भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 468, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें४५० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. ४२
प्रतिपादनपरमिति संशयः । किं तावत्प्राप्तम् ? संसारिस्वरूपमात्रविषयमेवेति । कुतः ? उपक्रमोपसंहाराभ्याम् । उपक्रमे 'योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु' इति शारीरलिङ्गात् । उपसंहारे च 'स वा एष महानज योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु' (बृ० ४।४।२२) इति तदपरित्यागात्, मध्येऽपि बुद्धान्तावस्थोपन्यासेन तस्यैव प्रपञ्चनादिति ।
एवं प्राप्ते ब्रूमः, - परमेश्वरोपदेशपरमेवेदं वाक्यं न शारीरमात्रान्वाख्यानपरम् । कस्मात् ? सुषुप्त्युत्क्रान्तौ च शरीराद्भेदेन परमेश्वरस्य व्यपदेशात् सुषुप्तौ तावत् 'अयं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम्' (बृ० ४।३।२१) इति शारीराद्भेदेन परमेश्वरं व्यपदिशति । तत्र पुरुषः शारीरः स्यात्तस्य वेदितृत्वात् ।
भामती
शुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः प्रतिपाद्यः । यत्तु सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्त इति भेदं मन्यसे, नासौ भेदः, किन्त्वयमात्मशब्दः स्वभाववचनस्तेन सुषुप्त्युत्क्रान्त्यवस्थायां विशेषविषयाभावात्संविण्डितप्रज्ञेन प्राज्ञेनात्मना स्वभावेन परिष्वक्तो न किञ्चिद्वेदेत्यभेदेऽपि भेदवदुपचारेण योजनीयम् । यथाहुः- 'प्राज्ञः संपिण्डितप्रज्ञः' इति । पत्यादयश्च शब्दाः कार्यकारणसङ्घातात्मकस्य जगतो जीवकर्मार्जिततया तद्भोग्यतया च योजनीयाः तस्मात्संसार्यैवानूद्यते न तु परमात्मा प्रतिपाद्यत इति प्राप्तम् ।
एवं प्राप्त उच्यते 'सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन' व्यपदेशादित्यनुवर्त्तते । अयमभिसन्धिः - कि संसारिणोऽन्यः परमात्मा नास्ति, तस्मात् संसायर्त्मिपरं योऽयं विज्ञानमयः प्राणेष्विति वाक्यम् ? आहोस्विदिह संसारिव्यतिरेकेण परमात्मनोऽसङ्कीर्त्तनात्संसारिणश्चादिमध्यावसानेष्वमर्शात्संसार्याह्यमपरं ? न तावत्संसार्यति-
भामती-व्याख्या
आरम्भ में पठित 'विज्ञानमय' शब्द, मध्य में स्वप्नावस्था का वर्णन एवं महानजः का निर्देश—यह सब कुछ जीव में ही घटता है, क्योंकि संसारी आत्मा ही अहङ्कारास्पद और प्राणादि से युक्त लोक-प्रसिद्ध है। "योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु"—यह वाक्य उसी संसारी का अनुवादमात्र करता है। वही संसारी आत्मा जड़वर्ग की अपेक्षा महान् एवं संसार के अनादि होने के कारण जीवात्मा भी अनादि और अज है, उससे भिन्न कोई नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्तस्वरूप तत्त्व यहाँ प्रतिपाद्य नहीं हो सकता। यह जो सुषुप्ति और उत्क्रान्ति अवस्था में प्राज्ञात्मा से सम्परिष्वक्त (युक्त) कहा गया है, वह उससे भिन्न माना जाता है, वह उचित नहीं, क्योंकि वहाँ 'आत्मा' शब्द स्वभाव का वाचक है। इस प्रकार सुषुप्ति और उत्क्रान्ति की अवस्था में विशेष विषय न रहने के कारण यह जीव घनीभूत प्रज्ञावाले आत्मा (स्वभाव) से युक्त अत एव किञ्चिज्ज्ञ होता है। जीव और उसके स्वभाव का भेद न होने पर भी भेद-जैसा औपचारिक व्यवहार हो जाता है, जैसा कि कहा गया है—"प्राज्ञः सम्पिण्डितप्रज्ञ"। पत्यादि शब्द भी कार्यकारण-संघातात्मक संसारी में ही घट जाते हैं, क्योंकि जीव के कर्मों-द्वारा अर्जित होने के कारण जगत् जीव का भोग्य और जीव उसका पति या भोक्ता होता है। फलतः उक्त वाक्य के द्वारा संसारी आत्मा का ही अनुवाद किया जाता है, परमात्मा का प्रतिपादन नहीं।
सिद्धान्त—पूर्व सूत्र से 'व्यपदेशात्' पद की अनुवृत्ति करके "सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन व्यपदेशात्"—ऐसा महावाक्य सम्पन्न होता है। आशय यह है कि क्या संसारी से भिन्न परमात्मा नहीं है, जिससे कि "योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु"—यह वाक्य जीवपरक माना जाता है? अथवा यहाँ (प्रकृत में) परमात्मा का संकीर्तन न होने एवं संसारी आत्मा का ही उपक्रम, अभ्यास और उपसंहार में उल्लेख होने के कारण उक्त वाक्य संसारी आत्मा