भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ
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( ६ ) भैषज्यरत्नावली-
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| उत्पलषट्क, उत्पलाद्यचूर्णं | २१८ | पथ्यादिचूर्णं | २८३- |
| व्योषाद्यचूर्णं, कलिङ्गादिगुटिका | २१९ | द्वन्द्वजातीसार-चिकित्सा | ” |
| कुटजावलेह | २२० | वातपित्तातिसार-चिकित्सा । | |
| द्वितीय कुटजावलेह | २२१ | कलिङ्गादि | ” |
| सिद्धप्राणेश्वर रस, कनकसुन्दररस | २२२ | पित्तश्लेष्मातिसार-चिकित्सा | ” |
| बृहत्कनकसुन्दररस, गगनसुन्दररस | २२३ | मुस्तादि, समङ्गादि | ” |
| कनकप्रभावटी | ” | कुटजादि | २३९ |
| मृतसंजीवनी वटी, आनन्द-भैरवरस | २२४ | वातश्लेष्मातिसार-चिकित्सा | ” |
| अमृतार्णवरस, कारुण्यसागररस | २२५ | चित्रकादि | ” |
| मृतसंजीवनरस | २२६ | त्रिदोषातिसार-चिकित्सा | ” |
| प्राणेश्वररस | २२७ | समङ्गादि-कषाय | ” |
| अभ्रवटिका | २२८ | पञ्चमूली-बलादि | २४० |
| अतिसार-चिकित्सा । | पुटपक्वौषधप्रयोगविधि, कुटज-पुटपाक | ” | |
| आम और पक्वके लक्षण | २२९ | श्योनाकपुटपाक, दाडिमपुटपाक... | २४१ |
| आम और पक्वके अन्य लक्षण | २३० | कुटज-लेह | ” |
| आम और पक्वातिसारकी चिकित्सा | ” | कुटजाष्टकावलेह | २४२ |
| आमातिसार-चिकित्सा | ” | दुग्ध-पानविधि | २४३ |
| धान्यपञ्चक और धान्यचतुष्क | २३३ | शोथातीसार-चिकित्सा | ” |
| स्वल्प शालपर्ण्यादि, बृहच्छाल-पर्ण्यादि | ” | भय-शोकज अतीसार चिकित्सा | ” |
| वत्सकादि, पथ्यादि | ” | पृश्निपर्ण्यादि | ” |
| यमान्यादि, कलिङ्गादि, कञ्चटादि | २३४ | रक्तातीसार-चिकित्सा | २४४ |
| कुटजादि | ” | रलाञ्जनादिचूर्णं, नारायणचूर्णं | २४७ |
| त्र्यूषणादिचूर्णं, शुण्ठ्यादिचूर्णं | २३५ | गुड़पाकमें विधि | २४८ |
| वातातीसार-चिकित्सा | ” | साधारणातिसार-चिकित्सा | ” |
| पूतकादि | ” | बिल्वादि, पटोलादि, प्रियंग्वादि... | ” |
| पथ्यादि, वचादि | २३६ | जम्ब्वादि | ” |
| पित्तातीसार-चिकित्सा | ” | वत्सकादि, नाभिप्रलेप | २४९ |
| मधुकादि, बिल्वादि | ” | प्रवाहिका-चिकित्सा | ” |
| कट्फलादि, किराततिक्तकादि | ” | अहिफेनयोग, अहिफेनवदिका | २५० |
| अतिविषादि | २३७ | जातीफलादिवटी, पूर्णचन्द्रोदयरस | २५१ |
| श्लेष्मातीसार-चिकित्सा | ” | बृहद्गगनसुन्दररस, लोकनाथरस... | २५२ |
| पथ्यादि, चव्यादि | ” | बृहच्चिन्तामणिरस, भुवनेश्वररस | २५३ |
| पाठादिचूर्णं, हिंङ्ग्वादिचूर्णं | ” |