अष्टाध्यायी सूत्रपाठ (महर्षि पाणिनि - पदच्छेद एवं यतिबोध सहित सम्पूर्ण ८ अध्याय)
Ashtadhyayi Sutrapatha of Maharshi Panini
महर्षि पाणिनि द्वारा
( ङ ) होती थी परन्तु चूँकि पूज्य आचार्य जी अपने गुरुजी द्वारा सम्पादित संस्करण से मात्र मुद्रित अशुद्धियों को ही दूर करने के विशेष इच्छुक थे, कोई नवीन परिवर्तन करने के इच्छुक नहीं थे, उसके पुराने रूप से छेड़छाड़ के पक्षधर नहीं थे अतः उस समय चाहकर भी वे नये परिवर्तन प्रकाशित नहीं हो पाये थे। हालाँकि जहाँ तक हमें स्मरण है, हमने उस समय आचार्य जी से अपनी बुद्धि के नये सुझाव खुलकर प्रस्तुत भी नहीं किये थे, करते तो सम्भवतः वे स्वीकार कर भी लेते, परन्तु उस समय सङ्कोचवश कह ही नहीं पाये अतः वह सब मन में ही रह गया। **यतिबोध—**सूत्रों में किस अक्षर पर शब्द को तोड़कर अर्थात् किस अक्षर पर यति ( अल्पविराम अथवा हल्की सी श्वाँस ) करके, उनका शुद्धतम उच्चारण करके, उन्हें शुद्धतम रूप में कण्ठस्थ किया जाये, इसका बोध कराने के लिये प्रस्तुत संस्करण में जिस नवीन एवम् अतिविशिष्ट प्रकार की सुविधा ‘यतिबोध’ का समावेश किया गया है, उसके लिये हमने अधिकांशतया शब्दों के अविखण्डित स्वरूप ( सन्धि, लिपिपरिपाटी आदि के कारण जहाँ इनके स्वरूप का विखण्डन हुआ है, वहाँ कुछ अत्यावश्यक नियमों का आश्रय लेकर, उनका परशब्द के साथ समावेश करके, अविखण्डित स्वरूप की कल्पना की गई है ) को प्रमुखतया आधार बनाकर स्वनिर्मित परन्तु अत्यन्त सूक्ष्म शास्त्रीय दृष्टि से शास्त्रीयता का पुट लिये हुये एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से सुविधापूर्ण अनेक नियमों को आधार बनाया है। इस विशेषता का समावेश कर देने से छात्रों को एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लाभ दूरगामी दृष्टि से यह भी होगा कि उन्हें इस प्रकार यतिबोधपूर्वक सूत्रों को कण्ठस्थ करते-करते शब्दों के अधिकाधिक मूल स्वरूपों का बोध भी अनायास ही हो जायेगा जिसका चामत्कारिक लाभ उन्हें प्रथमावृत्ति, काशिका, महाभाष्य आदि ग्रन्थों का अध्ययन करते समय प्रतीत होगा। उन सभी का उल्लेख यहाँ पर विस्तरभय तथा ग्रन्थ के
( च ) कण्ठस्थीकरणरूप प्रधान उद्देश्य होने के कारण अप्रासङ्गिक होने से नहीं किया जा रहा है, साथ ही यह भी कारण है कि उन सभी विशेषताओं का उल्लेख करने से कदाचित् उपर्युक्त संस्करण से श्रेष्ठता सिद्ध करने की ध्वनि निकलती हुई प्रतीत न हो जो कि लेशमात्र भी हमारा उद्देश्य नहीं है। और फिर विद्वान् एवं छात्र ग्रन्थ का अध्ययन करके यथेष्टरूप से लाभान्वित होते हुये स्वयम् उन विशेषताओं, परिष्कारों एवं नियमों से अवगत हो सकेंगे जो कि हमारा वास्तविक ध्येय है। यद्यपि यतिबोध के नियमों का ( आनुमानिक ) बोध छात्रों को सूत्रों को कण्ठस्थ करते समय ही हो जायेगा—यह आवश्यक नहीं है परन्तु भावी अध्ययन करते समय यह बोध स्वतः ही अवश्य हो सकेगा। इसके अतिरिक्त यदि किन्हीं विद्वानों एवं छात्रों को यतिबोध के नियमों का स्पष्टीकरण न हो सके तो वे यथोचित सम्पर्क अथवा पत्र-व्यवहार आदि द्वारा उनका हमसे स्पष्टीकरण प्राप्त कर सकते हैं तथा यदि किन्हीं विद्वानों एवं छात्रों के मस्तिष्क में ग्रन्थ के अन्दर किसी भी प्रकार की कोई त्रुटि अथवा परामर्श अनुभूत हो तो कृपया यथोचित माध्यम से सम्पर्क करके सूचित करने की कृपा अवश्य करें जिससे अग्रिम संस्करण को और भी अधिक श्रेयस्कर प्रकाशित किया जा सके। सभी का हार्दिक स्वागत है। विशेष—प्रस्तुत ग्रन्थ में छात्रों तथा अध्यापकों को यह सुविधा भी प्रदान की जाती है कि वे अपनी उच्चारण करने की सामर्थ्य के अनुसार एक साथ एक से अधिक यतियों सहित भी सूत्रों का उच्चारण करके कण्ठस्थ कर तथा करवा सकते हैं। यथा—‘दाधा घ्वदाप्’, यहाँ पर स्वयं की सुविधानुसार ‘दा’ तथा ‘धा’ इन दो यतियों का तथा ‘घ्व’ तथा ‘दाप्’ इन दो यतियों का एक साथ उच्चारण करके क्रमशः ‘दाधा’ तथा ‘घ्वदाप्’ इस प्रकार भी कण्ठस्थ कर तथा करवा सकते हैं।
( छ ) कृतज्ञता-प्रकाश-यद्यपि यह नवीन ग्रन्थ-निर्माण किसी विशेष बुद्धि तथा विद्वत्ता की अपेक्षा नहीं रखता है तथापि नवसृजनात्मकता की दृष्टि से यह अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण तथा परमोपयोगी है। इस सम्पूर्ण कृत्य के लिये हम अपनी सम्पूर्ण विद्याओं के गुरु, परमादरणीय, प्रातःस्मरणीय, परमविद्वान् गुरुवर्य 'आचार्य विजयपाल विद्यावारिधि जी' का अत्यन्त हार्दिक रूप से आभार व्यक्त करते हैं जिनके साक्षात् मुखारविन्द से हमने वैदिक वाङ्मय का विधिवत् एवं यथाशक्ति अध्ययन किया तथा जिनके आशीर्वचन हमारे लिये स्वाभाविक रूप से ही निरन्तर प्राप्त होते रहते हैं जिन्हें प्राप्त करके ही हम किसी भी प्रकार के महत्त्वपूर्ण कार्य को पूर्ण करने में सफल हो पाते हैं। इनके अतिरिक्त हम अपने परमादरणीय स्वर्गीय बाबा जी एवं दादी जी, परमादरणीय, परमविद्वान् पितृवर्य 'आचार्य चन्द्रदत्त शर्मा जी' तथा माता जी, संस्कृत तथा संस्कृति के कार्यों के लिये हमारा सतत उत्साहवर्धन करनेवाली, अपने अत्यन्त हार्दिक, सात्त्विक एवम् आत्मिक प्रेम से हमारे हृदय को निरन्तर सींचनेवाली, अत्यन्त सेवापरायणा, पतिव्रता, हमारी हृदयेश्वरी, अपनी धर्मपत्नी का विशेष रूप से आभार व्यक्त करते हैं जिनके वास्तविक एवं व्यावहारिक सत्प्रयासों तथा हार्दिक शुभकामनाओं से ही हम यह कार्य पूर्ण कर पाने में सफल हो सके हैं। इनके अतिरिक्त हम अपने सभी भाईयों, बहनों, सभी निकटदूरस्थ बन्धु-बान्धवों तथा अपने सभी अभिन्नहृदय परममित्रों 'आचार्य भरत कुमार जी' आदि का भी हृदय से अत्यन्त आभार व्यक्त करते हैं जिनकी सर्वदैव निष्छल, निःस्वार्थ शुभकामनायें हमें सर्वदैव प्राप्त होती रही हैं जिस कारण हम यह कार्य पूर्ण कर पाने में सफल हो सके हैं। उपर्युक्त सभी की स्नेहमयी कृपा, आशीर्वाद तथा शुभेच्छाओं को ही हम इस कार्य की सफलता का श्रेय तथा धन्यवाद प्रदान करेंगे जिन्हें प्राप्त करके हम इस कार्य को पूर्ण करने में सफल हुये तथा भविष्य में भी दुरूह से दुरूह कार्यों में सफलता प्राप्त करते
( ज ) रहेंगे। आशा है हमारा यह सर्वथा नवीन प्रयास संस्कृत जगत् के प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति के लिये परमोपयोगी सिद्ध होगा तथा यही हमारे लिये उनके द्वारा प्रदत्त इस कार्य का सुफल भी होगा। इसी कामना के साथ- 'संस्कृतम्', होटल अन्नपूर्णा, विदुषामनुचरः- ११०२, सिविल लाइन्स, बदायूँ, धर्मेश भारद्वाज जिला-बदायूँ, (उ.प्र.), पिन कोड-२४३६०१. श्रावण, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा, संवत्सर २०६३, दिनाङ्क-९ अगस्त, २००६ (बुधवार)। --०--
८. अष्टमोऽध्यायः (द्वित्व, सन्धि, णत्व, षत्व एवं अ अ उपसंहार)
॥ ओ३म् ॥ पाणिनिमुनिप्रणीतः अष्टाध्यायीसूत्रपाठः ( यतिबोधसहितो लघुकायश्च ) यतिबोधकारः सम्पादकश्च- आचार्य धर्मेश भारद्वाज प्रकाशकः- श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती संस्कृत एवं संस्कृति शोध, शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थान, तहसील-सिन्नर, जिला-नासिक (महाराष्ट्र), पिन कोड-४२२१०३.
प्रकाशक- श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती संस्कृत एवं संस्कृति शोध, शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थान, तहसील-सिन्नर, जिला-नासिक (महाराष्ट्र), पिन कोड-४२२१०३. कम्प्यूटर-अक्षरसंयोजक- आचार्य धर्मेश भारद्वाज, 'संस्कृतम्', होटल अन्नपूर्णा, ११०२, सिविल लाइन्स, बदायूँ, जिला-बदायूँ (उ.प्र.), पिन कोड-२४३६०१. सर्वाधिकार- प्रकाशकाधीन (कॉपीराइट संख्या------------)। वितरक- श्री जयसेठ हीरालाल चम्पालाल खिवंसरा जी, हीरालाल चम्पालाल एण्ड कम्पनी, निकट-कालभैरवनाथ मन्दिर, तहसील-सिन्नर, जिला-नासिक, (महाराष्ट्र), पिन कोड-४२२१०३. प्रथम संस्करण- ५००० प्रतियाँ। समय- संवत् २०६४, सन् २००७ ई.। मूल्य- -----------(साथ में लघुकाय संस्करण निःशुल्क)। मुद्रक-
॥ ओ३म् ॥ पाणिनिमुनिप्रणीतः अष्टाध्यायीसूत्रपाठः ( यतिबोधसहितो लघुकायश्च ) यतिबोधकारः सम्पादकश्च- आचार्य धर्मेश भारद्वाज प्रकाशकः- श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती संस्कृत एवं संस्कृति शोध, शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थान, तहसील-सिन्नर, जिला-नासिक ( महाराष्ट्र ), पिन कोड-४२२१०३.
(क) प्रकाशकीय कृतज्ञता-ज्ञापन स्वामी जी का छायाचित्र श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती जी जिनके ऊपर परमपिता परमेश्वर की असीम अनुकम्पा है, जिनके आशीर्वाद, कृपा तथा सत्प्रेरणा के फलस्वरूप ही मैं अकिञ्चन इस पवित्र कार्य को कर पाने में समर्थ हो सका हूँ, जो इस कार्य के वास्तविक कर्ता हैं, मैं तो निमित्तमात्र हूँ, जिन्हें यह कार्य मेरी ओर से पूर्ण निरहङ्कारिता तथा भक्तिभाव से समर्पित है, जिनके प्रति मेरी पूर्ण आत्मिक कृतज्ञता है। प्रकाशक—जयसेठ हीरालाल चम्पालाल खिंवसरा अध्यक्ष श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती संस्कृत एवं संस्कृति शोध, शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थान, तहसील—सिन्नर, जिला—नासिक (महाराष्ट्र), पिन कोड—४२२१०३.
( ख )
प्रकाशकीय कृतज्ञता-ज्ञापन
अब मैं अपने पूजनीय पिता जी तथा माता जी 'श्री-------- ----------जी' तथा 'श्रीमती ------------------जी', परिवारवासियों, निकटदूरस्थ बन्धु-बान्धवों, अभिन्नहृदय मित्रों, अतिशयस्नेही 'आचार्य भरत कुमार जी', रचनात्मक संस्कृतसाहित्य के प्रकाशन के प्रति मेरे हृदय में सत्प्रेरणा जगानेवाले, इस अद्भुत एवम् अद्वितीय ग्रन्थ का अत्यन्त शोधपूर्ण मन्थन करके यथाशक्ति श्रेष्ठतम सम्पादन तथा प्रकाशनसम्बन्धी कम्प्यूटर-अक्षरसंयोजन आदि अनेक आवश्यक कार्य पूर्ण करनेवाले, हमारे संस्थान के 'शोध- निर्देशक', समादरणीय तथा अतिशय सुहृत्, सम्पादक महोदय 'आचार्य धर्मेश भारद्वाज जी', इस अद्भुत तथा अद्वितीय ग्रन्थ का मुद्रण करनेवाले मुद्रक महोदय 'श्री --------- -------जी' तथा इस पवित्र कार्य के निर्बाधरूप से पूर्ण होने में सभी सहायक परोक्ष एवम् अपरोक्ष परिस्थितियों के प्रति भी अपनी हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ जिनकी सत्प्रेरणा, सहयोग, परिश्रम तथा शुभकामनाओं के फलस्वरूप ही मैं अकिञ्चन इस ग्रन्थ को यथाशक्ति श्रेष्ठतम रूप में प्रकाशित करने में समर्थ हो सका हूँ। प्रभु आप सभी पर अपनी कृपादृष्टि सदा बनायें रखें, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ मैं आप सभी को हार्दिक साधुवाद भी प्रदान करता हूँ। साथ ही आप सभी सुधी पाठकों के आशीर्वचनरूपी फल का पुण्यभागी बन सकूंगा, यह आशा भी करता हूँ। शुभाकाङ्क्षी- प्रकाशक—जयसेठ हीरालाल चम्पालाल खिंवसरा अध्यक्ष श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती संस्कृत एवं संस्कृति शोध, शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थान, तहसील-सिन्नर, जिला-नासिक (महाराष्ट्र), पिन कोड-४२२१०३.
॥ ओ३म् ॥ पाणिनिमुनिप्रणीतः अष्टाध्यायीसूत्रपाठः ( यतिबोधसहितो लघुकायश्च ) यतिबोधकारः सम्पादकश्च- आचार्य धर्मेश भारद्वाज प्रकाशकः- श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती संस्कृत एवं संस्कृति शोध, शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थान, तहसील-सिन्नर, जिला-नासिक ( महाराष्ट्र ), पिन कोड-४२२१०३.