भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्यालग्न : षष्ठभाव : चन्द्र छठे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को शत्रु पक्ष द्वारा मानसिक अशान्ति बनी रहती है, परन्तु वह अपनी विनम्रता द्वारा शत्रु-पक्ष पर सफलता पाता है और उससे लाभ भी उठाता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी मिलता रहता है। ६७८ 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्यालग्न : सप्तमभाव : चन्द्र सातवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को सुन्दर पत्नी मिलती है, भोगादि के श्रेष्ठ साधन प्राप्त होते हैं तथा व्यवसाय में भी सफलता मिलती है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य, शक्ति एवं प्रसन्नता की प्राप्ति होती है। ऐसा जातक सुन्दर, स्वस्थ, सुखी तथा सम्पन्न होता है। ६७९ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्यालग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की दीर्घायु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है। आय के साधनों में कुछ कठिनाइयां आती हैं, परन्तु बाहरी स्थानों से लाभ होता है। सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है। ६८०