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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

॥ श्रीः ॥ काशी संस्कृत ग्रन्थमाला १३० श्रीमद्भावमिश्रप्रणीतः भावप्रकाशः (भावप्रकाशनिघण्टु युक्त) सविवरण 'विद्योतिनी' हिन्दीव्याख्यापरिशिष्टसहितः व्याख्याकारः भिषग्रत्न श्री ब्रह्मशङ्कर मिश्र विवरणकारः वनस्पतिविशेषज्ञ : श्री रूपलालजी वैश्यः प्रथम भाग (पूर्वार्द्ध) चौखम्भा संस्कृत भवन वाराणसी - २२१००१ (भारत)

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THE KASHI SANSKRIT SERIES 130 BHĀVAPRAKĀŚA OF ŚRĪBHĀVA MIŚRA (including BHĀVAPRAKĀŚA NIGHANṬU Protion) Edited with the ‘Vidyotinī’ Hindī Commentary Notes and Appendix By ŚRĪ BRAHMAŚAṄKARA MIŚRA and ŚRĪ RŪPALĀLAJĪ VAIŚYA (Specialist in Botany) FIRST PART चौखम्भा संस्कृत भवन • चौक, वाराणसी • तमसो मा ज्योतिर्गमय CHAUKHAMBHA SANSKRIT BHAWAN VARANASI-221001 (INDIA) CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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प्राक्कथन ग्रन्थ-प्रयोजन इस लोक में धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस पुरुषार्थचतुष्टय की प्राप्ति शरीर के द्वारा ही होती है। अतः शरीर को निरन्तर स्वस्थ रखना मानव का प्रथम कर्तव्य होता है। कहा भी है— धर्मार्थकाममोक्षाणां मूलमुक्तं कलेवरम्। तच्च सर्वार्थसंसिद्ध्यै भवेद्यदि निरामयम्।। शरीर को स्वस्थ रखने के लिये आयुर्वेद का ज्ञान परमावश्यक है। आयुर्वेद के द्वारा आयु के लिए हिताहित द्रव्यों का ज्ञान, रोगों का निदान तथा रोगों को दूर करने का ज्ञान प्राप्त होता है। कहा भी है— आयुर्हिताहितं व्याघेर्निदानं शमनं तथा। विद्यते यत्र विद्वद्भिः स आयुर्वेद उच्यते।। आयुर्वेद की उत्पत्ति आधुनिक काल के उपलब्ध मान्य ग्रन्थों के आधार पर यदि आयुर्वेद के उत्पत्तिकाल का निर्णय किया जाय तो आयुर्वेद को अनादि अपौरुषेय कहना ही उचित होगा। चरक ने भी कहा है— 'सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादित्वात्, स्वभावसंसिद्धलक्षणत्वात्।' ब्रह्मा ने विश्वसृजन में प्राणियों की उत्पत्ति के पूर्व ही आयुर्वेद की रचना की। 'अनुत्पाद्यैव प्रजा आयुर्वेदमेवाऽग्रेऽसृजत्' (सुश्रुत) सृष्टि से पूर्व आयुर्वेद की रचना का उसी प्रकार संभव है जिस प्रकार शिशु की उत्पत्ति के पूर्वस्तन्य की उत्पत्ति हो जाती है। 'बालस्योत्पत्तेः पूर्वं स्तन्योद्गमनमिव सृष्टेः प्रथमत आयुर्विज्ञानं स्वरतोऽपि सम्भाति।' (काश्यपसंहिता) आयुर्वेद का विकास आयुर्वेदोत्पत्ति के पश्चात् ब्रह्मा ने पार्थिवसृष्टि करने के साथ ही साथ प्राणियों को विविध रोगों से बचाने के लिए दक्षप्रजापति को सर्वप्रथम आयुर्वेद का उपदेश दिया। तदनन्तर दक्षप्रजापति ने अश्विनीकुमारों को आयुर्वेद का सांगोपांग ज्ञान इस रूप से कराया कि अश्विनीकुमारों ने अपने नाम पर एक संहिता का निर्माण ही कर डाला, जिसे देखकर देवराज इन्द्र भी मुग्ध हो उठे और उन्होंने स्वयं अश्विनीकुमारों से आयुर्वेद का अध्ययन किया। इन्द्र से महर्षि आत्रेय और आत्रेय से अग्निवेश, भेल, जतुकर्ण, पराशर, क्षारपाणि तथा हारीत नामक ऋषियों ने आयुर्वेद की शिक्षा ग्रहण की और उन्होंने आयुर्वेद में पारंगत होकर अपने-अपने नाम से पृथक्-पृथक् विविध ग्रन्थों की रचना भी की। उपलब्ध विभिन्न संहिता ग्रन्थों में कुछ हेर-फेर के साथ प्रायः यही अवतरणक्रम निर्दिष्ट किया गया है। शल्यकर्म प्रधान ग्रन्थों में केवल सुश्रुतसंहिता तथा कायचिकित्सा के ग्रन्थों में चरकसंहिता, हारीतसंहिता एवं खण्डित रूप में भेलसंहिता और बालतन्त्र का विशेष तन्त्र 'काश्यपसंहिता या वृद्धजीवकीय तन्त्र उपलब्ध हैं। वास्तव में इनमें अधिकांश मौलिक न होकर प्रतिसंस्कृत एवं उत्तरकालीन भावों से प्रभावित हैं। अग्निवेश तन्त्र अब चरक प्रतिसंस्कृत रूप में—चरकसंहिता के रूप में—अधिक प्रसिद्ध है। आचार्य चरक के पश्चात् महर्षि सुश्रुत का काल है। सुश्रुत विश्वामित्र के पुत्र थे। उन्होंने काशिराज दिवोदास, जो धन्वन्तरि के अवतार माने जाते थे, उनसे आयुर्वेद का अध्ययन कर 'सुश्रुत' नामक ग्रन्थ की रचना की। सुश्रुत ने अपने ग्रन्थ में शल्य-शालाक्य की चिकित्सा पर विशेष ध्यान दिया है। अतः सुश्रुत ग्रन्थ शल्य शालाक्य चिकित्सा के लिए अधिक प्रसिद्ध है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे आचार्य चरक और सुश्रुत के पश्चात् वाग्भट का काल प्रारम्भ हुआ। महाभारत के समय में आचार्य वाग्भट युधिष्ठिर के प्रधान चिकित्सक थे, ऐसा कुछ लोगों का कहना है। उस समय वाग्भट ने चरक और सुश्रुत के रचित ग्रन्थों के आधार पर 'अष्टांगहृदय' नामक ग्रन्थ रचा। 'अष्टांगहृदय' की महत्ता सूत्रों के लिए अधिक है। अतः समकक्ष होने से चरक, सुश्रुत और वाग्भट ये तीनों 'वृद्धत्रयी' कहे जाते हैं। वाग्भट के पश्चात् उत्तरोत्तर माधवाचार्य, भावमिश्र (प्रस्तुत ग्रन्थकार), शार्ङ्गधर आदि आचार्यों का काल हुआ। आचार्य भावमिश्र भावमिश्र काशी के निवासी थे। आपके पिता का नाम लटकन मिश्र था। सन् १५५० ई. के लगभग में पुर्तगीजों के भारतवर्ष में पदार्पण करने के बाद आपने चिकित्सा सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण प्रस्तुत भावप्रकाश ग्रन्थ का निर्माण किया। इसमें आपने फिरंग आदि नवीन व्याधियों का विस्तृत वर्णन करके उसकी आयुर्वेदिक चिकित्सा में उस युग के प्रचलित ओषधि चीनी मूल को चोपचीनी के नाम से व्यवहृत किया है। किं बहुना, अभी तक प्राचीन ग्रन्थों में जिन द्रव्यों का वर्णन नहीं पाया जाता था, उनका भी आपने शास्त्रीय नाम देकर वैद्यक चिकित्सा में बरतने का महत्त्वपूर्ण प्रथम प्रयास किया है, जिससे आयुर्वेद में आपका एक बहुत बड़ा प्रमुख स्थान है। कई ओषधियों का जैसे—वदक्शानी नास्पाती, खोरा सानी और पारसीक वचा, सुलेमानी, खजूर, अहिफेन और कपूर आदि का आपने इस ग्रन्थ में नया योग दिया है। पञ्चम संस्करण इस संस्करण का सम्पादन तथा परिष्कार डॉ. गंगासहाय पाण्डेय ए. एम. एस., भूतपूर्व अध्यापक—काशी हिन्दूविश्वविद्यालय ने अधिक परिश्रम और मनोयोग से किया है। पाण्डेय जी की लौहलेखनी से इस बार तो निघण्टु भाग का कलेवर ही बदल गया है। अल्प मूल्य में निघण्टु भाग छात्रों को सुलभ हो इस उद्देश्य से निघण्टु भाग का पृथक् संस्करण भी निकाला गया है। निघण्टु भाग की विशेषता प्रस्तुत संस्करण में विमर्श का आद्योन्त परिष्कार, अद्यतन वनौषधि अनुसंधान साहित्य का अन्तर्भाव एवं प्रत्येक वनस्पति का यथाशक्ति असंदिग्ध परिचय देने की चेष्टा की गई है। उन वनस्पतियों के शास्त्रोक्त विशिष्ट आमयिक प्रयोगों का भी यथास्थल उल्लेख किया गया है। संस्कृत के मूल श्लोकों का हिन्दी अनुवाद, भेषज द्रव्यों के भिन्न भारतीय भाषाओं में प्रचलित सही नाम, उनके अंग्रेजी व लैटिन के स्वीकृत नाम, वनस्पतियों के उत्पत्ति स्थान, उनका विशिष्ट परिचय, रासायनिक संगठन आदि का यथाशक्ति सही सही वर्णन दिया गया है। संदिग्ध एवं विवादास्पद स्थलों में विभिन्न विद्वानों के विचार एवं मतभेद के आधार के उल्लेख की चेष्टा की गई है। आशा है विद्वान् वैद्य, चिकित्सक, अध्यापक तथा छात्रों को इस संस्करण से विशेष लाभ होगा। —ब्रह्मशङ्कर शास्त्री

भावप्रकाशनिघण्टु साङ्केतिक-विवरण

अं० \t अंग्रेजी \t पहा० \t पहाड़ी अ० \t अरबी \t पाठा० \t पाठान्तर अफ० \t अफगानी \t फा० \t फारसी आसा० \t आसामी \t बं० \t बंगाली इरा० \t ईरानी \t बंब० \t बम्बई उ० (डि) \t उडिया \t भोटि० \t भोटिया उ० प्र० \t उत्तर प्रदेश \t म० \t मराठी क० \t कर्नाटक \t मल० \t मलयालम क० अ० \t कल्पस्थान अध्याय \t मा० \t मारवाड़ी काश्मी० \t काश्मीर \t मि० ग्रा० \t मिली ग्राम काठी० \t काठियावाड \t मि० मी० \t मिलीमीटर कुमा० \t कुमाऊँ \t मुंगे० \t मुंगेर कों० \t कोंकणी \t यू० \t यूनानी खासि० \t खासिया \t र० \t रत्ती गढ० \t गढवाल \t रा० नि० \t राजनिघण्टु गु० \t गुजराती \t रा० पु० \t राजपुताना गो० \t गोवा \t लि० \t लिपचा ग्रा० \t ग्राम \t ले० \t लेटिन च० \t चरक \t सं० \t संस्कृत चि० \t चिकित्सास्थान \t सन्ता० \t सन्ताल ता० \t तमिल \t सिं० \t सिन्धी तु० \t तुलु \t सिलो० \t सिलोनी ते० \t तेलगु \t सु० \t सुश्रुत द० \t दक्षिण \t सू० \t सूत्रस्थान ध० नि० \t धन्वन्तरीय निघण्टु \t हि० \t हिन्दी ने० \t नेपाली \t Fam. \t Family पं० \t पंजाबी \t Syn. \t Synonym (पर्याय)

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संक्षिप्त विषयसूची

भाव प्रकाश:

प्रथम भाग

पृष्ठ १. आयुर्वेदप्रवक्तृप्रादुर्भाव प्रकरण १-९ आयुर्वेद की निरुक्ति तथा प्रादुर्भाव । २. सृष्टि प्रकरण १०-१९ सृष्टिक्रम, प्रकृतिस्वरूपनिर्णय, प्रकृति-पुरुष का साधर्म्य—वैधर्म्य, सात्त्विक—राजस—तामस—प्रकृति के लक्षण, सप्तविध प्रकृतिस्वरूप निरूपण । ३. गर्भ प्रकरण २०-९६ रजस्वला का स्वरूप, नियम तथा कर्तव्याकर्तव्य । गर्भावतरणक्रम । गर्भस्थ स्त्री, पुरुष वा नपुंसक सन्तान के लक्षण, निदान तथा वातादि दोषत्रय का स्वरूपनिरूपण एवं गर्भस्थ सन्तान के रस-रक्त-मांस-मेदादि के वृद्धिक्रम तथा लक्षण आदि का विशद वर्णन, प्रसवमास की संख्या, सूतिकागृहनिर्माणप्रकार तथा आसन्नप्रसवा का लक्षण । ४. बाल प्रकरण ९७-१०८ सन्तानोत्पत्त्यनन्तर कर्तव्य, धातृस्वरूप वर्णन, शिशुपरिचर्या, वातादिप्रकृतिक शिशुलक्षण । ५. दिनचर्यादि प्रकरण १०९-१६२ आनूपादि देशनिरूपण, दिनचर्या, रात्रिचर्या तथा वसन्तादि षट् ऋतुओं का वर्णन । ६. मिश्र प्रकरण १६३-२०४ रोग की साध्यासाध्यता, चिकित्सा, रोगी, वैद्य तथा दूत के लक्षण, आयु-विचार, दीर्घायु स्वल्पायु रोगी के लक्षण तथा औषध-परीक्षादि ।

निघण्टुभाग पृष्ठ | पृष्ठ हरीतक्यादिवर्गः २०८ | वारिवर्गः ८९५ कर्पूरादिवर्गः ३६२ | दुग्धवर्गः ९०६ गुडूच्यादिवर्गः ४४८ | दधिवर्गः ९१४ पुष्पवर्गः ६४० | तक्रवर्गः ९१८ वटादिवर्गः ६७२ | नवनीतवर्गः ९२१ आम्रादिफलवर्गः ७०८ | घृतवर्गः ९२२ धातूपधातु-रसोपरस-रत्नोपरत्न विषोपविषवर्गः ७५७ | मूत्रवर्गः ९२५ धान्यवर्गः ७८९ | तैलवर्गः ९२६ शाकवर्गः ८१५ | सन्धानवर्गः ९३० मांसवर्गः ८५५ | मधुवर्गः ९३५ कृतान्नवर्गः ८७३ | इक्षुवर्गः ९३९ अनेकार्थनामवर्गः ९४५

भावप्रकाशः द्वितीयभाग (७) मानपरिभाषादिप्रकरण

पृष्ठ | परिशिष्ट मानपरिभाषा ९५५ | पृष्ठ भेषजविधानप्रकरणम् ९५९ | अस्थियों के विषय में संक्षिप्त विवरण १०८३ धात्वादिशोधन-मारणविधिः ९७० | अकारादिक्रमानुसार निघण्टुभाग-स्थित द्रव्यों के व्यवहारोपयोगी स्नेहपानविधिः १००२ | अङ्ग तथा उनकी मात्राएँ ११०१ पञ्चकर्मविधिः १००७ | धूमपानादिविधिः १०३४ | रोगि-परीक्षा १०६३ |

विषय-सूची

१. आयुर्वेदप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरण | पृष्ठ पृष्ठ | रजस्वला स्त्रियों के नियम २० आयुर्वेद का लक्षण १ | रजस्वला के नियम पालन नहीं करने पर दोष २१ आयुर्वेद की निरुक्ति १ | स्नानोत्तर रजस्वला स्त्री का कर्तव्य २१ आयुर्वेद का उत्पत्ति क्रम २ | रजस्वला के साथ सम्भोग निषेध २१ २. सृष्टिप्रकरणम् | स्त्री योनि की नाड़ियाँ और उसकी विशेषता २२ | सम-विषम रात्रियों में स्त्री संभोग करने का फल २२ ग्रन्थोपक्रम १० | पुरुष के लिए स्त्री सम्भोग का विधान २३ प्रकृति के स्वरूपविशेष ११ | स्त्री सम्भोग में अयोग्य पुरुष २३ प्रकृति-पुरुष के समान धर्म ११ | स्त्री के लिये पुरुष सम्भोग का विधान २३ प्रकृति-पुरुष के विभिन्न धर्म ११ | सम्भोग के अयोग्य स्त्री २३ प्रकृति के नाम तथा गुण १२ | रजस्वला के साथ सम्भोग निषेध २३ सत्त्वगुण से युक्त मन के लक्षण १२ | गर्भस्थिति का क्रम २३ रजोगुण से युक्त मन के लक्षण १३ | गर्भाशय के स्वरूप २४ तमोगुण से युक्त मन १३ | गर्भ में जीव के प्रवेश करने का प्रकार २५ महत्तत्व की उत्पत्ति १३ | गर्भाशय का द्वार बन्द होने का समय २५ अहङ्कार की उत्पत्ति और भेद १४ | यमज सन्तान उत्पन्न होने का कारण २५ त्रिविध अहङ्कार के कार्य १४ | पुत्र, पुत्री और नपुंसक सन्तान होने के कारण २६ बुद्धि और कर्मेन्द्रिय से मन की अभिन्नता १४ | सद्यः गर्भवती हुई स्त्री के लक्षण २७ बुद्धीन्द्रियों के विषय १५ | गर्भवती स्त्रियों के लक्षण २७ कर्मेन्द्रिय और मन के विषय १५ | पुत्र गर्भवती स्त्रियों के लक्षण २७ पंचतन्मात्रों की उत्पत्ति के विषय १५ | कन्या गर्भवती स्त्रियों के लक्षण २८ पंचमहाभूतों की उत्पत्ति १६ | नपुंसक गर्भ के लक्षण २८ आकाश के गुण १६ | नपुंसकों के भेद तथा लक्षण २८ वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी के गुण १६ | अनस्थि सन्तानोत्पत्ति के लक्षण ३० आठ प्रकृतियों में पहिली प्रकृति १७ | सन्तानों में चेष्टादिभेद के कारण ३१ सप्त प्रकृतियाँ १७ | गर्भ के लक्षण ३१ सोलह विकार १८ | हृदय के स्वरूप ३२ जीवात्मा के निवासस्थान १८ | शरीरस्थ दोषों का स्वरूप ३४ जीवात्मा और शरीरी १८ | दोष शब्द की निरुक्ति ३४ जीवविषयक गुण १९ | त्रिदोषों में वायु के स्वरूप ३५ ३. गर्भप्रकरणम् | उदानादि वायुओं के नाम, स्थान तथा कर्म ३६ रजस्वला स्त्री के स्वरूप २० | पित्त के स्वरूप ३७ गर्भग्रहण के योग्य समय २० | CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

१२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पृष्ठ | पृष्ठ पित्तों के नाम ३७ | शुक्र के स्वरूप ६२ पाचकादि पित्तों के स्थान तथा कर्म ३७ | जीव का आश्रय ६२ श्लेष्मा (कफ) का स्वरूप ४१ | गर्भ उत्पन्न करने वाले शुक्र के लक्षण ६२ क्लेदनादि कफों के स्थान ४१ | शुक्र के स्थान ६२ अवलम्बन, रसक, स्नेहन तथा श्लेषण नामक | शुक्र के निकलने के मार्ग ६३ कफों के कर्म ४२ | शुक्र के क्षरण होने में कारण ६३ धातु शब्द की निरुक्ति ४३ | आर्तव के स्वरूप ६३ धातुओं के कार्य ४३ | गर्भग्रहण के योग्य आर्तव ६४ रस धातु की निरुक्ति ४३ | धातुगुण-वर्णन ६४ रस के स्वरूप ४३ | धातुओं के मल ६४ रस के स्थान और कर्म ४४ | उपधातु का लक्षण ६५ रक्त के स्वरूप ४४ | आशय के लक्षण ६५ रक्त के स्थान ४५ | वाग्भटोक्त आशयों का क्रम ६५ मांस के स्वरूप ४५ | कलाओं के स्वरूप ६६ मांसपेशियों की संख्यायें ४५ | मर्मस्थल के लक्षण ६६ मांसपेशियों के कर्म ४७ | मर्मों की संख्या तथा स्थान ६६ मेद का स्वरूप और स्थान ४७ | मर्मों के कार्य ६६ हड्डियों के स्वरूप और संख्याएँ ४८ | सद्यःप्राणहरण करने वाले मर्मस्थल ६७ हड्डियों के प्रयोजन ४९ | शृङ्गाटक मर्म ६७ मज्जा के स्वरूप और स्थान ५० | अधिपति मर्म ६७ शुक्र की उत्पत्ति ५० | कण्ठशिरा या शिरामातृका मर्म ६७ आमाशय का स्थान ५१ | गुदमर्म ६७ कफ का स्वरूप ५१ | हृदय मर्म ६७ ग्रहणी का लक्षण ५२ | बस्ति मर्म ६८ पंचमहाभूतों में चरकोक्त पञ्चाग्नि का निर्देश ५३ | नाभि मर्म ६८ आहार से रसादि का निर्माण ५३ | कालान्तर में प्राणहरण करने वाले मर्म ६८ मूत्र और पुरीषोत्सर्ग में कारण ५४ | वक्षो मर्म ६८ आहार रस का कार्य ५४ | स्तनरोहित मर्म ६८ ओज के लक्षण ५८ | अपलाप मर्म ६८ स्त्रियों का वीर्य विकृत गर्भ में कारण ५९ | अपस्तम्भ मर्म ६८ शरीर में आहार-रस का सञ्चार ६० | सीमन्त मर्म ६९ वाजीकरण ओषधियों का प्रयोजन ६० | तल मर्म ६९ शुक्रवर्धक पदार्थ ६१ | क्षिप्र मर्म ६९ बालकों के अदृश्य शुक्र में कारण ६१ | इन्द्रबस्ति मर्म ६९ वृद्धावस्था में शुक्रवृद्धि का ह्रास ६२ | बृहती मर्म ६९ पार्श्वसन्धि मर्म ६९ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

विषय-सूची १३ पृष्ठ | पृष्ठ कटीकतरुण मर्म ७० | कण्डराओं के स्वरूप और स्थान ८३ नितम्ब मर्म ७० | रन्ध्रों की संख्या और स्थान ८३ विकलता करने वाले मर्मस्थल ७० | स्रोतों के लक्षण ८४ लोहिताक्ष मर्म ७० | जालों के लक्षण और संख्या ८४ आणि मर्म ७० | कूर्चों के लक्षण और संख्या ८४ जानु मर्म ७१ | रज्जुओँ के लक्षण और संख्या ८५ ऊर्वी मर्म ७१ | सेवनियों के लक्षण और संख्या ८५ कूर्च मर्म ७१ | सङ्घातों की संख्या ८५ विटप मर्म ७१ | सीमन्तों के लक्षण और संख्या ८५ कूर्परमर्म ७१ | त्वचाओं के लक्षण और संख्या ८५ कुकुन्दर मर्म ७१ | रोम तथा रोमकूप ८७ कक्षधर मर्म ७१ | प्रत्येक मास में गर्भ की अवस्था ८७ विधुर मर्म ७१ | गर्भिणी की इच्छा विशेष ८९ कृकाटिका मर्म ७२ | गर्भ में अङ्गोत्पत्ति ९० अंस मर्म ७२ | पितृज-मातृज शरीराकृति ९१ अंसफलक मर्म ७२ | गर्भ के विशेष उपकारक ९१ अपाङ्ग मर्म ७२ | गर्भ के जीवित रहने के हेतु ९२ नीला और मन्या मर्म ७२ | दृष्टिमण्डल तथा रोमकूपों की वृद्धि निषेध ९३ फण मर्म ७२ | नख और केशों की वृद्धि में हेतु ९३ आवर्त्त मर्म ७३ | शरीर में चेतन तथा अचेतन अङ्ग ९३ गुल्फ मर्म ७३ | गर्भ में मलादि त्याग न करने में कारण ९३ मणिबन्ध मर्म ७३ | गर्भस्थ सन्तान के रोदन न करने के कारण ९४ कूर्चशिरा मर्म ७३ | गर्भवती स्त्रियों के कर्म ९४ विशल्यघ्न मर्म ७३ | गर्भिणी के न करने योग्य कर्म ९४ उत्क्षेप मर्म ७३ | प्रसव का समय ९५ स्थपनी मर्म ७४ | प्रसूतिकार्गृह का स्वरूप ९५ सन्धियों के लक्षण तथा संख्या ७४ | आसन्नप्रसवा के लक्षण ९५ कोष्ठगत सन्धियाँ ७५ | आसन्नप्रसवा स्त्री के उपचार ९५ ग्रीवा तथा उसके ऊपर की सन्धियाँ ७५ | आसन्नप्रसवा की परिचारिका ९६ आठ प्रकार की सन्धियाँ ७५ | जनयित्री स्त्रियों के करने योग्य कर्म ९६ शिराओं का वर्णन ७६ | प्रसवव्यथा से रहित गर्भिणी के कांखने से वैगुण्य ९६ शिराओं के भेद ७७ | ४. बालप्रकरणम् स्नायु के स्वरूप तथा संख्या ७९ | बालक के जन्म होने के बाद की विधि ९७ धमनियों की संख्या और स्थान ८० | प्रसूता स्त्री के नियम ९७ | प्रसूता स्त्री के नियम पालन का समय ९७

१४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पृष्ठ पृष्ठ दूध का स्वरूप ९७ अधोवायु रोकने से हानि १११ स्तनों से दूध उतरने का समय ९८ मूत्र के वेग को रोकने से हानि १११ दूध निकलने के कारण ९८ दातौन करने की विधि ११२ दूध के कम निकलने के कारण ९८ जीभ सफा करने की विधि ११३ दूध के बढ़ने के कारण ९८ कुल्ला करने की विधि ११४ कलम नामक धान्यविशेष का लक्षण ९८ नस्य लेने की विधि ११४ दूध के दूषित होने के कारण ९९ अंजन लगाने की विधि ११४ दूषित दूध के लक्षण ९९ अंजन लगाने के अयोग्य व्यक्ति ११५ दूषित दुग्ध की शोधन विधि ९९ नाखून कटाने और बाल बनवाने की विधि ११५ शुद्ध दूध के लक्षण ९९ नाक के बाल उखाड़ने में दोष ११५ धात्री के लक्षण १०० बालों में कंघी लगाने के गुण ११५ दूध पिलाने के अयोग्य धात्री के लक्षण १०० दर्पण में मुख देखने के गुण ११५ बालकों को दूध पिलाने की विधि १०० व्यायाम के गुण ११६ अविधि स्तनपान कराने का दोष १०१ बलार्ध का लक्षण ११६ स्तन्य के अभाव में गो अथवा बकरी के दुग्ध १०१ व्यायाम करने के अयोग्य व्यक्ति ११६ अन्नप्राशन का समय १०१ अत्यन्त व्यायाम करने से दोष ११६ बालक की परिचर्या १०१ तेल लगाने के गुण ११६ बालकों के लिये हितकर १०२ सर्वाङ्ग में तेल लगाने के गुण ११७ बालकों के कवलादि करने का समय १०२ शिर में तेल लगाने के गुण ११७ बाल्यादि अवस्थाओं की सीमा १०२ कानों में तेल डालने के गुण ११७ प्रकृतियों के लक्षण १०४ कान में तेल डालने का समय ११७ वात-पित्त-कफ प्रकृति के लक्षण १०४ पैरों में तेल लगाने के गुण ११७ द्वन्द्वज तथा त्रिदोषज प्रकृति के लक्षण १०५ शरीर में तेल लगाकर स्नान के गुण ११८ वाग्भटोक्त वात-पित्त-कफ प्रकृति के लक्षण १०५ अभ्यङ्ग के अयोग्य जन ११८ ५. दिनचर्यादिप्रकरणम् उबटन लगाने के गुण ११८ देशों के भेद १०९ स्नान की विधि ११८ अनूपदेश के लक्षण १०९ आँवला मिश्रित जल के गुण ११९ जांगल देश के लक्षण १०९ स्नान करने के अयोग्य जन ११९ साधारण देश के लक्षण १०९ स्नानोत्तर देह पोंछने के गुण ११९ दिनादिचर्या ११० वस्त्रधारण करने का विधान ११९ स्वस्थ पुरुष का लक्षण ११० ग्रीष्म ऋतु में वस्त्र धारण विधान १२० दिनचर्या-विधि ११० वर्षारितु में वस्त्रधारण विधान १२० पुरीषोत्सर्ग के वेग को रोकने से हानि १११ नवीन वस्त्रधारण करने के गुण १२० मलिन वस्त्रधारण करने के दोष १२० CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

विषय-सूची १५ पृष्ठ | पृष्ठ शीतकाल में प्रलेप के योग्य द्रव्य १२० | गुरु अन्न का भोजन निषेध १२८ उष्ण काल में प्रलेप के योग्य द्रव्य १२० | छः प्रकार का आहार १२८ वर्षाकाल में प्रलेप के योग्य द्रव्य १२१ | स्वभाव और संस्कार से गुरु तथा स्वभाव से प्रलेप के गुण १२१ | लघु भोज्य पदार्थों के परिमाण १२९ सुगन्धित पुष्प तथा पत्र धारण के गुण १२१ | शुष्कादि द्रव्यों के भोजन से दोष १३० भूषण धारण करने के गुण १२१ | सत्तू खाने की विधि १३० रत्नों के धारण करने के गुण १२१ | सत्तू खाने में वर्ज्य कर्म १३० सूर्यादि नवग्रहों को प्रसन्न करनेवाले रत्न १२२ | बहुत तथा कम भोजन करने के दोष १३१ सुन्दर वस्त्रादि धारण करने के गुण १२२ | असमय में भोजन करने के दोष १३१ सिद्ध मन्त्र, महौषधादि धारण के गुण १२२ | भोजन का समय व्यतीत होने पर भोजन करने भोजन समय मङ्गल वस्तु दर्शन के गुण १२२ | से दोष १३१ मङ्गलप्रद वस्तु १२२ | भोजन का प्रमाण १३१ खड़ाऊँ धारण करने के गुण १२२ | भोजन के बीच में थोड़ा-थोड़ा जलपान की विधि १३२ स्वाभाविक मानुषी इच्छा १२३ | भोजन के आरम्भ, मध्य अथवा अन्त में जल भोजन की इच्छा रोकने से हानि १२३ | पीने का फल १३२ प्यास रोकने से हानि १२३ | प्यासे के लिये भोजन और भूखे के लिये जलपान नींद रोकने से हानि १२३ | का निषेध १३२ भूख लगने पर भोजन न करने से हानि १२३ | भोजन के अन्त में दुग्धपान विधि १३२ भूख लगने पर भोजन करने का गुण १२३ | भोजनोपरान्त आचमन विधि १३४ भोजन का समय १२३ | भोजनोपरान्त कर्म १३५ प्रातःकालीन भोजन का समय १२४ | भोजनोपरान्त वातादि की वृद्धि १३५ भोजन का अनियमित समय १२४ | भोजनोपरान्त कफ वृद्धि का प्रतीकार १३६ आहार परिपाक के लक्षण १२४ | पान खाने का समय १३६ भोजन करने योग्य स्थान १२४ | पान के गुण १३६ भोजन के समय शुभाशुभ दृष्टि १२५ | सुपारी के गुण १३७ भोजन करने योग्य पात्र १२५ | खैर, चूना युक्त पान के गुण १३७ जलपात्र का विधान १२५ | पान के अग्र तथा मध्य भागों का परित्याग न भोजन के समय सबसे पहले भोज्य वस्तु १२६ | करने से दोष १३७ भोजन के समय ब्रह्मादि का स्मरण १२७ | पान के दो पीक थूकने के बाद खाने का विधान १३८ भोजन का क्रम १२७ | अधिक पान खाने से दोष १३८ स्वाद अन्न के लक्षण और गुण १२७ | पान खाने के अयोग्य पुरुष १३८ अत्यन्त गर्म, शीतल, सूखा और गीला | भोजन के बाद टहलने के गुण १३८ भोजन करने से दोष १२८ | भोजनोपरान्त शयन विधि १३८ अत्यन्त शीघ्रता तथा धीरे-धीरे अन्न | सर्वदा बायें करवट लेटने का विधान १३८ खाने के दोष १२८ | शय्या का विधान १३९

१६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पृष्ठ | पृष्ठ शय्या के विषय में अन्य मत १३९ | सन्ध्या काल के निषिद्ध कर्म १४८ शरीर दबवाने के गुण १३९ | रात्रि की चाँदनी, ओस और अन्धकार के गुण १४९ धीरे तथा जोरों से बहती हुई वायु सेवन के गुण १३९ | रात्रि भोजन का विधान १४९ पूर्वी वायु (पुरवइया हवा) के सेवन से गुण दोष १३९ | इच्छा होने पर मैथुन न करने से दोष १४९ दक्षिणी तथा पश्चिमी वायु सेवन के गुण-दोष १४० | स्त्रियों की बालादि अवस्था का विचार १४९ उत्तरी वायु के गुण-दोष १४० | बाला, तरुणी और प्रौढा स्त्री सेवन का समय १४९ आग्नेय, नैर्ऋत्य, वायव्य, ईशान तथा चौतरफा | सद्यः बल उत्पन्न करने वाले पदार्थ १५० बहने वाली वायु के गुण १४० | सद्यः बल को हरण करने वाले पदार्थ १५० पङ्खे की वायु के गुण १४० | तरुणी और वृद्धा स्त्रीसंभोग का फल १५० दिन में सोने का निषेध १४१ | नियम पूर्वक स्त्री संभोग के गुण १५० दिन में सोने योग्य जन १४१ | ऋतु भेद से स्त्री सेवन का प्रकार १५० शयन, मर्दन आदि का गुण १४१ | वसन्तादि ऋतुओं में स्त्रीसेवन के मध्यन्तर काल १५० उदर में अन्न के ठहरने के कारण १४१ | ऋतुभेद से स्त्रीसेवन के समय १५१ खाये हुए अन्न के उदर में न ठहरने के हेतु १४२ | स्त्रीसम्भोग का निषिद्ध समय १५१ भोजन के बाद परित्याग करने के योग्य अन्यान्य | स्त्रीसम्भोग करने योग्य स्थान १५१ कर्म १४२ | स्त्रीसम्भोग के अयोग्य स्थान १५१ अजीर्ण होने के कारण १४२ | स्त्रीसम्भोग करने के समय पुत्रार्थी पुरुषों का अध्यशन के लक्षण १४३ | वेषादि १५१ प्रातःकाल अजीर्ण मालूम पड़ने पर भोजन का | मैथुन करने के अयोग्य पुरुष १५१ उपयाय १४३ | मैथुन के योग्य स्त्री १५२ दिन में स्त्री सम्भोग का निषेध १४४ | मैथुन के अयोग्य स्त्री १५२ बैठे रहने, रास्ता चलने एवं धीरे-धीरे | रजस्वला स्त्री के साथ सम्भोग करने से दोष १५२ टहलने के गुण-दोष १४४ | संन्यासिनी आदि स्त्रियों के साथ संभोग करने में पगड़ी, मुरेठा आदि धारण करने के गुण-दोष १४४ | दोषान्तर १५२ जूता पहनने के गुण १४४ | गर्भिणी आदि स्त्रियों के साथ संभोग करने में जूता न पहने से अवगुण १४४ | दोषान्तर १५२ छाता तथा दण्ड धारण करने के गुण १४५ | भूखे प्यासे आदि होकर तथा मध्याह्न में स्त्री पालकी, नौका, हाथी और घोड़े की सवारी | संभोग करने से दोष १५३ करने के गुण १४५ | रुग्णावस्था या प्रातःकाल में स्त्रीसंभोग से दोष १५३ धूप तथा छाया सेवन के गुण १४५ | पशु आदि की योनि में मैथुन करने के दोष १५३ वर्षा तथा कुहेसा के सेवन के गुण १४५ | वेग रोकने से या विपरीत मैथुन करने से दोष १५४ अग्नि तथा धूप सेवन के गुण १४५ | स्खलित होते हुये शुक्र के रोकने का दोष १५४ सत्पुरुषों के आचरण १४६ | मैथुन करने के बाद हितकारक द्रव्य १५४ सन्ध्या समय में वर्ज्य कर्म १४८ | अत्यन्त मैथुन करने से होने वाले रोग १५४ चाँदनी, ओस और अन्धकार के गुण १४८ |

विषय-सूची १७ पृष्ठ | पृष्ठ रात्रि में सोने तथा जागने के गुण-दोष १५४ | चिकित्सा की विधि १६६ सुखपूर्वक नींद आने के लिये औषध १५४ | बिना समझे चिकित्सा करने में दोष १६७ उषाकाल (सूर्योदय के पूर्व) जल पीने के गुण १५४ | रोग तथा औषध दोनों का ज्ञान उषःकाल में नासिका से जल पीने के गुण १५५ | होने पर गुण १६७ नासाजलपान में जल का परिमाण १५५ | चिकित्सा करने की पद्धति १६८ नासा जलपान के विशेष गुण १५६ | अतिरिक्त तथा हीन चिकित्सा का निषेध १६९ नासा जलपान के अयोग्य जन १५६ | परस्पर भिन्न स्वरूपवाली चिकित्साओं ऋतुभेद और ऋतुचर्या १५६ | का एकत्र विधान १६९ दक्षिणायन तथा उत्तरायण के लक्षण और गुण १५७ | चिकित्सा करने से फल १७० ऋतुओं के गुण-दोष १५७ | धनियों से धन लेकर चिकित्सा का विधान १७० ऋतुभेद से दोषों के उपचयापचयादि १५७ | निःशुल्क चिकित्सा कराने में दोष १७० अकाल दोषों की वृद्धि १५९ | वैद्य की चिकित्सा वृद्धि का प्रसार १७० दोषों के चय होने के लक्षण १५९ | रोगी के लक्षण १७१ वर्षा ऋतु के नियम १६० | चिकित्स्य रोगी के लक्षण १७१ शरद् ऋतु के नियम १६० | अचिकित्स्य रोगी के लक्षण १७१ हेमन्त ऋतु के नियम १६१ | अचिकित्स्य रोगियों की चिकित्सा का निषेध १७२ शिशिर ऋतु के नियम १६१ | दूत के लक्षण १७२ वसन्त ऋतु के नियम १६२ | दूत के शकुन विचार १७३ ग्रीष्म ऋतु के नियम १६२ | चिकित्सक के लक्षण १७३ ऋतुचर्याओं का आचरण करने से लाभ १६२ | निषिद्ध वैद्य के लक्षण १७३ ६. मिश्रप्रकरण | वैद्य का कर्तव्य १७४ रोग के लक्षण १६३ | आगन्तुक हेतु १७५ चार प्रकार के रोग १६३ | रोगी के प्रथम आयु का विचार १७६ व्याधियों के भेद १६३ | दीर्घायु रोगी के लक्षण १७६ कर्मज व्याधि १६३ | स्वल्प आयुवाले रोगियों के लक्षण १७६ दोषज व्याधि १६४ | गतायु को ओषधि से लाभ नहीं होने के कारण १७९ कर्म तथा दोष दोनों से उत्पन्न व्याधि १६४ | चिकित्सा में द्रव्य की आवश्यकता १८१ कर्मजादि रोगों के क्षीण होने के कारण १६४ | रोगी की परिचर्या करने वाले (परिचारक) साध्यादि भेद से तीन प्रकार के रोग १६५ | का लक्षण १८१ याप्य के लक्षण १६५ | औषध के लक्षण १८१ साध्य-याप्य रोगों से युक्त रोगी की | औषध ग्रहण करने की परिभाषा १८१ आवश्यक चिकित्सा १६५ | औषधियों की परीक्षा १८४ उपद्रव के लक्षण १६५ | स्वभावतः हितकारक द्रव्य १८५ अरिष्ट के लक्षण १६५ | स्वभावतः अहितकर द्रव्य १८६ चिकित्सा के लक्षण १६५ | २ भाव.I

इस पृष्ठ पर छपा हुआ मूल पाठ (संस्कृत श्लोक, योग, रोग-वर्णन आदि) अत्यधिक धुंधला (faded/overexposed) होने के कारण पढ़ने योग्य नहीं है। केवल पृष्ठ के निचले भाग का कुछ अंश ही दिखाई दे रहा है:

... १. भाव ... CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भावप्रकाशनिघण्टु विषय-सूची हरीतक्यादिवर्ग | पृष्ठ | पृष्ठ हरीतकी के नाम और भेद | २०७ | मेथी तथा वनमेथी के नाम तथा गुण | २३९ हरीतकी के उत्पत्तिस्थान | २०८ | चनसूर के नाम तथा गुण | २४१ हरीतकी के लक्षण | २०८ | चतुर्बीज (चारदाना) के नाम तथा गुण | २४२ हरीतकी के प्रयोग | २०८ | हींग के नाम तथा गुण | २४२ हरीतकी के गुण और प्रभाव | २०९ | वच के नाम तथा गुण | २४४ हरड़ में रसों के रहने के स्थान | २१० | खुरासानी वच नाम तथा गुण | २४६ उत्तम हरड़ के लक्षण | २१० | महाभरी वच नाम तथा गुण | २४८ हरीतकी के प्रयोग भेद से गुण भेद | २१० | चोबचीनी के नाम तथा गुण | २४८ हरीतकी का रासायनिक प्रयोग | २१० | हपुषाद्वयम के नाम तथा गुण | २५० हरीतकी-सेवन करने के अयोग्य व्यक्ति | २११ | वायविडङ्ग के नाम तथा गुण | २५२ बहेड़े के नाम तथा गुण | २१३ | तुम्बुरु फल के नाम तथा गुण | २५६ आंवले के नाम तथा गुण | २१४ | वंशलोचन के नाम तथा गुण | २५८ त्रिफला के लक्षण नाम तथा गुण | २१६ | समुद्रफेन के नाम तथा गुण | २५९ सोंठ के नाम तथा गुण | २१६ | अष्टवर्ग के लक्षण तथा गुण | २६० अदरख के नाम तथा गुण | २१७ | जीवक तथा ऋषभक के उत्पत्ति-स्थान, लक्षण, | पीपर के नाम तथा गुण | २१८ | नाम तथा गुण | २६० मरिच के नाम तथा गुण | २२० | मेदा और महामेदा के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, | त्रिकटु के लक्षण, नाम तथा गुण | २२२ | नाम तथा गुण | २६१ पिपरामूल के नाम तथा गुण | २२२ | काकोली तथा क्षीरकाकोली के उत्पत्तिस्थान, | चतुरूषण के लक्षण, नाम तथा गुण | २२२ | लक्षण, नाम तथा गुण | २६१ चव्य के नाम तथा गुण | २२३ | ऋद्धि तथा वृद्धि के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, | गजपीपल के नाम तथा गुण | २२४ | नाम तथा गुण | २६२ चीता के नाम तथा गुण | २२४ | अष्टवर्ग की प्रतिनिधि औषधियाँ | २६२ पञ्चकोल के लक्षण तथा गुण | २२७ | मुलहठी के नाम तथा गुण | २६३ षडूषण के लक्षण नाम तथा गुण | २२७ | कबीला के नाम तथा गुण | २६५ अजवायन के नाम तथा गुण | २२७ | अमलतास के नाम तथा गुण | २६७ अजमोदा (बड़ी अजवायन) के नाम तथा गुण | २२९ | कुटकी के नाम तथा गुण | २६८ खुरासानी अजवायन के गुण | २३१ | चिरायता के नाम तथा गुण | २७१ सफेद जीरा, स्याह जीरा तथा कलौंजी (मंगरैला) | | इन्द्रयव के नाम तथा गुण | २७४ के नाम तथा गुण | २३३ | मैनफल के नाम तथा गुण | २७५ धनियाँ के नाम तथा गुण | २३५ | रास्ना के नाम तथा गुण | २७६ सोया और सौंफ के नाम तथा गुण | २३७ | नाकुलीकन्द के नाम तथा गुण | २८० | | मोइया के नाम तथा गण | २८३ १९

२० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पृष्ठ | पृष्ठ तेजवती के नाम तथा गुण २८६ | बिरिया संचर नमक के नाम तथा गुण ३४९ मालकांगनी के नाम तथा गुण २८६ | काला नमक के नाम तथा गुण ३५१ कूठ के नाम तथा गुण २८८ | खनिज लवण अर्थात् रेहगवा नोन के नाम, कूठ के भेद पोहकर मूल नाम तथा गुण २९१ | उत्पत्ति तथा गुण ३५१ सत्यानाशी (चोक) के नाम तथा गुण २९२ | चनाखार के नाम तथा गुण ३५२ काकड़ासिङ्गी के नाम तथा गुण २९४ | जवाखार, सज्जी तथा सोरा के नाम तथा गुण ३५३ कायफल के नाम तथा गुण २९५ | सुहागा के नाम तथा गुण ३५८ भारङ्गी के नाम तथा गुण २९७ | क्षारद्वय, क्षारत्रय तथा क्षाराष्टक का वर्णन और गुण ३६० पाषाणभेद के नाम तथा गुण ३०० | चूक के नाम तथा गुण ३६१ धाय के नाम तथा गुण ३०३ | कर्पूरादिवर्गः मंजीठ के नाम तथा गुण ३०५ | कर्पूर के नाम तथा गुण ३६२ कुसुम के नाम तथा गुण ३०६ | चीनिया कपूर के नाम तथा गुण ३६४ लाख के नाम तथा गुण ३०७ | कस्तूरी के नाम, भेद तथा गुण ३६६ हलदी के नाम तथा गुण ३०८ | लता कस्तूरी के नाम तथा गुण ३७० कपूरहलदी या आमाहरदी के नाम तथा गुण ३१० | गन्धमार्जार का वीर्य अर्थात् जबादकस्तूरी के गुण ३७२ वनहरदी के गुण ३११ | चन्दन के नाम तथा गुण ३७३ दारुहरदी के नाम तथा गुण ३१२ | पीतचन्दन के नाम तथा गुण ३७७ रसोत के बनाने की विधि, नाम तथा गुण ३१५ | लाल चन्दन के नाम तथा गुण ३७७ बाकुची के नाम और उसके फल के गुण ३१७ | पतङ्ग के नाम तथा गुण ३७९ चकवड़ के नाम और उसके फल के गुण ३१८ | मलयागिरि चन्दन की उत्तमता ३८० अतीस के नाम तथा गुण ३१९ | अगर तथा काले अगर के तेल के नाम तथा गुण ३८० शावरलोध्र और पटियालोध के | देवदारु के नाम तथा गुण ३८२ नाम तथा गुण ३२१ | सरल (धूप) अर्थात् चीड़ के नाम तथा गुण ३८३ लहसुन की उत्पत्ति ३२३ | तगर तथा पिण्ड तगर के भेद एवं दोनों के नाम लहसुन सेवन करनेवालों के लिये हितकर | तथा गुण ३८५ तथा अहितकर पदार्थ ३२४ | पद्माख के नाम तथा गुण ३८७ पियाज के नाम तथा गुण ३२७ | गूगल के नाम लक्षण तथा गुण ३८९ भिलावा के नाम तथा उसके पके फल, | चीड़ के गोंद (गन्धाविरोजा) के नाम तथा गुण ३९३ मींगी और वृन्त के गुण ३३० | राल के नाम तथा गुण ३९५ भांग के नाम तथा गुण ३३३ | कुन्दुरु (सुगन्ध द्रव्य) जो कि शल्लकी का गोंद है पोस्ता के नाम तथा गुण ३३६ | उसके नाम तथा गुण ३९६ अफीम की उत्पत्ति, नाम तथा गुण ३३९ | शिलारस के नाम तथा गुण ३९९ खसखस के दाने के नाम तथा गुण ३४४ | जायफल के नाम तथा गुण ४०० सेंधानमक के नाम तथा गुण ३४५ | जावित्री के नाम तथा गुण ४०२ सांभर नमक के नाम तथा गुण ३४८ | लौंग के नाम तथा गुण ४०२ समुद्रनोन (पांगा) के नाम तथा गुण ३४८ | बड़ी इलायची के नाम तथा गुण ४०५