भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
इस पृष्ठ पर कोई पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है। यह एक रिक्त पृष्ठ (blank page) है।
भक्तिरसामृतसिन्धु
कृष्णकृपाश्रीमूर्ति श्रीमद् भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद द्वारा विरचित वैदिक-ग्रन्थ-रत्न — श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप श्रीमद्भागवत स्कन्ध १-१० (५०-खण्ड) श्रीचैतन्य चरितामृत (१७-खण्ड) श्रीचैतन्य महाप्रभु का शिक्षामृत भक्तिरसामृतसिन्धु उपदेशामृत श्री ईशोपनिषद् अन्य लोकों की सुगम यात्रा कृष्णभावना : परमयोग भगवान् श्रीकृष्ण का लीलामृत (३-खण्ड) पारमार्थिक प्रश्नोत्तर वैदिक आलोक में पाश्चात्य दर्शन (२-खण्ड) देवहूतिनन्दन भगवान् कपिल का शिक्षामृत प्रह्लाद महाराज की भागवत-शिक्षा रसराज श्रीकृष्ण जीवन का स्रोत चेतन है योग की पूर्णता जन्म-मृत्यु से परे श्रीकृष्ण की ओर कृष्णभावना : अनुपम भेंट गीतार गान (बंगाली) राजविद्या कृष्णभावना की प्राप्ति भगवत्-दर्शन पत्रिका (संस्थापक) अधिक जानकारी तथा सूचीपत्र के लिए लिखें : अन्तर्राष्ट्रीय श्रीकृष्णभावनामृत संघ हरे कृष्ण लैण्ड, गांधी ग्राम रोड, जुहू, बम्बई - ४०० ०४९
श्रीश्रीगुरुगौराङ्गौ जयतः भक्तिरसामृतसिन्धु श्रीरूप गोस्वामी द्वारा विरचित भक्तियोग का संपूर्ण विज्ञान कलियुगपावन स्वभजन-विभजन प्रयोजनावतार श्रीभगवत्कृष्णचैतन्यमहाप्रभोः परंपरायां दशम् विश्वव्यापी श्रीहरेकृष्ण महामन्त्र प्रचारक प्रवर कृष्णकृपाश्रीमूर्ति श्रीरूपानुगवर जगद्गुरु ॐ विष्णुपाद परमहंस परिव्राजकाचार्यवर्य अष्टोत्तरशत श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद संस्थापकाचार्य अन्तर्राष्ट्रीय श्रीकृष्णभावनामृत संघ हिन्दी भाषान्तरकार राजीव गुप्ता भक्तिवेदान्त बुक ट्रस्ट न्यूयार्क-लास एन्जीलीस-लण्डन-बम्बई
इस ग्रन्थ की विषय-वस्तु में रुचिवान् पाठकों को अन्तर्राष्ट्रीय श्रीकृष्णभावनामृत संघ अपने निम्नलिखित भारतीय केन्द्रों से सम्पर्क तथा पत्र-व्यवहार करने के लिए आमन्त्रित करता है : अन्तर्राष्ट्रीय श्रीकृष्णभावनामृत संघ १. हरे कृष्ण लैण्ड, जुहू, बम्बई — ४००० ४९ २. २१/ए, फिरोज गाँधी रोड, नई दिल्ली — ११००२४ ३. श्रीकृष्ण बलराम-मन्दिर, भक्तवेदान्त स्वामी मार्ग, रमणरेती वृन्दावन, (मथुरा उ. प्र.) दूरभाष : १७८ ४. हरे कृष्ण लैण्ड, नमपल्ली स्टेशन रोड, हैदराबाद — ५००००१। (आ. प्र.) ५. इस्कोन, हरे कृष्ण लैण्ड, दक्षिण मार्ग, नं. ५६६ सेक्टर, ३६-बी चण्डीगढ़ (पंजाब) ६. ७, कैलाश सोसाइटी, आश्रम रोड, अहमदाबाद (गुजरात) ७. ३६, क्रिसेन्ट रोड बंगलोर — १ ८. ३, एल्बर्ट रोड, कलकत्ता — ७०००१७ (पं बंगाल) ६. श्रीमायापुर चन्द्रोदय मन्दिर, पो. श्रीमायापुर धाम (नदिया, पं. बंगाल) सर्वाधिकार सुरक्षित भक्ति वेदान्त बुक ट्रस्ट, हरेकृष्ण लैँड, जुहू — बंबई ४६ पहली आवृत्ति - अगस्त १९७९ / प्रतियाँ १०,००० दूसरी आवृत्ति - जून १९८० / प्रतियाँ १०,००० Published by Gopal Krishna Das for the Bhaktivedanta Book Trust, Hare Krishna Land, Juhu, Bombay, and Printed by A. E. Subramaniam, Orion Offset Printers, 4-Dhanraj Industrial Estate, Sun Mill Road, Lower Parel, Bombay 400 013. Telephone-378643.
श्रीधाम वृन्दावन के छः गोस्वामियों को नानाशास्त्र विचारणैक निपुणौ सद्धर्मसंस्थापकौ लोकानां हितकारिणौ त्रिभुवने मान्यौ शरण्याकरौ। राधाकृष्ण पदारविन्द भजनानन्देन मत्तालिकौ वन्दे रूप सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव गोपालकौ। 'मैं श्रीसनातन, श्रीरूप, श्रीरघुनाथ भट्ट, श्रीरघुनाथ दास, श्रीगोपाल भट्ट तथा श्रील जीव-इन छः गोस्वामियों को सादर प्रणाम करता हूँ! ये सभी सनातन धर्म की स्थापना करके जगत् का रंजन करने के लिए शास्त्र-विचार में निपुण हैं। इसलिए भी ये त्रिलोकी में मान्य हैं तथा सब प्रकार से शरण लेने योग्य हैं, क्योंकि गोपीभाव में निमग्न होकर श्रीराधाकृष्ण की दिव्य सेवा में निरत हैं।‘’
अनुक्रमणिका भूमिका १- प्रस्तावना १ पूर्व विभाग १. शुद्ध भक्तियोग के लक्षण ८ २. साधनभक्ति २२ ३. भक्तियोग के अधिकारी के लक्षण ३० ४. भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़कर है ३६ ५. भक्तियोग का शुद्ध स्वरूप ४४ ६. भक्ति के साधन ४६ ७. भक्ति के अंगों के प्रमाण ५३ ८. वर्जनीय अपराध ६१ ६. भक्ति के सब अंगों का विशद विवेचन ६५ १०. श्रवण-स्मरण की कला ७७ ११. भगवत्सेवा के नाना रूप ८३ १२. भक्ति के अंग ८८ १३. भक्ति के पाँच शक्तिशाली साधन ९५ १४. भक्ति की योग्यता ९६ १५. रागानुगाभक्ति १०५ १६. रागानुगाभक्ति (२) ११० १७. भाव ११५ १८. भाव के लक्षण (अनुभाव) ११६ १६. प्रेमभक्ति १२६ दक्षिण विभाग २०. रस १३१ २१. श्रीकृष्ण के दिव्य गुण १३४ २२. श्रीकृष्ण के गुण १५२ २३. श्रीकृष्ण का स्वरूप १६६ २४. श्रीकृष्ण के वैशिष्ट्य १७३ २५. श्रीकृष्णभक्त १७६
२६. प्रेम के उद्दीपन १८० २७. प्रेम के लक्षण (अनुभाव) १८६ २८. सात्त्विक भाव १९३ २९. कृष्णप्रेम के व्यभिचारी भाव २०२ ३०. कृष्णप्रेम के अन्यान्य भाव २१३ ३१. अन्य व्यभिचारी भाव २२६ ३२. स्थायिभाव के लक्षण २३४ ३३. भाव के गौण लक्षण २३८ ३४. भक्तिरसामृत २४० पश्चिम विभाग ३५. शान्तरस २४५ ३६. प्रीतिभक्तिरस २५२ ३७ श्रीकृष्णसेवा के उद्दीपन २६० ३८. निर्वेद तथा वियोग २६६ ३९. श्रीकृष्ण से योग के प्रकार २७० ४०. श्रीकृष्ण के मित्र तथा अन्य लाल्याभिमानियों की गौरव प्रीति २७३ ४१. सख्यभक्तिरस २७८ ४२. सख्यरस में प्रेम के व्यवहार २८७ ४३. वत्सलभक्तिरस २९८ ४४. मधुरभक्तिरस ३१० उत्तर विभाग ४५. हास्य भक्तिरस ३१६ ४६. अद्भुतभक्तिरस और वीरभक्तिरस ३२० ४७. करुणभक्तिरस और रौद्रभक्तिरस ३२७ ४८. भयानक तथा बीभत्स भक्तिरस ३३२ ४९. रसों की मैत्री—वैर स्थिति ३३६ ५०. रसों की मैत्री—वैर स्थिति (२) ५१. रसाभास ३४८ ५२. विज्ञाप्ति ३५२
इस पृष्ठ पर लिखा हुआ पाठ अत्यधिक धुंधला (faded) और अस्पष्ट होने के कारण पठनीय नहीं है।
कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामीप्रभुपाद संस्थापकाचार्य अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ विश्व में कृष्णभक्ति के अद्वितीय दाता
श्रील रूप गोस्वामी प्रभुपाद भक्तिरसामृतसिन्धु के रचयिता
संकीर्तनयज्ञ के पिता प्रेमावतारी श्री चैतन्य महाप्रभु
श्रीमूर्त्ति का दर्शन बड़े ही श्रद्धा-प्रेम से करना चाहिए (पृ. ५०-५१)
श्रीकृष्ण के श्यामसुन्दर नामक स्वयंरूप की ओर तो निर्विशेषवादी भी आकृष्ट हो जाते हैं (पृ. १६२)
श्रीराधाकृष्ण का प्रेमानन्दमय विहार (पृ. ३११)
भूमिका प्रस्तुत ग्रन्थ में श्रील रूपगोस्वामी प्रभुपाद की संस्कृत रचना 'भक्तिरसामृतसिन्धु' का सार संकलन है। श्रील रूप गोस्वामी उन छः गोस्वामियों में प्रधान हैं, जो भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु के सीधे शिष्य हैं। जब वे श्रीचैतन्यदेव से पहली बार मिले, उस समय श्रील रूप गोस्वामी प्रभु- पाद बंगाल की मुस्लिम सरकार में मंत्री थे। वे और उनके भाई सनातन नवाब हुसैन शाह के साकरमलिक और दबीरखास नाम से प्रसिद्ध वरिष्ठ मंत्री थे। उस समय, आज से पाँच सौ वर्ष पहले, हिन्दू समाज बड़ा रूढ़ि- वादी था। यदि कोई ब्राह्मण जाति का व्यक्ति मुस्लिम शासक में सेवा कार्य स्वीकार कर लेता तो उसे ब्राह्मण समाज से निष्कासित कर दिया जाता। दबीरखास और साकरमलिक की ऐसी ही स्थिति थी। यद्यपि उनका जन्म उच्च सारस्वत ब्राह्मण जाति में हुआ था; पर वहाँ की सरकार में मंत्रीपद ग्रहण कर लेने से उन्हें समाज ने निष्कासित कर दिया था। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कृपा करके दोनों महापुरुषों को अपना शिष्य बना लिया और उस गोस्वामी पद पर आरूढ़ कर दिया जो ब्राह्मण संस्कृति की सर्वोच्च अवस्था है। इसी प्रकार भगवान् चैतन्य ने जन्म से मुस्लिम होने पर भी हरिदास ठाकुर को अपना शिष्य स्वीकार किया और बाद में हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे महामन्त्र के कीर्तन का आचार्यपद प्रदान किया। भगवान् चैतन्य देव का सिद्धान्त सार्वभौम है। जो कोई श्रीकृष्ण के तत्त्व को जानता हो और उनकी सेवा के परायण हो, उसे ब्राह्मण वंश में जन्मे व्यक्ति से श्रेष्ठ समझा जाता है। सम्पूर्ण वैदिक शास्त्रों, विशेषतः भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत का मूल सिद्धान्त यही है। भगवान् चैतन्य- महाप्रभु के आन्दोलन के इसी सिद्धान्त को 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में दिखाया गया है। इसके द्वारा कोई भी व्यक्ति गोस्वामी पद पर आरूढ़ हो सकता है। भगवान् चैतन्य महाप्रभु की दबीरखास और साकरमलिक नामक इन दोनों भाइयों से भेंट मालदा जिले के रामकेलि ग्राम में हुई थी। उस
२ | भक्तिरसामृतसिन्धु भेंट के बाद दोनों ने सरकारी सेवा को त्याग कर भगवान् चैतन्यदेव के शरणागत हो जाने का निश्चय किया। यही दबीरखास परवर्ती काल में रूपगोस्वामी कहलाये। उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और सेवाकाल में जितना धन संचित किया था उसे लेकर चल पड़े। चैतन्य- चरितामृत में वर्णन है कि स्वर्ण मुद्राओं के रूप में उनका संचित धन करोड़ों रुपयों तक का था और उससे एक बड़ी नाव भर गई। उन्होंने अपने इस धन का बड़े ही आदर्श रूप से विभाजन किया, जिसका भक्तों को विशेष रूप से और मानवता को सामान्य रूप से पालन करना चाहिये। संचित सम्पत्ति का आधा भाग कृष्णभावनाभावित पुरुषों अर्थात् ब्राह्मणों और वैष्णवों को दिया गया। पच्चीस प्रतिशत बन्धुबान्धवों में वितरित हुआ और शेष पच्चीस प्रतिशत आपत्काल और निजी कठिनाइयों के लिये रख छोड़ा। बाद में जब साकरमलिक ने भी त्यागपत्र देना चाहा तो नवाब बहुत उद्विग्न हुआ और उन्हें जेल में डाल दिया। साकरमलिक ने जो परवर्तीकाल में श्रील सनातन गोस्वामी नाम से ख्यात हुए अपने भाई के निजी धन का लाभ उठाया जो गाँव के एक धनी के यहाँ जमा था और उसके द्वारा वे शहनशाह के कारागार से भाग निकले। इस प्रकार वे दोनों भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु के साथ सम्मिलित हो गये। श्रील रूप गोस्वामी सर्वप्रथम भगवान् चैतन्य से प्रयागराज में मिले और उस पावन नगरी के दशाश्वमेध घाट पर भगवान् ने उन्हें निरन्तर दस दिन तक सदुपदेश दिया। भगवान् चैतन्यदेव ने उन्हें विशेष रूप से कृष्णभावना-विज्ञान की शिक्षा दी। भगवान् चैतन्यदेव द्वारा श्रील रूप गोस्वामी प्रभुपाद को दी गई इस शिक्षा का वर्णन हमारे 'श्रीचैतन्यमहाप्रभु का शिक्षामृत' नामक ग्रन्थ में है। बाद में, श्रील रूपगोस्वामी ने भगवान् चैतन्यदेव की शिक्षा का विविध वैदिक शास्त्रों के ज्ञान और प्रमाण के आधार पर विस्तृत रूप से प्रतिपादन किया। छः स्वामियों के चरणों में श्रील श्रीनिवासाचार्य की प्रार्थना में उल्लेख है कि वे सब महापंडित थे। उन्हें केवल संस्कृत का ही ज्ञान नहीं था, वरन् वे फारसी और अरबी आदि विदेशी भाषाओं में भी पारंगत थे। श्रीचैतन्य महाप्रभु के मत को प्रामाणिक वैदिक ज्ञान के आधार पर स्थापित करने के लिये उन्होंने सम्पूर्ण वैदिक शास्त्रों का गम्भीर विचारपूर्वक अध्ययन किया था। वर्तमान कृष्णभावनामृत आन्दो- लन भी श्रील रूप गोस्वामी प्रभुपाद की प्रामाणिकता पर आधारित है। अतएव हमें प्रायः रूपानुग अर्थात् श्रील रूपगोस्वामी प्रभुपाद के चरणचिह्नों
का अनुगामी कहा जाता है। हमारे मार्गदर्शन के लिये ही श्रील रूप- गोस्वामी ने इस 'भक्तिरसामृतसिन्धु' नामक ग्रन्थ की रचना की। जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत आन्दोलन में संलग्न हैं वे इस महान् ग्रन्थ का लाभ उठायें और बड़ी दृढ़ता के साथ कृष्णभावना में स्थिर हो जायें। भक्ति का अर्थ है सेवा करना। किसी भी सेवा में कुछ न कुछ आकर्षण रहता है, जिससे सेवक उसमें निरन्तर लगा रहता है। इस जगत् में हम निरन्तर किसी न किसी प्रकार की सेवा में लगे रहते हैं और इस सेवा का उद्दीपन है वह आनन्द, जो हमें उससे मिलता है। पत्नी और सन्तान के स्नेहवश गृहस्थ दिन-रात अथक परिश्रम करता है। परो- पकारी भी इसी प्रकार प्रेमवश बृहद परिवार के लिये कार्य करता है और जो राष्ट्रवादी है वह अपने देश और देशवासियों के लिये प्राणप्रण से प्रयास करता है। वह शक्ति जो परोपकारी, गृहस्थ और राष्ट्रवादी को अपने-अपने कार्य में लगाये रखती है, उसका नाम रस है जो अति मधुर है। भक्तिरस लौकिक कर्मियों के साधारण रस से भिन्न है। लौकिक कर्मी दिन-रात एक ऐसे रस को भोगने के लिये परिश्रम करते हैं जो वास्तव में इन्द्रियतृप्ति है। ऐसे रस का स्वाद अधिक देर नहीं रहता और इसीलिये लौकिक कर्मियों में अपने भोगने की अवस्था को निरन्तर बदलते रहने की प्रवृत्ति रहती है। व्यापारी पूरे सप्ताह कार्य करने में सन्तुष्ट नहीं होता। अतएव सप्ताहांत होने पर वह कुछ परिवर्तन चाहता है और इसलिये ऐसे स्थान पर चला जाता है जहाँ कम से कम एक दिन के लिये तो वह अपनी सारी व्यापार-क्रियाओं को भूल सके। सप्ताह का अन्त विस्मृति में खोकर वह फिर अपनी स्थिति को बदलकर व्यापार-क्रिया में संलग्न हो जाता है। किसी परिस्थिति अथवा स्थिति-विशेष को स्वीकार कर लेना और फिर कुछ समय बाद त्याग देना—लौकिक कार्यकलाप का यही स्वरूप है। इसी को भोग-त्याग कहते हैं। जीवात्मा निरन्तर न तो इन्द्रियतृप्ति में रह सकता है और न त्याग में । निरन्तर परिवर्तन चलता रहता है; हमें इनमें से किसी भी अवस्था में सुख नहीं मिलता क्योंकि हमारा शाश्वत् स्वरूप इन दोनों से भिन्न है। इन्द्रियतृप्ति अधिक समय तक नहीं रहती; अतएव उसे चपल सुख कहते हैं। उदाहरण के लिये—एक साधारण मनुष्य दिन-रात अथक परिश्रम करके अपने परिवार वालों को सुख देने में सफल होता है और इससे उसे एक प्रकार के रस की अनुभूति है। परन्तु जैसे ही उसका जीवन समाप्त हो जाता है, शरीर के साथ ही प्राकृत सुख में की हुई सब उन्नति भी समाप्त हो
[ ४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु जाती है। अतएव नास्तिकों के लिये मृत्यु को भगवान् का रूप माना जाता है। भक्त भक्तियोग के द्वारा भगवान् के सान्निध्य का अनुभव करते हैं और नास्तिक उनका साक्षात्कार मृत्यु के रूप में करते हैं। मृत्यु होने पर सब कुछ समाप्त हो जाता है। एक नई अवस्था में जो पिछली अवस्था से श्रेष्ठ अथवा अधम हो सकती है, जीवन का एक नया अध्याय शुरू करना होता है। राजनीतिक, सामाजिक, राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय —किसी भी क्रियाक्षेत्र में सारे कर्मों का फल जीवन के साथ ही समाप्त हो जायगा। यह बिलकुल निश्चित है। परन्तु भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में अनुभव में आने वाला भक्तिरस जीवन के अन्त के साथ समाप्त नहीं होता। वह निरन्तर बना रहता है और इसीलिये उसे अमृत कहते हैं। सम्पूर्ण वैदिक शास्त्रों में इसका प्रमाण है। भगवद्गीता कहती है—'भक्तिरस में थोड़ी भी उन्नति भक्त को परम भय से अर्थात् मानव-जीवन के अवसर को खो देने से होने वाले भय से बचा सकती है। सामाजिक जीवन, पारिवारिक जीवन अथवा परोपकार, मानवतावाद, राष्ट्रवाद, समाजवाद, साम्यवाद आदि बृहद् पारिवारिक जीवनों के भावों से होने वाले रस इस बात की गारण्टी नहीं दे सकते कि हमारा अगला जन्म भी मनुष्य के रूप में ही होगा। इस जीवन में अपनी वास्तविक क्रियाओं के द्वारा हम अपने अगले जीवन की रचना कर रहे हैं। जीवात्मा अपनी देह में जो काम करता है उसी के फलस्वरूप उसे अगले जन्म में देह की प्राप्ति होती है। इन सब क्रियाओं का लेखा-जोखा दैव के हाथ में है। भगवद्गीता में इस दैव को सबका प्रधान कारण बतलाया गया है। श्रीमद्भागवत में भी उल्लेख है कि पुनर्जन्म में नई देह की प्राप्ति 'दैवनेत्रेण' अर्थात् भगवान् के निर्देशानुसार होती है। साधारण अर्थ में दैव भाग्य को कहते हैं। दैव का विधान हमें चौरासी लाख योनियों में से उपयुक्त देह देता है। इसका चयन हमारी इच्छा के अनुसार नहीं, हमारे भाग्य के अनुसार होता है। यदि हमारी वर्तमान देह कृष्णभावनाभावित क्रियाओं में लगी हुई है तो इस बात की गारण्टी है कि अगले जन्म में हमें कम से कम मनुष्य की योनि तो अवश्य ही मिलेगी। यदि कोई कृष्णभावनाभावित क्रियाओं के परायण है तो यह निश्चित है कि भक्तियोग को पूर्ण न कर पाने की अवस्था में उसे मानव- समाज में उच्च वर्गों में जन्म की प्राप्ति होगी जिससे वह स्वतः कृष्ण- भावना में आगे उन्नति कर सके । अतएव कृष्णभावनाभावित सभी प्रामाणिक क्रियाएँ अमृत हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' का यही विषय है।
भूमिका [ ५ 'भक्तिरसामृतसिन्धु' के गम्भीर अध्ययन से भक्तिरस की इस शाश्वत् क्रिया को समझा जा सकता है। भक्तिरस अथवा कृष्णभावना को अंगीकार करना सब उपाधियों से मुक्त ऐसा सर्वमंगलमय दिव्य जीवन प्रदान करता है जिससे मुक्ति भी तुच्छ हो जाती है। भक्तिरस स्वयं मुक्ति देने में समर्थ है, क्योंकि यह साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण को भी आकृष्ट करने वाला है। सामान्यतः कनिष्ठ भक्त भगवान् अथवा श्रीकृष्ण को देखने को उत्कंठित रहते हैं; परन्तु वास्तव में हम उन्हें अपनी वर्तमान प्राकृत विकारमय कुण्ठित इन्द्रियों से नहीं देख सकते। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में वर्णित भक्तियोग की पद्धति साधक को शनै-शनैः देहात्मबुद्धि से मुक्त कर पराप्रकृति में स्थित कर देगी। इस अवस्था में भक्त सब उपाधियों से मुक्त हो जाता है। तब सब दोषों से मुक्त हुई इन्द्रियाँ निरन्तर भक्तिरस के संयोग से निर्दोष हो जाती हैं। जब शुद्ध इन्द्रियों के द्वारा भगवान् की सेवा की जाती है तो भक्तिरसमय जीवन में स्थिति हो जाती है। इस दिव्य जीवन में श्रीकृष्ण की सन्तुष्टि के लिये किये कार्यों का नित्य निरन्तर आस्वादन हो सकता है। भक्तियोग में नियोजित होने पर सब प्रकार के रस शाश्वत् हो जाते हैं। प्रारम्भ में आचार्य के आश्रय में विधिभक्ति में शिक्षा दी जाती है। शनैः-शनैः साधक के उन्नति करने पर उसकी भक्ति श्रीकृष्ण में रागानुगा हो उठती है। जैसा इस ग्रंथ में वर्णन किया जायगा-रस बारह प्रकार के हैं। इनमें से पाँच प्रधान रसों में श्रीकृष्ण से अपने सम्बन्ध को फिर से स्थापित करके हम सच्चिदानन्द- मय जीवन को प्राप्त हो सकते हैं। जीवनदशा का यह प्रधान सिद्धान्त है कि हममें किसी न किसी से प्यार करने की सामान्य प्रवृत्ति रहती है। कोई भी किसी दूसरे को प्यार किये बिना जीवित नहीं रह सकता। यह प्रवृत्ति जीवमात्र में विद्यमान है। बाघ जैसे पशु में भी यह प्रेम करने की प्रवृत्ति अवश्य है, चाहे सुप्त अवस्था में ही क्यों न हो; मनुष्यों में तो यह है ही। परन्तु खोयी कड़ी यह है कि अपने प्रेम को हम कहाँ लगायें जिससे सब सुखी हो सकें। आजकल मानव-समाज अपने देश, परिवार अथवा स्वयं अपने से प्रेम करने की शिक्षा देता है; परन्तु इसकी जानकारी किसी को नहीं है कि इस प्रेम की प्रवृत्ति को कहाँ समर्पित किया जाये जिससे सबको सुख मिले। वह केन्द्र कृष्ण हैं और 'भक्तिरसामृतसिन्धु' अपने स्वरूपभूत कृष्णप्रेम को जगा कर उस अवस्था को प्राप्त हो जाने की शिक्षा देती है जिसमें शाश्वत् जीवन का आस्वादन किया जा सकता है।