ्ते की मुद्दत पर पाँच लाख रुपये उधार लिये हैं ? शर्तनामे में लिखा है“ कि यदि निर्धारित समय के अन्तर्गत रुपये न चुका सकोगे तो मारवाड़ी के इच्छानुसार तुम्हें अपने शरीर के किसी भाग का एक सेर मांस देना पड़ेगा। वह इतना विख्यात व्योपारी होकर झूठ नहीं कहना चाहता था। इसलिये बोला- “काजी साहब ! शर्तनामे की बात सही है, उस समय मुझसे और मारवाड़ी से ऐसी ही शर्तें तयँ पाई थीं, परन्तु इस समय मैं मय सूद के इसका रुपया अदा करने को प्रस्तुत हूँ।
अकबर बीरबल विनोद ६४
अकबर बीरबल विनोद ६४ पहले भी एक बार नौकर के हाथ रुपया सूद के सहित भेज दिया था, परन्तु यह रुपया लेने से इन्कार कर मेरे से एक सेर मांस मांगता है। सरकार इस पर भलीभाँति विचारकर उचित न्याय करें।" साहूकार और दीनदयाल के अन्तरगत तय पाई शर्तों को सुनकर काजी बोला-"इसका न्याय अब हमारे बूते का नहीं है, न्याय तो तुम्हारा शर्तनामा ही कर रहा है। मैं हुक्म देता हूँ कि यह मारवाड़ी इसी समय आपके शरीर का एक सेर मांस अपनी इच्छानुसार काटकर ले लेवे।" दीनदयाल के रहे सहे होस हवास भी जाते रहे। बड़ा चिन्तित हुआ अन्त में कुछ सोच समझकर काजी से बोला-"मैं इस मामले को शाहनशाह के पास ले जाऊँगा, कृपया आप अपने आर्डर को तब तक के लिये मंसूख रक्खें जब तक कि वहाँसे कुछ फैसला न हो जावे।" काजी को लाचार होकर उसकी अर्जी मंजूर करनी पड़ी। उस मारवाड़ी को एक महीने की मुद्दत देकर काजी ने अपना काम समाप्त किया। दीनदयाल दूसरे ही दिन बादशाह की अदालत में समय से पेस्तर जा पहुँचा, और बादशाह को अदब से सलाम कर उदास मुख एक तरफ आसन लगाकर बैठ गया। उस समय बादशाह अपने फौज का प्रबन्ध कर रहे थे। जब वह काम शेष हो गया तो उनकी दृष्टि दीनदयाल पर पड़ी। उसका चेहरा उतरा हुआ देखकर बादशाहने उसके उदासी का कारण पूछा। दीनदयाल अपने और मारवाड़ी के बीच जो कुछ मामला चल रहा था ब्योरेवार कहकर समझाया। यह एक
६५ अकबर बीरबल विनोद
६५ अकबर बीरबल विनोद
नवीन घटना थी, सुनकर बादशाह दंग हो गया । वह इस सौदागर को भलीभाँति जानता था, वह दिल्ली नगर का बहुत प्राचीन व्योपारी था । उसने अनेक अवसरों पर अपना तन धन लगाकर सरकारी सहायता की थी जिस कारण बाद- शाह को उसकी दशा पर बड़ी तर्श आई और उसकी रक्षा का भार स्वयं अपने शिर लिया । तत्क्षण साहूकार को घर जाने की आज्ञा देकर आप दीवानखाने में पहुँचे । बीरबल स्वागत के लिये अपने आसन से उठ खड़ा हुआ और बादशाह उसकी बगल में एक कुर्सी पर जा बैठे । दोनों में अन्तरंग गोष्ठी होने लगी । बादशाह बीरबल को दीनदयाल का सारा कच्चा चिट्ठा सुना कर बोला-"बीरबल ! इस साहूकार का न्याय ऐसी युक्ति से करो, जिसमें उसकी जान बचे और अन्याय भी न हो, मैं इसकी दैन्य दशा पर बड़ा चिन्तित हो रहा हूँ । बीरबल बोला-"पृथ्वीनाथ ! चिन्ता करने की कोई बात नहीं है आपकी आज्ञा का यथोचित पालन करूँगा । उधर वे बीरबल को समझा कर अपनी सभा में पहुँचे इधर बीरबल उसके छुट- कारे की तरकीब सोचने लगा । एकाएक उसका चेहरा प्रफु- ल्लित हो गया और फिर अपने कार्य में दत्तचित्त हुआ । उधर केशवदास मारवाड़ी को भी नींद नहीं आती थी, वह तो दीनदयाल के पीछे हाथ धोकर पड़ा हुआ था पाँच छः दिनों की मुहलत देकर फिर बादशाह की अदालत में दावा दायर किया-"शर्त के मुवाफिक अदालत दीनदयाल से उसके शरीर का एक सेर मांस दिलवा दे ।" बीरबल इस अभियोग ५
का न्यायाधीश बनाया गया। वह बादशाह की आज्ञा स्वीकार करते हुए बोला-"पृथ्वीनाथ ! मैं यथाशीघ्र इसका न्याय करने का प्रयत्न करूँगा।" वह मारवाड़ी को एक ठौर बैठाकर दीनदयाल को बुलाने के लिये एक कर्मचारी को भेजा। जब आया तो उसे मारवाड़ी के सामने खड़ा कराकर बीरबल ने पूछा-"क्या तुम्हें अपना रुपया लेना मंजूर नहीं है? मारवाड़ी रुपया लेना नहीं चाहता था इससे साफ इनकार कर दिया। तब बीरबलने कहा-"मुझे काजी का फैसला शर्तनामे के बमूजिब स्वीकार है अतः मारवाड़ी को हुक्म देता हूँ कि सौदागर के शरीर से एक सेर माँस का टुकड़ा अपने हाथ से निकाल ले; परन्तु ध्यान रहे; अगर टुकड़ा जरा भी छोटा बड़ा हुआ कि वह सकुदुंब जान से मारा जावेगा। घर बार तथा उसका सारा कोष उसी अपराध के कारण जब्त कर लिया जायगा।" इस विज्ञप्ति से मारवाड़ी दहल गया और उससे कुछ उत्तर देते न बना। बीरबल उसे चुप देखकर जवाब के लिये बारबार उत्तेजित करने लगा। तब वह बोला- "दीवान जी ! मुझे माँस लेने की खाहिश नहीं है, मैं केवल पाँच लाख रुपये लेकर अपने मामले को उठा लेना चाहता हूँ, सूद भी छोड़े देता हूँ।" बीरबल ने कहा-"यह हरगिज नहीं हो सकता, तुम्हें मांस का टुकड़ाही लेना पड़ेगा, क्योंकि पहले तूँ साहूकार से रुपये लेना नामंजूर कर चुका है।" यदि तूँ शर्तनामें के अनुसार माँस न लेगा तो राजाज्ञा भंग करने के अपराध में तुझे सात लाख रुपये जरबाने लगेंगे। इस बार
६७ अकबर बीरबल विनोद
६७ अकबर बीरबल विनोद
खूब सोच समझ कर उत्तर दो, दोनों बातों में किसे मंजूर करते हो और किसे नामंजूर ? मारवाड़ी गरदन नीची करके बोला-“दीवान जी ! मुझे कुछ भी नहीं चाहिये ।” बीरबल ने कहा-“जो तू अब कुछ भी नहीं लेना चाहता तो तुझे पहले की राजाज्ञा न मानने के अपराध में सात लाख रुपये दण्ड देने पड़ेंगे, और दूसरा अपराध यह है कि तू ने दीनदयाल को कष्ट पहुँचाने की नीयत से उसके शरीर का मांस काट लेने की शर्त करायी थी, इस कारण चार साल की सजा और भुगतनी पड़ेगी ।” मारवाड़ी का होश ठिकाने न रहा। राजदूत बीरबल की आज्ञा से उसे पकड़ लिये और वह उसी क्षण जेलखाने में बन्द कर दिया गया । मार- वाड़ी के घर वालों से सात लाख रुपये वसूल किये गये । बीरबल के इस न्याय को सुनकर बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ और बीरबल के बुद्धि की प्रशंसा की । चूंकि दीनदयाल नेकनीयती कर पहले ही उसके पास रुपये भेज दिये था, इसलिये उसकी दूकान की प्रतिष्ठा रखने के लिये बादशाह ने उसको पारितोषिक देकर विदा किया। जो रुपये मारवाड़ी से दंड में लिये गये थे वह बीरबल को मिले ।
न स्त्री हैं न पुरुष
एक दिन बादशाह और उसके खोजे से आपस में कुछ बातें हो रही थीं, इसी बीच बीरबल की बात आई। तब
अकबर बीरबल विनोद ६८
अकबर बीरबल विनोद ६८
खोजे ने बीरबल की बड़ी दुर्निन्द की। यह बादशाह का मुँहलगा खोजा था इसलिये खुलेआम उसकी अवहेलना करना उचित न समझकर प्रमाणों द्वारा मुहतोड़ उत्तर देना शुरू किया। वह बोले-“तुम स्वयं विचारकर देखो कि मेरे दर्बार में बीरबल सा हाजिर जवाब एक आदमी भी नहीं है।” खोजा बादशाह के मुख से बीरबल की प्रशंसा सुनकर मनही-मन भड़क उठा और बोला-“हुजूर यदि आप बीरबलको हाजिर जवाब बतलाते हैं तो वह मेरे तीन सवालों का जवाब दे। यदि ठीक २ उत्तर दे देगा तो मैं भी उसे श्रेष्ठ मान लूँगा। बादशाहने उससे सवाल पूछने को कहा। खोजा बोला-“(१) आकाश में तारों की कितनी संख्या है (२) दुनियाँ में स्त्री पुरुष अलग २ कितने हैं। (३) धरती अपना बीच कहाँ रखती है।” बादशाह खोजे को अपने पास बैठाकर बीरबल को बुलवाने के लिये सिपाही भेजा। जब वह आया तो उससे खोजे के तीनों सवालों का उत्तर माँगा। बीरबल चुपके बाजार से एक बड़ा मेढ़ा खरीद लाया और उसे बादशाह के सामने खड़ा कर बोला-“खोजा साहब ! इसके पीठ के बालों की गणना कर लेवें। इसके शरीर में जितने बाल हैं उतने ही आकाश में तारे भी हैं। फिर इधर उधर गोड़ से पड़ताल कर एक जगह जमीन में खूटी गाड़ कर बोला- “पृथ्वीनाथ ! पृथ्वी का मध्य यही है, यदि खोजे को यकीन न हो तो स्वयं नाप ले, जब पहले और तीसरे सवालों के बाद दूसरे की बारी आई तो बीरबल हँसा पड़ा परन्तु
६६ अकबर बीरबल विनोद
६६ अकबर बीरबल विनोद अपना असली भाव छिपाकर उत्तर दिया- "गरीब परवर स्त्री पुरुषों की संख्या तो इन खोजों के कारण बिगड़ गई है क्योंकि ये न तो स्त्रियों की संख्या में आते हैं और न पुरुषों के ही। यदि सब खोजे जान से मरवा दिये जायें तो ठीक- ठीक गणना निकल सकती है।" खोजे का मुँह छोटा होगया। उसके मुँह से एक बात भी न निकली। बादशाह ने बहुत कुछ उसे भला बुरा सुनाया। बिचारा लाज का मारा, दुम दबाकर जनानखाने में चला गया। बादशाह ने बीरबल को पारितोषिक देकर बिदा किया। चार मूर्ख एक दिन मनोरंजन के समय बादशाह के मनमें यह बात आई- "संसार में मूर्खों की संख्या तो अमित है; परन्तु मैं ऐसे चार मूर्ख देखना चाहता हूँ जिनकी जोड़ के दूसरे न हों।" उसने बीरबल से कहा- "बीरबल ! चार मूर्ख इस ढंग के तलाश करो कि जिनकी जोड़ के दूसरे न मिलें।" वह बादशाह की आज्ञा मानकर नगर से बाहर निकला। ढूंढ़ने वालों को क्या नहीं मिल सकता, केवल सच्ची लगन होनी चाहिये। कुछ दूर जाकर बीरबल को एक आदमी दिखलाई पड़ा जो थाली में पान का एक जोड़ा बीड़ा और मिठाई लिये हुये बड़े उत्साह से नगर की तरफ जल्दी २ भागा जा रहा था।
अकबर बीरबल विनोद ७०
अकबर बीरबल विनोद ७० बीरबल ने उस आदमी से पूछा—"क्यों साहब ! यह सब सामान कहाँ लिये जा रहे हो, जो आपका पैर खुशि- हाली के कारण जमीन पर नहीं पड़ता, आपके मर्म को जानने की मुझे बड़ी इच्छा है अतएव थोड़ा कष्ट कर बत- लाते जाइये ।" उस आदमी ने पहले तो इस ख्याल से कुछ हीला हवाली किया कि कहीं उचित समय पर पहुँचने में देर न हो जाय । परन्तु जब बीरबल ने उसे छेड़कर कई बार पूछा तो वह मटक कर बोला—"यद्यपि मुझे विलम्ब हो रहा है परन्तु आपके इतना आग्रह करने पर बतला देना भी जरूरी है । "मेरी औरत ने एक दूसरा खसम कर लिया है उससे उसे लड़का पैदा हुआ है, आज बरही है । मैं उसीका बधावा लिये हुए न्योते में जा रहा हूँ । बीरबल ने उसे अपना नाम बतला कर रोक लिया और बोला "तुझे मेरे साथ बादशाह के पास चलना पड़ेगा, जब मैं छुट्टी दूँगा तब जाना । वह बीरबल का नाम सुनकर डर गया और लाचार होकर उसके साथ हो लिया । वह उसको साथ में लेकर आगे बढ़ा, दैवयोग से रास्ते में एक घोड़ी सवार मिला । वह आप तो घोड़ी पर सवार था परन्तु अपने सिर पर घास का बण्डल ढो रहा था । बीरबल ने उससे पूछा—"क्यों भाई ! यह क्या मामला है, आप अपने सिर का बोझ घोड़ी पर लादकर क्यों नहीं ले जाते ?" उसने कहा—"गरीबपरवर ! इसका कारण यह है कि मेरी घोड़ी गर्भिणी है ऐसी दशा में उसपर इतना बोझ नहीं लादा जा सकता, मुझे ले जा रही है यही क्या कम गनीमत है ।
७१ अकबर बीरबल विनोद
७१ अकबर बीरबल विनोद बीरबल इस घोड़ी सवार को भी अपने साथ ले लिया और दोनों को लिये दिये बादशाहके पास पहुँचा। तब बीरबल बोला—"पृथिवीनाथ ! चारों मूर्ख आपके सामने उपस्थित हैं।" बादशाह तो दो को ही देख रहा था अतएव बोला-"तीसरा मूर्ख कहाँ है?" बीरबल ने कहा-"तीसरा नम्बर हुजूर का है जो आपको ऐसे २ मूर्खों के देखने की इच्छा होती है। चौथा मूर्ख मैं हूँ जो उन्हें ढूंढकर आपके पास लाता हूँ।" बादशाह को बीरबल के ऐसे उत्तर से बड़ी प्रस- न्नता हुई और जब उन्हें उनकी मूर्खता का परिचय मिला तो खिलखिलाकर हँस पड़े।
बीरबल की चतुरता एक बार आश्विन के महीने में बीरबल बीमार पड़ा जिस कारण महीनों दर्बार में नहीं आया। एक दिन बादशाह को उसे देखने की इच्छा हुई। वह दो कर्म चारियों के साथ उसके मकान पर गया। बीरबल बादशाह को देख कर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसका कुम्हिलाया हुआ हृदय- कमल कुछ खिल सा गया। ये आपस में बड़ी देर तक बार्तालाप करते रहे न बीरबल बादशाह को छोड़ना चाहता था और न बादशाह बीरबल को ही, बातचीत में कई घंटों का समय व्यतीत हो गया। इसी बीच बीरबल को पाखाना मालूम हुआ। ऐसी विवशता के कारण वह बादशाह से कुछ देर की मुहलत लेकर बगल की एक कोठरी में
अकबर बीरबल विनोद ७२
अकबर बीरबल विनोद ७२
पाखाना फिरने गया। इस बीच बादशाह के जी में बीरबल के बुद्धि-परीक्षा की बात समाई, उसने ख्याल किया कि बीरबल महीनों से बीमार है; शायद उसकी चतुरता में कुछ कमी पड़ गयी हो। जानना चाहिये कि अब यह कितना चतुर रह गया है। नौकरों द्वारा उसके पलँग के चारों पायों तले चार कागज के टुकड़े रखवा कर खामोश रहा। थोड़ी देर बाद बीरबल पाखाने से लौटकर आया और अपनी पलँग पर लेट रहा। बादशाह उसकी परीक्षा के अभिप्राय से इधर उधर की बातें छेड़कर उसे भुलावा देने लगा। बीरबल एक तरफ बादशाह की बातें सुनता जाता था दूसरी तरफ किसी चीज की खोज में व्यस्त था। वह ऊपर नीचे इस प्रकार से देख रहा था मानों किसी चीज का अनुसंधान कर रहा हो। बादशाह ने उसकी उसक पुसक का कारण पूछा। बीरबल ने कहा-"पृथिवीनाथ! जान पड़ता है कि यहाँ पर कुछ रद्दो बदल हो गया है? वे अनजान सा मुँह बनाकर बोले-"क्या रद्दो बदल हुआ है?" बीरबल ने उत्तर दिया-मुझे मालूम होता है कि या तो इस मकान की दीवाल कागज भर नीचे को दब गई है वा मेरी पलँग एक कागज ऊँची हो गई है। बादशाह ने कहा-"हाँ हाँ अक्सर देखा जाता है कि बीमारी की दशा में निर्बलता के कारण लोगोंके दिमागमें तुम्हारे समान ही फितूर आ जाता है परन्तु दरअसल में वह बात ठीक नहीं रहती।" बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ! ऐसा नहीं हो सकता, मैं बीमार हूँ तो मेरी बुद्धि बीमार नहीं है।" बादशाह बीरबल की
७३ अकबर बीरबल विनोद
७३ अकबर बीरबल विनोद पहले ही सी चतुरता देखकर बड़ा प्रसन्न हुए और उससे असली भेद प्रकट कर दिया । —०:***:०— अपनी मनमानी दूँगा दिल्ली का एक नागरिक बड़ा सूम था। वह अपने परिश्रम और कृपणता के कारण रत्नों का एक बड़ा कोष संग्रह किये हुए था। वह उन रत्नों को एक ऐसी साधारण सन्दूक में छिपाकर रक्खे हुए था कि जिससे देखने वाले को उसमें रत्न होने का भ्रम न हो सके। उसका घर भी साधारण गृहस्थों के समान कच्चा और टूटा फूटा हुआ था। भला ऐसे भग्न मकान में रत्न होने की कौन संभावना कर सकता था ? दैवात एक दिन मध्य रात्रि में उसके घर में आग लगी । कंजूस उस आग को बुझाने की कोई तरकीब न देख कर कुछ साधारण वस्त्रों को लेकर घर से बाहर निकल आया । ये वस्त्र उसके रोजमर्रा के काम आने वाले थे । घर जलने की चिन्ता में विचारा कंजूस छाती पीट पीटकर रुदन करने लगा। उसके रोने का शब्द सुन और आग की लपट देखकर उसके अड़ोस पड़ोस के बहुतेरे आदमी एकत्र हो गये। उन आदमियोंमें एक लोहार भी था। लोहारने कंजूस को फटकारते हुए कहा-“इस साधारण झोपड़े के लिये तूँ इतना रुदन क्यों कर रहा है, इसमें तेरा कौन सा बड़ा नुकसान हो जायगा ?” सूम बोला-“भाई तू झोपड़ा जलता देखता है और मैं अपने रत्नों को जलते देख रहा हूँ; फिर तू
अकबर बीरबल विनोद ७४
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ही बता कि क्यों कर न रोकूँ ।” लोहार ने कहा-“वह धन कहाँ और किस चीज़ में रक्खा हुआ है। तब सूमड़ा उँगली से बगल की एक कोठरी दिखलाते हुए बोला-“उसी कोठरी में एक काठ की पुरानी सन्दूक रक्खी हुई है जिसमें सात लाख के जवाहरात बन्द हैं।” लोहार ने कहा-“यदि मैं उन जवाहरातों को बाहर निकाल लाऊँगा तो अपने मन मानी तुझे दूँँगा और बाकी मैं लूँगा ।” सर्वस जाता देख कंजूस ने उसकी बात मान ली । लुहार अग्नि से बचने की तरकीब जानता था इसलिये उस जलती हुई आग में साहस कर कूद पड़ा और कोठरी में पहुँच कर उस सन्दूक को बाहर निकाल लाया । इस प्रकार पिटारी को अपनी बगल में रखकर अग्नि- काण्ड देखने लगा। थोड़ी देर बाद जब अग्नि का वेग घट गया और लोगों के हृदय में शान्ति आई तो पिटारी का मामला उपस्थित हुआ। जिस वक्त लोहार और कंजूस में ऐसी शर्तें तय पाई थीं उस समय लोहार ने एक और चालाकी की थी। उस जगह के दो मनुष्यों को अपना गवाह बना लिया था। गवाहों के सामने ही वह पिटारी खोली गई। पिटारी खुलते ही जवाहरातों की चमक बाहर तक फैल गई। जैसे धन देखकर गँवारों की दशा होती है वही दशा लुहार की भी हुई। उस अमुल्य रत्नों की ढेरी को देखकर उसका मन फिर गया। वह का सारा धन तो आप ले लिया और उस खाली को विचारे कंजूस के हवाले किया। कंजूस लुहार अनीति देखकर बहुत चकराया और गिडगिडा
७५ अकबर बीरबल विनोद
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कर उससे कहने लगा- "भाई आधा धन मुझे दो और बाकी आधा आप ले लो, इसमें मेरी राजी है।" लुहार डाटकर बोला-"क्या पहले मेरे तेरे बीच ऐसी शर्ते पकी नहीं हुई थीं कि मैं तुझे अपनी मनमानी दूँगा ! अब चों चप्पड़ क्यों करता है?" दोनों में वाता विवाद होते होते सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत होगई और सूर्योदय का समय आया । सूमड़ा आधा रत्नोंको पानेकेलिये बहुतेरा प्रयास किया परन्तु लुहार उसकी एक भी सुनने को तय्यार नहीं था सूमड़े ने लाचार होकर बादशाह के पास अर्जी गुजारी । मामला पेचीला देखकर वादशाहने बीरबलको बुलाया और उनका सारा हाल सुनाकर उसे न्याय करने की आज्ञा दी । बादशाह की आज्ञा सिरोधार्य कर बीरबल ने उन दोनों से अलग अलग बयान लिया, और उन बयानों को पृथक पृथक दो कागजों पर लिखकर उस पर उनके हस्ताक्षर कराये । फिर उन दोनों से बारी बारी शाक्षी लेकर प्रमाणित कराया कि उनका कहना बिल्कुल सत्य और उन्हें मान्य है। तब बीरबल ने पहले पहल लुहार से पूछा-"तुमको इसमें से क्या क्या लेना मंजूर है?" लोहार बोला-"मेरी इच्छा जवाहरात लेने की है।" बीरबल ने तुरत निर्णय कर दिया-"तू जवाहरात इस कंजूस को दे दे और स्वयं खाली पिटारी ले ले।" यह निर्णय सुनकर लोहार ने शर्तनामें की तरफ इशारा किया । बीरबल बोला- : "तूँ पहले ही अपनी शर्तों में लिख चुका है-"मैं अपनी मन मानी दूँगा।" तो तेरे मन में जवाहरात लेने का है अतएव तेरी