भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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३७८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ १ पा. २ सू. २२

प्रकृतं च ब्रह्म 'यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतम्' (मु० २।२।५) इत्यादिना । अनन्तरं च 'हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्य- दात्मविदो विदुः' इति । कथं तज्ज्योतिषां ज्योतिरित्यत इदमुत्थितम्- 'न तत्र सूर्यो भाति' इति । यदप्युक्तं - सूर्यादीनां तेजसां भानप्रतिषेधस्तेजोधातावेवान्यस्मिन्नव- कल्पते सूर्ये इवेतरेषामिति । तन्न तु स एव तेजोधातुरन्यो न संभवतीत्युपपादितम् । ब्रह्मण्यपि चैषां भानप्रतिषेधोऽवकल्पते । यतः यदुपलभ्यते तत्सर्वं ब्रह्मणैव ज्योतिषो-

भामती

इत्यादावपि प्रकृते परस्मिन् प्रत्ययेऽर्थभेदेऽन्वाख्यायमाने प्रातिपदिकप्रकृत्यर्थस्य पूर्ववृत्तत्वमस्तीति । तेनेति तत्परामर्शान्न व्यभिचारः । तथा च सर्वनामश्रुतिरेव ब्रह्मोपस्थापयति । तेन भवतु नाम प्रकरणालिङ्गं बलीयः, श्रुतिस्तु लिङ्गाद् बलीयसीति । श्रौतमिह ब्रह्मैव गम्यत इति । अपि चापेक्षितानपेक्षिताभिधानयोर- पेक्षिताभिधानं युक्तं, दृष्टार्थत्वादित्याह ॐ अनन्तरं च हिरण्मये परे कोशे इति ॐ । अस्मिन् वाक्ये ज्योतिषां ज्योतिरित्युक्तं, तत्र कथं तज्ज्योतिषां ज्योतिरित्यपेक्षायामिदमुपतिष्ठते ॐ न तत्र सूर्य इति ॐ । स्वातन्त्र्येण तूच्यमानेऽनपेक्षितं स्याददृष्टार्थमिति ॐ ब्रह्मण्यपि चैषां भानप्रतिषेधोऽवकल्पत इति ॐ । अयमभिप्रायः-

भामती-व्याख्या

पड़ता ऐसा भाष्यकार कह रहे हैं- "तत्र शब्दमाहरन् प्रकृतग्रहणं दर्शयति, प्राकृतं च ब्रह्म" । यह 'तत्' शब्द सर्वत्र पूर्वोक्त का ही परामर्शक होता है, "तेन रक्तं रागात्" (पा० स० ४।२।१) इत्यादि स्थलों पर भी प्रकृति से पर-प्रयुक्त प्रत्यय के अर्थ-विशेष का अन्वाख्यान करते समय प्रातिपदिक रूप प्रकृति का अर्थ पूर्वोक्त है, अतः 'तेन' पद के द्वारा उसो रागादि का ग्रहण किया जाता है, अतः उक्त नियम में किसो प्रकार का व्यभिचार सम्भव नहीं। फलतः तदादि सर्वनाम शब्द ही ब्रह्म के उपस्थापक है। निरपेक्ष शब्द को ही श्रुति प्रमाण कहा जाता है। पहले यह समझा जाता था कि ब्रह्म का प्रकरण होने के कारण प्रकरण प्रमाण ब्रह्म का उपस्थापक है, किन्तु भान-अनुभानरूप शब्द-सामर्थ्यात्मक लिङ्ग प्रमाण से अलौकिक तेजोधातु की कल्पना की जाती है। प्रकरण प्रमाण से पूर्वभावी होने के कारण लिङ्ग प्रमाण प्रकरण का बाधक होता है, अतः अलौकिक तेजोऽन्तर धातु को ही जगत् का भासक मानना होगा । अब यह निष्कर्ष निकाला जा सका है कि प्रकृत में परमेश्वर का प्रापक प्रकरण प्रमाण नहीं, अपितु श्रुति प्रमाण है अर्थात् "तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्", "तस्य भासा सर्वमिदं विभाति"-इत्यादि वाक्यों में प्रयुक्त 'तम्' और 'तस्य' इत्यादि सर्वनाम शब्द ही परमेश्वर के बोधक हैं, निरपेक्ष शब्द ही श्रुतिप्रमाण कहे जाते हैं। अतः लिङ्ग प्रमाण प्रकरण से प्रबल होने पर भी श्रुति से दुर्बल है, अतः श्रुति प्रमाण-प्रापित ब्रह्म ही वह तेज है, जिसके प्रकाश से समस्त जगत् प्रकाशित है।

दूसरी बात यह भी है कि "न तत्र सूर्यो भाति" (मुण्ड० २।२।१०) इस वाक्य से पूर्व "हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कल, तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिः" (मुण्ड० २।२।९) इस वाक्य में जो ब्रह्म को ज्योतियों की ज्योति कहा गया है, उसमें आकाङ्क्षा होती है कि 'कथं ज्योतिषां ज्योतिर्ब्रह्म?' इस आकाङ्क्षा को शान्त करने के लिए "न तत्र सूर्यो भाति"- यह कहा गया है। अब यदि इस वाक्य के द्वारा अलौकिक तेजोधातु का अभिधान किया जाता है, तब वह पूर्व वाक्य में अपेक्षित या आकांक्षित नहीं और यदि ब्रह्म का प्रतिपादन किया जाता है, तब वह आकांक्षिताभिधान है। अपेक्षित (आकांक्षित) और अनपेक्षित (अनाकां- क्षित) में अपेक्षित का अभिधान न्यायोचित और दृष्टार्थक होने के कारण ग्राह्य है किन्तु अलौकिक तेजोधातु का अभिधान अदृष्टार्थक होने के कारण अग्राह्य है । "ब्रह्मण्यपि तेषां भान-