भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
३०६ 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्यालग्न : षष्ठभाव : चन्द्र छठे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को शत्रु पक्ष द्वारा मानसिक अशान्ति बनी रहती है, परन्तु वह अपनी विनम्रता द्वारा शत्रु-पक्ष पर सफलता पाता है और उससे लाभ भी उठाता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी मिलता रहता है। ६७८ 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्यालग्न : सप्तमभाव : चन्द्र सातवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को सुन्दर पत्नी मिलती है, भोगादि के श्रेष्ठ साधन प्राप्त होते हैं तथा व्यवसाय में भी सफलता मिलती है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य, शक्ति एवं प्रसन्नता की प्राप्ति होती है। ऐसा जातक सुन्दर, स्वस्थ, सुखी तथा सम्पन्न होता है। ६७९ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्यालग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की दीर्घायु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है। आय के साधनों में कुछ कठिनाइयां आती हैं, परन्तु बाहरी स्थानों से लाभ होता है। सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है। ६८०
३०७ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : नवमभाव : चन्द्र नवें भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को धन का यथेष्ट लाभ होता है तथा आकस्मिक दैवी सहायताएँ भी मिलती रहती हैं। सातवीं नीच-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख में कुछ कमी आती है तथा पराक्रम की भी अधिक वृद्धि नहीं हो पाती। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : दशमभाव : चन्द्र दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को राज्य, पिता एवं व्यवसाय के पक्ष से पूर्ण लाभ तथा सम्मान मिलता है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा यशस्वी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से भूमि, भवन तथा माता का सुख भी पर्याप्त मिलता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : एकादशभाव : 'चन्द्र ग्यारहवें भाव में स्वराशिस्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी रहती है और वह अपने मनोबल द्वारा पर्याप्त धन कमाता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या में कमी रहती है तथा सन्तानों से वैमनस्य रहता है, परन्तु वह अपनी चतुराई द्वारा अन्य क्षेत्रों में उन्नति करता रहता है।
३०८ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से सम्बन्ध से पर्याप्त लाभ भी होता है। खर्च के कारण कभी-कभी मन में चिन्ताएं बनी रहती हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु- पक्ष में धन के खर्च एवं विनम्रता से सफलता मिलती है। बीमारी तथा अन्य झगड़ों में भी खर्च होता है। 'कन्या' लग्न में मंगल 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित अष्टमेश 'मंगल' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी आती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। चौथी मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कमी आती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि के अष्टमभाव को देखने से आयु की वृद्धि तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। ऐसे व्यक्ति का जीवन संघर्षपूर्ण रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : द्वितीयभाव : मंगल दूसरे भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक के भाई-बहिन के सुख में कुछ कमी आती है। परन्तु धन का लाभ होता है। चौथी उच्च दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में प्रयत्न करने से लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। नवीं शत्रु-दृष्टि से देखने से धर्म-पालन तथा भाग्योन्नति में कुछ कमियां बनी रहती हैं।
३०६ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : तृतीयभाव : मंगल तीसरे भाव में स्वराशि-स्थित व्ययेश 'मंगल' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में तो वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी आती है। आयु तथा पुरातत्त्व का श्रेष्ठ लाभ होता है। चौथी शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव के देखने से शत्रु- पक्ष पर प्रभाव रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवम- भाव को देखने से भाग्योन्नति तथा धर्म-पालन में कठिनाइयाँ आती हैं। आठवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में अधिक परिश्रम करने पर भी थोड़ी सफलता मिलती है तथा पिता का सुख भी कम ही रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : चतुर्थभाव : मंगल चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित अष्टमेश 'मंगल' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि, भवन तथा भाई-बहिनों के सुख में कमी आती है, परन्तु पुरातत्त्व का लाभ होता है। चौथी मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। आठवीं नीच-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से लाभ के मार्ग में रुकावटें आती हैं। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : पंचमभाव : मंगल पाँचवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक की कुछ कठिना- इयों के साथ सन्तान-पक्ष की शक्ति तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरा- तत्त्व की शक्ति बनती है। सातवीं नीच-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आय के मार्ग में कठिनाइयाँ आती हैं। आठवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है तथा प्रभाव बढ़ता है।
३१० 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : षष्ठभाव : मंगल छठे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर विजय पाता है। वह परिश्रमी तथा पुरुषार्थी होता है, परन्तु भाई- बहिनों में कुछ विरोध रहता है । आयु तथा पुरातत्त्व का अच्छा लाभ होता है । चौथी शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य एवं धर्म के क्षेत्र में कमजोरी रहती है । सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है । आठवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक स्वास्थ्य में कमी तथा रक्त-विकार आदि रोग रहते हैं । 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कष्ट मिलता है तथा आयु एवं पुरातत्त्व की वृद्धि होती है । पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिनों के सुख मे न्यूनाधिकता बनी रहती है । चौथी मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में उन्नति होती है । सातवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथम- भाव को देखने से शरीर में कुछ परेशानियां रहती हैं । आठवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीय- भाव को देखने से धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख में भी कमी बनी रहती है । 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव मे स्वराशि में स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी आती है । चौथी नीच दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है । सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वितीयभाव' को देखने मे धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख में कुछ असंतोष रहता है । आठवीं दृष्टि से स्वराशि के तृतीयभाव को देखने से पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख में वृद्धि होती है तथा गुप्त हिम्मत बढ़ती है ।
३११ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित अष्टमेश 'मंगल' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म के पक्ष में कुछ कमी आती है तथा आयु एवं पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। चौथी मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले तृतीय भाव को देखने से पराक्रम की वृद्धि होती है तथा कुछ कठिनाइयों के साथ भाई-बहिनों का सुख मिलता है। आठवीं मित्र दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से कुछ कमी के साथ माता, भूमि एवं भवन का सुख भी प्राप्त होत है। सामान्यतः जीवन शानदार बना रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में शत्रु 'बुध' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाइयों के साथ पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होत है, परन्तु भाई-बहिनों के सुख में कुछ कमी रहती है। चौथी शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर विकार-ग्रस्त रहता है, जब कि हिम्मत बढ़ी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। आठवीं उच्चदृष्टि से पञ्चमभाव को देखने से सन्तान-पक्ष में कुछ कमी के साथ सफलता मिलती है तथा विद्या-बुद्धि की पर्याप्त वृद्धि होती है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को लाभ के क्षेत्र में कुछ कठिनाई आती है, परन्तु आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है। चौथी शत्रुदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख में कमी आती है। सातवीं उच्च दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या एवं बुद्धि की उन्नति होती है तथा सन्तान के पक्ष में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। आठवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है। ऐसा जातक बड़ा हिम्मती, बहुत बोलने वाला तथा बहादुर होता है।
३१२ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : द्वादशभाव : मंगल बारहवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है तथा बाहरी सम्बन्धों से कुछ शक्ति भी मिलती है। आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयाँ आती रहती हैं। चौथी दृष्टि से स्वराशि वाले तृतीयभाव को देखने से पराक्रम एवं भाई- बहिन के सुख में सामान्य वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष पर कुछ कठिनाइयों के बाद प्रभाव स्थापित हो पाता है। आठवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री पक्ष में कुछ कठिनाई रहती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में परिश्रम तथा कठिनाइयों के बाद सफलता मिलती है। 'कन्या' लग्न में 'बुध' 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में स्वराशि-स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में वृद्धि होती है। राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। सातवीं नीच-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा दैनिक आय के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। ऐसा व्यक्ति अत्यधिक स्वाभिमानी होता है, इस कारण व्यवसाय में अधिक उन्नति नहीं कर पाता। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के धन तथा कौटुम्बिक सुख में वृद्धि होती है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति प्राप्त होती है। ऐसे व्यक्ति का रहन-सहन ऐश्वर्यशाली होता है। वह धनी तथा सुखी भी रहता है।
३१३ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के पराक्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है। राज्य, व्यवसाय तथा पिता के पक्ष में भी सफलता मिलती है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी, धर्मात्मा, यशस्वी तथा प्रभावशाली होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है। शारीरिक सौन्दर्य तथा सुख में भी वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के एकादशभाव को देखने से राज्य, पिता एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सब प्रकार की सफलताएँ प्राप्त होती हैं। 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का पर्याप्त सुख मिलता है और उच्च पद की प्राप्ति होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से एकादशभाव को देखने के कारण आमदनी के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ वृद्धि होती है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति सुन्दर, सुखी, धनी तथा स्वाभिमानी होता है।
३१४ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में विवेक एवं युक्तियों के द्वारा सफलताएँ मिलती हैं । ननिहाल-पक्ष से भी लाभ होता है । परन्तु शारीरिक सौन्दर्य तथा पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ असन्तोष रहता है । सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों से अच्छा लाभ एवं सुख प्राप्त होता है । 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक अपनी पत्नी के व्यक्तित्व के समक्ष स्वयं को कुछ हीन-सा अनुभव करता है तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिन परिश्रम करना पड़ता है । पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सामान्य सफलताएँ प्राप्त होती हैं । सातवीं उच्चदृष्टि से स्वराशि वाले प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव एवं मानसिक सुख-शान्ति में भी कुछ कमी रहती है । 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : अष्टमभाव : बुध आठवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती रहती हैं । बाहरी सम्बन्धों से आजीविका चलती रहती है । सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण गुप्त युक्तियों के आश्रय से धन की वृद्धि होती है तथा कुटुम्ब से प्रेम रहता है ।
३१५ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : नवमभाव : बुध नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के भाग्य एवं धर्म की उन्नति होती है तथा राज्य, पिता एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं । सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सज्जन, सुखी, यशस्वी तथा धनी होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : दशमभाव : बुध दसवें भाव में स्वक्षेत्री 'बुध' के प्रभाव से जातक को राज्य, पिता एवं व्यवसाय के क्षेत्र में अत्यधिक सफलता, यश तथा सम्मान की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति सुन्दर, यशस्वी, स्वाभिमानी तथा सुखी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन आदि का सुख भी पर्याप्त उपलब्ध होता है। घरेलू जीवन सुख, शान्ति तथा ऐश्वर्य से पूर्ण रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी रहती है तथा पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ प्राप्त होती हैं। शारीरिक सौन्दर्य, मनोबल एवं सुख में भी वृद्धि होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से पञ्चमभाव को देखने से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में भी विशेष उन्नति प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी, विद्वान् तथा ऐश्वर्यशाली होता है।
३१६ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्यालग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्पर्क से सम्मान तथा लाभ की प्राप्ति होती है। परन्तु पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में असन्तोष रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु- पक्ष पर सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति दूरदर्शी, विवेकी तथा बुद्धिमान् होता है। 'कन्या' लग्न में 'गुरु' 'कन्या' लग्न की कुंडली में 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्यालग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को श्रेष्ठ शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य की प्राप्ति होती हैं। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। पांचवीं नीचदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में कठिनाइयां आती रहती हैं। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव को देखने से स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख मिलता है। नवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्योन्नति एवं धर्म के क्षेत्र में बाधाएं आती रहती हैं। परन्तु ऐसा व्यक्ति सज्जन तथा धनी होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्यालग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में सामान्य शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को धन, कुटुम्ब का सुख मिलता है, परन्तु माता एवं स्त्री के सुख में कुछ बाधाएं आती हैं जबकि व्यवसाय-पक्ष की उन्नति होती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव की देखने से शत्रु- पक्ष में प्रभाव स्थापित होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। नवीं मित्र- दृष्टि से एकादशभाव की देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ, यश तथा सम्मान की प्राप्ति होती है।
३१७ 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्या लग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख में वृद्धि होती है और माता, भूमि तथा भवन का सुख भी प्राप्त होता है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष से भी सफलताएँ मिलती हैं। स्त्री सुन्दर मिलती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कुछ रुकावटों के साथ उन्नति होती है। नवीं उच्चदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी बहुत अच्छी रहती है। ऐसा जातक धनी तथा सुखी रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली से 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्या लग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में स्वक्षेत्री 'गुरु' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख मिलता है। स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं मित्र- दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएं मिलती रहती हैं। नवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में लाभ मिलता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्या लग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर नीच के गुरु के प्रभाव से जातक की सन्तान पक्ष से कष्ट मिलता है तथा विद्या एवं बुद्धि में कमी रहती है। मातृ- पक्ष भी कमजोर रहता है। पांचवी शत्रु-दृष्टि से नवम- भाव को देखने से भाग्य एवं धर्म की सामान्य वृद्धि होती है। सातवीं उच्च-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी में वृद्धि होती है तथा नवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक, शक्ति, सम्मान, प्रभाव एवं कार्य-कुशलता में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी तथा सामान्य धनी होता है।
३१८ 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्या लग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में नम्रता से काम निकालता है। माता, भूमि एवं भवन के सुख में भी कमी रहती है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ सफलताओं, सुख तथा यश की प्राप्ति होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से लाभ होता है। नवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से कुटुम्ब का सामान्य सुख मिलता है तथा धन-संचय के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्या लग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में स्वक्षेत्री 'गुरु' के प्रभाव से जातक को स्त्री एवं व्यवसाय-पक्ष में पर्याप्त लाभ मिलता है। माता, भूमि तथा मकान का यथेष्ट सुख भी प्राप्त होता है। पाँचवीं उच्चदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी में बहुत वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक-सुख, मान एवं सौन्दर्य की प्राप्ति होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख एवं पराक्रम में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी तथा यशस्वी होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्या लग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। परन्तु स्त्री तथा व्यवसाय के सुख में कुछ कमी आती है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-वृद्धि के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है तथा कौटुम्बिक सुख में भी कमी आती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख कुछ परेशानियों के साथ मिलता है।
३१६ 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्या लग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में कुछ कठि- नाइयाँ आती हैं। स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कुछ कमी रहती है, परन्तु माता, भूमि तथा भवन का सुख प्राप्त होता है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से सुख-सम्मान की वृद्धि होती है तथा भोगेच्छा प्रबल रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। नवीं नीच-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या तथा सन्तान के पक्ष में कुछ कमजोरी आती है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्या लग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की पिता, राज्य तथा व्यव- साय से लाभ होता है। स्त्री सुन्दर तथा प्रभावशाली मिलती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन, कुटुम्ब का सामान्य लाभ होता है। सातवीं दृष्टि अपनी राशि में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है। नवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रु-पक्ष में शान्ति-नीति से विजय मिलती है तथा उससे लाभ भी होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्या लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की आमदनी बढ़ती है तथा माता, भूमि एवं मकान का यथेष्ट सुख भी मिलता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम एवं भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है। सातवीं नीचदृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान-पक्ष से परेशानी रहती है तथा विद्या-बुद्धि में कमी आती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तम भाव को देखने से सुन्दर तथा योग्य पत्नी मिलती है। भोगादि का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है तथा व्यवसाय में भी उन्नति होती है।
३२० 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्या लग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से लाभ भी मिलता है। स्त्री के सुख में कमी आती है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सामान्य सुख मिलता है। सातवीं शत्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु पक्ष में नम्रता से काम निकालना पड़ता है। नवीं मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। ऐसा जातक सामान्यतः सुखी जीवन बिताता है। 'कन्या' लग्न में 'शुक्र' 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित नीच के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के धन तथा कौटुम्बिक सुख में कुछ कमी रहती है और वह अधर्म- पूर्वक भी धन कमाने का प्रयत्न करता है। सातवीं उच्चदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री सुन्दर तथा भाग्यवान् मिलती है तथा व्यवसाय एवं भोगादि में भी पर्याप्त सफलता प्राप्त होती है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में स्वराशि स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक के धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है। वह भाग्यवान्, यशस्वी तथा धर्मात्मा भी होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति चतुर, धनी, सुखी तथा यशस्वी होता है।
३२१ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिन का अच्छा सुख मिलता है तथा पराक्रम में भी वृद्धि होती है। कौटुम्बिक सुख को भी वह बढ़ाता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म में बहुत वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति बहुत सुखी, धनी, धर्मात्मा तथा भाग्यशाली होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित शुक्र' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट लाभ होता है तथा धन एवं कुटुम्ब का सुख भी मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सम्मान तथा लाभ की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति धर्म का पालन भी करता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : पंचमभाव : शुक्र पांचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से श्रेष्ठ लाभ होता है तथा विद्या-बुद्धि की वृद्धि के साथ धन, धर्म तथा भाग्य की वृद्धि भी होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से एकादशभाव को देखने से जातक अपनी बुद्धि एवं चातुर्य के बल पर आमदनी को बढ़ाता है तथा निरन्तर उन्नति करता रहता है।
३२२ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के भाग्य, धन तथा कौटुम्बिक सुख में कुछ कमी आती है तथा धर्म में भी अरुचि रहती है, फिर भी वह अपनी चतुराई द्वारा भाग्य तथा धन की वृद्धि करता है तथा परिश्रम द्वारा शत्रु-पक्ष में सफलताएँ पाता है। उसे झगड़े-मुकदमों से भी लाभ होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से सुख एवं लाभ की प्राप्ति होती है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में सामान्य शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की सुन्दर स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति भोगी, धर्मात्मा, सुखी तथा भाग्यवान् होता है। सातवीं नीचदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी आती है। ऐसा व्यक्ति धन-वृद्धि के लिए शारीरिक सुखों की चिन्ता नहीं करता। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का भाग्य कमजोर रहता है तथा धन-संचय में भी कठिनाइयाँ आती हैं। धर्म का समुचित पालन भी नहीं हो पाता। पर आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं नीच दृष्टि से स्वराशि वाले द्वितीय भाव को देखने से जातक गुप्त चातुर्य एवं कठोर परिश्रम द्वारा धन-संचय करता है।
३२३ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक बडा भाग्यशाली तथा धर्मात्मा होता है। उसके धन, सम्मान तथा यश में भी वृद्धि होती है। सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों की शक्ति तथा पुरुषार्थ में वृद्धि होती है। साथ ही धन एव कुटुम्ब का पूर्ण सुख भी मिलता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : दशमभाव दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित शुक्र' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा 'व्यवसाय के क्षेत्र में विशेष सुख, सम्मान तथा सफलताएँ प्राप्त होती हैं। वह अपने अच्छे कर्मों से धन एव कुटुम्ब की वृद्धि करता है। सातवीं सामान्य शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन आदि का सुख कुछ कमी के साथ प्राप्त होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी रहती है। वह धनी, कुटुम्बवाला, धर्मात्मा, भाग्यशाली तथा न्यायी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या-बुद्धि की उन्नति होती है तथा सन्तान-पक्ष से सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति प्रभावयुक्त वाणी का धनी, चतुर, निपुण, सुखी तथा यशस्वी होता है।
३२४ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित शुक्र' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, बाहरी सम्बन्धों से हानि होती है, धन- संचय नहीं हो पाता तथा भाग्योन्नति में व्यवधान पड़ता है । कौटुम्बिक सुख में भी कमी रहती है । सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष एवं झगड़े-मुकदमों में सफलता एवं लाभ की प्राप्ति होती है । 'कन्या लग्न में 'शनि' 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कन्या लग्न : प्रथमभाव - शनि पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक का शरीर रोगी रहता है । विद्या-बुद्धि तथा सन्तान का सुख प्राप्त होता है, परन्तु सन्तान से वैमनस्य रहता है । शत्रु- पक्ष पर विजय मिलती है । तीसरी शत्रुदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख में कुछ कमी रहती है । सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री से कुछ वैमनस्य रहता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में अधिक मेहनत करनी पड़ती है । दसवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता की ओर से सामान्य परेशानी रहती है तथा राज्य एवं व्यापार के क्षेत्र में सफलता मिलती है । 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि का फलादेश कन्या लग्न : द्वितीयभाव - शनि दूसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक विद्या-बुद्धि का सुख प्राप्त करता है तथा सन्तान से वैमनस्य रहता है । तीसरी शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता भूमि तथा भवन के सुख में कमी आती है । सातवीं नीच दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व को कुछ हानि होती है । दसवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति प्रत्येक क्षेत्र में संघर्षशील रहता है तथा शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त करता है ।
३२५ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कन्यालग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में शत्रु मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों से परेशानी रहती है, पर शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है और पराक्रम की वृद्धि होती है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि के पंचमभाव को देखने से विद्या-बुद्धि का लाभ होता है, परन्तु सन्तान-पक्ष में सामान्य कठिनाइयां आती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से परिश्रम द्वारा भाग्योन्नति होती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव की देखने से खर्च में कठिनाई का अनुभव होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से असन्तोष रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कन्या लग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है तथा सन्तान के पक्ष से भी परेशानी रहती है, परन्तु विद्या-बुद्धि का लाभ होता है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव की देखने से शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है तथा झगड़ों से सुख-दुःख दोनों ही मिलते हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में परिश्रम द्वारा सफलता मिलती है। दसवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव की देखने से परिश्रम एवं प्रभाव की वृद्धि होती है, परन्तु शरीर कुछ अस्वस्थ बना रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कन्या लग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या-बुद्धि एवं सन्तान का लाभ होता है, परन्तु सन्तान से कुछ परेशानी भी होती है। शत्रु-पक्ष में उसे गुप्त युक्तियों से विजय मिलती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव की देखने से स्त्री-पक्ष से कुछ परेशानी रहती है तथा व्यवसाय में भी कठिनाइयाँ आती हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से परिश्रम द्वारा लाभ होता है। दसवीं उच्च दृष्टि से द्वितीय भाव की देखने से धन- कुटुम्ब की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति संघर्षपूर्ण सुखी-सम्पन्न जीवन बिताता है।