भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
६९० भैषज्यरत्नावली । [पित्तरोग-
मध्ये चानाहविष्टब्धं तथाऽन्ते चाग्निमान्द्यताम् ॥
रक्तपित्तसमुद्भूतान् रोगान् हन्ति न संशयः ॥ ११ ॥
आमलौंका चूर्ण ३२ तोले, लोहभस्म १६ तोले और मुलहठीका चूर्ण ८ तोले लेकर इन सबको खरलमें एकत्र पीसलेवे । फिर आमलोंके क्वाथके साथ उस चूर्णको ७ दिनतक भावना देकर तीक्ष्ण धूपमें सुखालेवे और बारीक पीसकर मिट्टीके वर्त्तनमें भरकर रखदेवे । इस लोहको घृत और शहदके साथ मिलाकर प्रतिदिन भोजनके पहले मध्यमें और अन्तमें इस प्रकार तीनवार भक्षण करे । यह औषध भोजनके पहले सेवन करनेसे पित्तजनित रोगोंको, भोजनके मध्यकालमें सेवन करनेसे आनाह, विष्टब्धाजीर्ण आदि और भोजनके अन्तमें सेवन करनेसे अग्निकी मन्दता और रक्तपित्तसे उत्पन्न हुए सम्पूर्ण रोगोंको निश्चय नाश करती है । इसपर यथादोषानुसार पथ्य देना चाहिये ॥ ८–११ ॥
पित्तान्तक रस ।
जातीकोषफले मांसी कुष्ठं तालीशपत्रकम् ।
माक्षिकं मृतलौहं च अभ्रं दिव्यं समांशकम् ॥ १२ ॥
सर्वतुल्यं मृतं तारं समं निष्पिष्य वारिणा ।
द्विगुञ्जाभा वटी कार्या पित्तरोगविनाशिनी ॥ १३ ॥
कोष्ठस्थितं च यत्पित्तं शाखाश्रितमथापि वा ।
शूलं चैवाम्लपित्तं च पाण्डुरोगं हलीमकम् ॥ १४ ॥
दुर्नामभ्रान्तिवान्तिं च क्षिप्रमेव विनाशयेत् ।
रसः पित्तान्तको ह्येष काशिराजेन भाषितः ॥ १५ ॥
जावित्री, जायफल, बालछड, कूठ, िशपत्र, सोनामाखी, लोहभस्म, अभ्रकभस्म और लाग ये सब औषधियाँ समान भाग और सबकी बराबर चाँदीकी भस्म लेकर सबको एकत्र जलके साथ खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह वटी सर्व प्रकारके पित्तके रोगोंको शमन करनेवाली है । एवं कोष्ठगत और हाथ, पाँव आदि अंगोंमें स्थित पित्त, शूल, अम्लपित्त, पाण्डु, हलीमक, बवासीर, भ्रान्ति और वमन इन सब रोगोंको यह पित्तान्तरस शीघ्रही नष्ट करता है । इसको काशिराजने निर्दिष्ट किया है ॥ १२–१५ ॥
महापित्तान्तरस ।
यद्यत्र माक्षिकं त्यक्त्वा सुवर्णमपि दीयते ।
महापित्तान्तको नाम सर्वपित्तविनाशनः ॥ १६ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६९१
यदि उक्त पित्तान्तक रसमें सोनामाखीको त्यागकर सुवर्णभस्म मिलादीजाय तो यही महापित्तान्तक रस कहा जाता है । यह सम्पूर्ण पित्तविकारोंको नाश करे ॥
गुडूचीतैल ।
गुडूचीक्वाथकल्काभ्यां सिद्धं तैलं प्रयत्नतः ।
वातरक्तं निहन्त्याशु नात्र कार्या विचारणा ॥ १७ ॥
गिलोयके क्वाथ और कल्कके साथ विधिपूर्वक तिलके तैलको सिद्ध करे । यह तैल मर्दन करनेसे वातरक्त और पित्तरोगोंको निस्सन्देह शीघ्र नष्ट करता है ॥
पित्तरोगमें पथ्य ।
तिक्तस्वादुकषायशीतपवनच्छायानिशावीजनं
ज्योत्स्नाभूगृहयन्त्रवारि जलजं स्त्रीगात्रसंस्पर्शनम् ।
सर्पिःक्षीरविरेकसेकरुधिरस्रावप्रदेहादिकं
पानाहारविहारभेषजमिदं पित्तं प्रशान्तिं नयेत् ॥ १८॥
तिक्त ( कडवे ) रसवाले पदार्थ, मधुर और कषैले रसवाले पदार्थ, शीतल वायु, छाया, रात्रिकी वायु, पंखेकी वायु, चाँदनी, कच्चे मकान, फुहारेका जल, कमल, स्त्रीका आलिंगन, घृत, दूध, विरेचन, अभिषेचन, रुधिरस्राव कराना और प्रलेप आदि करना ये सम्पूर्ण पान और आहार, विहारादि औषधियाँ पित्तको शमन करती हैं ॥ १८ ॥
पित्तरोगमें अपथ्य ।
कट्वम्लोष्णविदाहितीक्ष्णलवणक्रोधोपवासातप-
स्त्रीसम्भोगतृषाक्षुधाभिहननव्यायाममद्यादिभिः ॥ १९ ॥
माषैस्तिलैःकुलत्थैश्च मत्स्यैर्मेषाभिषेण च ।
गव्येन दधितक्रेण नृणां पित्तं प्रकुप्यति ॥ २० ॥
चरपरेरस, खट्टे रस, गरम, दाहकारक, तीक्ष्ण और लवणयुक्त पदार्थ, क्रोध, उप-वास, धूप, स्त्रीप्रसंग, क्षुधा और तृषाके वेगको रोकना, व्यायाम, मद्यपान, उड़द, तिल, कुलथी, मछली, मेंडका मांस, गौका दही और मट्ठा इन समस्त पदार्थोंके द्वारा मनुष्योंके पित्त कुपित होता है ॥ १९ ॥ २० ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां पित्तरोगचिकित्सा ।
प्रथमं मुखमाधुर्यं तथैव मुखलिप्तता ।
| ६९२ | भैषज्यरत्नावली । | [ कफरोग- |
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कफरोगचिकित्सा ।
प्रथमं मुखमाधुर्यं तथैव मुखलिप्तता ।
तथा मुखप्रसेकश्च निद्राधिक्यं तथैव च ॥ १ ॥
कण्ठे घुर्घुरता चापि कटुकांशोष्णकामिता ।
बुद्धिमान्द्यमचैतन्यमालस्यं तृप्तिरेव च ॥ २ ॥
अग्निमान्द्यं मलाधिक्यं मलशैत्यं तथैव च ।
मूत्राधिक्यं मूत्रशौक्ल्यं शुक्राधिक्यं तथैव च ॥
स्तैमित्यं गौरवं शैत्यमेत एव हि विंशतिः ॥ ३ ॥
योगतो रूढितः प्रोक्तो मुनिभिः श्लैष्मिको गदः ।
बोद्धव्या स्वप्रकरणे चिकित्सैषां पृथक् पृथक् ॥ ४ ॥
प्रथम मुखमें मधुरताका होना, मुँहका लिहसासा रहना, मुँहसे पानीका गिरना, निद्राका अधिक आना, कण्ठमें घुर्घुर शब्द होना, चरपरे और गरम पदार्थोंकी इच्छा होना, बुद्धिकी मन्दता, मूर्च्छा, आलस्य और तृप्तिका होना, अग्निकी मन्दता, मलका अधिक और शितल होना, मूत्रकी अधिकता और सफेद होना, वीर्यकी अधिकता, शरीरमें आर्द्रता, गुरुता और शीतलताका होना ये २० प्रकारके कफके रोग योगसे विचारकर मुनियोंने वर्णन किये हैं। इनकी पृथक् पृथक् चिकित्सा मूलरोगाधिकारकी समान जाननी चाहिये ॥ १-४ ॥
कफश्चितो हि शिशिरे वसन्तेऽर्कांशुतापितः ।
हत्वाऽग्निं कुरुते रोगांस्तत्र तत्र प्रयोजयेत् ॥ ५ ॥
तीक्ष्णं वमननस्यादिकवलग्रहमञ्जनम् ।
व्यायामोद्वर्त्तनं धूमं शौचकार्ये सुखोदकम् ॥ ६ ॥
शिशिर ऋतुमें कफ उत्पन्न होता है और वसन्तऋतुमें सूर्यकी गर्मीसे पिघलकर अग्निको मन्द करके अनेक प्रकारके कफजन्य रोगोंको उत्पन्न करता है। इसलिये उस समय तीक्ष्ण पदार्थ, वमनकारक ओषधियाँ, नस्य, कवलधारण करना, अञ्जन आँजना, कसरत, उबटन, धूम्रपान एवं शौच और स्नानादि कार्योंमें गरम जल व्यवहार करना चाहिये ॥ ५ ॥ ६ ॥
'चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६९३
कफजकोपविनाशकृतेऽनलवमननावनरूक्षनिषेवणम् ॥ ७ ॥
कफके कोपके शमन करनेके लिये अग्निका सेवन, वमन करना, नस्य देना और रूक्ष पदार्थोंका सेवन करना चाहिये ॥ ७ ॥
विविधः सुरतानन्दः संश्रमः कफवारणः ।
कटुक्षाराम्लकाः सेव्याः शोधनं कफसम्भवे ॥ ८ ॥
कफजनित रोगोंमें—स्त्रीसहवास, परिश्रम, चरपरे, खारी और अम्ल (खट्टे) रसवाले पदार्थोंका सेवन और वमन, विरेचनादिके द्वारा शरीरकी शुद्धि करना ये सब कफनाशक हैं ॥ ८ ॥
कफचिन्तामणिरस ।
हिङ्गुलेन्द्रयवं टङ्कं त्रैलोक्यबीजमेव च ।
मरिचं च समं सर्वं त्रिभागं रससिन्दुरम् ॥ ९ ॥
आर्द्रकस्य रसेनैव मर्दयेद्याममात्रकम् ।
चणकाभा वटी कार्या सर्ववातप्रशान्तये ॥
कफरोगं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ १० ॥
सिंगरफ, इन्द्रजौ, सुहागा, भाँगके बीज और कालीमिरच ये प्रत्येक एक एक भाग और रससिन्दूर, तीन भाग लेकर सबको एकत्र अदरखके रसके साथ एक प्रहरतक खरल करे, फिर चनेकी बराबर गोलियाँ बनाकर सर्वप्रकारके वातरोगोंके शमन करनेके लिये सेवन करावे। यह रस कफरोगोंको इस प्रकार शीघ्र नाश कर देता है, जैसे सूर्य अन्धकारको नष्ट करता है ॥ ९ ॥ १० ॥
बृहत्कफकेतुरस ।
मुक्तासुवर्णे च समानभागे प्रवालभस्मापि तयोः समानम् ।
अभ्रं च योज्यं द्विगुणं प्रवालात्स्वर्णोत्थसिन्दुरसमं विकल्प्य॥
दुग्धेन नार्या विमलाशमपात्रे यत्नेन मर्द्यं कुशलैर्भिषग्भिः ।
गुञ्जात्रयं चास्य कफप्रकोपे सेवेत सद्यः कफनाशमिच्छन् ११
मोती १ तोला, सुवर्ण १ तोला, मूँगाभस्म २ तोले, अभ्रकभस्म ४ तोले और स्वर्णसिन्दूर, ८ तोले लेवे। इन सबको साफ़ पत्थरके खरलमें डालकर स्त्रीके दूधके साथ उत्तम प्रकारसे खरल करे। कफका प्रकोप होनेपर शीघ्र कफनाश करने की इच्छावाला मनुष्य इस रसको प्रतिदिन तीन तीन रत्ती प्रमाण सेवन करे ॥११॥
६९४ भैषज्यरत्नावली । [ कफरोग-
महाश्लेष्मकालानलरस ।
हिङ्गूलसम्भवं सूतं शिलागन्धकटङ्कणम् ।
ताम्रं वङ्गं तथाऽभ्रं च स्वर्णमाक्षिकतालकम् ॥ १२ ॥
धुस्तूरं सैन्धवं कुष्ठं हिङ्गु पिप्पलि कट्फलम् ।
दन्तीबीजं सोमराजी वनराजफलं त्रिवृत् ॥ १३ ॥
वज्रीक्षीरेण सम्मर्द्य वटिकां कारयेद्भिषक् ।
कलायपरिमाणां तु खादेदेकां यथाबलम् ॥ १४ ॥
सन्निपातं निहन्त्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ।
मदसिंहो यथाऽरण्ये मृगाणां कुलनाशनः ॥
तथाऽयं सर्वरोगाणां सद्यो नाशकरो महान् ॥ १५ ॥
हिंगुलसे निकालाहुआ पारा, मैनसिल, शुद्ध गन्धक, सुहागा, ताँबा, वंग, अभ्रक, सोनामाखी इन सबकी भस्म, वंशपत्री, हरतालकी भस्म, धतूरा, सेंधानमक, कूठ, हींग, पीपल, कायफल, जमालगोटा, बापची, अमलतासकी फली और निसोत इन सबको एकत्र चूर्ण करके थूहरके दूधके साथ खरल कर मटरकी बराबर गोलियाँ बनालेवै । इनमेंसे प्रतिदिन जठराग्निके बलाबलके अनुसार एकएक गोली भक्षण करनेसे त्रिदोषजन्य विकार इसप्रकार तत्काल नष्ट होते हैं, जैसे वज्र वृक्षकों शीघ्र विनाश करदेता है वनमें जैसे मदोन्मत्त सिंह पशुओंके समूहको नाश करता है वैसेही यह महाश्लेष्मकालानलरस सर्वप्रकारके रोगोंको शीघ्र नष्ट कर देता है ॥ १२–१५ ॥
श्लेष्मशैलेन्द्ररस ( रसेन्द्रगुटिका ) ।
गन्धकं पारदं चाभ्रं त्र्यूषणं जीरकद्वयम् ।
शठी शृङ्गी यमानी च पुष्करं रामठं तथा ॥ १६ ॥
सैन्धवं यावशूकं च टङ्कणं गजपिप्पली ।
जातीकोषाजमोदे च लौहं यासलवङ्गकम् ॥ १७ ॥
धुस्तूरबीजं जैपालं कट्फलं चित्रकं तथा ।
प्रत्येकं कार्षिकं चैषां श्लक्ष्णचूर्ण प्रकल्पयेत् ॥ १८ ॥
पाषाणे विमले पात्रे घृष्टं पाषाणमुद्गरैः ।
बिल्वमूलरसं दत्त्वा चार्कचित्रकदन्तिकाः ॥ १९ ॥