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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

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स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

६१ अकबर बीरबल बिनोद कमी पड़ती थी। जब दीनदयाल को मौके पर रुपयों का प्रबन्ध होना असम्भव दीख पड़ा तो अपने मुनीम को हुण्डी वालों का हिसाब किताब मिलान करने की आज्ञा देकर आप रुपये की तलाश में बाहर निकला। उस समय नगर में एक महाजन के अतिरिक्त ऐसा दूसरा कोई भी बड़ा महाजन नहीं था जो एकमुस्त पाँच लाख की थैली उधार देता। दीनदयाल ने उसी से कर्ज लेकर हुण्डी सकर देने का निश्चय किया। वह साहूकार बड़ा धूर्त, दुष्ट और निर्दय था, परन्तु लाचार, कोई दूसरी सूरत न सूझ पड़ने पर दीनदयाल को उसके द्वार पर कर्ज के निमित्त जाना पड़ा। दीनदयाल ने उस महाजन से बारह दिनों की अवधि पर पाँच लाख रुपये कर्ज माँगा। उसका विश्वास था की उपरोक्त समय के अन्तरगत उसके पास बहुत सा रुपया आ जावेगा। उसने मारवाड़ी को उसकी इच्छानुसार सूद देने का पक्का विचार कर लिया था। केशवदास बराबर दीनदयाल को समूल नष्ट करने की चेष्टा में लगा रहता कारण की उसका और दीन- दयाल का व्योपारिक द्वेष था। दीनदयाल का कारोबार इतना बड़ा और समुन्नत था कि उसके आगे दूसरे व्योपारियों का व्योपार चलना कठिन था। दीनदयाल निःसन्तान था अतएव अगले डाह के कारण मारवाड़ी इस घात में लगा हुआ था कि यदि किसी प्रकार दीन- दयाल मारा जाय तो फिर उसका कारोबार भलीभाँति रु निकले।

अकबरबीरबल विनोद ६२

अकबरबीरबल विनोद ६२ ऐसी ईर्ष्या वश केशवदास उसको अपने पंजे में फाँस लेना चाहता था। उसे विश्वास था कि यदि वह रुपये न देगा तो दीनदयाल की इतनी ख्याति है कि कहीं न कहीं से रुपये अवश्य प्राप्तकर लेगा। सुअवसर आया देख उसने अपनी दुष्ट प्रकृत्यानुसार एक तरकीब खूब सोच विचारकर निकाली और दीनदयाल से बोला—"महाशय जी ! आज आप कर्ज लेने के विचार से पहले पहल मेरे द्वार पर आये हैं अत- -एव मैं इतने अल्प समय के लिये रुपयों का सूद लेना उचित नहीं समझता; परन्तु इसके साथ आपको भी मेरी एक शर्त माननी पड़ेगी। यदि आप एक हफ्ते में मेरे रुपये वापस न करदेंगे तो मैं अपने हाथ से आपके शरीर के किसी भी भाग से एक सेर मांस काट कर निकाल लूँगा।" दीनदयाल ने रुपया लौटाने का पहले ही से इतना थोड़ा समय रक्खा था कि उसके अन्तरगत उसका लौटाया जाना कठिन था। अब तो मारवाड़ी ने तीन दिनों, की अवधि और कम कर दी। परन्तु हुण्डी सकरने की कोई दूसरी सूरत न देख दीनदयाल को लाचार होकर मारवाड़ी के शर्तनामे पर हस्ताक्षर कर रुपये लेने पड़े। घर पहुँच कर उन रुपयों से उसने हुण्डी की रकम अदा करदी। लेनदार रुपये पाकर लौट गये और ईश्वर की कृपा से उसकी धाक जस की तस बनी रही। दीनदयाल को किसी कार्य्य विशेष के कारण एक दूसरे नगर को जाना पड़ा। जब लौट कर घर आया तो उसको मारवाड़ी के रुपये चुकाने की बात याद आई। इतने अल्प

६३ अकबर'बीरबल विनोद

६३ अकबर'बीरबल विनोद समय में उसके पास पाँच लाख रुपये एकत्रित नहीं हुये थे, फिर भी इधर उधर से संग्रह कर सूद के सहित रुपये लेकर उसके पास गया। मारवाड़ी तो एक सेर मांस का भूखा था, इधर शर्तनामे की तिथि भी बीत चुकी थी इसलिये रुपया लेने से साफ इनकार कर दिया और शर्तनामे के अनुसार उससे एक सेर मांस माँगा। दीनदयाल बाहर जाकर अस्वस्थ होगया था अब मांस देने की चिन्ता से और भी बीमार हो गया। बीमारी के बहाने से टाल मटोल में दो तीन दिन का समय और निकल गया। जब महाजन ने देखा कि इस प्रकार काम बनना कठिन है तो वह शर्तनामे को पेशकर अदालत से एक सेर मांस पाने के लिये दादख्वाह हुआ। दीनदयाल तलब किया गया। वह लाचार होकर बीमारी की हालत में पालकी में बैठकर न्यायालय में उपस्थित हुआ। मुकदमा पेश हुआ, काजी ने दीनदयाल से पूछा-“क्या इस शर्तनामे के मुताबिक तुमने इस मारवाड़ी से एक हफ्ते की मुद्दत पर पाँच लाख रुपये उधार लिये हैं ? शर्तनामे में लिखा है“ कि यदि निर्धारित समय के अन्तर्गत रुपये न चुका सकोगे तो मारवाड़ी के इच्छानुसार तुम्हें अपने शरीर के किसी भाग का एक सेर मांस देना पड़ेगा। वह इतना विख्यात व्योपारी होकर झूठ नहीं कहना चाहता था। इसलिये बोला- “काजी साहब ! शर्तनामे की बात सही है, उस समय मुझसे और मारवाड़ी से ऐसी ही शर्तें तयँ पाई थीं, परन्तु इस समय मैं मय सूद के इसका रुपया अदा करने को प्रस्तुत हूँ।

अकबर बीरबल विनोद ६४

अकबर बीरबल विनोद ६४ पहले भी एक बार नौकर के हाथ रुपया सूद के सहित भेज दिया था, परन्तु यह रुपया लेने से इन्कार कर मेरे से एक सेर मांस मांगता है। सरकार इस पर भलीभाँति विचारकर उचित न्याय करें।" साहूकार और दीनदयाल के अन्तरगत तय पाई शर्तों को सुनकर काजी बोला-"इसका न्याय अब हमारे बूते का नहीं है, न्याय तो तुम्हारा शर्तनामा ही कर रहा है। मैं हुक्म देता हूँ कि यह मारवाड़ी इसी समय आपके शरीर का एक सेर मांस अपनी इच्छानुसार काटकर ले लेवे।" दीनदयाल के रहे सहे होस हवास भी जाते रहे। बड़ा चिन्तित हुआ अन्त में कुछ सोच समझकर काजी से बोला-"मैं इस मामले को शाहनशाह के पास ले जाऊँगा, कृपया आप अपने आर्डर को तब तक के लिये मंसूख रक्खें जब तक कि वहाँसे कुछ फैसला न हो जावे।" काजी को लाचार होकर उसकी अर्जी मंजूर करनी पड़ी। उस मारवाड़ी को एक महीने की मुद्दत देकर काजी ने अपना काम समाप्त किया। दीनदयाल दूसरे ही दिन बादशाह की अदालत में समय से पेस्तर जा पहुँचा, और बादशाह को अदब से सलाम कर उदास मुख एक तरफ आसन लगाकर बैठ गया। उस समय बादशाह अपने फौज का प्रबन्ध कर रहे थे। जब वह काम शेष हो गया तो उनकी दृष्टि दीनदयाल पर पड़ी। उसका चेहरा उतरा हुआ देखकर बादशाहने उसके उदासी का कारण पूछा। दीनदयाल अपने और मारवाड़ी के बीच जो कुछ मामला चल रहा था ब्योरेवार कहकर समझाया। यह एक

६५ अकबर बीरबल विनोद

६५ अकबर बीरबल विनोद

नवीन घटना थी, सुनकर बादशाह दंग हो गया । वह इस सौदागर को भलीभाँति जानता था, वह दिल्ली नगर का बहुत प्राचीन व्योपारी था । उसने अनेक अवसरों पर अपना तन धन लगाकर सरकारी सहायता की थी जिस कारण बाद- शाह को उसकी दशा पर बड़ी तर्श आई और उसकी रक्षा का भार स्वयं अपने शिर लिया । तत्क्षण साहूकार को घर जाने की आज्ञा देकर आप दीवानखाने में पहुँचे । बीरबल स्वागत के लिये अपने आसन से उठ खड़ा हुआ और बादशाह उसकी बगल में एक कुर्सी पर जा बैठे । दोनों में अन्तरंग गोष्ठी होने लगी । बादशाह बीरबल को दीनदयाल का सारा कच्चा चिट्ठा सुना कर बोला-"बीरबल ! इस साहूकार का न्याय ऐसी युक्ति से करो, जिसमें उसकी जान बचे और अन्याय भी न हो, मैं इसकी दैन्य दशा पर बड़ा चिन्तित हो रहा हूँ । बीरबल बोला-"पृथ्वीनाथ ! चिन्ता करने की कोई बात नहीं है आपकी आज्ञा का यथोचित पालन करूँगा । उधर वे बीरबल को समझा कर अपनी सभा में पहुँचे इधर बीरबल उसके छुट- कारे की तरकीब सोचने लगा । एकाएक उसका चेहरा प्रफु- ल्लित हो गया और फिर अपने कार्य में दत्तचित्त हुआ । उधर केशवदास मारवाड़ी को भी नींद नहीं आती थी, वह तो दीनदयाल के पीछे हाथ धोकर पड़ा हुआ था पाँच छः दिनों की मुहलत देकर फिर बादशाह की अदालत में दावा दायर किया-"शर्त के मुवाफिक अदालत दीनदयाल से उसके शरीर का एक सेर मांस दिलवा दे ।" बीरबल इस अभियोग ५

का न्यायाधीश बनाया गया। वह बादशाह की आज्ञा स्वीकार करते हुए बोला-"पृथ्वीनाथ ! मैं यथाशीघ्र इसका न्याय करने का प्रयत्न करूँगा।" वह मारवाड़ी को एक ठौर बैठाकर दीनदयाल को बुलाने के लिये एक कर्मचारी को भेजा। जब आया तो उसे मारवाड़ी के सामने खड़ा कराकर बीरबल ने पूछा-"क्या तुम्हें अपना रुपया लेना मंजूर नहीं है? मारवाड़ी रुपया लेना नहीं चाहता था इससे साफ इनकार कर दिया। तब बीरबलने कहा-"मुझे काजी का फैसला शर्तनामे के बमूजिब स्वीकार है अतः मारवाड़ी को हुक्म देता हूँ कि सौदागर के शरीर से एक सेर माँस का टुकड़ा अपने हाथ से निकाल ले; परन्तु ध्यान रहे; अगर टुकड़ा जरा भी छोटा बड़ा हुआ कि वह सकुदुंब जान से मारा जावेगा। घर बार तथा उसका सारा कोष उसी अपराध के कारण जब्त कर लिया जायगा।" इस विज्ञप्ति से मारवाड़ी दहल गया और उससे कुछ उत्तर देते न बना। बीरबल उसे चुप देखकर जवाब के लिये बारबार उत्तेजित करने लगा। तब वह बोला- "दीवान जी ! मुझे माँस लेने की खाहिश नहीं है, मैं केवल पाँच लाख रुपये लेकर अपने मामले को उठा लेना चाहता हूँ, सूद भी छोड़े देता हूँ।" बीरबल ने कहा-"यह हरगिज नहीं हो सकता, तुम्हें मांस का टुकड़ाही लेना पड़ेगा, क्योंकि पहले तूँ साहूकार से रुपये लेना नामंजूर कर चुका है।" यदि तूँ शर्तनामें के अनुसार माँस न लेगा तो राजाज्ञा भंग करने के अपराध में तुझे सात लाख रुपये जरबाने लगेंगे। इस बार

६७ अकबर बीरबल विनोद

६७ अकबर बीरबल विनोद

खूब सोच समझ कर उत्तर दो, दोनों बातों में किसे मंजूर करते हो और किसे नामंजूर ? मारवाड़ी गरदन नीची करके बोला-“दीवान जी ! मुझे कुछ भी नहीं चाहिये ।” बीरबल ने कहा-“जो तू अब कुछ भी नहीं लेना चाहता तो तुझे पहले की राजाज्ञा न मानने के अपराध में सात लाख रुपये दण्ड देने पड़ेंगे, और दूसरा अपराध यह है कि तू ने दीनदयाल को कष्ट पहुँचाने की नीयत से उसके शरीर का मांस काट लेने की शर्त करायी थी, इस कारण चार साल की सजा और भुगतनी पड़ेगी ।” मारवाड़ी का होश ठिकाने न रहा। राजदूत बीरबल की आज्ञा से उसे पकड़ लिये और वह उसी क्षण जेलखाने में बन्द कर दिया गया । मार- वाड़ी के घर वालों से सात लाख रुपये वसूल किये गये । बीरबल के इस न्याय को सुनकर बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ और बीरबल के बुद्धि की प्रशंसा की । चूंकि दीनदयाल नेकनीयती कर पहले ही उसके पास रुपये भेज दिये था, इसलिये उसकी दूकान की प्रतिष्ठा रखने के लिये बादशाह ने उसको पारितोषिक देकर विदा किया। जो रुपये मारवाड़ी से दंड में लिये गये थे वह बीरबल को मिले ।

न स्त्री हैं न पुरुष

एक दिन बादशाह और उसके खोजे से आपस में कुछ बातें हो रही थीं, इसी बीच बीरबल की बात आई। तब

अकबर बीरबल विनोद ६८

अकबर बीरबल विनोद ६८

खोजे ने बीरबल की बड़ी दुर्निन्द की। यह बादशाह का मुँहलगा खोजा था इसलिये खुलेआम उसकी अवहेलना करना उचित न समझकर प्रमाणों द्वारा मुहतोड़ उत्तर देना शुरू किया। वह बोले-“तुम स्वयं विचारकर देखो कि मेरे दर्बार में बीरबल सा हाजिर जवाब एक आदमी भी नहीं है।” खोजा बादशाह के मुख से बीरबल की प्रशंसा सुनकर मनही-मन भड़क उठा और बोला-“हुजूर यदि आप बीरबलको हाजिर जवाब बतलाते हैं तो वह मेरे तीन सवालों का जवाब दे। यदि ठीक २ उत्तर दे देगा तो मैं भी उसे श्रेष्ठ मान लूँगा। बादशाहने उससे सवाल पूछने को कहा। खोजा बोला-“(१) आकाश में तारों की कितनी संख्या है (२) दुनियाँ में स्त्री पुरुष अलग २ कितने हैं। (३) धरती अपना बीच कहाँ रखती है।” बादशाह खोजे को अपने पास बैठाकर बीरबल को बुलवाने के लिये सिपाही भेजा। जब वह आया तो उससे खोजे के तीनों सवालों का उत्तर माँगा। बीरबल चुपके बाजार से एक बड़ा मेढ़ा खरीद लाया और उसे बादशाह के सामने खड़ा कर बोला-“खोजा साहब ! इसके पीठ के बालों की गणना कर लेवें। इसके शरीर में जितने बाल हैं उतने ही आकाश में तारे भी हैं। फिर इधर उधर गोड़ से पड़ताल कर एक जगह जमीन में खूटी गाड़ कर बोला- “पृथ्वीनाथ ! पृथ्वी का मध्य यही है, यदि खोजे को यकीन न हो तो स्वयं नाप ले, जब पहले और तीसरे सवालों के बाद दूसरे की बारी आई तो बीरबल हँसा पड़ा परन्तु

६६ अकबर बीरबल विनोद

६६ अकबर बीरबल विनोद अपना असली भाव छिपाकर उत्तर दिया- "गरीब परवर स्त्री पुरुषों की संख्या तो इन खोजों के कारण बिगड़ गई है क्योंकि ये न तो स्त्रियों की संख्या में आते हैं और न पुरुषों के ही। यदि सब खोजे जान से मरवा दिये जायें तो ठीक- ठीक गणना निकल सकती है।" खोजे का मुँह छोटा होगया। उसके मुँह से एक बात भी न निकली। बादशाह ने बहुत कुछ उसे भला बुरा सुनाया। बिचारा लाज का मारा, दुम दबाकर जनानखाने में चला गया। बादशाह ने बीरबल को पारितोषिक देकर बिदा किया। चार मूर्ख एक दिन मनोरंजन के समय बादशाह के मनमें यह बात आई- "संसार में मूर्खों की संख्या तो अमित है; परन्तु मैं ऐसे चार मूर्ख देखना चाहता हूँ जिनकी जोड़ के दूसरे न हों।" उसने बीरबल से कहा- "बीरबल ! चार मूर्ख इस ढंग के तलाश करो कि जिनकी जोड़ के दूसरे न मिलें।" वह बादशाह की आज्ञा मानकर नगर से बाहर निकला। ढूंढ़ने वालों को क्या नहीं मिल सकता, केवल सच्ची लगन होनी चाहिये। कुछ दूर जाकर बीरबल को एक आदमी दिखलाई पड़ा जो थाली में पान का एक जोड़ा बीड़ा और मिठाई लिये हुये बड़े उत्साह से नगर की तरफ जल्दी २ भागा जा रहा था।

अकबर बीरबल विनोद ७०

अकबर बीरबल विनोद ७० बीरबल ने उस आदमी से पूछा—"क्यों साहब ! यह सब सामान कहाँ लिये जा रहे हो, जो आपका पैर खुशि- हाली के कारण जमीन पर नहीं पड़ता, आपके मर्म को जानने की मुझे बड़ी इच्छा है अतएव थोड़ा कष्ट कर बत- लाते जाइये ।" उस आदमी ने पहले तो इस ख्याल से कुछ हीला हवाली किया कि कहीं उचित समय पर पहुँचने में देर न हो जाय । परन्तु जब बीरबल ने उसे छेड़कर कई बार पूछा तो वह मटक कर बोला—"यद्यपि मुझे विलम्ब हो रहा है परन्तु आपके इतना आग्रह करने पर बतला देना भी जरूरी है । "मेरी औरत ने एक दूसरा खसम कर लिया है उससे उसे लड़का पैदा हुआ है, आज बरही है । मैं उसीका बधावा लिये हुए न्योते में जा रहा हूँ । बीरबल ने उसे अपना नाम बतला कर रोक लिया और बोला "तुझे मेरे साथ बादशाह के पास चलना पड़ेगा, जब मैं छुट्टी दूँगा तब जाना । वह बीरबल का नाम सुनकर डर गया और लाचार होकर उसके साथ हो लिया । वह उसको साथ में लेकर आगे बढ़ा, दैवयोग से रास्ते में एक घोड़ी सवार मिला । वह आप तो घोड़ी पर सवार था परन्तु अपने सिर पर घास का बण्डल ढो रहा था । बीरबल ने उससे पूछा—"क्यों भाई ! यह क्या मामला है, आप अपने सिर का बोझ घोड़ी पर लादकर क्यों नहीं ले जाते ?" उसने कहा—"गरीबपरवर ! इसका कारण यह है कि मेरी घोड़ी गर्भिणी है ऐसी दशा में उसपर इतना बोझ नहीं लादा जा सकता, मुझे ले जा रही है यही क्या कम गनीमत है ।

७१ अकबर बीरबल विनोद

७१ अकबर बीरबल विनोद बीरबल इस घोड़ी सवार को भी अपने साथ ले लिया और दोनों को लिये दिये बादशाहके पास पहुँचा। तब बीरबल बोला—"पृथिवीनाथ ! चारों मूर्ख आपके सामने उपस्थित हैं।" बादशाह तो दो को ही देख रहा था अतएव बोला-"तीसरा मूर्ख कहाँ है?" बीरबल ने कहा-"तीसरा नम्बर हुजूर का है जो आपको ऐसे २ मूर्खों के देखने की इच्छा होती है। चौथा मूर्ख मैं हूँ जो उन्हें ढूंढकर आपके पास लाता हूँ।" बादशाह को बीरबल के ऐसे उत्तर से बड़ी प्रस- न्नता हुई और जब उन्हें उनकी मूर्खता का परिचय मिला तो खिलखिलाकर हँस पड़े।

बीरबल की चतुरता एक बार आश्विन के महीने में बीरबल बीमार पड़ा जिस कारण महीनों दर्बार में नहीं आया। एक दिन बादशाह को उसे देखने की इच्छा हुई। वह दो कर्म चारियों के साथ उसके मकान पर गया। बीरबल बादशाह को देख कर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसका कुम्हिलाया हुआ हृदय- कमल कुछ खिल सा गया। ये आपस में बड़ी देर तक बार्तालाप करते रहे न बीरबल बादशाह को छोड़ना चाहता था और न बादशाह बीरबल को ही, बातचीत में कई घंटों का समय व्यतीत हो गया। इसी बीच बीरबल को पाखाना मालूम हुआ। ऐसी विवशता के कारण वह बादशाह से कुछ देर की मुहलत लेकर बगल की एक कोठरी में

अकबर बीरबल विनोद ७२

अकबर बीरबल विनोद ७२

पाखाना फिरने गया। इस बीच बादशाह के जी में बीरबल के बुद्धि-परीक्षा की बात समाई, उसने ख्याल किया कि बीरबल महीनों से बीमार है; शायद उसकी चतुरता में कुछ कमी पड़ गयी हो। जानना चाहिये कि अब यह कितना चतुर रह गया है। नौकरों द्वारा उसके पलँग के चारों पायों तले चार कागज के टुकड़े रखवा कर खामोश रहा। थोड़ी देर बाद बीरबल पाखाने से लौटकर आया और अपनी पलँग पर लेट रहा। बादशाह उसकी परीक्षा के अभिप्राय से इधर उधर की बातें छेड़कर उसे भुलावा देने लगा। बीरबल एक तरफ बादशाह की बातें सुनता जाता था दूसरी तरफ किसी चीज की खोज में व्यस्त था। वह ऊपर नीचे इस प्रकार से देख रहा था मानों किसी चीज का अनुसंधान कर रहा हो। बादशाह ने उसकी उसक पुसक का कारण पूछा। बीरबल ने कहा-"पृथिवीनाथ! जान पड़ता है कि यहाँ पर कुछ रद्दो बदल हो गया है? वे अनजान सा मुँह बनाकर बोले-"क्या रद्दो बदल हुआ है?" बीरबल ने उत्तर दिया-मुझे मालूम होता है कि या तो इस मकान की दीवाल कागज भर नीचे को दब गई है वा मेरी पलँग एक कागज ऊँची हो गई है। बादशाह ने कहा-"हाँ हाँ अक्सर देखा जाता है कि बीमारी की दशा में निर्बलता के कारण लोगोंके दिमागमें तुम्हारे समान ही फितूर आ जाता है परन्तु दरअसल में वह बात ठीक नहीं रहती।" बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ! ऐसा नहीं हो सकता, मैं बीमार हूँ तो मेरी बुद्धि बीमार नहीं है।" बादशाह बीरबल की

७३ अकबर बीरबल विनोद

७३ अकबर बीरबल विनोद पहले ही सी चतुरता देखकर बड़ा प्रसन्न हुए और उससे असली भेद प्रकट कर दिया । —०:***:०— अपनी मनमानी दूँगा दिल्ली का एक नागरिक बड़ा सूम था। वह अपने परिश्रम और कृपणता के कारण रत्नों का एक बड़ा कोष संग्रह किये हुए था। वह उन रत्नों को एक ऐसी साधारण सन्दूक में छिपाकर रक्खे हुए था कि जिससे देखने वाले को उसमें रत्न होने का भ्रम न हो सके। उसका घर भी साधारण गृहस्थों के समान कच्चा और टूटा फूटा हुआ था। भला ऐसे भग्न मकान में रत्न होने की कौन संभावना कर सकता था ? दैवात एक दिन मध्य रात्रि में उसके घर में आग लगी । कंजूस उस आग को बुझाने की कोई तरकीब न देख कर कुछ साधारण वस्त्रों को लेकर घर से बाहर निकल आया । ये वस्त्र उसके रोजमर्रा के काम आने वाले थे । घर जलने की चिन्ता में विचारा कंजूस छाती पीट पीटकर रुदन करने लगा। उसके रोने का शब्द सुन और आग की लपट देखकर उसके अड़ोस पड़ोस के बहुतेरे आदमी एकत्र हो गये। उन आदमियोंमें एक लोहार भी था। लोहारने कंजूस को फटकारते हुए कहा-“इस साधारण झोपड़े के लिये तूँ इतना रुदन क्यों कर रहा है, इसमें तेरा कौन सा बड़ा नुकसान हो जायगा ?” सूम बोला-“भाई तू झोपड़ा जलता देखता है और मैं अपने रत्नों को जलते देख रहा हूँ; फिर तू

अकबर बीरबल विनोद ७४

अकबर बीरबल विनोद ७४

ही बता कि क्यों कर न रोकूँ ।” लोहार ने कहा-“वह धन कहाँ और किस चीज़ में रक्खा हुआ है। तब सूमड़ा उँगली से बगल की एक कोठरी दिखलाते हुए बोला-“उसी कोठरी में एक काठ की पुरानी सन्दूक रक्खी हुई है जिसमें सात लाख के जवाहरात बन्द हैं।” लोहार ने कहा-“यदि मैं उन जवाहरातों को बाहर निकाल लाऊँगा तो अपने मन मानी तुझे दूँँगा और बाकी मैं लूँगा ।” सर्वस जाता देख कंजूस ने उसकी बात मान ली । लुहार अग्नि से बचने की तरकीब जानता था इसलिये उस जलती हुई आग में साहस कर कूद पड़ा और कोठरी में पहुँच कर उस सन्दूक को बाहर निकाल लाया । इस प्रकार पिटारी को अपनी बगल में रखकर अग्नि- काण्ड देखने लगा। थोड़ी देर बाद जब अग्नि का वेग घट गया और लोगों के हृदय में शान्ति आई तो पिटारी का मामला उपस्थित हुआ। जिस वक्त लोहार और कंजूस में ऐसी शर्तें तय पाई थीं उस समय लोहार ने एक और चालाकी की थी। उस जगह के दो मनुष्यों को अपना गवाह बना लिया था। गवाहों के सामने ही वह पिटारी खोली गई। पिटारी खुलते ही जवाहरातों की चमक बाहर तक फैल गई। जैसे धन देखकर गँवारों की दशा होती है वही दशा लुहार की भी हुई। उस अमुल्य रत्नों की ढेरी को देखकर उसका मन फिर गया। वह का सारा धन तो आप ले लिया और उस खाली को विचारे कंजूस के हवाले किया। कंजूस लुहार अनीति देखकर बहुत चकराया और गिडगिडा

७५ अकबर बीरबल विनोद

७५ अकबर बीरबल विनोद

कर उससे कहने लगा- "भाई आधा धन मुझे दो और बाकी आधा आप ले लो, इसमें मेरी राजी है।" लुहार डाटकर बोला-"क्या पहले मेरे तेरे बीच ऐसी शर्ते पकी नहीं हुई थीं कि मैं तुझे अपनी मनमानी दूँगा ! अब चों चप्पड़ क्यों करता है?" दोनों में वाता विवाद होते होते सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत होगई और सूर्योदय का समय आया । सूमड़ा आधा रत्नोंको पानेकेलिये बहुतेरा प्रयास किया परन्तु लुहार उसकी एक भी सुनने को तय्यार नहीं था सूमड़े ने लाचार होकर बादशाह के पास अर्जी गुजारी । मामला पेचीला देखकर वादशाहने बीरबलको बुलाया और उनका सारा हाल सुनाकर उसे न्याय करने की आज्ञा दी । बादशाह की आज्ञा सिरोधार्य कर बीरबल ने उन दोनों से अलग अलग बयान लिया, और उन बयानों को पृथक पृथक दो कागजों पर लिखकर उस पर उनके हस्ताक्षर कराये । फिर उन दोनों से बारी बारी शाक्षी लेकर प्रमाणित कराया कि उनका कहना बिल्कुल सत्य और उन्हें मान्य है। तब बीरबल ने पहले पहल लुहार से पूछा-"तुमको इसमें से क्या क्या लेना मंजूर है?" लोहार बोला-"मेरी इच्छा जवाहरात लेने की है।" बीरबल ने तुरत निर्णय कर दिया-"तू जवाहरात इस कंजूस को दे दे और स्वयं खाली पिटारी ले ले।" यह निर्णय सुनकर लोहार ने शर्तनामें की तरफ इशारा किया । बीरबल बोला- : "तूँ पहले ही अपनी शर्तों में लिख चुका है-"मैं अपनी मन मानी दूँगा।" तो तेरे मन में जवाहरात लेने का है अतएव तेरी

अकबर बीरबल विनोद ७१

अकबर बीरबल विनोद ७१ जबान से ही निर्णय हो गया । अब जवाहरातों को इसे देकर आप खाली पिटारी लेकर चला जा । इस प्रकार लुहार के हाथ खाली पिटारी लगी और कंजूस सानन्द जवाहरातों को लेकर घर लौटा ।

बीरबल और मदिरा

दरबार के समय में बादशाह को गप्प लड़ाने का मौका नहीं मिलता था इसकारण जनाने महल में ही गप लड़ा लिया करता था और इसी समय में आपस की गोष्ठी भी हो जाया करती थी। यह बात सब पर विदित थी जिस कारण बीरबल को जनाने महल में जाने की कोई मना ही नहीं थी। जब वार्तालाप करके बादशाह संतुष्ट हो जाता तो एक ऐसी नशीली चीज का सेवन करलेता जिससे कुछ समय पश्चात उसका चेहरा बदल जाता और बातें भी और की तौर करने लगता था। बीरबल नित्य बादशाह की ऐसी दशा देखा करता; परन्तु उसकी समझ में न आता कि दरअसल वह किस वस्तु का सेवन करता है। उस चीज के सेवन से बादशाह की स्मरणशक्ति बदल जाती । ऐसी दशा में बादशाह अनेक भूलें भी कर डालता था । एक दिन बीरबल के मन में उस वस्तु की जानकारी प्राप्त करने की सूझी। वह बीमारी का बहाना कर कई दिनों तक दरबार में नहीं आया। बादशाह ने एक दो दिन तो यह समझ कर कि साधारण बीमारी होगी, उसकी कुछ

७७ अकबर बीरबल विनोद

७७ अकबर बीरबल विनोद खोज खबर न ली। परन्तु जब सोचते सोचते तीन चार दिनों का अरसा बीता और वह नहीं आया तो उन्हें बीरबल को देखने की इच्छा हुई। वे अपने चन्द सिपाहियों के साथ बीरबल के मकान पर गये। जब उसे बादशाहके आगमन की सूचना मिली तो झट दूसरे दरवाजे से होकर बाहर निकल गया और लोगों की आंख बचाकर सीधे दरबार में जा पहुँचा। गुप्त मार्ग से जनाने महल में पहुँचकर उस नशीली चीज की तलाश करने लगा। जब बाहर उसका सुराख न लगा तो बक्स की तालीके फिराक में पड़ा, दैवात ताली मिल गई, वह एक कोने में अच्छी तरह छिपाकर रक्खी हुई थी। बक्स का ताला खोलकर उसके अन्दर की चीजों को देखा। एक तरफ कोने में एक बोतल रक्खी हुई मिली, उसे चुपके से बाहर निकाल कर अपनी शाल के अन्दर छिपा लिया और द्रुत वेग से घर की तरफ राही हुआ। बादशाह को उसके घर वालों से पूछने पर विदित हुआ. "थोड़ी देर हुआ दरबार की तरफ गये हैं।" यह सुनकर उसको कुछ चिन्ता सी हुई और बीरबल के जाने का कारण जानने के लिये व्याकुल हो उठा। मनमें सोचा-"बिना किसी अनिवार्य कारणके बीरबल ऐसी दशामें नहीं जा सकता था। वह अपने साथियों सहित लौटने लगा। अभी दो चार सीढ़ी ही उतर कर गया था कि सामने से बीरबल आता हुआ दिखाई पड़ा। बीरबल मनहीं मन सोचता हुआ आरहा था कि बादशाह के पूछने पर क्या उत्तर दूँगा। इसी बीच बादशाह की दृष्टि उसपर जो पड़ी और वह वहीं रुक गया। पास

अकबर बीरबल विनोद

अकबर बीरबल विनोद पहुँचकर बादशाह ने पूछा- "तुम इस समय महल की तरफ क्यों गये थे और तुम्हारे बगलमें यह क्या चीज है।" बीरबल ने कहा-"कुछ तो नहीं।" फिर भी बादशाह का शक ब- ही रहा क्योंकि उसकी काख तले चदरे के भीतर से कोई चीज दिखाई पड़ रही थी। बादशाह ने दुबारा पूछा- "बीरबल ! झूठा क्यों बोल रहा है, तुम्हारी काख के भीतर कोई चीज अवश्य छिपी हुई है।" बीरबल ने कहा- "हाँ वह तोता है।" बीरबल के ऐसे रूखे उत्तर से बादशाह को सन्तोष नहीं हुआ और क्रोधित होकर बोला- "तुम्हें आज इतना मजाक क्यों सूझी है।" बीरबल अविलम्ब बोला- "पृथ्वीनाथ ! अश्व है।" बादशाह बड़ा हैरान हुआ और भौंह चढ़ाकर कहा- "मैं देखता हूँ कि आज तुम्हारा दिमाग आसमान पर चढ़ता जा रहा है।" बीरबल ने कहा- "नहीं नहीं हाथी है।" बादशाह ने कहा- "क्या तुमने भाँग तो नहीं खाई है, ठीक ठीक समझ कर उत्तर दो।" बीरबल कब चुप रहने वाला था बोला- "गधा है, गधा।" बारंबार बीरबल के टालमटोल की बातें सुनकर बादशाह बहुत ही चिढ़ गया और पूछा- "क्या आज तुमपर मृत्यु तो नहीं सवार हो गई है, काँख में की छिपी वस्तु का नाम ठीक ठीक क्यों नहीं बतलाते हो ?" इस बार बीरबल ने साफ बतला दिया-हुजूर ! शराब है !" फिर अपनी बगल से बोतल निकाल कर बादशाह के हवाले किया। बीरबल ऐसे धर्म परायण ब्राह्मण के पास शराब की बोतल देखकर बादशाह को आश्चर्य हुआ और उसका कोप कुछ शान्त हो गया। वह बीरबल को अपने साथ जनाने महल में लिवा

७६ अकबर बीरबल विनोद

७६ अकबर बीरबल विनोद ले गया। वहाँ जाकर देखा तो उसके कमरे की सारी चीजें इधर उधर बिखरी पड़ी हैं, सन्दूक काताला भी खुला हुआ है। बादशाह तुरत ताड़ गया कि इसी को चुराने के लिये बीर- बल अकेले में यहाँ आया था, परन्तु फिर भी इतने ही से उसे शान्ति न मिली। उसने विचारा कि यह तो हुई यहाँ की बात, रास्ते में बीरबल अंटसंट क्यों बतलाता था ? तब वह बोला-“बीरबल ! मालूम होता है आज तुम कुछ नशा खा गये हो; नहीं तो ऐसी ऊटपटांग बातें कभी न करते। तुम्हारी काँख तले शराब की बोतल मौजूद थी फिर भी तुमने उसे बैल, गदहा आदि आदि कैसे बतलाया ।” बीरबल को अपना राज बादशाह पर खोलने का मौका मिल गया और उसे इस ढंग से प्रगट करना प्रारम्भ किया-“पृथिवीनाथ ! न तो मैं नशा खाये हूँ और न मेरी बुद्धि ही भ्रष्ट हुई है, मैंने जो कुछ भी कहा है वह मेरे काँख तले थी।”-“अच्छा हुजूर सुनिये-“पहले पहल मैंने आप से बतलाया था कि कुछ भी नहीं है, सो मद्यपान के प्रथम प्याले की बात थी, उस समय बात करनेवाला कुछ भी नहीं देखता। दूसरी बार मेरी जबान पर तोते का नाम आपने सुना होगा। इसका अभिप्राय यह था कि दूसरा प्याला पीलेनेपर मनुष्य तोते के समान बकने लगता है। फिर मैंने घोड़े का नाम लिया था। उसके मानी यह था कि तीसरा प्याला पी चुकने पर मद्यपी घोड़े के समान हिनहिनाना प्रारम्भ कर देता है। चौथी बार हाथी बतलाया था। सो इस कारण कि चौथे प्याले के सेवन के पश्चात् मद्यपी मस्त

अकबर बीरबल विनोद ८०

अकबर बीरबल विनोद ८० हाथी की तरह झूमना प्रारम्भ करता है। पाँचवीं बार गधा बना देता है। छठवें में मद्यपी नशे में गुप्त हो जाता है, यहाँ तक कि उसको अपने शरीर तक की भी सुधि बुध नहीं रहती। यही कारण था कि अन्त में मैंने शराब का नाम लिया था।" एक बोतल में केवल छः प्याला शराब रहती है। प्रत्येक प्याला सेवन के पश्चात् मनुष्य की पृथक पृथक दशाएँ हो जाती हैं। बादशाह बीरबल की इन बातों को बड़े ध्यान पूर्वक सुन रहा था कारण कि उसे इस बात का पहले ही से विश्वास था कि बीरबल जो कुछ भी कहे वा करेगा उसके अच्छे के लिये ही। बीरबल का अभिप्राय भी बादशाह का मद्य पान छुड़ाना ही था। उस की इस शुभ कांक्षा से बादशाह बड़ा हर्षित हुआ और उसे उचित पुरस्कार देकर बिदा किया। शिर के बाल मुड़वा दूँगा। दिल्ली नगर में एक बड़े सुप्रतिष्ठित और विद्वान ब्राह्मण रहते थे, उनके श्रेष्ठाचरण से दरबार में उनका बड़ा सम्मान था। पंडित जी का स्वभाव था कि वे बिना समझे बूझे किसी कार्य्य में हाथ नहीं डालते थे और जिस बात को मुख से एक बार कह देते उसको प्राणप्रण से पालन करते थे। उनसे उनका भृत्य समुदाय सदा भयभीत रहता। एक दिन ऐसी घटना घटी, जब उक्त पंडित जी चौके में