भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अन्तमें प्रलय करते हैं। कल्प परमेश्वरका दिन है। इस कारण परमेश्वरके दिनमें सृष्टि और रात्रिमें प्रलय होता है। हे राजा शतानीक! अब आप काल-गणनाको सुनें—
अठारह निमेष (पलक गिरनेके समयको निमेष कहते हैं)-की एक काष्ठा होती है अर्थात् जितने समयमें अठारह बार पलकोंका गिरना हो, उतने कालको काष्ठा कहते हैं। तीस काष्ठाकी एक कला, तीस कलाका एक क्षण, बारह क्षणका एक मुहूर्त, तीस मुहूर्तका एक दिन-रात, तीस दिन-रातका एक महीना, दो महीनोंकी एक ऋतु, तीन ऋतुका एक अयन तथा दो अयनोंका एक वर्ष होता है। इस प्रकार सूर्यभगवान्के द्वारा दिन-रात्रिका काल-विभाग होता है। सम्पूर्ण जीव रात्रिको विश्राम करते हैं और दिनमें अपने-अपने कर्ममें प्रवृत्त होते हैं।
पितरोंका दिन-रात मनुष्योंके एक महीनेके बराबर होता है अर्थात् शुक्ल पक्षमें पितरोंकी रात्रि और कृष्ण पक्षमें दिन होता है। देवताओंका एक अहोरात्र (दिन-रात) मनुष्योंके एक वर्षके बराबर होता है अर्थात् उत्तरायण दिन तथा दक्षिणायन रात्रि कही जाती है। हे राजन्! अब आप ब्रह्माजीके रात-दिन और एक-एक युगके प्रमाणको सुनें— सत्ययुग चार हजार वर्षका है, उसके संध्यांशके चार सौ वर्ष तथा संध्याके चार सौ वर्ष मिलाकर
इस प्रकार चार हजार आठ सौ दिव्य वर्षोंका एक सत्ययुग होता है*। इसी प्रकार त्रेतायुग तीन हजार वर्षोंका तथा संध्या और संध्यांशके छः सौ वर्ष कुल तीन हजार छः सौ वर्ष, द्वापर दो हजार वर्षोंका संध्या तथा संध्यांशके चार सौ वर्ष कुल दो हजार चार सौ वर्ष तथा कलियुग एक हजार वर्ष तथा संध्या और संध्यांशके दो सौ वर्ष मिलाकर बारह सौ वर्षोंके मानका होता है। ये सब दिव्य वर्ष मिलाकर बारह हजार दिव्य वर्ष होते हैं। यही देवताओंका एक युग कहलाता है।
देवताओंके हजार युग होनेसे ब्रह्माजीका एक दिन होता है और यही प्रमाण उनकी रात्रिका है। जब ब्रह्माजी अपनी रात्रिके अन्तमें सोकर उठते हैं तब सत्-असत्-रूप मनको उत्पन्न करते हैं। वह मन सृष्टि करनेकी इच्छासे विकारको प्राप्त होता है, तब उससे प्रथम आकाशतत्त्व उत्पन्न होता है। आकाशका गुण शब्द कहा गया है। विकारयुक्त आकाशसे सब प्रकारके गन्धको वहन करनेवाले पवित्र वायुकी उत्पत्ति होती है, जिसका गुण स्पर्श है। इसी प्रकार विकारवान् वायुसे अन्धकारका नाश करनेवाला प्रकाशयुक्त तेज उत्पन्न होता है, जिसका गुण रूप है। विकारवान् तेजसे जल, जिसका गुण रस है और जलसे गन्धगुणवाली पृथ्वी उत्पन्न होती है। इसी प्रकार सृष्टिका क्रम चलता रहता है।
- एक संक्रान्तिसे दूसरी सूर्य-संक्रान्तिकके समयको सौर मास कहते हैं। बारह सौर मासोंका एक सौर वर्ष होता है और मनुष्य-मानका यही एक सौर वर्ष देवताओंका एक अहोरात्र होता है। ऐसे ही तीस अहोरात्रोंका एक मास और बारह मासोंका एक दिव्य वर्ष होता है।
| दोनों संध्याओंसहित युगोंका मान | दिव्य वर्षोंमें | सौर वर्षोंमें |
|---|---|---|
| १-सत्ययुगका मान | ४,८०० | १७,२८,००० |
| २-त्रेतायुगका मान | ३,६०० | १२,९६,००० |
| ३-द्वापरयुगका मान | २,४०० | ८,६४,००० |
| ४-कलियुगका मान | १,२०० | ४,३२,००० |
महायुग या एक चतुर्थी— | १२,००० | ४३,२०,००० वर्ष
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- ब्राह्मपर्व *
१७
पूर्वमें बारह हजार दिव्य वर्षोंका जो एक दिव्य युग बताया गया है, वैसे ही एकहत्तर युग होनेसे एक मन्वन्तर होता है। ब्रह्माजीके एक दिनमें चौदह मन्वन्तर व्यतीत होते हैं।
सत्ययुगमें धर्मके चारों पाद वर्तमान रहते हैं अर्थात् सत्ययुगमें धर्म चारों चरणोंसे (अर्थात् सर्वाङ्गपूर्ण) रहता है। फिर त्रेता आदि युगोंमें धर्मका बल घटनेसे धर्म क्रमसे एक-एक चरण घटता जाता है, अर्थात् त्रेतामें धर्मके तीन चरण, द्वापरमें दो चरण तथा कलियुगमें धर्मका एक ही चरण बचा रहता है और तीन चरण अधर्मके रहते हैं। सत्ययुगके मनुष्य धर्मात्मा, नीरोग, सत्यवादी होते हुए चार सौ वर्षोंतक जीवन धारण करते हैं। फिर त्रेता आदि युगोंमें इन सभी वर्षोंका एक चतुर्थांश न्यून हो जाता है, यथा त्रेताके मनुष्य तीन सौ वर्ष, द्वापरके दो सौ वर्ष तथा कलियुगके एक सौ वर्षतक जीवन धारण करते हैं। इन चारों युगोंके धर्म भी भिन्न-भिन्न होते हैं। सत्ययुगमें तपस्या, त्रेतामें ज्ञान, द्वापरमें यज्ञ और कलियुगमें दान प्रधान धर्म माना गया है।
परम द्युतिमान् परमेश्वरने सृष्टिकी रक्षाके लिये अपने मुख, भुजा, ऊरु और चरणोंसे क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—इन चार वर्णोंको उत्पन्न किया और उनके लिये अलग-अलग कर्मोंकी कल्पना की। ब्राह्मणोंके लिये पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना यज्ञ कराना तथा दान देना और दान लेना—ये छः कर्म निश्चित किये गये हैं। पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना तथा प्रजाओंका पालन आदि कर्म क्षत्रियोंके लिये नियत किये गये हैं। पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, पशुओंकी रक्षा करना, खेती-व्यापारसे धनार्जन करना—ये काम वैश्योंके लिये निर्धारित किये गये और इन तीनों वर्णोंकी सेवा करना—यह एक मुख्य कर्म शूद्रोंका नियत किया गया है।
पुरुषकी देहमें नाभिसे ऊपरका भाग अत्यन्त पवित्र माना गया है। उसमें भी मुख प्रधान है। ब्राह्मण ब्रह्माके मुख (उत्तमाङ्ग)—से उत्पन्न हुआ है, इसलिये ब्राह्मण सबसे उत्तम हैं, यह वेदकी वाणी है। ब्रह्माजीने बहुत कालतक तपस्या करके सबसे पहले देवता और पितरोंको हव्य तथा कव्य पहुँचानेके लिये और सम्पूर्ण संसारकी रक्षा करने-हेतु ब्राह्मणको उत्पन्न किया। शिरोभागसे उत्पन्न होने और वेदको धारण करनेके कारण सम्पूर्ण संसारका स्वामी धर्मतः ब्राह्मण ही है। सब भूतों (स्थावर-जङ्गमरूप पदार्थों)—में प्राणी (कीट आदि) श्रेष्ठ हैं, प्राणियोंमें बुद्धिसे व्यवहार करनेवाले पशु आदि श्रेष्ठ हैं। बुद्धि रखनेवाले जीवोंमें मनुष्य श्रेष्ठ हैं और मनुष्योंमें ब्राह्मण, ब्राह्मणोंमें विद्वान्, विद्वानोंमें कृतबुद्धि और कृतबुद्धियोंमें कर्म करनेवाले तथा इनसे ब्रह्मवेत्ता—ब्रह्मज्ञानी श्रेष्ठ हैं। ब्राह्मणका जन्म धर्म-सम्पादन करनेके लिये है और धर्माचरणसे ब्राह्मण ब्रह्मत्त्व तथा ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है।
राजा शतानीकने पूछा—हे महामुने! ब्रह्मलोक और ब्रह्मत्त्व अति दुर्लभ हैं, फिर ब्राह्मणमें कौनसे ऐसे गुण होते हैं, जिनके कारण वह इन्हें प्राप्त करता है। कृपाकर आप इसका वर्णन करें।
सुमन्तु मुनि बोले—हे राजन्! आपने बहुत ही उत्तम बात पूछी है, मैं आपको वे बातें बताता हूँ, उन्हें ध्यानपूर्वक सुनें।
जिस ब्राह्मणके वेदादि शास्त्रोंमें निर्दिष्ट गर्भाधान, पुंसवन आदि अङ्गतालीस संस्कार विधिपूर्वक हुए हों, वही ब्राह्मण ब्रह्मलोक और ब्रह्मत्त्वको प्राप्त करता है। संस्कार ही ब्रह्मत्त्व-प्राप्तिका मुख्य कारण है, इसमें कोई संदेह नहीं।
राजा शतानीकने पूछा—महात्मन्! वे संस्कार कौनसे हैं, इस विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो रहा है। कृपाकर आप इन्हें बतायें।
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१८ * संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सुमन्तुजी बोले- राजन्! वेदादि शास्त्रोंमें जिन संस्कारोंका निर्देश हुआ है, उनका मैं वर्णन करता हूँ— गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूडाकर्म, उपनयन, चार प्रकारके वेदव्रत, वेदस्नान, विवाह, पञ्चमहायज्ञ (जिनसे देवता, पितरों, मनुष्य, भूत और ब्रह्मकी तृप्ति होती है), सप्तपाकयज्ञ-संस्था—अष्टकाद्वय, पार्वण, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री (शूलगव) तथा आश्वयुजी, सप्तहविर्यज्ञ-संस्था—अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास, चातुर्मास्य, निरूढ-पशुबन्ध, सौत्रामणी और सप्तसोम-संस्था—अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम—ये चालीस ब्राह्मणके संस्कार हैं। इनके साथ ही ब्राह्मणमें आठ आत्मगुण भी अवश्य होने चाहिये, जिससे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। ये आठ गुण इस प्रकार हैं—
अनसूया दया क्षान्तिरनायासं च मङ्गलम्।
अकार्पण्यं तथा शौचमस्पृहा च कुरुद्वह॥
(ब्राह्मपर्व २।१५५)
'अनसूया (दूसरोंके गुणोंमें दोष-बुद्धि नहीं रखना), दया, क्षमा, अनायास (किसी सामान्य बातके पीछे जानकी बाजी न लगाना), मङ्गल (माङ्गलिक वस्तुओंका धारण), अकार्पण्य (दीन वचन नहीं बोलना और अत्यन्त कृपण न बनना), शौच (बाह्याभ्यन्तरकी शुद्धि) और अस्पृहा—ये आठ आत्मगुण हैं।' इनकी पूरी परिभाषा इस प्रकार है—
गुणीके गुणोंको न छिपाना अर्थात् प्रकट करना, अपने गुणोंको प्रकट न करना तथा दूसरेके दोषोंको देखकर प्रसन्न न होना अनसूया है। अपने-परायेमें, मित्र और शत्रुमें अपने समान व्यवहार करना और दूसरेका दुःख दूर करनेकी इच्छा रखना दया है। मन, वचन अथवा शरीरसे कोई दुःख भी पहुँचाये तो उसपर क्रोध और वैर न करना क्षान्ति है। अभक्ष्य वस्तुका भक्षण न करना, निन्दित पुरुषोंका सङ्ग न करना और सदाचरणमें स्थित रहना शौच कहा जाता है। जिन शुभ कर्मोंके करनेसे शरीरको कष्ट होता है, उस कर्मको हठात् नहीं करना चाहिये, यह अनायास है। नित्य अच्छे कार्योंको करना और बुरे कर्मोंका परित्याग करना—यह मङ्गल-गुण कहलाता है। बड़े कष्ट एवं परिश्रमसे न्यायोपार्जित धनसे उदारतापूर्वक थोड़ा-बहुत नित्य दान करना अकार्पण्य है। ईश्वरकी कृपासे प्राप्त थोड़ी-सी सम्पत्तिमें भी संतुष्ट रहना और दूसरेके धनकी किंचित् भी इच्छा न रखना अस्पृहा है*। इन आठ गुणों और पूर्वोक्त संस्कारोंसे जो ब्राह्मण संस्कृत हो वह ब्रह्मलोक तथा ब्रह्मत्वको प्राप्त करता है। जिसकी गर्भ-शुद्धि हो, सब संस्कार विधिवत् सम्पन्न हुए हों और वह वर्णाश्रम-धर्मका पालन करता हो तो उसे अवश्य मुक्ति प्राप्त होती है। (अध्याय १-२)
* न गुणान् गुणिनो हन्ति न स्तौत्यात्मगुणानपि। प्रहृष्यते नान्यदोषैरनसूया प्रकीर्तिता॥
अपरे बन्धुवर्गे वा मित्रे द्वेष्टरि वा सदा। आत्मवद्वर्तनं यत् स्यात् सा दया परिकीर्तिता॥
वाचा मनसि काये च दुःखेनोत्पादितेन च। न कुप्यति न चाप्रीतिः सा क्षमा परिकीर्तिता॥
अभक्ष्यपरिहारश्च संसर्गश्चाप्यनिन्दितैः। आचारे च व्यवस्थानं शौचमेतत् प्रकीर्तितम्॥
शरीरं पीड्यते येन शुभेनापि च कर्मणा। अत्यन्तं तन्न कुर्वीत अनायासः स उच्यते॥
प्रशस्ताचरणं नित्यमप्रशस्तविवर्जनम्। एतद्धि मङ्गलं प्रोक्तं मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः॥
स्तोकादपि प्रदातव्यमदीनेनान्तरात्मना। अहन्यहनि यत्किंचिदकार्पण्यं तदुच्यते॥
यथोत्पन्नेन संतुष्टः स्वल्पेनाप्यथ वस्तुना। अहिंसया परस्वेषु साऽस्पृहा परिकीर्तिता॥ (ब्राह्मपर्व २।१५७-१६४)
- ब्राह्मपर्व *
१९
गर्भाधानसे यज्ञोपवीतपर्यन्त संस्कारोंकी संक्षिप्त विधि, अन्नप्रशंसा तथा भोजन-विधिके प्रसंगमें धनवर्धनकी कथा, हाथोंके तीर्थ एवं आचमन-विधि
राजा शतानीकने कहा—हे मुने! आपने मुझे जातकर्मादि संस्कारोंके विषयमें बताया, अब आप इन संस्कारोंके लक्षण तथा चारों वर्ण एवं आश्रमके धर्म बतलानेकी कृपा करें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, अन्नप्राशन, चूडाकर्म तथा यज्ञोपवीत आदि संस्कारोंके करनेसे द्विजातियोंके बीज-सम्बन्धी तथा गर्भ-सम्बन्धी सभी दोष निवृत्त हो जाते हैं। वेदाध्ययन, व्रत, होम, त्रैविद्य व्रत, देवर्षि-पितृ-तर्पण, पुत्रोत्पादन, पञ्च महायज्ञ और ज्योतिष्टोमादि यज्ञोंके द्वारा यह शरीर ब्रह्म-प्राप्तिके योग्य हो जाता है। अब इन संस्कारोंकी विधिको आप संक्षेपमें सुनें—
पुरुषका जातकर्म-संस्कार नालच्छेदनसे पहिले किया जाता है। इसमें वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक बालकको सुवर्ण, मधु और घृतका प्राशन कराया जाता है। दसवें दिन, बारहवें दिन, अठारहवें दिन अथवा एक मास पूरा होनेपर शुभ तिथि-मुहूर्त और शुभ नक्षत्रमें नामकरण-संस्कार किया जाता है। ब्राह्मणका नाम मङ्गलवाचक रखना चाहिये, जैसे शिवशर्मा। क्षत्रियका बलवाचक जैसे इन्द्रवर्मा। वैश्यका धनयुक्त जैसे धनवर्धन और शूद्रका भी यथाविधि देवदासादि नाम रखना चाहिये। स्त्रियोंका नाम ऐसा रखना चाहिये, जिसके बोलनेमें कष्ट न हो, क्रूर न हो, अर्थ स्पष्ट और अच्छा हो, जिसके सुननेसे मन प्रसन्न हो तथा मङ्गलसूचक एवं आशीर्वादयुक्त हो और जिसके अन्तमें आकार, ईकार आदि दीर्घ स्वर हों। जैसे यशोदादेवी आदि।
जन्मसे बारहवें दिन अथवा चतुर्थ मासमें बालकको घरसे बाहर निकालना चाहिये, इसे निष्क्रमण कहते हैं। छठे मासमें बालकका अन्नप्राशन-संस्कार करना चाहिये। पहले या तीसरे वर्षमें मुण्डन-संस्कार करना चाहिये। गर्भसे आठवें वर्षमें ब्राह्मणका, ग्यारहवें वर्षमें क्षत्रियका और बारहवें वर्षमें वैश्यका यज्ञोपवीत-संस्कार करना चाहिये। परंतु ब्रह्मतेजकी इच्छावाला ब्राह्मण पाँचवें वर्षमें, बलकी इच्छावाला क्षत्रिय छठे वर्षमें और धनकी कामनावाला वैश्य आठवें वर्षमें अपने-अपने बालकोंका उपनयन-संस्कार सम्पन्न करे। सोलह वर्षतक ब्राह्मण, बाईस वर्षतक क्षत्रिय और चौबीस वर्षतक वैश्य गायत्री (सावित्री)-के अधिकारी रहते हैं, इसके अनन्तर यथासमय संस्कार न होनेसे गायत्रीके अधिकारी नहीं रहते और वे 'ब्रात्य' कहलाते हैं। फिर जबतक ब्रात्यस्तोम नामक यज्ञसे उनकी शुद्धि नहीं की जाती, तबतक उनका शरीर गायत्री-दीक्षाके योग्य नहीं बनता। इन ब्रात्योंके साथ आपत्तिमें भी वेदादि शास्त्रोंका पठन-पाठन अथवा विवाह आदिका सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये।
त्रैवर्णिक ब्रह्मचारियोंको उत्तरीयके रूपमें क्रमशः कृष्ण (कस्तूरी)-मृगचर्म, रुरु नामक मृगका चर्म और बकरेका चर्म धारण करना चाहिये। इसी प्रकार क्रमशः सन (टाट), अलसी और भेड़के ऊनका वस्त्र धारण करना चाहिये। ब्राह्मण ब्रह्मचारीके लिये तीन लड़ीवाली सुन्दर चिकनी मूँजकी, क्षत्रियके लिये मूर्वा (मुरा)-की और वैश्यके लिये सनकी मेखला कही गयी है। मूँज आदिके प्राप्त न होनेपर क्रमशः कुशा, अशमन्तक और बल्वज नामक
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२०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
तुणकी मेखलाको तीन लड़ीवाली करके एक, तीन अथवा पाँच ग्रन्थियाँ उसमें लगानी चाहिये। ब्राह्मण कपासके सूतका, क्षत्रिय सनके सूतका और वैश्य भेड़के ऊनका यज्ञोपवीत धारण करे। ब्राह्मण बिल्व, पलाश या प्लक्षका दण्ड, जो सिरपर्यन्त हो उसे धारण करे। क्षत्रिय बड़, खदिर या बेंतके काष्ठका मस्तकपर्यन्त ऊँचा और वैश्य पैलव (पीलू वृक्षकी लकड़ी), गूलर अथवा पीपलके काष्ठका दण्ड नासिकापर्यन्त ऊँचा धारण करे। ये दण्ड सीधे, छिद्ररहित और सुन्दर होने चाहिये। यज्ञोपवीत-संस्कारमें अपना-अपना दण्ड धारणकर भगवान् सूर्यनारायणका उपस्थान करे और गुरुकी पूजा करे तथा नियमके अनुसार सर्वप्रथम माता, बहिन या मौसीसे भिक्षा माँगे। भिक्षा माँगते समय उपनीत ब्राह्मण वटु भिक्षा देनेवालीसे 'भवति! भिक्षां मे देहि', क्षत्रिय 'भिक्षां भवति! मे देहि' तथा वैश्य 'भिक्षां देहि मे भवति!'—इस प्रकारसे 'भवति' शब्दका प्रयोग करे। भिक्षामें वे सुवर्ण, चाँदी अथवा अन्न ब्रह्मचारीको दें। इस प्रकार भिक्षा ग्रहणकर ब्रह्मचारी उसे गुरुको निवेदित कर दे और गुरुकी आज्ञा पाकर पूर्वाभिमुख हो आचमन कर भोजन करे। पूर्वकी ओर मुख करके भोजन करनेसे आयु, दक्षिण-मुख करनेसे यश, पश्चिम-मुख करनेसे लक्ष्मी और उत्तर-मुख करके भोजन करनेसे सत्यकी अभिवृद्धि होती है। एकाग्रचित्त हो उत्तम अन्नका भोजन करनेके अनन्तर आचमन कर अङ्गों (आँख, कान, नाक)-का जलसे स्पर्श करे। अन्नकी नित्य स्तुति करनी चाहिये और अन्नकी निन्दा किये बिना भोजन करना चाहिये। उसका दर्शन कर संतुष्ट एवं प्रसन्न होना चाहिये। हर्षसे भोजन करना
चाहिये। पूजित अन्नके भोजनसे बल और तेजकी वृद्धि होती है और निन्दित अन्नके भोजनसे बल और तेज दोनोंकी हानि होती है*। इसीलिये सर्वदा उत्तम अन्नका भोजन करना चाहिये। उच्छिष्ट (जूठा) किसीको नहीं देना चाहिये तथा स्वयं भी किसीका उच्छिष्ट नहीं खाना चाहिये। भोजन करके जिस अन्नको छोड़ दे उसे फिर ग्रहण न करे अर्थात् बार-बार छोड़-छोड़कर भोजन न करे, एक बार बैठकर तृप्तिपूर्वक भोजन कर लेना चाहिये। जो पुरुष बीच-बीचमें विच्छेद करके लोभवश भोजन करता है, उसके दोनों लोक नष्ट हो जाते हैं, जैसे धनवर्धन वैश्यके हुए थे।
राजा शतानीकने पूछा— महाराज! आप धनवर्धन वैश्यकी कथा सुनाइये। उसने कैसा भोजन किया और उसका क्या परिणाम हुआ?
सुमन्तु मुनिने कहा— राजन्! सत्ययुगकी बात है, पुष्करक्षेत्रमें धन-धान्यसे सम्पन्न धनवर्धन नामक एक वैश्य रहता था। एक दिन वह ग्रीष्म-ऋतुमें मध्याह्नके समय वैश्वदेव-कर्म सम्पन्न कर अपने पुत्र, मित्र तथा बन्धु-बान्धवोंके साथ भोजन कर रहा था। इतनेमें ही अकस्मात् उसे बाहरसे एक करुण शब्द सुनायी पड़ा। उस शब्दको सुनते ही वह दयावश भोजनको छोड़कर बाहरकी ओर दौड़ा। किंतु जबतक वह बाहर पहुँचा वह आवाज बंद हो गयी। फिर लौटकर उस वैश्यने पात्रमें जो छोड़ा हुआ भोजन था उसे खा लिया। भोजन करते ही उस वैश्यकी मृत्यु हो गयी और इसी अपराधवश परलोकमें भी उसकी दुर्गति हुई। इसलिये छोड़े हुए भोजनको फिर कभी नहीं खाना चाहिये। अधिक भोजन भी नहीं करना चाहिये। इससे शरीरमें
- तथात्रं पूजयेन्नित्यमद्याञ्चेतदकुत्सयन्। दर्शनात् तस्य हृष्येद् वै प्रसीदेचापि भारत ॥ पूजितं त्वशनं नित्यं बलमोजश्च यच्छति ॥ अपूजितं तु तदभुकमुभयं नाशयेदितम्। (ब्राह्मपर्व ३।३७—३९)
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- ब्राह्मपर्व *
२१
अत्यधिक रसकी उत्पत्ति होती है, जिससे प्रतिशयाय (जुकाम, मन्दाग्नि, ज्वर) आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। अजीर्ण हो जानेसे स्नान, दान, तप, होम, तर्पण, पूजा आदि कोई भी पुण्य कर्म ठीकसे सम्पन्न नहीं हो पाते। अति भोजन करनेसे अनेक रोग उत्पन्न होते हैं—आयु घटती है, लोकमें निन्दा होती है तथा अन्तमें सदृति भी नहीं होती। उच्छिष्ट मुखसे कहीं नहीं जाना चाहिये। सदा पवित्रतासे रहना चाहिये। पवित्र मनुष्य यहाँ सुखसे रहता है और अन्तमें स्वर्गमें जाता है।
राजाने पूछा—मुनीश्वर! ब्राह्मण किस कर्मके करनेसे पवित्र होता है? इसका आप वर्णन करें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! जो ब्राह्मण विधिपूर्वक आचमन करता है, वह पवित्र हो जाता है और सत्कर्मोंका अधिकारी हो जाता है। आचमनकी विधि यह है कि हाथ-पाँव धोकर पवित्र स्थानमें आसनेके ऊपर पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुख करके बैठे। दाहिने हाथको जानुके भीतर रखकर दोनों चरण बराबर रखे तथा शिखामें ग्रन्थि लगाये और फिर उष्णता एवं फेनसे रहित शीतल एवं निर्मल जलसे आचमन करे। खड़े-खड़े, बात करते, इधर-उधर देखते हुए, शीघ्रतासे और क्रोधयुक्त होकर आचमन न करे।
हे राजन्! ब्राह्मणके दाहिने हाथमें पाँच तीर्थ कहे गये हैं—(१) देवतीर्थ, (२) पितृतीर्थ, (३) ब्राह्मतीर्थ, (४) प्राजापत्यतीर्थ और (५) सौम्यतीर्थ। अब आप इनके लक्षणोंको सुनें—अँगूठेके मूलमें ब्राह्मतीर्थ, कनिष्ठके मूलमें प्राजापत्यतीर्थ, अङ्गुलियोंके अग्रभागमें देवतीर्थ, तर्जनी और अङ्गुष्ठके बीचमें पितृतीर्थ और हाथके मध्य-भागमें सौम्यतीर्थ।
कहा जाता है, जो देवकर्ममें प्रशस्त माना गया है*। देवार्चा, ब्राह्मणको दक्षिणा आदि कर्म देवतीर्थसे; तर्पण, पिण्डदानादि कर्म पितृतीर्थसे; आचमन ब्राह्मतीर्थसे; विवाहके समय लाजाहोमादि और सोमपान प्राजापत्यतीर्थसे; कमण्डलुग्रहण, दधिप्राशनादि कर्म सौम्यतीर्थसे करे। ब्राह्मतीर्थसे उपस्पर्शन सदा श्रेष्ठ माना गया है।
अङ्गुलियोंको मिलाकर एकाग्रचित्त हो, पवित्र जलसे बिना शब्द किये तीन बार आचमन करनेसे महान् फल होता है और देवता प्रसन्न होते हैं। प्रथम आचमनसे ऋग्वेद, द्वितीयसे यजुर्वेद और तृतीयसे सामवेदकी तृप्ति होती है तथा आचमन करके जलयुक्त दाहिने अँगूठेसे मुखका स्पर्श करनेसे अथर्ववेदकी तृप्ति होती है। ओष्ठके मार्जनसे इतिहास और पुराणोंकी तृप्ति होती है। मस्तकमें अभिषेक करनेसे भगवान्
- अङ्गुष्ठमूलोत्तरतो येयं रेखा महीपते॥
ब्राह्मं तीर्थं वदन्त्येतद्दसिष्टाद्या द्विजोत्तमाः। कार्यं कनिष्ठिकामूले अङ्गुल्यग्रे तु दैवतम्॥
तर्जन्मङ्गुष्ठयोस्तः पितृयं तीर्थमुदाहृतम्। करमध्ये स्थितं सौम्यं प्रशस्तं देवकर्मणि॥ (ब्राह्मपर्व ३।६३—६५)
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२२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
रुद्र प्रसन्न होते हैं। शिखाके स्पर्शसे ऋषिगण, दोनों आँखोंके स्पर्शसे सूर्य, नासिकाके स्पर्शसे वायु, कानोंके स्पर्शसे दिशाएँ, भुजाके स्पर्शसे यम, कुबेर, वरुण, इन्द्र तथा अग्निदेव तृप्त होते हैं। नाभि और प्राणोंकी ग्रन्थियोंके स्पर्श करनेसे सभी तृप्त हो जाते हैं। पैर धोनेसे विष्णुभगवान्, भूमिमें जल छोड़नेसे वासुकि आदि नाग तथा बीचमें जो जलबिन्दु गिरते हैं, उनसे चार प्रकारके भूतग्रामकी तृप्ति होती है।
अङ्गुष्ठ और तर्जनीसे नेत्र, अङ्गुष्ठ तथा अनामिकासे नासिका, अङ्गुष्ठ एवं मध्यमासे मुख, अङ्गुष्ठ और कनिष्ठकासे कान, सब अङ्गुलियोंसे भुजाओंका, अङ्गुष्ठसे नाभिमण्डल तथा सभी अङ्गुलियोंसे सिरका स्पर्श करना चाहिये। अङ्गुष्ठ अग्रिर्पुष्प है, तर्जनी वायुरूप, मध्यमा प्रजापतिरूप, अनामिका सूर्यरूप और कनिष्ठिका इन्द्ररूप है१।
इस विधिसे ब्राह्मणके आचमन करनेपर सम्पूर्ण जगत्, देवता और लोक तृप्त हो जाते हैं। ब्राह्मण सदा पूजनीय है, क्योंकि वह सर्वदेवमय है।
ब्राह्मतीर्थ, प्राजापत्यतीर्थ अथवा देवतीर्थसे आचमन करे, परंतु पितृतीर्थसे कभी भी आचमन नहीं करना चाहिये। आचमनका जल हृदयतक
जानेसे ब्राह्मणकी, कण्ठतक जानेसे क्षत्रियकी और वैश्यकी जलके प्राशनसे तथा शूद्रकी जलके स्पर्शमात्रसे शुद्धि हो जाती है।
दाहिने हाथके नीचे और बायें कंधेपर यज्ञोपवीत रहनेसे द्विज उपवीती (सव्य) कहलाता है, इसके विलोम रहनेसे अर्थात् यज्ञोपवीतके दाहिने कंधेसे बायों ओर रहनेसे प्राचीनावीती (अपसव्य) तथा गलेमें मालाकी तरह यज्ञोपवीत रहनेसे निवीती कहा जाता है।
मेखला, मृगछाला, दण्ड, यज्ञोपवीत और कमण्डलु—इनमें कोई भी चीज भग्न हो जाय तो उसे जलमें विसर्जित कर मन्त्रोच्चारणपूर्वक दूसरा धारण करना चाहिये। उपवीती (सव्य) होकर और दाहिने हाथको जानु अर्थात् घुटनेके भीतर रखकर जो ब्राह्मण आचमन करता है वह पवित्र हो जाता है। ब्राह्मणके हाथकी रेखाओंको गङ्गा आदि नदियोंके समान पवित्र समझना चाहिये और अङ्गुलियोंके जो पर्व हैं, वे हिमालय आदि देवपर्वत माने जाते हैं। इसलिये ब्राह्मणका दाहिना हाथ सर्वदेवमय है और इस विधिसे आचमन करनेवाला अन्तमें स्वर्गलोकको प्राप्त करता है२। (अध्याय ३)
वेदाध्ययन-विधि, ओंकार तथा गायत्री-माहात्म्य, आचार्यादि-लक्षण,
ब्रह्मचारिधर्म-निरूपण, अभिवादन-विधि, स्नातककी महिमामें
अङ्गिरापुरका आख्यान, माता-पिता और गुरुकी महिमा
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! ब्राह्मणका केशान्त (समावर्तन)-संस्कार सोलहवें वर्षमें, क्षत्रियका बार्हस्यवर्षमें तथा वैश्यका पचीसवें वर्षमें करना चाहिये। स्त्रियोंके संस्कार अमन्त्रक करने चाहिये।
केशान्त-संस्कार होनेके अनन्तर चाहे तो गुरु-गृहमें रहे अथवा अपने घरमें आकर विवाह कर अग्निहोत्र ग्रहण करे। स्त्रियोंके लिये मुख्य संस्कार विवाह है।
१- अङ्गुष्ठोऽग्रिमहाबाहो प्रोक्तो वायुः प्रदेशिनी ॥
अनामिका तथा सूर्यः कनिष्ठा मघवा विभो। प्रजापतिर्मध्यमा ज्ञेया तस्माद् भरतसप्तम ॥ (ब्राह्मपर्व ३।८४-८५)
२- यास्त्वैताः करमध्ये तु रेखा विप्रस्य भारत ॥
गङ्गाद्याः सरितः सर्वा ज्ञेया भरतसप्तम। यान्यङ्गुलिषु पर्वाणि गिरयस्तानि विद्धि वै ॥
सर्वदेवमयो राजन् करो विप्रस्य दक्षिणः।
(ब्राह्मपर्व ३।१२-१४)
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- ब्राह्मपर्व *
२३
राजन्! यहाँतक मैंने उपनयनका विधान बतलाया। अब आगेका कर्म बताते हैं, उसे आप सुनें। शिष्यका यज्ञोपवीत कर गुरु पहले उसको शौच, आचार, संध्योपासन, अग्निकार्य सिखाये और वेदका अध्ययन कराये। शिष्य भी आचमन कर उत्तराभिमुख हो ब्रह्माञ्जलि बाँधकर एकाग्रचित्त हो प्रसन्न-मनसे वेदाध्ययनके लिये बैठे। पढ़नेके आरम्भ तथा अन्तमें गुरुके चरणोंकी वन्दना करे। पढ़नेके समय दोनों हाथोंकी जो अञ्जलि बाँधी जाती है, उसे 'ब्रह्माञ्जलि' कहा जाता है। शिष्य गुरुका दाहिना चरण दाहिने हाथसे और बायाँ चरण बायें हाथसे छूकर उनको प्रणाम करे। वेदके पढ़नेके समय आदिमें और अन्तमें ओंकारका उच्चारण न करनेसे सब निष्फल हो जाता है। पहलेका पढ़ा हुआ विस्मृत हो जाता है और आगेका विषय याद नहीं होता।
पूर्वदिशामें अग्रभागवाले कुशाके आसनपर बैठकर पवित्री धारण करे तथा तीन बार प्राणायामसे पवित्र होकर ओंकारका उच्चारण करे। प्रजापतिने तीनों वेदोंके प्रतिनिधिभूत अकार, उकार और मकार—इन तीन वर्णोंको तीनों वेदोंसे निकाला है, इनसे ओंकार बनता है। भूर्भुवः स्वः—ये तीनों व्याहृतियाँ और गायत्रीके तीन पाद तीनों वेदोंसे निकले हैं। इसलिये जो ब्राह्मण ओंकार तथा व्याहृतिपूर्वक त्रिपदा गायत्रीका दोनों संध्याओंमें जप करता है, वह वेदपाठके पुण्यको प्राप्त करता है और जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अपनी क्रियासे हीन होते हैं, उनकी साधु पुरुषोंमें निन्दा होती है तथा परलोकमें भी वे कल्याणके भागी नहीं होते, इसलिये अपने कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये। प्रणव, तीन व्याहृतियाँ और त्रिपदा गायत्री—ये सब मिलकर जो मन्त्र गायत्री-मन्त्र होता है, वह ब्रह्माका मुख है। जो इस गायत्री-मन्त्रका श्रद्धा-
भक्तिसे तीन वर्षतक नित्य नियमसे विधिपूर्वक जप करता है, वह वायुकी तरह वेगसम्पन्न होकर आकाशके स्वरूपको धारणकर ब्रह्मतत्त्वको प्राप्त करता है। एकाक्षर 'ॐ' परब्रह्म है, प्राणायाम परम तप है। सावित्री (गायत्री)-से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं है और मौनसे सत्य बोलना श्रेष्ठ है। तपस्या, हवन, दान, यज्ञादि क्रियाएँ स्वरूपतः नाशवान् हैं, किंतु प्रणव-स्वरूप एकाक्षर ब्रह्म ओंकारका कभी नाश नहीं होता। विधियज्ञों (दर्श-पौर्णमास आदि)-से जपयज्ञ (प्रणवादि-जप) सदा ही श्रेष्ठ है। उपांशु-जप (जिस जपमें केवल ओठ और जीभ चलते हैं, शब्द न सुनायी पड़े) लाख गुना और उपांशु-जपसे मानस-जप हजार गुना अधिक फल देनेवाला होता है। जो पाकयज्ञ (पितृकर्म, हवन, बलिवैश्वदेव) विधि-यज्ञके बराबर हैं, वे सभी जप-यज्ञकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं। ब्राह्मणको सब सिद्धि जपसे प्राप्त हो जाती है और कुछ करे या न करे, पर ब्राह्मणको गायत्री-जप अवश्य करना चाहिये।
सूर्योदयसे पूर्व जब तारे दिखायी देते रहें तभीसे प्रातः-संध्या आरम्भ कर देनी चाहिये और सूर्योदयपर्यन्त गायत्री-जप करता रहे। इसी प्रकार सूर्यास्तसे पहले ही सायं-संध्या आरम्भ करे और तारोंके दिखायी देनेतक गायत्री-जप करता रहे। प्रातः-संध्यामें खड़े होकर जप करनेसे रात्रिके पाप नष्ट होते हैं और सायं-संध्याके समय बैठकर गायत्री-जप करनेसे दिनके पाप नष्ट होते हैं। इसलिये दोनों कालोंकी संध्या अवश्य करनी चाहिये। जो दोनों संध्याओंको नहीं करता उसे सम्पूर्ण द्विजातिके विहित कर्मोंसे बहिष्कृत कर देना चाहिये। घरके बाहर एकान्त-स्थानमें, अरण्य या नदी-सरोवर आदिके तटपर गायत्रीका जप करनेसे बहुत लाभ होता है। मन्त्रोंके जप, संध्याके मन्त्र और जो
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२४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
ब्रह्म-यज्ञादि नित्यकर्म हैं, इनके मन्त्रोंके उच्चारणमें अनध्यायका विचार नहीं करना चाहिये अर्थात् नित्यकर्ममें अनध्याय नहीं होता।
यज्ञोपवीतके अनन्तर समावर्तन-संस्कारतक शिष्य गुरुके घरमें रहे। भूमिपर शयन करे, सब प्रकारसे गुरुकी सेवा करे और वेदाध्ययन करता रहे। सब कुछ जानते हुए भी जडवत् रहे। आचार्यका पुत्र, सेवा करनेवाला, ज्ञान देनेवाला, धार्मिक, पवित्र, विश्वासी, शक्तिमान्, उदार, साधुस्वभाव तथा अपनी जातिवाला—ये दस अध्यापनके योग्य हैं। बिना पूछे किसीसे कुछ न कहे, अन्यायसे पूछनेवालेको कुछ न बताये। जो अनुचित ढंगसे पूछता है और जो अनुचित ढंगसे उत्तर देता है, वे दोनों नरकमें जाते हैं और जगत्में सबके अप्रिय होते हैं। जिसको पढ़ानेसे धर्म या अर्थकी प्राप्ति न हो और वह कुछ सेवा-शुश्रूषा भी न करे, ऐसेको कभी न पढ़ाये, क्योंकि ऐसे विद्यार्थीको दी गयी विद्या ऊषरमें बीज-वपनके समान निष्फल होती है। विद्याके अधिष्ठातृ-देवताने ब्राह्मणसे कहा— 'मैं तुम्हारी निधि हूँ, मेरी भलीभाँति रक्षा करो, मुझे ब्राह्मणों (अध्यापकों)-के गुणोंमें दोष-बुद्धि रखनेवालेको और द्वेष करनेवालेको न देना, इससे मैं बलवती रहूँगी। जो ब्राह्मण जितेन्द्रिय, पवित्र, ब्रह्मचारी और प्रमादसे रहित हो उसे मुझे देना।'
जो गुरुकी आज्ञाके बिना वेद-शास्त्र आदिको स्वयं ग्रहण करता है, वह अति भयंकर रौरव नरकको प्राप्त होता है। जो लौकिक, वैदिक अथवा आध्यात्मिक ज्ञान दे, उसे सर्वप्रथम प्रणाम करना चाहिये। जो केवल गायत्री जानता हो, पर शास्त्रकी मर्यादामें रहे वह सबसे उत्तम है, किंतु सभी वेदादि शास्त्रोंको जानते हुए भी मर्यादामें न रहे और भक्ष्याभक्ष्यका कुछ भी विचार न करे तथा सभी वस्तुओंको बेचे, वह अधम है।
गुरुके आगे, शय्या अथवा आसनपर न बैठे। यदि पहिलेसे बैठो हो तो गुरुको आते देख नीचे उतर जाय और उनका अभिवादन करे। वृद्धजनोंको आते देख छोटोंके प्राण उच्छ्रुंसित हो जाते हैं, इसलिये नम्रतापूर्वक खड़े होकर उन्हें प्रणाम करनेसे वे प्राण पुनः अपने स्थानपर आ जाते हैं। प्रतिदिन बड़ोंकी सेवा और उन्हें प्रणाम करनेवाले पुरुषके आयु, विद्या, यश और बल—ये चारों निरन्तर बढ़ते रहते हैं—
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि सम्यग्बर्धन्ते आयुः प्रज्ञा यशो बलम्॥
(ब्राह्मपर्व ४।५०)
अभिवादनके समय दूसरेकी स्त्रीको और जिससे किसी प्रकारका सम्बन्ध न हो उसे भवती (आप), सुभगे अथवा भगिनी (बहन) कहकर सम्बोधित करे। चाचा, मामा, ससुर, ऋह्विक् और गुरु—इनको अपना नाम लेते हुए प्रणाम करना चाहिये। मौसी, मामी, सास, बुआ (पिताकी बहन) और गुरुकी पत्नी—ये सब मान्य एवं पूज्य हैं। बड़े भाईकी सवर्णा स्त्री (भाभी)-का जो नित्य आदर करता है और उसे माताके समान समझता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। पिताकी बहन, माताकी बहन और अपनी बड़ी बहन—ये तीनों माताके समान ही हैं। फिर भी अपनी माता—इन सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। पुत्र, मित्र और भानजा (बहनका लड़का) इनको अपने समान समझना चाहिये। धन-सम्पत्ति, बन्धु, अवस्था, कर्म और विद्या—ये पाँचों महत्त्वके कारण हैं—इनमें उत्तरोत्तर एकसे दूसरा बड़ा है अर्थात् विद्या सर्वश्रेष्ठ है।
वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी।
एतानि मान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम्॥
(ब्राह्मपर्व ४।७०)
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* ब्राह्मपर्व * २५
रथ आदि यानपर चढ़े हुए, अतिवृद्ध, रोगी, भारयुक्त, स्त्री, स्नातक (जिसका समावर्तन-संस्कार हो गया हो), राजा और वर (दूल्हा) यदि सामनेसे आते हों तो इन्हें मार्ग पहले देना चाहिये। ये सभी यदि एक साथ आते हों तो स्नातक और राजा मान्य हैं। इन दोनोंमेंसे भी स्नातक विशेष मान्य है१।
जो ब्राह्मण शिष्यका उपनयन कराकर रहस्य (यज्ञ, विद्या और उपनिषद्) तथा कल्पसहित वेदाध्ययन कराता है, उसे आचार्य कहते हैं। जो जीविकाके निमित्त वेदका एक भाग अथवा वेदाङ्ग पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहलाता है। जो निषेक अर्थात् गर्भाधानादि संस्कारोंको रीतिसे कराता है और अन्नादिसे पोषण करता है, उस ब्राह्मणको गुरु कहते हैं। जो अग्निष्टोम, अग्निहोत्र, पाक-यज्ञादि कर्मोंका वरण लेकर जिसके निमित्त करता है, वह उसका ऋत्विक् कहलाता है। जो पुरुष वेद-ध्वनिसे दोनों कान भर देता है, उसे माता-पिताके समान समझकर उससे कभी द्वेष नहीं करना चाहिये।
उपाध्यायसे दस गुना गौरव आचार्यका और आचार्यसे सौ गुना पिताका तथा पितासे हजार गुना गौरव माताका होता है—
उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।
<p align="right">(ब्राह्मपर्व ४।७९)</p>
सहस्रेण पितुर्माता गौरवेणातिरिच्यते॥
जन्म देनेवाला और वेद पढ़ानेवाला—ये दोनों पिता हैं, किंतु इनमें भी वेदाध्ययन करानेवाला श्रेष्ठ है, क्योंकि ब्राह्मणका मुख्य जन्म तो वेद पढ़नेसे ही होता है। इसलिये उपाध्याय आदि जितने पूज्य हैं, उनमें सबसे अधिक गौरव महागुरुका ही होता है।
राजा शतानीकने पूछा—हे मुने! आपने उपाध्याय आदिके लक्षण बताये, अब महागुरु किसे कहते हैं? यह भी बतानेकी कृपा करें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! जो ब्राह्मण जयोपजीवी हो अर्थात् अष्टादशपुराण, रामायण, विष्णुधर्म, शिवधर्म, महाभारत (भगवान् श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासद्वारा रचित महाभारत जो पञ्चम वेदके नामसे भी विख्यात है) तथा श्रौत एवं स्मार्त-धर्म (विद्वान् लोग इन सभीको ‘जय’ नामसे अभिहित करते हैं)—का ज्ञाता हो, वह महागुरु कहलाता है२। वह सभी वर्णोंके लिये पूज्य है। जो शास्त्रद्वारा थोड़ा या बहुत उपकार करे, उसको भी उस उपकारके बदले गुरु मानना चाहिये। अवस्थामें चाहे छोटा क्यों न हो, पढ़ानेसे वह बालक वृद्धका भी पिता हो सकता है। राजन्! इस विषयमें एक प्राचीन आख्यान सुनो—
पूर्वकालमें अङ्गिरा मुनिके पुत्र बृहस्पति (बालक होनेपर भी) बड़े वृद्धोंको पढ़ाते थे और पढ़ानेके समय ‘हे पुत्रो! पढ़ो’ ऐसा कहते थे। बालकद्वारा ‘पुत्र’ सम्बोधन सुनकर उनको बड़ा क्षोभ हुआ और वे देवताओंके पास गये तथा उन्होंने सारा वृत्तान्त बतलाया। तब देवताओंने कहा—पितृगणो! उस बालकने न्यायोचित बात ही कही है, क्योंकि
१-चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः। स्नातकस्य तु राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च॥
एषां समागमे तात पूज्यौ स्नातकपार्थिवौ। आभ्यां समागमे राजन् स्नातको नृपमानभाक्॥
२-जयोपजीवी यो विप्रः स महागुरुरुच्यते। अष्टादशपुराणानि रामस्य चरितं तथा॥
विष्णुधर्मादयो धर्माः शिवधर्माश्च भारत। कार्ष्णं वेदं पञ्चमं तु यन्महाभारतं स्मृतम्॥
श्रौता धर्माश्च राजेन्द्र नारदोक्ता महीपते। जयेति नाम एतेषां प्रवदन्ति मनीषिणः॥
२६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
जो अज्ञ हो अर्थात् कुछ न जानता हो वही सच्चे अर्थमें बालक है, किंतु जो मन्त्रको देनेवाला है (वेदोंको पढ़ानेवाला है), उपदेशक है, वह युवा आदि होनेपर भी पिता होता है। अवस्था अधिक होनेसे, केश श्वेत होनेसे और बहुत वित्त तथा बन्धु-बान्धवोंके होनेसे कोई बड़ा नहीं होता, बल्कि इस विषयमें ऋषियोंने यह व्यवस्था की है कि जो विद्यामें अधिक हो, वही सबसे महान् (वृद्ध) है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्रोंमें क्रमशः ज्ञान, बल, धन तथा जन्मसे बड़प्पन होता है। सिरके बाल श्वेत हो जानेसे कोई वृद्ध नहीं होता, यदि कोई युवा भी वेदादि शास्त्रोंका भलीभाँति ज्ञान प्राप्त कर ले तो उसीको वृद्ध (महान्) समझना चाहिये। जैसे काष्ठसे बना हाथी, चमड़ेसे मढ़ा मृग किसी कामका नहीं, उसी प्रकार वेदसे हीन ब्राह्मणका जन्म निष्फल है। मूर्खको दिया हुआ दान जैसे निष्फल होता है, वैसे ही वेदकी ऋचाओंको न जाननेवाले ब्राह्मणका जन्म निष्फल होता है। ऐसा ब्राह्मण नाममात्रका ब्राह्मण होता है। वेदोंका स्वयं कथन है कि जो हमें पढ़कर हमारा अनुष्ठान न करे, वह पढ़नेका व्यर्थ क्लेश उठाता है, इसलिये वेद पढ़कर वेदमें कहे हुए कर्मोंका जो अनुष्ठान करता है अर्थात् तदनुकूल आचरण करता है, उसीका वेद पढ़ना सफल है। जो वेदादि शास्त्रोंको जानकर धर्मका उपदेश करते हैं, वही उपदेश ठीक है, किंतु जो मूर्ख वेदादि शास्त्रोंको जाने बिना धर्मका उपदेश करते हैं, वे बड़े पापके भागी होते हैं। शौचरहित (अपवित्र), वेदसे रहित तथा नष्टव्रत ब्राह्मणको जो अन्न दिया जाता है, वह अन्न रोदन करता है कि 'मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया था जो ऐसे मूर्ख ब्राह्मणके हाथ पड़ा'। तथा वही अन्न यदि
जयोपजीवीको दिया जाय तो प्रसन्नतासे नाच उठता है और कहता है कि 'मेरा अहोभाग्य है, जो मैं ऐसे पात्रके हाथ आया।' विद्या और तपके अभ्याससे सम्पन्न ब्राह्मणके घरमें आनेपर सभी अन्नदि ओषधियाँ अति प्रसन्न होती हैं और कहती हैं कि अब हमारी भी सदगति हो जायगी। व्रत, वेद और जपसे हीन ब्राह्मणको दान नहीं देना चाहिये, क्योंकि पत्थरकी नाव नदीके पार नहीं उतार सकती। इसलिये श्रोत्रियको हव्य-कव्य देनेसे देवता और पितरोंकी तृप्ति होती है। घरके समीप रहनेवाले मूर्ख ब्राह्मणसे दूर रहनेवाले विद्वान् ब्राह्मणको ही बुलाकर दान देना चाहिये। परंतु घरके समीप रहनेवाला ब्राह्मण यदि गायत्री भी जानता हो तो उसका परित्याग न करे। परित्याग करनेसे रौरव नरककी प्राप्ति होती है, क्योंकि ब्राह्मण चाहे निर्गुण हो या गुणवान्, परंतु यदि वह गायत्री जानता है तो वह परमदेव-स्वरूप है। जैसे अन्नसे रहित् ग्राम, जलसे रहित कूप केवल नामधारक हैं, वैसे ही विद्याध्ययनसे रहित ब्राह्मण भी केवल नाममात्रका ब्राह्मण है।
प्राणियोंके कल्याणके लिये अहिंसा तथा प्रेमसे ही अनुशासन करना श्रेष्ठ है। धर्मकी इच्छा करनेवाले शासकको सदा मधुर तथा नम्र वचनोंका प्रयोग करना चाहिये। जिसके मन, वचन शुद्ध और सत्य हैं, वह वेदान्तमें कहे गये मोक्ष आदि फलोंको प्राप्त करता है। आर्त होनेपर भी ऐसा वचन कभी न कहे जिससे किसीकी आत्मा दुःखी हो और सुननेवालोंको अच्छा न लगे। दूसरेका अपकार करनेकी बुद्धि नहीं करनी चाहिये। पुरुषको जैसा आनन्द मीठी वाणीसे मिलता है, वैसा आनन्द न चन्द्रकिरणोंसे मिलता है, न चन्दनसे, न शीतल छायासे और न शीतल जलसे*। ब्राह्मणको
- न तथा शशी न सलिलं न चन्दनसो न शीतलच्छाया । प्रह्लादयति च पुरुषं यथा मधुरभाषिणी वाणी ॥ (ब्राह्मपर्व ४।१२८)
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* ब्राह्मपर्व * २७
चाहिये कि सम्मानकी इच्छाको भयंकर विषके समान समझकर उससे डरता रहे और अपमानको अमृतके समान स्वीकार करे, क्योंकि जिसकी अवमानना होती है, उसकी कुछ हानि नहीं होती, वह सुखी ही रहता है और जो अवमानना करता है, वह विनाशको प्राप्त होता है। इसलिये तपस्या करता हुआ द्विज नित्य वेदका अभ्यास करे, क्योंकि वेदाभ्यास ही ब्राह्मणका परम तप है।
ब्राह्मणके तीन जन्म होते हैं—एक तो माताके गर्भसे, दूसरा यज्ञोपवीत होनेसे और तीसरा यज्ञकी दीक्षा लेनेसे। यज्ञोपवीतके समय गायत्री माता और आचार्य पिता होता है। वेदकी शिक्षा देनेसे आचार्यको पिता कहते हैं, क्योंकि यज्ञोपवीत होनेके पूर्व किसी भी वैदिक कर्मके करनेका अधिकारी वह नहीं होता। श्राद्धमें पढ़े जानेवाले वेदमन्त्रोंको छोड़कर (अनुपनीत द्विज) वेदमन्त्रका उच्चारण न करे, क्योंकि जबतक वेदारम्भ न हो जाय, तबतक वह शूद्रके समान माना गया है। यज्ञोपवीत सम्पन्न हो जानेपर वटुको व्रतका उपदेश ग्रहण करना चाहिये और तभीसे विधिपूर्वक वेदाध्ययन करना चाहिये। यज्ञोपवीतके समय जो-जो मेखला-चर्म, दण्ड और यज्ञोपवीत तथा वस्त्र जिस-जिसके लिये कहा गया है वह-वह ही धारण करे। अपनी तपस्याकी वृद्धिके लिये ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय होकर गुरुके पास रहे और नियमोंका पालन करता रहे। नित्य स्नानकर पवित्र हो देवता, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करे। पुष्प, फल, जल, समिधा, मृत्तिका, कुशा और अनेक प्रकारके काष्ठोंका संग्रह रखे। मद्य, मांस, गन्ध, पुष्पमाला, अनेक प्रकारके रस और स्त्रियोंका परित्याग करे। प्राणियोंकी हिंसा, शरीरमें उबटन, अंजन लगाना, जूता और छत्र धारण करना, गीत सुनना, नाच देखना, जुआ खेलना, झूठ बोलना, निन्दा करना, स्त्रियोंके समीप बैठना और काम, क्रोध तथा लोभादिके वशीभूत होना—इत्यादि बातें ब्रह्मचारीके लिये निषिद्ध हैं। उसे संयमपूर्वक एकाकी रहना चाहिये। वह जल, पुष्प, गौका गोबर, मृत्तिका और कुशा तथा आवश्यकतानुसार भिक्षा नित्य लाये। जो पुरुष अपने कर्मोंमें तत्पर हों और वेदादि शास्त्रोंको पढ़ें तथा यज्ञादिमें श्रद्धावान् हों ऐसे गृहस्थोंके घरसे ही ब्रह्मचारीको भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। गुरुके कुलमें और अपने पारिवारिक बन्धु-बान्धवोंके घरोंसे भिक्षा न माँगे। यदि भिक्षा अन्यत्र न मिले तो इनके घरसे भी भिक्षा ग्रहण करे, किंतु जो महापातकी हों उनकी भिक्षा न ले। नित्य समिधा लाकर सायंकाल और प्रातःकाल हवन करे। भिक्षा माँगनेके समय वाणी संयमित रखे। ब्रह्मचारीके लिये भिक्षाका अन्न मुख्य है। एकका अन्न नित्य न ले। भिक्षावृत्तिसे रहना उपवासके बराबर माना गया है। यह धर्म केवल ब्राह्मणके लिये कहा गया है, क्षत्रिय और वैश्यके धर्ममें कुछ भेद है।
ब्रह्मचारी गुरुके सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ा रहे, जब गुरुकी आज्ञा हो तब बैठे, परंतु आसनपर न बैठे। गुरुके उठनेसे पूर्व उठे, सोनेके पश्चात् सोये, गुरुके सम्मुख अति नम्रतासे बैठे, परोक्षमें गुरुका नाम उच्चारण न करे, किसी भी बातमें गुरुका अनुकरण अर्थात् नकल न करे। गुरुकी निन्दा न करे और जहाँ निन्दा होती हो, आलोचना होती हो वहाँसे उठकर चला जाय अथवा कान बंद कर ले—
परीवादस्तथा निन्दा गुरोर्यत्र प्रवर्तते।
कर्णौ तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः॥
(ब्राह्मपर्व ४। १७१)
वाहनपर चढ़ा हुआ गुरुका अभिवादन न करे अर्थात् वाहनसे उतरकर प्रणाम करे। गुरुके साथ
२८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
एक वाहन, शिला, नौकायन आदिपर बैठ सकता है। गुरुके गुरु तथा श्रेष्ठ सम्बन्धीजनों एवं गुरुपुत्रके साथ गुरुके समान ही व्यवहार करे। गुरुकी सवर्णा स्त्रीको गुरुके समान ही समझे, परंतु गुरुपत्नीके उबटन लगाना, स्नानादि कराना, चरण दबाना आदि क्रियाएँ निषिद्ध हैं। माता, बहन या बेटीके साथ एक आसनपर न बैठे, क्योंकि बलवान् इन्द्रियोंका समूह विद्वान्को भी अपनी ओर खींच लेता है१। जिस प्रकार भूमिको खोदते-खोदते जल मिल जाता है, उसी प्रकार सेवा-शुश्रूषा करते-करते गुरुसे विद्या मिल जाती है। मुण्डन कराये हो, जटाधारी हो अथवा शिखी (बड़ी शिखासे युक्त) हो, चाहे जैसा भी ब्रह्मचारी हो उसको गाँवमें रहते हुए सूर्योदय और सूर्यास्त नहीं होना चाहिये अर्थात् जलके तट अथवा निर्जन स्थानपर जाकर दोनों संध्याओंमें संध्या-वन्दन करना चाहिये। जिसके सोते-सोते सूर्योदय अथवा सूर्यास्त हो जाय वह महान् पापका भागी होता है और बिना प्रायश्चित्त (कृच्छ्रव्रत)-के शुद्ध नहीं होता।
माता, पिता, भाई और आचार्यका विपत्तिमें भी अनादर न करे। आचार्य ब्रह्माकी मूर्ति हैं, पिता प्रजापतिकी, माता पृथ्वीकी तथा भाई आत्ममूर्ति है। इसलिये इनका सदा आदर करना चाहिये। प्राणियोंकी उत्पत्तिमें तथा पालन-पोषणमें माता-पिताको जो क्लेश सहन करना पड़ता है, उस क्लेशका बदला वे सौ वर्षोंमें भी सेवा करके नहीं चुका पाते२। इसलिये माता-पिता और गुरुकी सेवा नित्य करनी चाहिये। इन तीनोंके संतुष्ट हो
जानेसे सब प्रकारके तपोंका फल प्राप्त हो जाता है, इनकी शुश्रूषा ही परम तप कहा गया है। इन तीनोंकी आज्ञाके बिना किसी अन्य धर्मका आचरण नहीं करना चाहिये। ये ही तीनों लोक हैं, ये ही तीनों आश्रम हैं, ये ही तीनों वेद हैं और ये ही तीनों अग्नियाँ हैं। माता गार्हपत्य नामक अग्नि है, पिता दक्षिणाग्नि-स्वरूप है और गुरु आहवनीय अग्नि है। जिसपर ये तीनों प्रसन्न हो जायें, वह तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त कर लेता है और दीप्यमान होते हुए देवलोकमें देवताओंकी भाँति सुख-भोग करता है।
त्रिषु तुष्टेषु चैतेषु त्रैल्लोकाञ्जयते गृही।
दीप्यमानः स्ववपुषा देववद्विदि वि मोदते॥
(ब्राह्मपर्व ४।२०१)
पिताकी भक्तिसे इहलोक, माताकी भक्तिसे मध्यलोक और गुरुकी सेवासे इन्द्रलोक प्राप्त होता है। जो इन तीनोंकी सेवा करता है, उसके सभी धर्म सफल हो जाते हैं और जो इनका आदर नहीं करता, उसकी सभी क्रियाएँ निष्फल होती हैं। जबतक ये तीनों जीवित रहते हैं, तबतक इनकी नित्य सेवा-शुश्रूषा और इनका हित करना चाहिये। इन तीनोंकी सेवा-शुश्रूषारूपी धर्ममें पुरुषका सम्पूर्ण कर्तव्य पूरा हो जाता है, यही साक्षात् धर्म है, अन्य सभी उपधर्म कहे गये हैं।
उत्तम विद्या अधम पुरुषमें हो तो भी उससे ग्रहण कर लेनी चाहिये। इसी प्रकार चाण्डालसे भी मोक्षधर्मकी शिक्षा, नीच कुलसे भी उत्तम स्त्री, विषसे भी अमृत, बालकसे भी सुन्दर
१- मात्रा स्वस्वा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् । बलवान्निन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ (ब्राह्मपर्व ४।१८४)
२-आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः । माताप्यथादितेमूर्तिर्भ्राता स्यान्मूर्तिरात्मनः ॥
यन्मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम् । न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ॥
(ब्राह्मपर्व ४।१९५-१९६)
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- ब्राह्मपर्व *
२९
उपदेशात्मक बात, शत्रुसे भी सदाचार और अपवित्र स्थानसे भी सुवर्ण ग्रहण कर लेना चाहिये*। उत्तम स्त्री, रत्न, विद्या, धर्म, शौच, सुभाषित तथा अनेक प्रकारके शिल्प जहाँसे भी प्राप्त हों, ग्रहण कर लेने चाहिये। गुरुके शरीर-त्यागपर्यन्त जो गुरुकी सेवा करता है, वह श्रेष्ठ ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। पढ़नेके समय गुरुको कुछ देनेकी इच्छा न करे, किंतु पढ़नेके अनन्तर गुरुकी आज्ञा पाकर भूमि, सुवर्ण, गौ, घोड़ा, छत्र, उपागह, धान्य, शाक तथा वस्त्र आदि अपनी शक्तिके अनुसार गुरु-दक्षिणाके रूपमें देने चाहिये। जब
गुरुका देहान्त हो जाय, तब गुणवान् गुरुपुत्र, गुरुकी स्त्री और गुरुके भाइयोंके साथ गुरुके समान ही व्यवहार करना चाहिये। इस प्रकार जो अविच्छिन्न-रूपसे ब्रह्मचारिधर्मका आचरण करता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है।
सुमन्तु मुनि पुनः बोले—हे राजन्! इस प्रकार मैंने ब्रह्मचारिधर्मका वर्णन किया। ब्राह्मणका उपनयन वसन्तमें, क्षत्रियका ग्रीष्ममें और वैश्यका शरद्-ऋतुमें प्रशस्त माना गया है। अब गृहस्थधर्मका वर्णन सुनै।
(अध्याय ४)
विवाह-संस्कारके उपक्रममें स्त्रियोंके शुभ और अशुभ लक्षणोंका वर्णन तथा आचरणकी श्रेष्ठता
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! गुरुके आश्रममें ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए स्नातकको वेदाध्ययन कर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहिये। घर आनेपर उस ब्रह्मचारीको पहले पुष्प-माला पहनाकर, शय्यापर बिठाकर उसका मधुपर्कविधिसे पूजन करना चाहिये। तब गुरुसे आज्ञा प्राप्तकर उसे शुभ लक्षणोंसे युक्त सजातीय कन्यासे विवाह करना चाहिये।
राजा शतानीकने पूछा—हे मुनीश्वर! आप प्रथम स्त्रियोंके लक्षणोंका वर्णन करें और यह भी बतायें कि किन लक्षणोंसे युक्त कन्या शुभ होती है।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! पूर्वकालमें ऋषियोंके पूछनेपर ब्रह्माजीने स्त्रियोंके जो उत्तम लक्षण कहे हैं, उन्हें मैं संक्षेपमें बतलाता हूँ, आप ध्यान देकर सुनै।
ब्रह्माजीने कहा—ऋषिगणो! जिस स्त्रीके चरण लाल कमलके समान कान्तिवाले अत्यन्त कोमल
तथा भूमिपर समतल-रूपसे पड़ते हों अर्थात् बीचमें ऊँचे न रहें, वे चरण उत्तम एवं सुख-भोग प्रदान करनेवाले होते हैं। जिस स्त्रीके चरण रुखे, फटे हुए, मांसरहित और नाड़ियोंसे युक्त हों, वह स्त्री दरिद्रा और दुर्भगा होती है। यदि पैरकी अंगुलियाँ परस्पर मिली हों, सीधी, गोल, स्निग्ध और सूक्ष्म नखोंसे युक्त हों तो ऐसी स्त्री अत्यन्त ऐश्वर्यको प्राप्त करनेवाली और राजमहिषी होती है। छोटी अंगुलियाँ आयुको बढ़ाती हैं, परंतु छोटी और विरल अंगुलियाँ धनका नाश करनेवाली होती हैं।
जिस स्त्रीके हाथकी रेखाएँ गहरी, स्निग्ध और रक्तवर्णकी होती हैं, वह सुख भोगनेवाली होती है, इसके विपरीत टेढ़ी और टूटी हुई हों तो वह दरिद्र होती है। जिसके हाथमें कनिष्ठाके मूलसे तर्जनीतक पूरी रेखा चली जाय तो ऐसी
- श्रद्धानः शुभां विद्यामाददीतावरादपि । अन्त्यादपि परं धर्मं स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ॥ विषादय्यभूतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् । अमित्रादपि सदवृत्तममेध्यादपि काञ्चनम् ॥
(ब्राह्मपर्व ४। २०७-२०८)
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३०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
स्त्री सौ वर्षतक जीवित रहती है और यदि न्यून हो तो आयु कम होती है। जिस स्त्रीके हाथकी अँगुलियाँ गोल, लम्बी, पतली, मिलानेपर छिद्ररहित, कोमल तथा रक्तवर्णकी हों, वह स्त्री अनेक सुख-भोगोंको प्राप्त करती है। जिसके नख बन्धुजीव-पुष्पके समान लाल एवं ऊँचे और स्निग्ध हों तो वह ऐश्वर्यको प्राप्त करती है तथा रूखे, टेढ़े, अनेक प्रकारके रंगवाले अथवा श्वेत या नीले-पीले नखोंवाली स्त्री दुर्भाग्य और दारिद्र्यको प्राप्त होती है। जिस स्त्रीके हाथ फटे हुए, रूखे और विषम अर्थात् ऊँचे-नीचे एवं छोटे-बड़े हों वह कष्ट भोगती है। जिस स्त्रीकी अँगुलियोंके पर्वमें समान रेखा हो अथवा यवका चिह्न होता है, उसे अपार सुख तथा अक्षय धन-धान्य प्राप्त होता है। जिस स्त्रीका मणिबन्ध सुस्पष्ट तीन रेखाओंसे सुशोभित होता है, वह चिरकालतक अक्षय भोग और दीर्घ आयुको प्राप्त करती है।
जिस स्त्रीकी ग्रीवामें चार अङ्गुलके परिमाणमें स्पष्ट तीन रेखाएँ हों तो वह सदा रत्नोंके आभूषण धारण करनेवाली होती है। दुर्बल ग्रीवावाली स्त्री निर्धन, दीर्घ ग्रीवावाली बन्धकी, ह्रस्वग्रीवावाली मृतवत्सा होती है और स्थूल ग्रीवावाली दुःख-संताप प्राप्त करती है। जिसके दोनों कंधे और कृकाटिका (गरदनका उठा हुआ पिछला भाग) ऊँचे न हों, वह स्त्री दीर्घ आयुवाली तथा उसका पति भी चिरकालतक जीता है।
जिस स्त्रीकी नासिका न बहुत मोटी, न पतली, न टेढ़ी, न अधिक लम्बी और न ऊँची होती है वह श्रेष्ठ होती है। जिस स्त्रीकी भौंहें ऊँची, कोमल, सूक्ष्म तथा आपसमें मिली हुई न हों, ऐसी स्त्री सुख प्राप्त करती है। धनुषके समान भौंहें सौभाग्य प्रदान करनेवाली होती हैं। स्त्रियोंके काले, स्निग्ध, कोमल और लम्बे
घुँघराले केश उत्तम होते हैं।
हंस, कोयल, वीणा, भ्रमर, मयूर तथा वेणु (वंशी) के समान स्वरवाली स्त्रियाँ अपार सुख-सम्पत्ति प्राप्त करती हैं और दास-दासियोंसे युक्त होती हैं। इसके विपरीत फूटे हुए काँसेके स्वरके समान स्वरवाली या गर्दभ और कौवेके सदृश स्वरवाली स्त्रियाँ रोग, व्याधि, भय, शोक तथा दरिद्रताको प्राप्त करती हैं। हंस, गाय, वृषभ, चक्रवाक तथा मदमस्त हाथीके समान चालवाली स्त्रियाँ अपने कुलको विख्यात बनानेवाली और राजाकी रानी होती हैं। शान, सियार और कौवेके समान गतिवाली स्त्री निन्दनीय होती है। मृगके समान गतिवाली दासी तथा द्रुतगामिनी स्त्री बन्धकी होती है। स्त्रियोंका फलिनी, गोरोचन, स्वर्ण, कुंकुम अथवा नये-नये निकले हुए दूरबुङ्गुरके सदृश रंग उत्तम होता है। जिन स्त्रियोंके शरीर तथा अङ्ग कोमल, रोम और पसीनेसे रहित तथा सुगन्धित होते हैं, वे स्त्रियाँ पूज्य होती हैं।
कपिलवर्णवाली, अधिकाङ्गी, रोगिणी, रोमोंसे रहित, अत्यन्त छोटी (बौनी), वाचाल तथा पिंगल-वर्णवाली कन्यासे विवाह नहीं करना चाहिये। नक्षत्र, वृक्ष, नदी, म्लेच्छ, पर्वत, पक्षी, साँप आदि और दासीके नामपर जिसका नाम हो तथा डरावने नामवाली कन्यासे विवाह नहीं करना चाहिये। जिसके सब अङ्ग ठीक हों, सुन्दर नाम हो, हंस या हाथीकी-सी गति हो, जो सूक्ष्म रोम, केश और दाँतोंवाली तथा कोमलाङ्गी हो, ऐसी कन्यासे विवाह करना उत्तम होता है। गौ तथा धन-धान्यादिसे अत्यधिक समृद्ध होनेपर भी इन दस कुलोंमें विवाहका सम्बन्ध स्थापित नहीं करना चाहिये—जो संस्कारोंसे रहित हों, जिनमें पुरुष-संतति न होती हो, जो वेदके पठन-पाठनसे रहित हों, जिनमें स्त्री-पुरुषोंके शरीरोंपर बहुत लम्बे केश हों, जिनमें
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- ब्राह्मपर्व *
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अर्श (बवासीर), क्षय (राजयक्ष्मा), मन्दाग्रि, मिस्गी, श्वेत दाग और कुष्ठ-जैसे रोग होते हैं।
ब्रह्माजीने ऋषियोंसे पुनः कहा—ये सब उत्तम लक्षण जिस कन्यामें हों और जिसका आचरण भी अच्छा हो उस कन्यासे विवाह करना चाहिये। स्त्रीके लक्षणोंकी अपेक्षा उसके सदाचारको ही अधिक प्रशस्त कहा गया है। जो स्त्री सुन्दर शरीर
तथा शुभ लक्षणोंसे युक्त भी है, किंतु यदि वह सदाचारसम्पन्न (उत्तम आचरणयुक्त) नहीं है तो वह प्रशस्त नहीं मानी गयी है। अतः स्त्रियोंमें आचरणकी मर्यादाको अवश्य देखना चाहिये*। ऐसे सल्लक्षणों तथा सदाचारसे सम्पन्न सुकन्यासे विवाह करनेपर ऋद्धि, वृद्धि तथा सत्कीर्ति प्राप्त होती है। (अध्याय ५)
गृहस्थाश्रममें धन एवं स्त्रीकी महत्ता, धन-सम्पादन करनेकी आवश्यकता तथा समान कुलमें विवाह-सम्बन्धकी प्रशंसा
राजा शतानीकने सुमन्तु मुनिसे पूछा—भगवन्! स्त्रियोंके लक्षणोंको तो मैंने सुना, अब उनके सद्वृत्त (सदाचार)-को भी मैं सुनना चाहता हूँ, उसे आप बतलानेकी कृपा करें।
सुमन्तु मुनि बोले—महाबाहु शतानीक! ब्रह्माजीने ऋषियोंको स्त्रियोंके सद्वृत्त भी बतलाये हैं, उन्हें मैं आपको सुनाता हूँ, आप ध्यानपूर्वक सुनें। जब ऋषियोंने स्त्रियोंके सद्वृत्तके विषयमें ब्रह्माजीसे प्रश्न किया तब ब्रह्माजी कहने लगे—मुनीश्वरो! सर्वप्रथम गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेवाला व्यक्ति यथाविधि विद्याध्ययन करके सत्कर्मोद्धार धनका उपार्जन करे, तदनन्तर सुन्दर लक्षणोंसे युक्त और सुशील कन्यासे शास्त्रोक्त विधिसे विवाह करे। धनके बिना गृहस्थाश्रम केवल विडम्बना है। इसलिये धन-सम्पादन करनेके अनन्तर ही गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहिये। मनुष्यके लिये घोर नरककी यातना सहनी अच्छी है, किंतु घरमें क्षुधासे तड़पते हुए स्त्री-पुत्रोंको देखना अच्छा नहीं है। फटे और मैले-कुचैले वस्त्र पहने, अति दीन और भूखे स्त्री-पुत्रोंको देखकर जिनका
हृदय विदीर्ण नहीं होता, वे वज्रके समान अति कठोर हैं। उनके जीवनको धिककार है, उनके लिये तो मृत्यु ही परम उत्सव है अर्थात् ऐसे पुरुषका मर जाना ही श्रेष्ठ है। अतः स्त्रीग्रहण करनेवाले अर्थहीन पुरुषके त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम)-की सिद्धि कहाँ सम्भव है? वह स्त्री-सुख न प्राप्त कर यातना ही भोगता है। जैसे स्त्रीके बिना गृहस्थाश्रम नहीं हो सकता, उसी प्रकार धन-विहीन व्यक्तियोंको भी गृहस्थ बननेका अधिकार नहीं है। कुछ लोग संतानको ही त्रिवर्गका साधन मानते हैं अर्थात् संतानसे ही धर्म, अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है, ऐसा समझते हैं; परंतु नीतिविशारदोंका यह अभिमत है कि धन और उत्तम स्त्री—ये दोनों त्रिवर्ग-साधनके हेतु हैं। धर्म भी दो प्रकारका कहा गया है—इष्ट धर्म और पूर्त धर्म। यज्ञादि करना इष्ट धर्म है और वापी, कूप, तालाब आदि बनवाना पूर्त धर्म है। ये दोनों धनसे ही सम्पन्न होते हैं।
दरिद्रीके बन्धु भी उससे लज्जा करते हैं और धनाढ्यके अनेक बन्धु हो जाते हैं। धन ही त्रिवर्गका
- लक्षणेभ्यः प्रशस्तं तु स्त्रीणां सद्वृत्तमुच्यते। सद्वृत्तयुक्ता या स्त्री सा प्रशस्ता न च लक्षणीः ॥ (ब्राह्मपर्व ५।११०)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मूल है। धनवान्में विद्या, कुल, शील अनेक उत्तम गुण आ जाते हैं और निर्धनमें विद्यमान होते हुए भी ये गुण नष्ट हो जाते हैं। शास्त्र, शिल्प, कला और अन्य भी जितने कर्म हैं, उन सबका तथा धर्मका साधन भी धन ही है। धनके बिना पुरुषका जन्म अजागल-स्तनवत् व्यर्थ ही है।
पूर्वजन्ममें किये गये पुण्योंसे ही इस जन्ममें प्रभूत धनकी प्राप्ति होती है और धनसे पुण्य होता है। इसलिये धन और पुण्यका अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है अर्थात् ये एक-दूसरेके कारक हैं। पुण्यसे धनार्जन होता है और धनसे पुण्यार्जन होता है—
प्राक्युण्यैर्विपुला सम्पद्भर्माकामादिहेतुजा।
भूयो धर्मैण सामुत्र तथा ताविति च क्रमः॥
(ब्राह्मपर्व ६।२३)
—इसलिये विद्वान् मनुष्यको इसी रीतिसे त्रिवर्ग-साधन करना चाहिये। स्त्रीरहित तथा निर्धन पुरुषका त्रिवर्ग-साधनमें अधिकार नहीं है। अतः भार्या-ग्रहणसे पूर्व उत्तम रीतिसे अर्थार्जन अवश्य कर लेना चाहिये। न्यायोपाजित धनकी प्राप्ति होनेपर दार-परिग्रह करना चाहिये। अपने कुलके अनुरूप, धन, क्रिया आदिसे प्रसिद्ध, अनिन्दित, सुन्दर तथा धर्मकी साधनभूता कन्याको प्राप्त करना चाहिये। जबतक विवाह नहीं होता है, तबतक पुरुष अर्ध-शरीर ही होता है। इसलिये यथाक्रम उचित अवसर प्राप्त हो जानेपर विवाह करना चाहिये। जैसे एक पहियेका रथ अथवा एक पंखवाला पक्षी किसी कार्यमें सफल नहीं हो पाता, वैसे ही स्त्रीहीन पुरुष
भी प्रायः सभी धर्मकृत्योंमें असफल ही रहता है— एकचक्रो रथो यद्देकपक्षो यथा खगः। अभार्योऽपि नरः तद्द्वयोग्यः सर्वकर्मसु॥
(ब्राह्मपर्व ६।३०)
पत्नी-परिग्रहसे धर्म तथा अर्थ दोनोंमें बहुत लाभ होता है और इससे आपसमें प्रीति उत्पन्न होती है, सत्प्रीतिसे कामरूपी तृतीय पुरुषार्थ भी प्राप्त हो जाता है, ऐसा विद्वानोंका कहना है। विवाह-सम्बन्ध तीन प्रकारका होता है—नीच कुलमें, समान कुलमें और उत्तम कुलमें। नीच कुलमें विवाह करनेसे निन्दा होती है। उत्तम कुलवालेके साथ विवाह करनेसे वे अनादर करते हैं। अपनेसे बड़े लोगोंके साथ बनाया गया विवाह-सम्बन्ध, नीचके साथ बनाये गये विवाह-सम्बन्धके प्रायः समान ही होता है। इस कारण अपने समान कुलमें ही विवाह करना चाहिये। मनस्वी लोग विजातीय सम्बन्ध भी ठीक नहीं मानते। यह वैसा ही सम्बन्ध होता है जैसे कोयल और शुक्का। जिस सम्बन्धमें प्रतिदिन स्नेहकी अभिवृद्धि होती रहती है और विपत्ति-सम्पत्तिके समय भी प्राणतक भी देनेमें विचार न किया जाय, वह सम्बन्ध उत्तम कहलाता है। परंतु यह बात उनमें ही होती है जो कुल, शील, विद्या और धन आदिमें समान होते हैं। मनुष्योंके स्नेह और कृतज्ञताकी परीक्षा विपत्तिमें ही होती है। इसलिये विवाह और परामर्श समानके साथ ही करना चाहिये, अपनेसे बड़े तथा छोटेके साथ नहीं। इसीमें अच्छी मित्रता रहती है। (अध्याय ६)
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नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्
गीताप्रेस, गोरखपुर
नर-नारायण, सरस्वतीदेवी और व्यासदेवकी वन्दना
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गीताप्रेस, गोरखपुर जनमेजयका सर्प-यज्ञ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
A vibrant, full-page illustration of Lord Kartikeya, the Hindu deity of war. He is depicted with seven heads and seven arms, seated on an ornate red throne. He wears a yellow dhoti and is adorned with gold jewelry and garlands. His right hand is raised in a blessing gesture, while his other hands hold a conch shell, a bow, and a sword. A black bird with a white eye is perched on the floor in front of him. The background features green peacock feathers and a decorative archway.
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् कार्तिकेय
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