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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-१४२ देवता—अश्विनीकुमार

यन्नासत्या पराके अर्वाके अस्ति भेषजम्.
तेन नूनं विमदाय प्रचेतसा छर्दिर्वत्साय यच्छतम्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! दूर की अथवा समीप की ओषधि को अपने दंभी मन के द्वारा हमें
विशेष शक्ति के लिए प्रदान करो तथा हमारे शिशु के लिए घर दो. (५)
सूक्त-१४२ देवता—अश्विनीकुमार
अभुत्स्यु प्र देव्या साकं वाचाहमश्विनोः.
व्यावर्दैव्या मतिं वि रातिं मर्त्येभ्यः.. (१)
मैं अपनेआप को अश्विनीकुमारों की ज्ञान वृद्धि के साथ रहने वाला मानता हूं. तुम मेरी
बुद्धि को प्रकाशित करो तथा मनुष्यों के लिए धन दो. (१)
प्र बोधयोषो अश्विना प्र देवि सूनृते महि.
प्र यज्ञहोतरानुषक् प्र मदाय श्रवो बृहत्.. (२)
हे स्तोताओ! तुम प्रातःकाल अश्विनीकुमारों को जगाओ. हे सत्यरूप देवो! तुम
स्तोताओं को प्रशंसनीय बनाओ. हे होता! तुम अश्विनीकुमारों के यश को सभी ओर फैलाओ.
(२)
यदुषो यासि भानुना सं सूर्येण रोचसे.
आ हायमश्विनो रथो वर्तिया॑ति नृपाय्यम्.. (३)
हे अश्विनीकुमारों के रथ! तू अपने तेज से उषा के साथ मिलता हुआ सूर्य के साथ
दमकता है. वह रथ अश्वों के द्वारा मार्ग पर जाता है. (३)
यदापीतासो अंशवो गावो न दुह ऊधभिः.
यद्वा वाणीरनूषत प्र देवयन्तो अश्विना.. (४)
जब रश्मियां जल पीने वाली गायों के समान होती हैं, तब गायों के ऐनों से दूध काढ़ा
जाता है. हे अश्विनीकुमारो! उस समय ऋषियों की वाणी तुम्हारी स्तुति करती है. (४)
प्र द्युम्नाय प्र शवसे प्र नृषाह्याय शर्मणे. प्र दक्षाय प्रचेतसा.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! मैं अपनी सुंदर बुद्धि के द्वारा तुम्हारी स्तुति इसलिए करता हूं कि मैं
मनुष्यों को वश में करने वाला महान बल और कल्याण प्राप्त कर सकूं. (५)
यन्नूनं धीभिरश्विना पितुर्योना निषीदथः. यद्वा सुम्नेभिरुक्य्था.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अपनी बुद्धि के द्वारा अपने पालनकर्ता के समीप विराजमान
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सूक्त-१४३ देवता—अश्विनीकुमार

होते हो. तुम कल्याणकारी प्रशंसा के पात्र हो. (६)
सूक्त-१४३ देवता—अश्विनीकुमार
तं वां रथं वयमद्या हुवेम पृथुज्रयम्श्विना संगतिं गोः.
यः सूर्यां वहति वन्धुरायुर्र्गिर्वाहसं पुरुतमं वसूयुम्.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! आज हम तुम्हारे वेगवान रथ का आह्वान करते हैं. तुम्हारा वह रथ
ऊंचेनीचे स्थानों में जाता हुआ सूर्या को वहन करता है. वह रथ वाणी को वहन करने वाला,
वसुओं को प्राप्त करने वाला तथा गायों से सुसंगत है. मैं उसी रथ को बुलाता हूं. (१)
युवं श्रियमश्विना देवता तां दिवो नपाता वनथः शचीभिः.
युवोर्र्वपुरभि पृक्षः सचन्ते वहन्ति यत् ककुहासो रथे वाम्.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम लक्ष्मी के अधिष्ठाता देव हो. तुम उस का सेवन अपनी शक्तियों
के द्वारा करते हो तथा उसे आकाश से नीचे नहीं गिरने देते. रथ में तुम्हें वहन करने वाले
विशाल घोड़े तथा अन्न तुम्हारे शरीर से सदा मिले रहते हैं. (२)
को वामद्या करते रातहव्य ऊतये वा सुतपेयाय वार्कैः.
ऋतस्य वा वनुषे पूर्य्याय नमो येमानो अश्विना ववर्तत्.. (३)
कौन सा हवि दाता रक्षा पाने के लिए तथा तैयार किया हुआ सोमरस पीने के लिए तुम्हें
बुला रहा है. कौन तुम्हारी सेवा कर रहा है. यज्ञ की सेवा करने वाले इंद्र को नमस्कार है.
अश्विनीकुमारों को यहां लाने वाले रथ को मैं नमस्कार करता हूं. (३)
हिरण्ययेन पुरुभू रथेनेमं यज्ञं नासत्योप यातम्.
पिबाथ इन्मधुनः सोम्यस्य दधथो रत्नं विधते जनाय.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! तुम सोने के बने हुए अपने रथ के द्वारा इस यज्ञशाला में आओ. तुम
मधुर सोमरस पीते हुए इस सेवक पुरुष को रत्न और धन प्रदान करो. (४)
आ नो यातं दिवो अच्छा पृथिव्या हिरण्ययेन सुवृता रथेन.
मा वामन्ये नि यमन् देवयन्तः सं यद् ददे नाभिः पूर्व्या वाम्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम सोने के बने हुए अपने रथ के द्वारा आकाश से पृथ्वी पर आओ.
अग्निपूजक तुम्हें न रोक सके. मैं तुम्हारे लिए स्तुति करता हूं. (५)
नू नो रयिं पुरुवीरं बृहन्तं दस्रा मिमाथामुभयेष्वस्मे.
नरो यद् वामश्विना स्तोममावन्त्सधस्तुतिमाजमीळ्हासो अग्मन्.. (६)
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हे अश्विनीकुमारो! स्तोता मनुष्य स्तुति के साथ ही अजमीढ के पुत्रों के समीप गए. इस
स्तोता को तुम इस के वीर्य से उत्पन्न होने वाले पुत्रों और पौत्रों के साथ दोनों लोकों में धन
प्रदान करो. (६)
इहेह यद् वां समना पपृक्षे सेयमस्मे सुमतिर्वाजरत्ना.
ऊरुष्यतं जरितारं युवं ह श्रितः कामो नासत्या युवद्रिक्.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! इस यजमान को तुम ऐसी बुद्धि दो, जिस से यह तुम पर ही निर्भर
रहे तथा तुम इस स्तोता के रक्षक रहो. (७)
मधुमतीरोषधीर्द्याव आपो मधुमन्नो भवत्वन्तरिक्षम्.
क्षेत्रस्य पतिर्मधुमान्नो अस्त्वरिष्यन्तो अन्वेनं चरेम.. (८)
हमारे लिए आकाश मधुमय हो, अंतरिक्ष मधुमय हो, ओषधियां मधुमती हों तथा
क्षेत्रपति भी मधुमय हो. हम अमृतत्व को प्राप्त कर के उस के अनुगामी बन कर घूमें. (८)
पनाय्यं तदश्विना कृतं वां वृषभो दिवो रजसः पृथिव्याः.
सहस्रं शंसा उत ये गविष्टौ सर्वां इत् तां उप याता पिबध्यै.. (९)
तुम्हारा स्तोता और कर्म आकाश और पृथ्वी की कामनाओं की वर्षा करने वाला हो.
तुम सोमपान कर के गोपूजा वाले सैकड़ों स्तोत्रों को प्राप्त होते हो. (९)
(अथर्ववेद संपूर्ण)
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