ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७९९ मार्कण्डेयपुराणमें नौ हजार श्लोक बतलाते हैं। परम रुचिर अग्निपुराण पंद्रह हजार चार सौ श्लोकोंवाला कहा गया है। पुराणप्रवर भविष्यमें चौदह हजार पाँच सौ श्लोक बतलाये जाते हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराणमें अठारह हजार श्लोक हैं। विद्वज्जन इसे सभी पुराणोंका सार बतलाते हैं। श्रेष्ठ लिङ्गपुराण ग्यारह हजार श्लोकोंका है। वाराहपुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार कही गयी है। सज्जनोंने उत्तम स्कन्दपुराणको ग्यारह हजार एक सौ अथवा इक्यासी हजार एक सौ श्लोकोंवाला निरूपित किया है। पण्डितोंने वामनपुराणकी दस हजार, कूर्मपुराणकी सतरह हजार और मत्स्यपुराणकी चौदह हजार श्लोक-संख्या बतलायी है। गरुड़पुराण उन्नीस हजार और उत्तम ब्रह्माण्डपुराण बारह हजार श्लोकोंवाला कहा गया है। इस प्रकार सभी पुराणोंकी श्लोक-संख्या चार लाख बतलायी जाती है। इस प्रकार पुराणवेत्ता लोग अठारह पुराण ही बतलाते हैं। इसी तरह उपपुराणोंकी भी संख्या अठारह ही कही गयी है। महाभारतको इतिहास कहते हैं। वाल्मीकीय रामायण काव्य है और श्रीकृष्णके माहात्म्यसे परिपूर्ण पञ्चरात्रोंकी संख्या पाँच है। वासिष्ठ, नारदीय, कापिल, गौतमीय और सनत्कुमारीय-ये ही पाँचों श्रेष्ठ पञ्चरात्र हैं। संहिताएँ भी पाँच बतलायी जाती हैं; जो सभी श्रीकृष्णकी भक्तिसे ओतप्रोत हैं। इनके नाम हैं- ब्रह्मसंहिता, शिवसंहिता, प्रह्लादसंहिता, गौतमसंहिता और कुमारसंहिता। शौनकजी ! इस प्रकार शास्त्रका भण्डार तो बहुत बड़ा है, तथापि मैंने अपनी जानकारीके अनुसार आपको क्रमशः पृथक्-पृथक् सब बतला दिया है। मुने ! साक्षात् भगवान् श्रीविष्णुने गोलोकस्थित रासमण्डलमें अपने भक्त ब्रह्माको यह पुराण बतलाया था। फिर ब्रह्माने धर्मात्मा धर्मको, धर्मने नारायणमुनिको, नारायणने नारदको और नारदने मुझ भक्तको इसका उपदेश किया। मुनिवर ! वही श्रेष्ठ पुराण इस समय मैं आपसे वर्णन कर रहा हूँ। यह अभीप्सित ब्रह्मवैवर्तपुराण परम दुर्लभ है। जो विश्वसमूहका वरण करता है, जीवधारियोंका परमात्मस्वरूप है; वही ब्रह्म कर्मनिष्ठोंके कर्मोंका साक्षीरूप है। उस ब्रह्मका तथा उसकी अनुपम विभूतिका जिसमें विवरण किया गया है; इसी कारण विद्वान्लोग इसे 'ब्रह्मवैवर्त' कहते हैं। यह पुराण पुण्यप्रद, मङ्गलस्वरूप और मङ्गलोंका दाता है। इसमें नये-नये अत्यन्त गोपनीय रमणीय रहस्य भरे पड़े हैं। यह हरिभक्तिप्रद, दुर्लभ हरिदास्यका दाता, सुखद, ब्रह्मकी प्राप्ति करनेवाला साररूप और शोक-संतापका नाशक है। जैसे सरिताओंमें शुभकारिणी गङ्गा तत्क्षण ही मुक्ति प्रदान करनेवाली हैं, तीर्थोंमें पुष्कर और पुरियोंमें काशी जैसे शुद्ध है, सभी वर्षोंमें जैसे भारतवर्ष शुभ और तत्काल मुक्तिप्रद है, जैसे पर्वतोंमें सुमेरु, पुष्पोंमें पारिजात-पुष्प, पत्रोंमें तुलसी-पत्र, व्रतोंमें एकादशीव्रत, वृक्षोंमें कल्पवृक्ष, देवताओंमें श्रीकृष्ण, ज्ञानिशिरोमणियोंमें महादेव, योगिन्द्रोंमें गणेश्वर, सिद्धेन्द्रोंमें एकमात्र कपिल, तेजस्वियोंमें सूर्य, वैष्णवोंमें अग्रगण्य भगवान् सनत्कुमार, राजाओंमें श्रीराम, धनुर्धारियोंमें लक्ष्मण, देवियोंमें महापुण्यवती सती दुर्गा, श्रीकृष्णकी प्रेयसियोंमें प्राणाधिका राधा, ईश्वरियोंमें लक्ष्मी तथा पण्डितोंमें सरस्वती सर्वश्रेष्ठ हैं; उसी प्रकार सभी पुराणोंमें ब्रह्मवैवर्त श्रेष्ठ है। इससे विशिष्ट, सुखद, मधुर, उत्तम पुण्यका दाता और संदेहनाशक दूसरा कोई पुराण नहीं है। यह इस लोकमें सुखद, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंका उत्तम दाता, शुभद, पुण्यद, विघ्नविनाशक और उत्तम हरि-दास्य प्रदान करनेवाला है तथा परलोकमें प्रभूत आनन्द देनेवाला है। पुत्रक ! सम्पूर्ण यज्ञों, तीर्थों, व्रतों और तपस्याओंका तथा समूची पृथ्वीकी प्रदक्षिणाका भी फल इसके फलकी समतामें नगण्य है। चारों वेदोंके पाठसे भी इसका फल श्रेष्ठ है। जो संयत-चित्त होकर इस पुराणको श्रवण करता है; उसे गुणवान् विद्वान् वैष्णव पुत्र प्राप्त होता है। यदि कोई दुर्भगा नारी इसे सुनती है तो उसे पतिके सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। इस पुराणके श्रवणसे मृतवत्सा, काकबन्ध्या आदि पापिनी स्त्रियोंको भी चिरजीवी पुत्र सुलभ हो जाता है। अपुत्रको पुत्र, भार्यारहितको पत्नी और कीर्तिहीनको उत्तम यश मिल जाता है। मूर्ख पण्डित हो जाता है। रोगी रोगसे, बँधा हुआ बन्धनसे, भयभीत भयसे और आपत्तिग्रस्त आपत्तिसे मुक्त हो जाता है। अरण्यमें, निर्जन मार्गमें अथवा दावाग्निमें फँसकर भयभीत हुआ मनुष्य इसके
८०० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
श्रवणसे निश्चय ही उस भयसे छूट जाता है। इसके श्रवणसे पुण्यवान् पुरुषपर कुष्ठरोग, दरिद्रता, व्याधि और दारुण शोकका प्रभाव नहीं पड़ता। ये सभी पुण्यहीनोंपर ही प्रभाव डालते हैं। जो मनुष्य अत्यन्त दत्तचित्त हो इसका आधा श्लोक अथवा चौथाई श्लोक सुनता है, उसे बहुसंख्यक गोदानका पुण्य प्राप्त होता है—इसमें संशय नहीं है। जो मनुष्य शुद्ध समयमें जितेन्द्रिय होकर संकल्पपूर्वक वक्ताको दक्षिणा देकर भक्ति-भावसहित इस चार खण्डोंवाले पुराणको सुनता है, वह अपने असंख्य जन्मोंके बचपन, कौमार, युवा और वृद्धावस्थाके संचित पापसे निःसंदेह मुक्त हो जाता है तथा श्रीकृष्णका रूप धारण करके रत्ननिर्मित विमानद्वारा अविनाशी गोलोकमें जा पहुँचता है। वहाँ उसे श्रीकृष्णकी दासता प्राप्त हो जाती है, यह ध्रुव है। असंख्य ब्रह्माओंका विनाश होनेपर भी उसका पतन नहीं होता। वह श्रीकृष्णके समीप पार्षद होकर चिरकालतक उनकी सेवा करता है।
मुने! भलीभाँति स्नान करके शुद्ध हो तथा इन्द्रियोंको वशमें करके 'ब्रह्मखण्ड' की कथा सुननेसे पश्चात् श्रोताको चाहिये कि वह वाचकको खीर-पूड़ी और फलका भोजन कराये, पानका बीड़ा समर्पित करे और सुवर्णकी दक्षिणा दे। फिर चन्दन, श्वेत पुष्पोंकी माला और मनोहर महीन वस्त्र श्रीकृष्णको निवेदित करके वाचकको प्रदान करे। अमृतोपम सुन्दर कथाओंसे युक्त 'प्रकृतिखण्ड' को सुनकर वक्ताको दधियुक्त अन्न खिलाकर स्वर्णकी दक्षिणा देनी चाहिये और फिर भक्तिपूर्वक सुन्दर सवत्सा गौका दान देना चाहिये। विघ्ननाशके लिये 'गणपतिखण्ड' को सुनकर जितेन्द्रिय श्रोताको उचित है कि वह वाचकको सोनेका यज्ञोपवीत, श्वेत अश्व, छाता, पुष्पमाला, स्वस्तिकके आकारकी मिठाई, तिलके लड्डू और काल-देशानुसार उपलब्ध होनेवाले पके फल प्रदान करे। 'श्रीकृष्णजन्मखण्ड' को श्रवण करके भक्तको चाहिये कि वाचकको रत्नकी सुन्दर अँगूठी दान करे और फिर महीन वस्त्र, हार, उत्तम स्वर्णकुण्डल, माला, सुन्दर पालकी, पके हुए फल, दूध और अपना सर्वस्व दक्षिणामें देकर उनकी स्तुति करे। इसके बाद सौ ब्राह्मणोंको परम आदरके साथ भोजन कराना चाहिये। जो विष्णुभक्त, शास्त्रपटु पण्डित और शुद्धाचारी हो, ऐसे ही श्रेष्ठ ब्राह्मणको वाचक बनाना चाहिये। जो श्रीकृष्णसे विमुख, दुराचारी और उपदेश देनेमें अकुशल हो, ऐसे ब्राह्मणसे कथा नहीं सुननी चाहिये। नहीं तो, पुराण-श्रवण निष्फल हो जाता है। जो श्रीकृष्णकी भक्तिसे युक्त हो इस पुराणको सुनता है, वह श्रीहरिकी भक्ति और पुण्यका भागी होता है तथा उसके पूर्वजन्मके पाप नष्ट हो जाते हैं।
विप्रवर! इस प्रकार मैंने अपने गुरुजीके श्रीमुखसे जो कुछ सुना था, वह सब आपसे वर्णन कर दिया। अब मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये; मैं नारायणाश्रमको जाना चाहता हूँ। यहाँ इस विप्र-समाजको देखकर नमस्कार करनेके लिये आ गया था; फिर आपलोगोंकी आज्ञा होनेसे उत्तम ब्रह्मवैवर्तपुराण भी सुना दिया। आप ब्राह्मणोंको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। परमात्मा श्रीकृष्ण, शिव, ब्रह्मा और गणेशको नित्यशः बारंबार नमस्कार है। शौनकजी! जो सत्यस्वरूप, राधाके प्राणेश और तीनों गुणोंसे परे हैं; उन परब्रह्म श्रीकृष्णका आप मन-वचन-शरीरसे परमभक्तिपूर्वक रात-दिन भजन कीजिये। सरस्वती-देवीको नमस्कार है। पुराणगुरु व्यासजीको अभिवादन है। सम्पूर्ण विघ्नोंका विनाश करनेवाली दुर्गादेवीको अनेकशः प्रणाम है। शौनकजी! आपलोगोंके पुण्यमय चरणकमलोंका दर्शन करके आज मैं उस सिद्धाश्रमको जाना चाहता हूँ, जहाँ भगवान् गणेश विराजमान हैं।
(अध्याय १३०-१३१)