भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

जन्मों में भी अपने बुरे संस्कारों को लाता है तथा उसी दगा तथा फूट की आदत को शुरू करता है। जो व्यक्ति संस्कारों के इस अटल नियम को जानता है क्या वह कभी भी अशुभ कार्यों को कर सकता है? बुरे कार्यों के द्वारा मनुष्य अपने मन को ही विगाड़ता है तथा भावी जन्म में बोर या ठग बन जाता है। वह आसुरी स्वभाव से सम्बन्ध बनता है। मनुष्य को अपने विचारों भावनाओं तथा जन्मों में बहुत ही सावधान रहना चाहिये। वह सदा अपने विचारों तथा कार्यों का निरीक्षण करे तथा दिव्य विचार, दिव्य भावना को प्रश्न दे साथ ही दिव्य कार्यों को करे, किया के अनुरूप ही प्रतिक्रिया भी होती है। इस नियम को याद रखना चाहिये। तब वह बुरे कार्यों को नहीं करेगा।

गीता में इस बात पर बल दिया गया है कि वही मनुष्य सुखी है जिसने अपनी राजसिक प्रकृति पर विजय पाई है। आप अपने महान् वासु राम पर आसानी से विजय पा सकते हैं यदि आप पूरे हृदय से धारणा तथा एकाग्रता के साथ आध्यात्मिक साधना में संलग्न हो जायें। इस जगत में कुछ भी असम्भव नहीं हैं। आहार की शुद्धता अत्यन्त आवश्यक है। दूध, फल, दाल, गेहूँ आदि सात्विक आहार को ग्रहण कीजिये। अन्चार, चटनी, खट्टाई आदि गरम चटपटे पदार्थों का परित्याग कीजिये। सरल आहार कीजिये। विचार कीजिये। ओश्म का जप कीजिये। आत्मा पर ध्यान कीजिये। विचार कीजिये कि “मैं कौन हूँ?”। याद रखिये आत्मा में वासना नहीं है। वासना मन में ही है। अलग अलग सोइये। चार बजे प्रातः उठिये। महामंत्र अश्वत् “ओश्म नमः शिवाय”