अष्टाध्यायी सूत्रपाठ (महर्षि पाणिनि - पदच्छेद एवं यतिबोध सहित सम्पूर्ण ८ अध्याय)
Ashtadhyayi Sutrapatha of Maharshi Panini
महर्षि पाणिनि द्वारा
( छ ) कृतज्ञता-प्रकाश-यद्यपि यह नवीन ग्रन्थ-निर्माण किसी विशेष बुद्धि तथा विद्वत्ता की अपेक्षा नहीं रखता है तथापि नवसृजनात्मकता की दृष्टि से यह अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण तथा परमोपयोगी है। इस सम्पूर्ण कृत्य के लिये हम अपनी सम्पूर्ण विद्याओं के गुरु, परमादरणीय, प्रातःस्मरणीय, परमविद्वान् गुरुवर्य 'आचार्य विजयपाल विद्यावारिधि जी' का अत्यन्त हार्दिक रूप से आभार व्यक्त करते हैं जिनके साक्षात् मुखारविन्द से हमने वैदिक वाङ्मय का विधिवत् एवं यथाशक्ति अध्ययन किया तथा जिनके आशीर्वचन हमारे लिये स्वाभाविक रूप से ही निरन्तर प्राप्त होते रहते हैं जिन्हें प्राप्त करके ही हम किसी भी प्रकार के महत्त्वपूर्ण कार्य को पूर्ण करने में सफल हो पाते हैं। इनके अतिरिक्त हम अपने परमादरणीय स्वर्गीय बाबा जी एवं दादी जी, परमादरणीय, परमविद्वान् पितृवर्य 'आचार्य चन्द्रदत्त शर्मा जी' तथा माता जी, संस्कृत तथा संस्कृति के कार्यों के लिये हमारा सतत उत्साहवर्धन करनेवाली, अपने अत्यन्त हार्दिक, सात्त्विक एवम् आत्मिक प्रेम से हमारे हृदय को निरन्तर सींचनेवाली, अत्यन्त सेवापरायणा, पतिव्रता, हमारी हृदयेश्वरी, अपनी धर्मपत्नी का विशेष रूप से आभार व्यक्त करते हैं जिनके वास्तविक एवं व्यावहारिक सत्प्रयासों तथा हार्दिक शुभकामनाओं से ही हम यह कार्य पूर्ण कर पाने में सफल हो सके हैं। इनके अतिरिक्त हम अपने सभी भाईयों, बहनों, सभी निकटदूरस्थ बन्धु-बान्धवों तथा अपने सभी अभिन्नहृदय परममित्रों 'आचार्य भरत कुमार जी' आदि का भी हृदय से अत्यन्त आभार व्यक्त करते हैं जिनकी सर्वदैव निष्छल, निःस्वार्थ शुभकामनायें हमें सर्वदैव प्राप्त होती रही हैं जिस कारण हम यह कार्य पूर्ण कर पाने में सफल हो सके हैं। उपर्युक्त सभी की स्नेहमयी कृपा, आशीर्वाद तथा शुभेच्छाओं को ही हम इस कार्य की सफलता का श्रेय तथा धन्यवाद प्रदान करेंगे जिन्हें प्राप्त करके हम इस कार्य को पूर्ण करने में सफल हुये तथा भविष्य में भी दुरूह से दुरूह कार्यों में सफलता प्राप्त करते
( ज ) रहेंगे। आशा है हमारा यह सर्वथा नवीन प्रयास संस्कृत जगत् के प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति के लिये परमोपयोगी सिद्ध होगा तथा यही हमारे लिये उनके द्वारा प्रदत्त इस कार्य का सुफल भी होगा। इसी कामना के साथ- 'संस्कृतम्', होटल अन्नपूर्णा, विदुषामनुचरः- ११०२, सिविल लाइन्स, बदायूँ, धर्मेश भारद्वाज जिला-बदायूँ, (उ.प्र.), पिन कोड-२४३६०१. श्रावण, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा, संवत्सर २०६३, दिनाङ्क-९ अगस्त, २००६ (बुधवार)। --०--
८. अष्टमोऽध्यायः (द्वित्व, सन्धि, णत्व, षत्व एवं अ अ उपसंहार)
॥ ओ३म् ॥ पाणिनिमुनिप्रणीतः अष्टाध्यायीसूत्रपाठः ( यतिबोधसहितो लघुकायश्च ) यतिबोधकारः सम्पादकश्च- आचार्य धर्मेश भारद्वाज प्रकाशकः- श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती संस्कृत एवं संस्कृति शोध, शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थान, तहसील-सिन्नर, जिला-नासिक (महाराष्ट्र), पिन कोड-४२२१०३.
प्रकाशक- श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती संस्कृत एवं संस्कृति शोध, शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थान, तहसील-सिन्नर, जिला-नासिक (महाराष्ट्र), पिन कोड-४२२१०३. कम्प्यूटर-अक्षरसंयोजक- आचार्य धर्मेश भारद्वाज, 'संस्कृतम्', होटल अन्नपूर्णा, ११०२, सिविल लाइन्स, बदायूँ, जिला-बदायूँ (उ.प्र.), पिन कोड-२४३६०१. सर्वाधिकार- प्रकाशकाधीन (कॉपीराइट संख्या------------)। वितरक- श्री जयसेठ हीरालाल चम्पालाल खिवंसरा जी, हीरालाल चम्पालाल एण्ड कम्पनी, निकट-कालभैरवनाथ मन्दिर, तहसील-सिन्नर, जिला-नासिक, (महाराष्ट्र), पिन कोड-४२२१०३. प्रथम संस्करण- ५००० प्रतियाँ। समय- संवत् २०६४, सन् २००७ ई.। मूल्य- -----------(साथ में लघुकाय संस्करण निःशुल्क)। मुद्रक-
॥ ओ३म् ॥ पाणिनिमुनिप्रणीतः अष्टाध्यायीसूत्रपाठः ( यतिबोधसहितो लघुकायश्च ) यतिबोधकारः सम्पादकश्च- आचार्य धर्मेश भारद्वाज प्रकाशकः- श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती संस्कृत एवं संस्कृति शोध, शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थान, तहसील-सिन्नर, जिला-नासिक ( महाराष्ट्र ), पिन कोड-४२२१०३.
(क) प्रकाशकीय कृतज्ञता-ज्ञापन स्वामी जी का छायाचित्र श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती जी जिनके ऊपर परमपिता परमेश्वर की असीम अनुकम्पा है, जिनके आशीर्वाद, कृपा तथा सत्प्रेरणा के फलस्वरूप ही मैं अकिञ्चन इस पवित्र कार्य को कर पाने में समर्थ हो सका हूँ, जो इस कार्य के वास्तविक कर्ता हैं, मैं तो निमित्तमात्र हूँ, जिन्हें यह कार्य मेरी ओर से पूर्ण निरहङ्कारिता तथा भक्तिभाव से समर्पित है, जिनके प्रति मेरी पूर्ण आत्मिक कृतज्ञता है। प्रकाशक—जयसेठ हीरालाल चम्पालाल खिंवसरा अध्यक्ष श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती संस्कृत एवं संस्कृति शोध, शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थान, तहसील—सिन्नर, जिला—नासिक (महाराष्ट्र), पिन कोड—४२२१०३.
( ख )
प्रकाशकीय कृतज्ञता-ज्ञापन
अब मैं अपने पूजनीय पिता जी तथा माता जी 'श्री-------- ----------जी' तथा 'श्रीमती ------------------जी', परिवारवासियों, निकटदूरस्थ बन्धु-बान्धवों, अभिन्नहृदय मित्रों, अतिशयस्नेही 'आचार्य भरत कुमार जी', रचनात्मक संस्कृतसाहित्य के प्रकाशन के प्रति मेरे हृदय में सत्प्रेरणा जगानेवाले, इस अद्भुत एवम् अद्वितीय ग्रन्थ का अत्यन्त शोधपूर्ण मन्थन करके यथाशक्ति श्रेष्ठतम सम्पादन तथा प्रकाशनसम्बन्धी कम्प्यूटर-अक्षरसंयोजन आदि अनेक आवश्यक कार्य पूर्ण करनेवाले, हमारे संस्थान के 'शोध- निर्देशक', समादरणीय तथा अतिशय सुहृत्, सम्पादक महोदय 'आचार्य धर्मेश भारद्वाज जी', इस अद्भुत तथा अद्वितीय ग्रन्थ का मुद्रण करनेवाले मुद्रक महोदय 'श्री --------- -------जी' तथा इस पवित्र कार्य के निर्बाधरूप से पूर्ण होने में सभी सहायक परोक्ष एवम् अपरोक्ष परिस्थितियों के प्रति भी अपनी हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ जिनकी सत्प्रेरणा, सहयोग, परिश्रम तथा शुभकामनाओं के फलस्वरूप ही मैं अकिञ्चन इस ग्रन्थ को यथाशक्ति श्रेष्ठतम रूप में प्रकाशित करने में समर्थ हो सका हूँ। प्रभु आप सभी पर अपनी कृपादृष्टि सदा बनायें रखें, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ मैं आप सभी को हार्दिक साधुवाद भी प्रदान करता हूँ। साथ ही आप सभी सुधी पाठकों के आशीर्वचनरूपी फल का पुण्यभागी बन सकूंगा, यह आशा भी करता हूँ। शुभाकाङ्क्षी- प्रकाशक—जयसेठ हीरालाल चम्पालाल खिंवसरा अध्यक्ष श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती संस्कृत एवं संस्कृति शोध, शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थान, तहसील-सिन्नर, जिला-नासिक (महाराष्ट्र), पिन कोड-४२२१०३.
॥ ओ३म् ॥ पाणिनिमुनिप्रणीतः अष्टाध्यायीसूत्रपाठः ( यतिबोधसहितो लघुकायश्च ) यतिबोधकारः सम्पादकश्च- आचार्य धर्मेश भारद्वाज प्रकाशकः- श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती संस्कृत एवं संस्कृति शोध, शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थान, तहसील-सिन्नर, जिला-नासिक ( महाराष्ट्र ), पिन कोड-४२२१०३.