ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंठंडा हिप बाथ
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जप करते रहिये। पेट के नीचे वाले भाग को अंगोछे या किसी खहर के मोटे कपड़े से रगड़ते जाइये। धीम्ब मृतु में यह स्नान प्रातः और सायंकाल में दो बार लेना चाहिये। यह स्नान घर पर भी किसी बड़े टब में मुखपूर्वक लिया जा सकता है। बूढ़े तथा रोग युक्त व्यक्ति गुनगुने पानी का प्रयोग कर सकते हैं। स्नान कर चुकने पर शरीर के गीले भाग को सूखे अंगोछे से पोंछ कर गर्म कपड़ा पहन लेना चाहिए। किसी नल या फोहारे के नीचे थंड कर ठंडे पानी से स्नान ब्रह्मचर्य के अभ्यास के लिए अत्यन्त लाभदायक है।
वह इच्छा जो मन में सूक्ष्मरूप से छिपी हुई रहती है, उसे वासना कहते हैं। स्थूल रूप में वह इच्छा है। विषय पदार्थों को प्राप्त करने के लिए वनीभूत उत्कंठा (लालसा) को तुष्णा कहते हैं।