भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०८३
अण्डीके बीज, तुलसीके बीज, बापची, चकवड, कडवी तोरईके बीज, पीपल, ढेरांवृक्षके बीज, मैनसिल, हीराक्सीस, हरड, कूट और वायविडंग ये सब औषधियाँ समान भाग मिलित एक सेर लेकर एकत्र पीसकर कल्क बनावेवे। फिर यह कल्क एवं गोमूत्र, दहीका तोड, गौका दूध, बकरेका मूत्र और कडवा तेल ये प्रत्येक चार चार सेर, सबोंको एकत्र मिलाकर उत्तम प्रकार पकावे। श्वेतकुष्ठपर प्रथम खुजलाकर पश्चात् इस तेलको मर्दन करे तो श्वेतकुष्ठरोग समूल नष्ट होजाता है और त्वचाका वर्ण पूर्ववत् अत्यन्त सुन्दर हो जाता है ॥ २०६-२०८ ॥
आरग्वधाद्यतैल।
आरग्वधं धवं कुष्ठं हरितालंमनःशिला ।
रजनीद्वयसंयुक्तं पचेत्तैलं विधानवित् ॥
एतेनाभ्यञ्जनादेव क्षिप्रं श्वित्रं विनश्यति ॥ ९ ॥
अमलतासके बीज, धौवृक्षकी छाल, कूट, हरिताल, मैनशिल, हल्दी, दारुहल्दी इन औषधियोंके समान भाग मिश्रित १ सेर कल्कके द्वारा १ प्रस्थ तेलको यथा-विधि पकावे। इस तेलके मर्दन करनेसेही श्वेतकुष्ठ नष्ट होता है ॥ २०९ ॥
वासारुद्रतैल ।
त्रिफला निम्बभण्टाकी बृहत्यौ सपुनर्नवे ।
हरिद्रे वृषनिर्गुण्ड्यौ पटोलकनकाह्वयौ ॥ २१० ॥
हरितालं शिलाकुष्ठौ लाङ्गलीदाडिमाह्वयौ ।
अपामार्गो विषं चैव जयन्ती पूतिकट्फलौ ॥ ११ ॥
एषां कर्षद्वयैः कल्कैस्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।
चतुर्गुणे गुडूच्याश्च रसे वैद्यः समाहितः ॥ १२ ॥
चतुर्गुणं तु गोक्षीरं वृषपत्ररसं तथा ।
दत्त्वाऽवतारयेद्वैद्यो रुद्रमन्त्रं समाजपेत् ॥ १३ ॥
हरड, बहेडा, आमला, नीमकी छाल, मुसली, कटाई, कटेरी, श्वेतपुनर्नवा, लालपुनर्नवा, हल्दी, दारुहल्दी, अडूसा, निर्गुण्डी, परवल, धतूरेकी जड, हरिताल, मैनसिल, कूट, कालिहारी, अनार, चिरचिटा, मीठा विष जयन्ती, दुर्गन्धकरञ्ज और कायफल इन सबोंको दो दो तोले लेकर एकत्र कल्क बनावे। इस कल्कके साथ तिलका तेल १ प्रस्थ, गिलोयका रस ४ प्रस्थ, अडूसेके पत्तोंका रस ४ प्रस्थ
१०८४ भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-
और गौका दूध ४ प्रस्थ मिलाकर तेलको पकावे। जब उत्तम प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब उतार लेवे और यथाशक्ति शिवजीके मन्त्रका जप करे। पश्चात् इस तेलको प्रतिदिन नियमबद्ध होकर सेवन करे ॥
दद्रुं कुष्ठं दुष्टव्रणं विसर्पं विद्रधिं तथा ।
नाडीव्रणं व्रणं घोरं वातरक्तं सुदुर्जयम् ॥ १४ ॥
सन्निपातज्वरं चैव शिरोरोगं सुदारुणम् ।
शोथं च गलगण्डं च श्लीपदं त्वर्बुदं तथा ॥ १५ ॥
वातरोगानशेषांश्च अन्त्रवृद्धिं सुदारुणाम् ।
पीनसश्वासकासं च सुदारुणभगन्दरम् ॥ १६ ॥
उपदंशं महाघोरं चक्षुःशूलं च नाशयेत् ।
चर्मोत्थान्सर्वरोगांश्च तैलमेतद्विनाशयेत्
रुद्रतैलमिदं नाम्ना स्वयं रुद्रेण भाषितम् ॥ १७ ॥
यह तैल दाद, कोढ, दुष्टव्रण, विसर्प, विद्रधि, नासूर, भयङ्कर व्रण, दुर्जय वात-रक्त, सन्निपातज्वर, शिरोरोग, सूजन, गलगण्डरोग, श्लीपद, अर्बुद, वातजन्य सब रोग, दारुण अन्त्रवृद्धि, पीनस, श्वास, खाँसी, दारुण भगन्दर, अत्यन्त कठिन उपदंश और नेत्रोंकी पीडाप्रभृति उत्कट व्याधियोंको शीघ्र नष्ट करता है। यह तेल चर्ममें उत्पन्न होनेवाले सम्पूर्ण विकारोंको अल्पकालमें ही नाश करदेता है। इस तेलको स्वयं शिवजी महाराजने वर्णन किया है, इसलिये इसको रुद्रतैल कहते हैं ॥ २१४-२१७ ॥
कन्दर्पसारतैल ।
सप्तपर्णस्तथा काली गुडूची पिचुमर्दकम् ।
शिरीषं च महातिक्ता जया तुम्बी मृगादनी ॥ १८ ॥
निशा दशपलान्भागाञ्जलद्रोणे विपाचयेत् ।
तैलप्रस्थं समादाय गोमूत्रं च चतुर्गुणम् ॥ १९ ॥
आरग्वधो भृङ्गराजो जयाधुस्तूररात्रयः ।
ऐन्द्रासनाग्निः खर्जूरं गोमयार्कस्नुहीच्छदम् ॥ २२० ॥
तैलतुल्यं प्रदातव्यं स्वरसं च पृथक् पृथक् ।
महाकालवचाब्राह्मीतुम्ब्यमृग्गृहपुत्रिकाः ॥ २१ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०८५
कुचेला कुलको रात्रिर्मेघनामा च ग्रन्थिका ।
शम्याकमर्कक्षीरं च कासुन्देश्वरमूलकम् ॥ २२ ॥
आचजिङ्गी महातिक्ता विशालाच्छविपत्रकम् ।
पूतिकास्फोटमूर्वा च सप्तपर्णशिरीषकम् ॥ २३ ॥
कुटजं पिचुमर्दश्च महानिम्बं तथैव च ।
गुडूची चन्द्ररेखा च सोमराट् चक्रमर्दकम् ॥ २४ ॥
तुम्बुरुर्भृङ्गयष्ट्याह्वकन्दं कटुकरोहिणी ।
शठी दार्बी त्रिवृत्पद्मग्रन्थिकागुरुपुष्करम् ॥ २५ ॥
कर्पूरं कटफलं मांसी सुरैलाटरुषाभयम् ।
एतेषां कार्षिकैः कल्कैर्नाम्ना कन्दर्प उच्यते ॥ २६ ॥
सतौनेकी छाल, पीला चन्दन, गिलोय, नीमकी छाल, सिरसकी छाल, बकायन, जयन्ती, कडवीतोंबी, सेंधिनी और हल्दी इनको चालीस चालीस तोले लेकर बत्तीस सेर जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर इस क्वाथमें सरसोंका तेल एक प्रस्थ, गोमूत्र चार प्रस्थ, अमलतास, भाङ्गरा, जयन्ती, धतूरा, हल्दी, भाँग, चीता, खजूर, गोबरका रस, आक और थूहर इन सबोंके पत्तोंका रस एक एक प्रस्थ तथा कल्कके लिये महाकाल ( लताविशेष ), वच, ब्राह्मी, कडवीतोंबी, चीतेकी जड, घीग्वार, कुचला, परवल, हल्दी, नागरमोथा, पीपलामूल, अमलतासका गूदा, आकका दूध, कसौंदी, कलिहारीकी जड, रञ्जनद्रुम ( पुष्पवृक्ष विशेष ), मञ्जीठ, पाठ, इन्द्रायनकी जड, बिछुओके पत्ते, करञ्जकी जड, आस्फोटनामकी लता, मूर्वाकी जड, सतवनकी छाल, सिरसकी छाल, कुडेकी छाल, नीमकी छाल, बकायनकी छाल, गिलोय, बापचीके बीज, चकवडके बीज, धनियाँ, भाँगरा, मुलहठी, जिमीकन्द, कुटकी, कचूर, दारुहल्दी, निसोत, पद्माख, गठिवन, अगर, पोहकरमूल, कपूर, कायफल, बालछड, कपूरकचरी, इलायची, अडूसेकी छाल और खस इन औषधियोंको दो दो तोले, परन्तु सोमराजीके बीज चार तोले लेवे और सबोंको एकत्र कूटपीसकर, यथाविधिसे मिलाकर तेलको पकावे । इस प्रकार सिद्ध किये हुए तेलको कन्दर्पतेल कहते हैं ॥
अष्टादशविधं कुष्ठं ग्रन्थिमज्जगतं तथा ।
हस्तपादाङ्गुलीसन्धिगलितं सर्वसंधिषु ॥ २७ ॥
१०८६ भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-
यस्य गात्रे भविष्यन्ति मांसानि चाधिकानि च ।
नासाकर्णस्य वैकल्यं भेकाकारवपुस्त्वचम् ॥ २८ ॥
श्वेतं रक्तं तथा कुष्ठं नानावर्णं विपादिकाम् ।
श्वित्रं चतुर्विधं चैव वातशोणितमेव च ॥ २९ ॥
कापालं कृमिजं कुष्ठं कण्डूं दद्रुं विचर्चिकाम् ।
पामाविस्फोटकानीलीकृमिवृद्धिं तथैव च ॥ ३० ॥
कीटकुष्ठमसूरीश्च किटिभं रक्तमण्डलम् ।
कुष्ठमौडुम्बरं पद्मं महापद्मं तथैव च ॥ ३१ ॥
गलगण्डार्बुदं हन्याद्गण्डमालां भगन्दरम् ।
वातजं पित्तजं चैव श्लेष्मजं सान्निपातिकम् ॥
एकोल्बणं द्वयुल्बणं च कुष्ठं हन्यान्न संशयः ॥ ३२ ॥
यह तेल अठारहों प्रकारके कोढ, ग्रन्थि और मज्जागत कुष्ठ, हाथ, पैर, अंगुली और सन्धियोंका गलजाना, शरीरके किसी अङ्गमें मांस अधिक बढजाना, नाक और कानोंकी विकलता, मेंडककी समान त्वचाका होजाना, श्वेत अथवा लालकुष्ठ, अनेक वर्णका कुष्ठ, विपादिका, चार प्रकारका सफेदकुष्ठ, वातरक्त, कापाल और कृमिजनितकुष्ठ, कण्डू, दद्रु, विचर्चिका, पामा, विस्फोटक, कृमिवृद्धि कीट, मसूरिका, किटिभ, रक्तमण्डल, औडुम्बर कुष्ठ, पद्म, महापद्म कुष्ठ, गलगण्ड, अर्बुद, गण्डमाला, भगन्दर, वातजकुष्ठ, पित्तजश्लैष्मिककुष्ठ, त्रिदोषजकुष्ठ, एकोल्बणकुष्ठ द्वयुल्बणकुष्ठ इत्यादि सर्वप्रकारके कुष्ठोंको निश्चय नष्ट करदेताहै ॥ २२७-२३२॥
खदिरारिष्ट ।
खदिरस्य तुलार्द्धं तु देवदारु च तत्समम् ।
वागुजी द्वादशपला दार्वी स्यात्पलविंशतिः ॥३३॥
त्रिफलाविंशतिपलान्यष्टद्रोणेऽम्भसः पचेत् ।
कषाये द्रोणशेषे च पूते शीते विनिक्षिपेत् ॥ ३४ ॥
तुलाद्वयं माक्षिकस्य तुलैका शर्करा तथा ।
धातक्या विंशतिपलं कङ्कोलं नागकेशरम् ॥ ३५ ॥
जातीफलं लवङ्गैला त्वक्पत्राणि पृथक् पृथक् ।
पलोन्मितानि कुष्ठाया दद्यात्पलचतुष्टयम् ॥
घृतभाण्डे विनिक्षिप्य मासादूध्वं पिबेततः ॥ ३६ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता १०८७
महाकुष्ठानि हृद्रोगं पाण्डुरोगाबुर्दं तथा।
गुल्मं ग्रन्थिकृमीन्कासं तथा प्लीहोदरं जयेत् ॥ ३७ ॥
एष वै खदिरारिष्टः सर्वकुष्ठविनाशनः ॥ ३८ ॥
खैर ५० पल, देवदारु ५० पल, बापची १२ पल, दारुहल्दी २० पल और त्रिफला २० पल सबोंको एकत्र कूटकर आठ द्रोण जलमें पकावे । जब पकते पकते एक द्रोण जल बाकी रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर शीतल होजानेपर इस क्वाथमें शहद २०० पल, खाँड १०० पल, धायके फूल २० पल, शीतलचीनी, नागकेशर, जायफल, लौंग, इलायची, दारचीनी और तेजपात ये प्रत्येक चार चार तोले तथा पीपल १६ तोले इन औषधियोंको बारीक कूटपीसकर डालदेवे । पश्चात् सबोंको विधिपूर्वक एकत्र मिलाकर घीके चिकने बर्त्तनमें भरकर और उसका मुख बन्दकरके एक महीनेतक रखा रहनेदेवे । एक महीनेके अनन्तर इसमेंसे प्रतिदिन बलानुसार उचितमात्रासे सेवन करे । इसके सेवनसे अत्यन्त भयंङ्कर सम्पूर्ण कुष्ठ-रोग तथा हृदयरोगें, पाण्डुरोग, अर्बुद, गुल्म, ग्रन्थि, कृमि, खाँसी, तिल्ली, उदर-विकार आदिरोग शीघ्र दूर होते हैं । यह खदिरारिष्ट सर्वप्रकारके कुष्ठोंको विनास-न्देह नष्ट करनेवाला है ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
कुष्ठरोगमें पथ्य ।
पक्षात्पक्षाच्छर्दनानि मासान्मासाद्विरेचनम् ।
नस्यं त्र्यहात्त्र्यहान्मासि षष्ठे षष्ठेऽस्रमोक्षणम् ॥ ३९ ॥
सर्पिर्लेपश्चिरोत्पन्ना यवगोधूमशालयः ।
मुद्गाढकीमसूराश्च माक्षिकं जाङ्गलामिषम् ॥ ४० ॥
आषाढफलवेत्राग्रं पटोलं बृहतीफलम् ।
काकमाची निम्बपत्रं लशुनं हिलमोचिका ॥ ४१ ॥
पुनर्नवा मेषशृङ्गी चक्रमर्ददलानि च ।
भल्लातकं पक्वतालं खदिरश्चित्रको वरा ॥ ४२ ॥
जातीफलं नागपुष्पं कुंकुमं प्रतनं हविः ।
कोषातकी करओऽपि तिलसर्षपनिम्बजम् ॥ ४३ ॥
तैलं तथेङ्गुदोत्थं च लघुन्यन्यानि यानि च ।
स्नेहाः सरलदेवाङ्घ्रिशिशपागुरुसम्भवाः ॥ ४४ ॥
| १०८८ | भैषज्यरत्नावली । | [ कुष्ठरोग- |
|---|
मूत्राणि गोखरोष्ट्राश्वमहिषीजनितानि च ।
कस्तूरिकागन्धसारस्तिक्तानि क्षारकर्म च ॥
यथादोषं समस्तानि पथ्यान्येतानि कुष्ठिनाम् ।
कुष्ठरोगमें एक एक पक्ष पीछे वमन, एक एक महीने पीछे विरेचन (जुल्लाब) देवे, तीन तीन महीनें बीतें नस्य और छः छः महीनेके अन्तरसे रक्तमोक्षण (फस्तखुलवाना) करावे। घीका लेप करे एवं पुराने जौ, गेहूँ, शालिचावल, मूँग अरहर, मसूर इनका भोजन, शहद, जंगली जीवोंका मांस ढकपन्ना, बेंतकी कोंपल, परबल, बडी कटेरीके फल, मकोय, नीमके पत्ते, लहसन, हुलहुलका शाक, पुनर्नवा मेढ़ासिंगी, चकवडके पत्ते, भिलावे, पके ताडके फल, खैर, चीता त्रिफला, जायफल, नागकेशर, केशर, पुराना घी, तोरई, करञ्ज, तिल, सरसों, नीम और हिंगोट इनका तेल, हलके पदार्थ, धूपसरल, देवदारु, शीशम और अगर इनका तेल, गौ, गधा, ऊँट, घोडा और भैंस इन सबोंके मूत्र, कस्तूरी, सफेदचन्दन, तीखेरसवाले द्रव्य और क्षारकर्म ये सब दोषानुसार सेवन करनेसे कुष्ठरोगियोंके लिये हितकारी है ॥ ३९-२४५ ॥
कुष्ठरोगमें अपथ्य !
पापानि कर्माणि कृतघ्नभावं निन्दां गुरूणां गुरुधर्षणं च ।
विरुद्धपानाशनमह्नि निद्रां चण्डांशुतापं विषमाशनं च ॥ ४६ ॥
स्वेदं रतं वेगनिरोधमिक्षुं व्यायाममम्लानि तिलांश्च माषान् ।
द्रवान्नगुर्वन्नवान्नभुक्तं विदाहि विष्टंभि च मूलकानि ॥ ४७ ॥
सह्याद्रिविन्ध्याद्रिसमुद्भवानां तरङ्गिणीनामुदकानि चापि ।
आनूपमांसं दधिदुग्धमद्यं गुडं च कुष्ठामयिनस्त्यजेयुः ॥४८॥
पापकर्म, कृतघ्नता, गुरुओंकी निन्दा, गुरुजनोंका तिरस्कार करना, स्वभाव-विरुद्ध भोजन-पान करना, दिनमें सोना, प्रचण्ड धूपका सेवन, विषम भोजन, स्वेद-देना, स्त्रीप्रसंग, मल-मूत्रादिके वेगको रोकना, ईखके रसका पान, कसरत करना, खट्टे पदार्थ, तिल, उडद, पतले पदार्थ, दुष्पाच्य अन्न, नये नाजोंका भोजन, दाह-कारक-विबन्धकारक द्रव्य, मुली, सह्याचल और विन्ध्याचलसे निकली हुई नदियों का जल, अनूपदेशजात जीवोंका मांस, दही दूध, मदिरा और गुड ये सब अपथ्य पदार्थ कुष्ठरोगियोंको त्याग देना चाहिये ॥ ४६-२४८ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां कुष्ठरोगचिकित्सा ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहितः । १०८९
शीतपित्त उदर्द और कोठरोगकी चिकित्सा ।
अभ्यङ्गः कटुतैलेन सेकश्चोष्णाम्बुभिस्तथा ।
उदर्द्दे वमनं कार्यं पटोलारिष्टवारिणा ॥ १ ॥
त्रिफलापुरकृष्णाभिर्विरेकश्चात्र शस्यते ।
अमृतादिं विसर्पोक्तं भिषगत्र प्रयोजयेत् ॥ २ ॥
उदर्दरोगमें सरसोंके तेलकी मालिशकर गरम जलसे सेंक करे, फिर पटोलपत्र और नीमकी छालके काढ़ेमें मैनफलका चूर्ण डालकर रोगीको पान कराकर वमन करावे। पश्चात् हरड, बहेडा, आमला, गूगल और पीपल इनके काथद्वारा विरेचन (जुलाब) करावे। इस रोगमें विसर्परोगाधिकारमें कहा हुआ अमृतादिक्वाथ पान करानेसे विशेष लाभ होता है ॥ १ ॥ २ ॥
सगुडं दीप्यकं यस्तु खादेत्पथ्यान्नभुङ्नरः ।
तस्य नश्यति सप्ताहादुदर्दः सर्वदेहगः ॥ ३ ॥
पथ्य द्रव्योंका भोजन करनेवाला मनुष्य यदि पुराना गुड और अजवायन इन दोनोंको एकत्र मर्दनकर सात दिनतक खाय तो उसका सर्वशरीरगत उदर्दरोग नष्ट होता है ॥ ३ ॥
दूर्वानिशायुते लेपः कण्डूपामाविनाशनः ।
कृमिदद्रुहरश्चैव शीतपित्तापहः स्मृतः ॥
क्षारसैन्धवतैलेन गात्राभ्यङ्गं प्रकारयेत् ॥ ४ ॥
दूब और हल्दीको एकत्र पीसकर लेप करनेसे कण्डू (खुश्क खुजली) और पामा (तर खुजली) नष्ट होती है। जवाखार और सैंधेनमकको तिलके तेलमें मिलाकर मालिश करनेसे कृमि, दद्रुकुष्ठ और शीतपित्तरोग दूर होता है ॥ ४ ॥
अग्निमन्थभवं मूलं पिष्टं पीतं च सर्पिषा ।
शीतपित्तोदर्दकोठान् सप्ताहादेव नाशयेत् ॥ ५ ॥
अरणीकी जडको पीसकर घीमें मिलाकर पान करे तो शीतपित्त, उदर्द और कोठरोग सात दिनमें ही नाश होजाते हैं ॥ ५ ॥
६९
१०९० भैषज्यरत्नावली । [ शीतपित्तादि-
कुष्ठोक्तं च क्रमं कुर्यादम्लपित्तघ्नमेव च ।
उद्दर्द्दोक्तां क्रियां सर्वां कोठरोगे समासतः ।
सर्पिः पीत्वा महातिक्तं कार्यं रक्तस्य मोक्षणम् ॥ ६ ॥
इस रोगमें कुष्ठरोगोक्त चिकित्सा और अम्लपित्तनाशक औषधियोंका सेवन करे । एवं उद्दर्दरोगमें कही हुई चिकित्साके अनुसार कोठरोगकी चिकित्सा करे । कोठरोगमें महातिक्तघृतका पान और रक्तमोक्षण करना उपयोगी है ॥ ६ ॥
कर्षं गव्यघृतस्यापि कर्षार्द्धं मरिचस्य च ।
एकीकृत्य पिबेत्प्रातः शीतपित्तविनाशनः ॥ ७ ॥
छः मासे काली मिरचोंको छः मासे गौके घीमें मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करनेसे शीतपित्तरोग नष्ट होता है ॥ ७ ॥
हरिद्राखण्ड ।
हरिद्रायाः पलान्यष्टौ षट्पलं हविषस्तथा ।
क्षीराढकेन संयुक्तं खण्डस्यार्द्धतुलां तथा ॥ ८ ॥
पचेन्मृद्वग्निना वैद्यो भाजने मृन्मये दृढे ।
कटुत्रिकं त्रिजातं च कृमिघ्नं त्रिवृता तथा ॥ ९ ॥
त्रिफला केशरं मुस्तं लौहं प्रति पलं पलम् ।
सञ्चूर्ण्यप्रक्षिपेत्तत्र कर्षमेकं तु भक्षयेत् ॥ १० ॥
कण्डूस्फोटदद्रूणां नाशनं परमौषधम् ।
प्रतप्तकाञ्चनाभासो देहो भवति नान्यथा ॥ ११ ॥
शीतपित्तोद्दर्दकोठान् सप्ताहादेव नाशयेत् ।
हरिद्रानामकः खण्डः कण्डूनां परमौषधम् ॥ १२ ॥
हलदीका चूर्ण ३२ तोले, गोघृत २४ तोले, गोदुग्ध ८ सेर और चीनी ५० पल इन सबोंको एकत्र मिलाकर स्वच्छ और दृढ मिट्टीके बर्त्तनमें मन्द मन्द अग्निसे पकावे । फिर उसमें सोंठ, मिरच, पीपल, दारचीनी, इलायची, तेजपात, वाय-विडङ्ग, निसोत, हरड, बहेडा, आमला, नागकेशर, नागरमोथा और लोह-भस्म ये प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेवे और सबोंको बारीक पीसकर मिला देवे । इसको प्रतिदिन एक एक तोला प्रमाण सेवन करनेसे कण्डू, विस्फोट और दद्रु रोगोंका शीघ्र नाश होता है तथा शरीर तपे हुए सुवर्णकी
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०९१
समान अत्यन्त देदीप्यमान होजाता है। यह औषधि शीतपित्त, उदद्दं और कोठरोगोंको सात दिनमें ही नष्ट करदेता है। इसको हरिद्राखण्ड कहते हैं। यह हरिद्राखण्ड खुजलीरोगकी अत्युत्तम औषधि है ॥ ८–१२ ॥
बृहद्धरिद्राखण्ड ।
निशाचूर्णस्य कुडवं त्रिवृत्पलचतुष्टयम् ।
अभया तत्समा देया सार्द्धप्रस्थद्वयी सिता ॥ १३ ॥
दार्बी मुस्ता यमान्यौ द्वे चित्रकं कटुरोहिणीं ।
अजाजी पिप्पली शुण्ठी त्रिजातं कृमिकण्टकम् ॥ १४ ॥
अमृता वासकं कुष्ठं त्रिफला चव्यधान्यकम् ।
मृतलौहं मृताभ्रं च प्रत्येकं कोलसंमितम् ॥ १५ ॥
पचेन्मृद्वग्निना वैद्यो भाजने मृन्मये नवे ।
कर्षाद्धं च ततः खादेदुष्णतोयानुपानतः ॥ १६ ॥
शीतपित्तोदर्दकोठकण्डूपामाविचर्चिकाः ।
जीर्णज्वरकृमीन्पाण्डुशोथादींश्च विनाशयेत् ॥ १७ ॥
हल्दीका चूर्ण १६ तोले, निसोत १६ तोले, हरड १६ तोले, मिश्री १६० तोले, दारुहल्दी, नागरमोथा, अजवायन, अजमोद, चीता, कुटकी, कालाजीरा, पीपल, साँठ, दारचीनी, इलायची, तेजपात, वायविडङ्ग, गिलोय, अडूसा, कूठ, त्रिफला, चव्य, धनियाँ, लोहभस्म और अभ्रकभस्म ये प्रत्येक एकएक तोला लेवे । फिर सबोंको एकत्र कूटपीसकर यथाविधिसे मिलाकर मिट्टीके नये और उत्तमप्रकारसे दृढ पात्रमें पाक करे । प्रतिदिन प्रातःकाल इसमेंसे छः छः माशे लेकर मन्दोष्ण जलके साथ भक्षण करे तो यह बृहद्धरिद्राखण्डावलेह शीतपित्त ( पित्ती ), उदद्दं, कोठ, कण्डू, पामा, विचर्चिका, जीर्णज्वर, कृमिरोग, पाण्डु और शोथप्रभृति रोगोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है ॥
शीतपित्तोदर्दकोठरोगोंमें पथ्य ।
छर्दिर्विरेचनं लेपोऽसृङ्मोक्षो जीर्णशालयः ।
जाङ्गलैरामिषैर्मुद्गैः कुलत्थैर्वा कृता रसा ॥ १८ ॥
कर्कोटकं कारवेल्लं शिग्रुमूलकपोतिकाः ।
शालिञ्चशाकं वेत्राग्रं दाडिमं त्रिफला मधु ॥ १९ ॥
१०९२ भैषज्यरत्नावली । [ अम्लपित्त-
कटुतैलं तप्तनीरं पित्तश्लेष्महराणि च ।
कटुतिक्तकषायाणि सर्वाणीति गणः सखा ॥
शीतपित्तोद्दर्दकोठरोगिणां स्याद्यथाबलम् ॥ २० ॥
वमन, विरेचन, प्रलेप और रक्तमोक्षण कराना, पुराने शालिचावल, जङ्गली पशु-पक्षियोंका मांसरस, मूँगका यूष, कुलथीका यूष, ककोडे, करेले, सहिंजनेकी फली, मूली, पोईका शाक, शालिश्चशाक, बेंतकी कोंपल, अनार, त्रिफला, मधु, सरसोंका तेल, गरमजल, कफ-पित्तनाशक द्रव्य और समस्त कडवे तीखे तथा कषायरसवाले पदार्थ ये सब शीतपित्त, उददर्द और कोठरोगवाले व्यक्तियोंको दोषानुसार सेवन करनेसे सुखावह कहेगये हैं ॥ १८-२० ॥
शीतपित्त, उददर्द और कोठरोगोंमें अपथ्य ।
क्षीरेक्षुजाता विविधा विकारा मत्स्योदकानूपभवामिषाणि ।
नवीनमद्यं वमिवेगरोधः प्राग्दक्षिणाशापवनोऽह्नि निद्रा ॥ २१ ॥
स्नानं विरुद्धाशनमातपश्च स्निग्धं तथाऽम्लं मधुरं कषायम् ।
गुर्वन्नपानानि च शीतपित्तकोठामयोद्दर्दवतां विषाणि ॥ २२ ॥
दूधके बने द्रव्य (दही, मट्ठादि), ईखके रससे बने (गुडादि) नानाप्रकारके द्रव्य, मछली, जलचर और अनूपदेशवासी जीवोंका मांस, नईमदिरा, वमन (कै) के वेगको रोकना, पूर्वदिशा और दक्षिणदिशाकी वायुका सेवन, दिनमें शयन, स्नान, विरुद्धभोजन, धूपका सेवन, चिकने, खट्टे, मीठे और कषैले पदार्थ, गुरुपाकी अन्न-पान ये सब वस्तुएँ शीतपित्त, कोठ और उददर्द, रोगाक्रान्त मनुष्योंको विषके समान अहितकर हैं ॥ २१ ॥ २२ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां शीतपित्तोद्दर्दकोठरोगचिकित्सा ॥
अम्लपित्तकी चिकित्सा ।
वान्तिं कृत्वाऽम्लपित्ते तु विरेकं मृदु कारयेत् ।
सम्यग्वान्तविरक्तस्य सुस्निग्धस्यानुवासनम् ॥ १ ॥
अम्लपित्तरोगमें वमन और मृदु विरेचन करावे। जब उक्तक्रियाओंके द्वारा शरीरकी अच्छे प्रकार शुद्धि होजाय तब रोगीको स्निग्धद्रव्य पान कराकर अनुवासनवस्ति लगावे ॥ १ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०९३
आस्थापनं चिरोद्भूते देयं दोषाद्यपेक्षया । क्रियाशुद्धस्य शमनं ह्यनुबन्धव्यपेक्षया ॥ दोषसंसर्गजे कार्या भेषजाहारकल्पना ॥ २ ॥
पुराने अम्लपित्तरोगमें दोषोंको विचारकर निरूहणवस्ति प्रयोग करना उपयोगी है । अम्लपित्तमें मिलेहुए दोषोंका प्रकोप होनेपर उपर्युक्त विधिके अनुसार रोगीको शुद्धकर दोषोंको शमन करनेवाली औषध और आहारकी कल्पना करे ॥ २ ॥
ऊर्ध्वंगं वमनैर्धीमानधोगं रेचनैर्हरेत् । अम्लपित्ते तु वमनं पटोलारिष्टपत्रकैः ॥ ३ ॥ कारयेन्मदनक्षौद्रसिन्धुयुक्तैः कफोल्बणे । विरेचनं त्रिवृच्चूर्णै मधुधात्रीफलद्रवैः ॥ ४ ॥
ऊर्ध्वगत अम्लपित्तमें वमन और अधोगत अम्लपित्तमें विरेचन कराना श्रेष्ठ है, कफप्रधान अम्लपित्तरोगमें परवलके पत्ते, नीमके पत्ते, मैनफल, शहद, सैन्धानमक इनका क्वाथ पान कराकर रोगीको वमन करावे एवं आमलोंके क्वाथमें शहद और निसोतका चूर्ण डालकर रोगीको पान कराकर दस्त करावे ॥ ३ ॥ ४ ॥
तिक्तभूयिष्ठमाहारं पानं चापि प्रकल्पयेत् । यवगोधूमविकृतीतीक्ष्णसंस्कारवर्जिताः ॥ यथास्वं लाजसक्तून्वा सितामधुयुतान्पिबेत् ॥ ५ ॥
अम्लपित्तरोगमें कडवेरसवाले द्रव्योंके साथ आहार और पान मिश्रित करके देवे । एवं मिष्ट पदार्थोंके साथ जौ और गेहूँके बनाये हुए खाद्यपदार्थ देवे, किन्तु उनके साथ नमक, लालमिरच और खटाई आदि तीक्ष्णद्रव्य मिलाकर सेवन न करे । अम्लपित्तरोगी मिश्री और शहद मिलाकर खीलोंके सत्तुओंको यथेच्छरूपसें पान करे ॥ ५ ॥
निस्तुषयववृषधात्रीक्वाथस्त्रिसुगन्धिमधुयुतः पीतः । हन्त्यम्लपित्तमचिराद् यदि भुक्तं मुद्गयूषेण ॥ ६ ॥
भूसीरहित जौ, अडूसेके पत्ते और आमले इनके क्वाथमें दारचीनी, इलायची और तेजपात इनका चूर्ण एवं शहद मिलाकर पान करे और मूंगके यूषका पथ्य करे तो अम्लपित्तरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ ६ ॥
१०९४ भैषज्यरत्नावली । [ अम्लपित्त-
कफपित्तवमिकण्डूज्वरविस्फोटदाहहा ।
पाचनो दीपनः क्वाथः शृङ्गवेरपटोलयोः ॥ ७ ॥
अदरख, परवल इनका सुखोष्ण क्वाथ पान करनेसे कफ-पित्तजन्य वमन, खुजली, ज्वर, विस्फोट दाहादिरोग नष्ट होते हैं। यह क्वाथ पाचन, दीपन है ॥ ७ ॥
पटोलं नागरं धान्यं क्वाथयित्वा जलं पिबेत् ।
कण्डूपामार्त्तिशूलघ्नं कफपित्ताग्निमान्द्यजित् ॥ ८ ॥
पटोलपात, सोंठ और धनियाँ इनका क्वाथ बनाकर पान करनेसे कण्डू, पामा, शूल, कफ, पित्तजन्य रोग और मन्दाग्निप्रभृति विकार दूर होते हैं ॥ ८ ॥
पटोलविश्वामृतरोहिणीकृतं जलं पिबेत्पित्तकफाश्रयेषु ।
शूलभ्रमारोचकवह्निमान्द्यदाहज्वरच्छर्द्दिनिवारणं तत् ॥ ९ ॥
परवल, सोंठ, गिलोय और कुटकी इनका यथाविधि क्वाथ बनाकर पान करें तो पित्तकफोत्पन्न अम्लपित्त एवं शूल, भ्रम, अरुचि, मन्दाग्नि, दाह, ज्वर और वमनरोग शान्त होते हैं ॥ ९ ॥
यवकृष्णापटोलानांक क्वाथं क्षौद्रयुतं पिबेत् ।
नाशयेदम्लपित्तं चारुचिं च वमनं तथा ॥ १० ॥
जौ, पीपल और परवल इनका एकत्र क्वाथ बनाकर उसमें शहद डालकर पान करनेसे अम्लपित्त, अरुचि और वमन नष्ट होती है ॥ १० ॥
छिन्नाखदिरयष्ट्याह्वदार्व्यम्भो मधुना पिबेत् ।
सद्राक्षामभयां खादेत्सक्षौद्रां सगुडां च ताम् ॥ ११ ॥
गिलोय, खैर, मुलहठी और दारुहल्दी इनके मंदोष्ण क्वाथमें मधु मिश्रित कर पान करे । दाख और हरड़को एकत्र पीसकर सेवन करे अथवा हरडोंके चूर्णमें शहद मिलाकर किञ्चा पुराना गुड मिलाकर सेवन करे । इसके सेवनसे अम्लपित्त दूर होता है ॥ ११ ॥
छिन्नोद्भवानिम्बपटोलपत्रं फलत्रिकं सुकथितं सुशीतम् ।
क्षौद्रान्वितं पीतमनेकरूपं सुदारुणं हन्ति तदम्लपित्तम् ॥१२॥
गिलोय, नीमकी छाल, पटोलपात, हरड, बहेडा, आमला इनका उत्तम प्रकारसे क्वाथ बनावे । फिर शीतल होजानेपर उसमें शहद मिलाकर पान करे तो यह अनेक प्रकारके दारुण अम्लपित्तरोगको नष्ट करता है ॥ १२ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०९६
हिंगु च कतकफलान्यपि चिञ्चायास्त्वग् घृतं च पुष्टदग्धम् ।
शमयति तदम्लपित्तमम्लभुजो यथोत्तरं द्विगुणम् ॥ १३ ॥
हींग १ तोला, निर्मलीके फल दो तोले, इमलीकी छाल ४ तोले और घी ८ तोले इन सबोंको एकत्र अन्तर्धूमअग्निमें पुटपाककी रीतिसे पकाकर उष्णजलके साथ सेवन करे और इसपर खट्टे रसवाले पदार्थ भक्षण करे तो अम्लपित्तरोग शमन होता है ॥ १३ ॥
कान्तपात्रे वराकल्को व्युषितोऽभ्यासयोगतः ।
सिताक्षौद्रसमायुक्तः कफपित्तहरः स्मृतः ॥ १४ ॥
लोहपात्रमें हरड, बहेडा और आमला इनके समान भाग मिश्रित रातभर रखे-हुए बासी कल्कको मिश्री और शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे कफपित्तजन्य अम्लपित्त विकार नष्ट होता है ॥ १४ ॥
वासाघृतं तिक्तघृतं पिप्पलीघृतमेव च ।
अम्लपित्ते प्रयोक्तव्यं खण्डकूष्माण्डकं तथा ॥ १५ ॥
पङ्क्तिशूलापहा योगस्तथा खण्डामलक्यपि ।
पिप्पली मधुसंयुक्ता अम्लपित्तविनाशिनी ॥
जम्बीरस्वरसः पीतः सायं हन्त्यम्लपित्तकम् ॥ १६ ॥
अम्लपित्तरोगमें वासाघृत, तिक्तघृत, पिप्पलीघृत, खण्डकूष्माण्डक, खण्डामलकी और परिणाम शूलनाशक योग प्रयोग करने चाहिये । पीपलके चूर्णको शहदमें मिलाकर चाटनेसे अथवा सायंकालमें चीनी मिश्रित जम्बीरीनींबूका रस पान करनेसे अम्लपित्तरोग नाश होता है ॥ १५ ॥ १६ ॥
दशांग।
वासामृतापर्पटकनिम्बभूनिम्बमार्कवैः ।
त्रिफलाकूलकैः क्वाथः सक्षौद्रश्चाम्लपित्तहा ॥ १७ ॥
अड़ूसेकी छाल, गिलोय, पित्तपापडा, नीमकी छाल, चिरायता, भाँगर्रा, त्रिफला और परवल इनके काढ़ेको शहद मिलाकर सेवन करनेसे अम्लपित्त नष्ट होता है ॥ १७ ॥
पञ्चनिम्बादिचूर्ण ।
एकोऽशः पञ्चनिम्बानां द्विगुणो वृद्धदारकः ।
सक्तुर्दशगुणो देयः शर्करामधुरीकृतः ॥ १८ ॥
१०९६ | भैषज्यरत्नावली । | [ अम्लपित्त-
शीतेन वारिणा पीतं शूलं पित्तकफोच्छ्रितम् ।
निहन्ति चूर्णं सक्षौद्रमम्लपित्तं सुदारुणम् ॥ १९ ॥
नीमकी छाल, पत्ते, फल, फूल और मूल ये सब एक २ तोला, विधारा दो तोले और जौंके सक्तू १० तोले, इनमें कुछ खाँड मिलाकर इनको मधुर बनालेवे । फिर इस चूर्णको मधुर मिश्रितकर शीतल जलके साथ दो तोले प्रमाण सेवन करे । यह चूर्ण पित्त-कफोद्भवशूल और दारुण अम्लपित्तको नष्ट करता है ॥
अविपत्तिकरचूर्ण ।
त्रिकटु त्रिफला मुस्तं विडं चैव विडङ्गकम् ।
एलापत्रं च चूर्णानि समभागानि कारयेत् ॥ २० ॥
सर्वमेकीकृतं यावल्लवङ्गं तत्समं भवेत् ।
सर्वचूर्णं द्विगुणितं त्रिवृच्चूर्णं प्रदापयेत् ॥ २१ ॥
सर्वमेकीकृतं यावत्तावच्छर्करयाऽन्वितम् ।
भोजनादौ तथा मध्ये खादेन्माषाष्टकं शुभम् ॥ २२ ॥
सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, आमला, बहेडा, नागरमोथा, विरियासञ्चर नोन, वाय-विडङ्ग, इलायची और तेजपात इनको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण कर लेवे । फिर इस चूर्णके बराबर भाग लौंगका चूर्ण एवं सबसे दुगुना निसोतका चूर्ण और जितना इन सब औषधियोंका चूर्ण हो उतनी खाँड मिलाकर सर्वोंको एकमएक करलेवे । इस चूर्णको आठ आठ माशेकी मात्रासे प्रतिदिन भोजनके आदि और मध्यमें सेवन करे, ऊपरसे शीतल जल अथवा नारियलका जल पान करे ॥ २०-२२ ॥
अम्लपित्तं निहन्त्याशु विबन्धं मलमूत्रयोः ।
अग्निमान्द्यभवात्रोगान् नाशयेदविकल्पतः ॥ २३ ॥
प्रमेहान्विंशतिं चैव सर्वदुर्नामनाशनम् ।
अविपत्तिकरं चूर्णमगस्त्यविहितं शुभम् ॥ २४ ॥
यह चूर्ण अम्लपित्त, मल मूत्रका विबन्ध, मन्दाग्निसे उत्पन्न होनेवाले रोग, बीसोंप्रकारके प्रमेह और सर्वप्रकारके बवासीरादि रोगोंको तत्काल नष्ट करता है । इस अविपत्तिकरनामक उत्तम चूर्णको अगस्त्यजीने विधान किया है ॥ २३ ॥ २४ ॥
लीलाविलास ।
रसो बलिव्योम रविश्च लौहं धात्र्यक्षनीरैस्त्रिदिनं विमर्द्य ।
तद्दल्पघृष्टं मृदु मार्कवेण संमर्दयेदस्य हि वह्नियुग्मम् ॥ २५ ॥
.चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०९७
हन्त्यम्लपित्तं विविधप्रकारं लीलाविलासो रसराज एषः ।
छर्दिं सशूलं हृदयस्य दाहं निवारयेदेव न संशयोऽत्र ॥
दुग्धं सकूष्माण्डरसं सधात्रीफलं समेतं ससितं भवेद्वा ॥ २६ ॥
पारा, गन्धक, अभ्रक, ताँवा और लोहा इनकी भस्मको एक एक तोला लेके फिर सबोंको एकत्र मिलाकर आमले और बहेडेके रस (अभावमें क्वाथ) में पृथक् पृथक् तीन दिनतक खरलकर कुछ थोडी देरतक भाँगरेके रसमें खरल करे पश्चात् इस रसको प्रतिदिन प्रातःकाल दो दो रत्तीप्रमाण सेवन करे और ऊपरसे दूध, पेडेका रस, आमलोंका रस अथवा चीनी पडाहुआ नारियलका जल पान करे । यह लीलाविलास सम्पूर्ण रसोंका राजा है । यह नानाप्रकारके अम्लपित्त, वमन, शूल और हृदयकी दाहादि रोगोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है इसमें कुछभी सन्देह नहीं है ॥ २५ ॥ २६ ॥
अम्लपित्तान्तकरस ।
मृतसूतार्कलोहानां तुल्यां पथ्यां विमर्दयेत् ।
माषमात्रं लिहेत्क्षौद्रैरम्लपित्तप्रशान्तये ॥ २७ ॥
रससिंदूर, ताँवा और लोहा ये प्रत्येक एक एक तोला और इनके बराबर भाग हरड लेकर सबोंको यथाविधि एकत्र मिलाकर पीसलेवे । पश्चात् इसको एक एक माशा प्रमाण शहदमें मिलाकर चाटनेसे अम्लपित्त शान्त होता है ॥ २७ ॥
भास्करामृताभ्र ।
वासामृताकेशराजः पर्पटी निम्बभृङ्गकैः ।
वृश्चीरं बृहती मुस्तं वाटचालकशतावरी ॥ २८ ॥
एषां सत्त्वैः पलोन्मानैर्मर्द्दितं विमलाभ्रकम् ।
सहस्रपुटितं तत्र शतावर्या रसं क्षिपेत् ॥
वारद्वादशकं दत्त्वा वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ २९ ॥
अड़ूसा, गिलोय, काला भाँगरा, पित्तपापडा, नीमकी छाल, भाँगरा, सफेद पुनर्नवा, बडी कटेरी, नागरमोथा, खिरेंटी और शतावर इनके चार चार तोले सत्त्वको निकाले और उससे एक हजार बार फूँकीहुई निर्मल अभ्रकको खरल करे । फिर उसमें बारह बार शतावरका रस डालकर उत्तम प्रकारसे खरल करके गोलियाँ बनालेवे ॥ २८ ॥ २९ ॥
१०२८ भैषज्यरत्नावली । [ अम्लपित्त-
भास्करामृतनामेदमम्लपित्तं नियच्छति ।
शूलमन्नद्रवं शूलंशूलं च परिणामजम् ॥ ३० ॥
छर्दिं हल्लासमरुचिं तृष्णां कासं च दुर्जयम् ।
हृद्ग्रहं कामलां रक्तपित्तं यक्ष्माणमेव च ॥ ३१ ॥
दाहं शोथं भ्रमं तन्द्रां विस्फोटं कुष्ठमेव च ॥
श्वासं मूर्च्छां च मन्दाग्निं यकृत्प्लीहोदरं तथा ॥ ३२ ॥
यह भास्करामृतनामक अभ्रक अम्लपित्त, अन्नद्रवभवशूल, शूल, परिणामशूल, वमन, हल्लास; अरुचि, तृषा, दुर्जय खाँसी, हृदयरोग, कामला, रक्तपित्त, राजयक्ष्मा, दाह, शोथ, भ्रम, तन्द्रा, विस्फोट, कुष्ठ, श्वास, मूर्च्छा, मन्दाग्नि, यकृत्, प्लीहा और उदररोग इन रोगोंको नष्ट करता है ॥ ३०-३२ ॥
सर्वतोभद्रलौह ।
लौहं चूर्णं मृतं ताम्रमभ्रकं च पलं पलम् ।
शुद्धसूतं च कर्षैकं गन्धकार्द्धपलं तथा ॥ ३३ ॥
माक्षिकस्य विशुद्धस्य कर्षं शुद्धा शिला परा ।
सार्द्धकर्षं विशुद्धं चशिलाजतु तथा परम् ॥ ३४ ॥
गुग्गुलोश्चापि कर्षैकं शाणमानं परस्य च ।
चूर्णं विडङ्गभल्लातवह्निश्वेतार्कमूलजम् ॥ ३५ ॥
करिकर्णं पलाशं च तालमूली पुनर्नवा ।
घनामृता नागबला चक्रमर्दकमुण्डिरी ॥ ३६ ॥
भृङ्गकेशशतावर्याै वृद्धदारं फलत्रिकम् ।
त्रिकटुश्चापि सर्वेषां प्रत्येकं च नयेद्भिषक् ॥ ३७ ॥
सर्वमेकत्र सम्मर्द्य घृतेन मधुना सह ।
स्निग्धभाण्डे विनिक्षिप्य ततः कुर्याद्विधानवित् ॥ ३८
लोहे, ताँबे और अभ्रककी भस्म चार चार तोले, शुद्ध पारा एक तोला, शुद्धगन्धक दो तोले, शुद्ध सोनामखी एक तोला, शुद्ध मैनसिल एक तोला, शुद्ध शिलाजीत डेढ तोला, शुद्ध गूगल एक तोला, एवं वायविडंग, भिलावे; चीतेकी जड, सफेद आककी जड, हस्तिकर्ण, पलाशकी छाल, मुसली, सोंठ, नागरमोथा, गिलोय, गंगरेन, चकवड, गोरखमुण्डी, सफेदभाँगरा, काला-
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०९९
भाँगरा, शतावर, विधारा, त्रिफला और त्रिकुटा इन औषधियोंको अलग अलग चार चार मासे लेवे। फिर सबोंको घी और शहदके साथ एकत्र मर्दन करके घीसे चिकने बासनमें भरकर रखदेवे ॥ ३३-३८ ॥
माषकादिक्रमेणैव लौहं सर्वरसायनम् । अम्लपित्तं जयेच्छीघ्रं सर्वोपद्रवसंयुतम् ॥ ३९ ॥ तद्वदर्शांसि सर्वाणि सर्वमेव भगन्दरम् । पंक्तिशूलं च शूलं च तथाऽऽमं कुक्षिसंभवम् ॥ ४० ॥ वातरक्तं तथा कुष्ठं पाण्डुरोगं हलीमकम् । आमवातं तथा शोथमग्निमान्द्यं सुदुस्तरम् ॥ ४१ ॥ कामलां वातगुल्मं च पिडिकागरगृध्रसीः । कासश्वासारुचिहरं वृष्यमेतद्विशेषतः ॥ ४२ ॥ सर्वव्याधिहरं प्रोक्तं यथेष्टाहारसेविनः । यक्ष्माणं रक्तपित्तं च वातरोगं विनाशयेत् । संज्ञया सर्वतोभद्रलौहो रसवरः स्मृतः ॥ ४३ ॥
इसमेंसे प्रतिदिन चार रत्तीसे प्रारम्भ कर एक माशे तक मात्राको बढाता हुआ सेवन करे तो यह रसायन सम्पूर्ण उपद्रवोंसे युक्त अम्लपित्तरोगको तत्काल नष्ट करती है। तथा सर्वप्रकारकी बवासीर, भगन्दर, पंक्तिशूल, आमशूल, कुक्षिगत-शूल, वातरक्त, कुष्ठ, पाण्डुरोग, हलीमक, आमवात, सूजन, मन्दाग्नि, कामला, वातगुल्म, पिडका, विषजरोग, गृध्रसी, खाँसी, श्वास, अरुचि और अन्यान्य सर्व प्रकारके विकारोंको दूर करती है। विशेषकर बल, वीर्यको बढाती एवं पुष्टि करती है। इसपर स्वेच्छापूर्वक आहार विहार करना चाहिये। यह औषधि राजयक्ष्मा-रक्तपित्त और वातरोगको नष्ट करती है। इस उत्तम रसायनको सर्वतोभद्रलोह कहते हैं ॥ ३९-४३ ॥
पानीयभक्तवटिका ।
त्र्यूषणं त्रिफला मुस्तं त्रिवृता चित्रकं तथा । प्रत्येकं कार्षिकं दद्यात्सूतगन्धौ तदर्द्धकौ ॥ ४४ ॥ लौहाभ्रकविडंगानां दद्यात्कर्षद्वयं तथा । त्रिफलायाः कषायेण गुटीं कुर्याद् विधानतः ॥ ४५ ॥
११०० भैषज्यरत्नावली। [अम्लपित्त-
सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, नागरमोथा, निसोत, चीता, ये प्रत्येक दो दो तोले, शोधित पारा और गन्धक एक एक तोला, लोहभस्म, अभ्रक-भस्म और वायविडङ्ग प्रत्येक चार चार तोले लेवे। इन सबोंको एकत्र त्रिफलेके क्वाथमें उत्तम प्रकार खरल करके चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥
तदेकां भक्षयेत्प्रातर्भक्तवारि पिबेदनु ।
हन्ति शूलं त्रिदोषोत्थमम्लपित्तं विशेषतः ॥ ४६ ॥
हृच्छूलं पार्श्वशूलं च कुक्षिवस्तिगुदे रुजम् ।
श्वासं कासं तथा कुष्ठं ग्रहणीदोषनाशिनी ॥ ४७ ॥
पश्चात् प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली भक्षणकर ऊपरसे काँजी पान करे। यह गोलियाँ त्रिदोषजन्य शूल, विशेषकर अम्लपित्त, हृदयशूल, पार्श्वशूल, कुक्षि और वस्तिगत शूल, गुदाके रोग, श्वास, खांसी, कुष्ठ और संग्रहणी आदि रोगोंको शीघ्र नष्ट करती हैं ॥ ४६ ॥ ४७ ॥
पञ्चाननगुटिका ।
शुद्धसूतं पलार्द्धं च तत्समं शुद्धगन्धकम् ।
तयोस्तुल्यं ताम्रपत्रं लिप्त्वा मूषोदरे क्षिपेत् ॥ ४८ ॥
आच्छाद्य पञ्चलवणैर्लिंप्त्वा गजपुटे पचेत् ।
सिद्धं ताम्रं समादाय पलमेकं विचूर्णयेत् ॥ ४९ ॥
पारदस्य पलं चैकं गन्धकस्य पलं तथा ।
पुटदग्धस्य लोहस्य गगनस्य पलं पलम् ॥ ५० ॥
यमानी शतपुष्पा च त्रिकटु त्रिफलानि च ।
त्रिवृता चविका दन्ती शिखरी जीरकद्वयम् ॥ ५१ ॥
एतेषां पलिकैर्भागैर्घण्टकर्णकमानकम् ।
ग्रन्थिकं चित्रकं चैव कुलिशानां पलार्द्धकम् ॥
आर्द्रकस्वरसैः पिष्ट्वा गुटिकां माषसम्मिताम् ॥ ५२ ॥
शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक दो दो तोले लेकर दोनोंकी कज्जली बनाले फिर उस कज्जलीसे चार तोले ताँबेके पत्रको ल्हेसकर मूषायन्त्रमें रक्खे और उसके मुँहको पाँचों नमकोंके द्वारा ल्हेसकर गजपुटमें स्थापन करके पकावे । इस प्रकार भस्म कियाहुआ ताँबा चार तोले तथा पारा गन्धक पुटदग्ध लोह अभ्रक अजवायन, सोया, त्रिकुटा, त्रिफला, निसोंत, चव्य, दन्ती, चिरचिटा, जीरा, काला-
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११०१
जीरा ये प्रत्येक चार चार तोले एवं घण्टावृक्ष, मानकन्द, पीपलामूल, चीता और हडसंकरी इनको दो दो तोले लेवे। सबोंको एकत्र अदरखके रसके साथ अच्छे प्रकार खरल करके एक एक माशेकी गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करे ॥ ४८-५२ ॥
पञ्चाननगुटी ख्याता सर्वरोगविनाशिनी ।
अम्लपित्तमहाव्याधिनाशिनी च रसायनी ॥ ५३ ॥
महाग्निकारिका चैषा परिणामव्यथापहा ।
शोथपाण्ड्वामयानाहप्लीहगुल्मोदरापहा ॥ ॥ ५४ ॥
गुरुवृष्यान्नपानानि पयो मांसरसो हिताः ॥ ५५ ॥
यह पञ्चाननगुटिका सर्वप्रकारके रोगोंको नष्ट करनेवाली है। भयंकर अम्लपित्त, मन्दाग्नि, सूजन, पाण्डु, आनाह, प्लीहा, गुल्म, उदररोग और परिणाम शूल इन सम्पूर्ण रोगोंको यह वटी तत्काल दूर करती है। यह जठराग्निको अत्यन्त दीपन करनेवाली और परम रसायन है। इसपर भारी वीर्यवर्द्धक पदार्थ दूध और मांसरस इनका भोजन हितकर है ॥ ५३-५५ ॥
लघुक्षुधावतीगुटिका १-२।
रसगन्धकमभ्राणि यमानी ऽयूषणं तथा ।
त्रिफला शतपुष्पा च चविका जीरकद्वयम् ॥ ५६ ॥
पुनर्नवा वचा दन्ती त्रिवृता घण्टकर्णकम् ।
दण्डोत्पला सारिवे द्वे चाक्षमात्राणि कारयेत् ॥ ५७ ॥
मण्डूरं द्विगुणं दत्त्वा पेषणीयं प्रयत्नतः ।
स्वरसेनार्द्रकस्यैता आलोड्य गुडिकां कुरु ॥ ५८ ॥
१-शुद्ध किया पारा, गन्धक, अभ्रक, अजवायन, साँठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, सोंफ, चव्य, जीरा, कालाजीरा, पुनर्नवा, वच, दन्ती, निसोत, घण्टाकर्णकी जड, सफेद दण्डोत्पलकी जड, उसवा, अनन्तमूल प्रत्येक दो दो तोले और मण्डूर चार तोले लेकर सबोंको एकत्र पीसलेवे। फिर अदरखके रसके साथ खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ५६-५८ ॥
प्रत्यहं भक्षयेदेकां भक्तवारि पिबेदनु ।
वटी क्षुधावती नाम्ना चाम्लपित्तविनाशिनी ॥ ५९ ॥
| ११०२ | भैषज्यरत्नावली । | [ अम्लपित्त- |
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अग्निं च कुरुते दीप्तं तेजोवृद्धिं बलं तथा ।
प्लीहानं श्वासमानाहममामवातं विनाशयेत् ॥ ६० ॥
परिणामभवं शूलं कासं पञ्चविधं तथा ।
जगतस्तु हितार्थाय वाग्भटेन प्रकीर्त्तिता ॥ ६१ ॥
प्रतिदिन प्रातःकाल एक गोली खाय ऊपरसे काँजीको पीवे। यह क्षुधावतीना-मवाली वटी अम्लपित्तको नष्ट कर अग्निको दीपनकर तेज और बलको बढाती है । तिल्ली, श्वास, अफरा, आमवात, परिणामजन्य शूल और पाँचों प्रकारकी खाँसीको शीघ्र दूर करती है । श्रीवाग्भटाचार्यने जीवोंको हितके लिये इसको निर्माण किया है ॥ ५९–६१ ॥
रसायोगन्धकाभ्राणि त्र्यूषणं त्रिफला वचा ।
यमानी शतपुष्पा च चविका जीरकद्वयम् ॥ ६२ ॥
प्रत्येकं पलमेषां तु घण्टकर्णः पुनर्नवा ।
माणकं ग्रन्थिकं चेन्द्रं केशराजः सुदर्शनी ॥ ६३ ॥
दण्डोत्पला त्रिवृद्दन्ती जामातृ रक्तचन्दनम् ।
भृङ्गापामार्गकुलका मण्डूकं च पलार्द्धकम् ॥
आर्द्रकस्वरसेनाथ गुटिकां संप्रकल्पयेत् ॥ ६४ ॥
२–शुद्ध पारा, लोहा, शुद्ध गन्धक, अभ्रक, त्रिकुटा, त्रिफला, वच, अजवायन, सौंफ, चव्य, जीरा, कालाजीरा ये प्रत्येक चार चार तोले तथा घण्टाकर्णकी जड, साँठी, मानकन्द, पीपलामूल, इन्द्रजौ, कालाभाँगरा, सुदर्शनवृक्षकी लता, सफेद दण्डोत्पल, निसोत, दन्तीकी जड, हुलहुलकी जड, लालचन्दन, भाँगरा, चिरचिटा, पटोलपत्र और पीलेफूलवाली मुण्डी इनको दो दो तोले लेवे। फिर सबोंको एकत्र अदरखके रसके साथ उत्तम प्रकार खरलकर बेरकी गुठलीके बराबर गोलियाँ बनालेवे । ६२–६४ ॥
बदरास्थिसमां चैकां भक्षयित्वा पिबेदनु ।
वारि भक्तजलं चैव प्रातरुत्थाय मानवः ॥ ६५ ॥
वटी क्षुधावती नाम्ना सर्वाजीर्णविनाशिनी ।
अग्निं च कुरुते दीप्तं भस्मकं च नियच्छति ॥ ६६ ॥