ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८०० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
श्रवणसे निश्चय ही उस भयसे छूट जाता है। इसके श्रवणसे पुण्यवान् पुरुषपर कुष्ठरोग, दरिद्रता, व्याधि और दारुण शोकका प्रभाव नहीं पड़ता। ये सभी पुण्यहीनोंपर ही प्रभाव डालते हैं। जो मनुष्य अत्यन्त दत्तचित्त हो इसका आधा श्लोक अथवा चौथाई श्लोक सुनता है, उसे बहुसंख्यक गोदानका पुण्य प्राप्त होता है—इसमें संशय नहीं है। जो मनुष्य शुद्ध समयमें जितेन्द्रिय होकर संकल्पपूर्वक वक्ताको दक्षिणा देकर भक्ति-भावसहित इस चार खण्डोंवाले पुराणको सुनता है, वह अपने असंख्य जन्मोंके बचपन, कौमार, युवा और वृद्धावस्थाके संचित पापसे निःसंदेह मुक्त हो जाता है तथा श्रीकृष्णका रूप धारण करके रत्ननिर्मित विमानद्वारा अविनाशी गोलोकमें जा पहुँचता है। वहाँ उसे श्रीकृष्णकी दासता प्राप्त हो जाती है, यह ध्रुव है। असंख्य ब्रह्माओंका विनाश होनेपर भी उसका पतन नहीं होता। वह श्रीकृष्णके समीप पार्षद होकर चिरकालतक उनकी सेवा करता है।
मुने! भलीभाँति स्नान करके शुद्ध हो तथा इन्द्रियोंको वशमें करके 'ब्रह्मखण्ड' की कथा सुननेसे पश्चात् श्रोताको चाहिये कि वह वाचकको खीर-पूड़ी और फलका भोजन कराये, पानका बीड़ा समर्पित करे और सुवर्णकी दक्षिणा दे। फिर चन्दन, श्वेत पुष्पोंकी माला और मनोहर महीन वस्त्र श्रीकृष्णको निवेदित करके वाचकको प्रदान करे। अमृतोपम सुन्दर कथाओंसे युक्त 'प्रकृतिखण्ड' को सुनकर वक्ताको दधियुक्त अन्न खिलाकर स्वर्णकी दक्षिणा देनी चाहिये और फिर भक्तिपूर्वक सुन्दर सवत्सा गौका दान देना चाहिये। विघ्ननाशके लिये 'गणपतिखण्ड' को सुनकर जितेन्द्रिय श्रोताको उचित है कि वह वाचकको सोनेका यज्ञोपवीत, श्वेत अश्व, छाता, पुष्पमाला, स्वस्तिकके आकारकी मिठाई, तिलके लड्डू और काल-देशानुसार उपलब्ध होनेवाले पके फल प्रदान करे। 'श्रीकृष्णजन्मखण्ड' को श्रवण करके भक्तको चाहिये कि वाचकको रत्नकी सुन्दर अँगूठी दान करे और फिर महीन वस्त्र, हार, उत्तम स्वर्णकुण्डल, माला, सुन्दर पालकी, पके हुए फल, दूध और अपना सर्वस्व दक्षिणामें देकर उनकी स्तुति करे। इसके बाद सौ ब्राह्मणोंको परम आदरके साथ भोजन कराना चाहिये। जो विष्णुभक्त, शास्त्रपटु पण्डित और शुद्धाचारी हो, ऐसे ही श्रेष्ठ ब्राह्मणको वाचक बनाना चाहिये। जो श्रीकृष्णसे विमुख, दुराचारी और उपदेश देनेमें अकुशल हो, ऐसे ब्राह्मणसे कथा नहीं सुननी चाहिये। नहीं तो, पुराण-श्रवण निष्फल हो जाता है। जो श्रीकृष्णकी भक्तिसे युक्त हो इस पुराणको सुनता है, वह श्रीहरिकी भक्ति और पुण्यका भागी होता है तथा उसके पूर्वजन्मके पाप नष्ट हो जाते हैं।
विप्रवर! इस प्रकार मैंने अपने गुरुजीके श्रीमुखसे जो कुछ सुना था, वह सब आपसे वर्णन कर दिया। अब मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये; मैं नारायणाश्रमको जाना चाहता हूँ। यहाँ इस विप्र-समाजको देखकर नमस्कार करनेके लिये आ गया था; फिर आपलोगोंकी आज्ञा होनेसे उत्तम ब्रह्मवैवर्तपुराण भी सुना दिया। आप ब्राह्मणोंको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। परमात्मा श्रीकृष्ण, शिव, ब्रह्मा और गणेशको नित्यशः बारंबार नमस्कार है। शौनकजी! जो सत्यस्वरूप, राधाके प्राणेश और तीनों गुणोंसे परे हैं; उन परब्रह्म श्रीकृष्णका आप मन-वचन-शरीरसे परमभक्तिपूर्वक रात-दिन भजन कीजिये। सरस्वती-देवीको नमस्कार है। पुराणगुरु व्यासजीको अभिवादन है। सम्पूर्ण विघ्नोंका विनाश करनेवाली दुर्गादेवीको अनेकशः प्रणाम है। शौनकजी! आपलोगोंके पुण्यमय चरणकमलोंका दर्शन करके आज मैं उस सिद्धाश्रमको जाना चाहता हूँ, जहाँ भगवान् गणेश विराजमान हैं।
(अध्याय १३०-१३१)