भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

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द्वादशभावविचाराध्यायः १६१ पंचम स्थान में बुध की राशि (३।६) हो अथवा शनि की राशि (१०।११) हो, उसमें शनि और गुलिक हो वा उससे देखा जाता हो तो दत्तक पुत्र होता है॥८२॥ पञ्चमे षड्ग्रहैर्युक्ते तदीशे व्ययराशिगे। लग्नेशे दुर्बलो चेत्स्यात्तदा दत्तादयः सुताः ॥८३॥ पाँचवें भाव में ६ ग्रह हों, पंचमेश १२वें भाव में हो और लग्नेश, चंद्रमा बलवान् हो तो दत्तक पुत्र से सुख होता है॥८३॥ सन्तानयोगमाह- सुतभवने भृगुजीवसौम्ययाते बलसहितेन विलोकिते युते वा । बहुसुतजननं वदन्ति सन्तः सुतभवनेशबलेन चिन्त्यमेतत् ॥८४॥ संतान भाव में शुक्र, गुरु, बुध हों तथा बलवान् ग्रह से देखे जाते हों वा युत हों, और सुतेश बली हो तो अनेक संतान होती हैं॥८४॥ सुतेशे शशिसंयुक्ते तद्द्रेष्काणगतेऽपि वा। तदा हि कन्यकालाभं प्रवदेन्मतिमान्नरः॥८५॥ सुतेश चंद्रमा से युक्त हो अथवा उसके द्रेष्काण में हो तो अधिक कन्या होती है॥८५॥ सुतेशे नरराशिस्थे राहुणा सहितो शशी। पुत्रस्थानं गते मन्दे परजातं वदेच्छिशुम्॥८६॥ सुतेश पुरुष राशि में हो और चंद्रमा-राहु से युत हो और पंचम स्थान में शनि हो तो दूसरे से उत्पन्न बालक होता है॥८६॥ लग्नाद्दशमे चन्द्रे लग्नादष्टमगो गुरुः। पापयुक्तेऽथ सन्दृष्टे अन्यबीजं न संशयः॥८७॥ लग्न से १०वें भाव में चंद्रमा हो तथा लग्न से आठवें भाव में गुरु हो तथा पापग्रह से युत-दृष्ट हो तो दूसरे से उत्पन्न बालक होता है॥८७॥ पुत्रस्थानाधिपे स्वोच्चे लग्नाच्चेद्द्वित्रिकोणभे। गुरुणा संयुते दृष्टे पुत्रभाग्यमुपैति सः॥८८॥ यदि पंचमेश अपनी उच्चराशि में होकर लग्न से २।९।५ भाव में हो और गुरु से युत-दृष्ट हो तो पुत्रसुख को भोगने वाला होता है॥८८॥ त्रिचतुःपापसंयुक्ते सुते च सौम्यरहिते। सुतेशे नीचराशिस्थे नीचसंस्थो भवेच्छिशुः॥८९॥