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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

द्वादशभावविचाराध्यायः १६१ पंचम स्थान में बुध की राशि (३।६) हो अथवा शनि की राशि (१०।११) हो, उसमें शनि और गुलिक हो वा उससे देखा जाता हो तो दत्तक पुत्र होता है॥८२॥ पञ्चमे षड्ग्रहैर्युक्ते तदीशे व्ययराशिगे। लग्नेशे दुर्बलो चेत्स्यात्तदा दत्तादयः सुताः ॥८३॥ पाँचवें भाव में ६ ग्रह हों, पंचमेश १२वें भाव में हो और लग्नेश, चंद्रमा बलवान् हो तो दत्तक पुत्र से सुख होता है॥८३॥ सन्तानयोगमाह- सुतभवने भृगुजीवसौम्ययाते बलसहितेन विलोकिते युते वा । बहुसुतजननं वदन्ति सन्तः सुतभवनेशबलेन चिन्त्यमेतत् ॥८४॥ संतान भाव में शुक्र, गुरु, बुध हों तथा बलवान् ग्रह से देखे जाते हों वा युत हों, और सुतेश बली हो तो अनेक संतान होती हैं॥८४॥ सुतेशे शशिसंयुक्ते तद्द्रेष्काणगतेऽपि वा। तदा हि कन्यकालाभं प्रवदेन्मतिमान्नरः॥८५॥ सुतेश चंद्रमा से युक्त हो अथवा उसके द्रेष्काण में हो तो अधिक कन्या होती है॥८५॥ सुतेशे नरराशिस्थे राहुणा सहितो शशी। पुत्रस्थानं गते मन्दे परजातं वदेच्छिशुम्॥८६॥ सुतेश पुरुष राशि में हो और चंद्रमा-राहु से युत हो और पंचम स्थान में शनि हो तो दूसरे से उत्पन्न बालक होता है॥८६॥ लग्नाद्दशमे चन्द्रे लग्नादष्टमगो गुरुः। पापयुक्तेऽथ सन्दृष्टे अन्यबीजं न संशयः॥८७॥ लग्न से १०वें भाव में चंद्रमा हो तथा लग्न से आठवें भाव में गुरु हो तथा पापग्रह से युत-दृष्ट हो तो दूसरे से उत्पन्न बालक होता है॥८७॥ पुत्रस्थानाधिपे स्वोच्चे लग्नाच्चेद्द्वित्रिकोणभे। गुरुणा संयुते दृष्टे पुत्रभाग्यमुपैति सः॥८८॥ यदि पंचमेश अपनी उच्चराशि में होकर लग्न से २।९।५ भाव में हो और गुरु से युत-दृष्ट हो तो पुत्रसुख को भोगने वाला होता है॥८८॥ त्रिचतुःपापसंयुक्ते सुते च सौम्यरहिते। सुतेशे नीचराशिस्थे नीचसंस्थो भवेच्छिशुः॥८९॥

१६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् पाँचवें भाव में ३ या ४ पापग्रह हों और शुभग्रह न हो और पंचमेश नीच राशि में हो तो बालक नीच कर्म करने वाला होता है॥८९॥ पुत्रप्राप्ति-वियोगसमयश्च- पुत्रस्थानं गते जीवे तदीशे भृगुसंयुते। द्वात्रिंशे च त्रयस्त्रिंशे वत्सरे पुत्रलाभकृत् ॥९०॥ पंचम स्थान में गुरु हो और पंचमेश शुक्र से युत हो तो ३२वें वा ३३वें वर्ष में पुत्र का लाभ होता है॥९०॥ सुतेशे केन्द्रभावस्थे कारकेण समन्विते। षट्त्रिंशे त्रिंशदब्दे च पुत्रोत्पत्तिं विनिर्दिशेत् ॥९१॥ पंचमेश कारक से युत होकर केंद्र में हो तो ३६वें वर्ष में पुत्र उत्पन्न होता है॥९१॥ लग्नाद्भाग्यगते जीवे जीवाद्भाग्यगते भृगौ। लग्नेशे भृगुसंयुक्ते चत्वारिंशे सुतं लभेत् ॥९२॥ लग्न से नवम स्थान में गुरु हो और गुरु से भाग्य ९वें भाव में शुक्र हो तथा लग्नेश शुक्र से युक्त हो तो ४०वें वर्ष में पुत्र का लाभ होता है॥९२॥ पुत्रस्थानं गते राहौ तदीशे पापसंयुते। नीचराशिगते जीवे द्वात्रिंशे पुत्रमृत्युदः॥९३॥ पाँचवें भाव में राहु हो, पंचमेश पाप से युत हो और गुरु अपनी नीच राशि में हो तो ३२वें वर्ष में पुत्र की मृत्यु होती है॥९३॥ जीवात्पञ्चमगे पापे लग्नात्पुत्रं गतेऽपि च। षड्विंशे च त्रयस्त्रिंशे चत्वारिंशे सुतक्षयः ॥९४॥ गुरु से पाँचवें भाव में पापग्रह हों और लग्न से पाँचवें भाव में भी गये हों तो २६वें और ४०वें वर्ष में पुत्र का नाश होता है॥९४॥ लग्ने मान्दिसमायुक्ते लग्नेशे नीचराशिगे। षट्पञ्चाशदब्देषु पुत्रशोकाकुलो भवेत् ॥९५॥ लग्न में गुलिक हो और लग्नेश अपनी नीच राशि में हो तो ५६वें वर्ष में पुत्रशोक होता है॥९५॥

द्वादशभावविचाराध्यायः १६३ सन्तानसंख्याज्ञानमाह- चतुर्थे पापसंयुक्ते षष्ठे चैव तथैव हि। सुतेशे परमोच्चस्थे लग्नेशेन समन्विते।।९६।। कारके शुभसंयुक्ते दशसंख्यास्तु सूनवः। यदि ४, ६ भाव में पापग्रह हों, सुतेश लग्नेश से युत होकर परम उच्च में हो, सुतभावकारक शुभग्रह से युत हो तो दश पुत्र होते हैं।।९६।। परमोच्चगते जीवे धनेशे राहुसंयुते ।।९७।। भाग्येशे भाग्यसंयुक्ते संख्यानां नव सूनवः।।९८।। गुरु परमोच्च में हो, धनेश राहु से युत हो और भाग्येश भाग्यस्थान में हो तो ९ पुत्र होते हैं।।९७-९८।। पुत्रभाग्यगते जीवे सुतेशे बलसंयुते । धनेशे कर्मराशिस्थे वसुसंख्यास्तु सूनवः।।९९।। पंचम वा भाग्य स्थान में गुरु हो, पंचमेश बली हो और धनेश १०वें स्थान में हो तो ८ पुत्र होते हैं।।९९।। पञ्चमात्पञ्चमे मन्दे सुतस्थे च तदीश्वरे । सूनवः सप्तसंख्याश्च द्विगर्भे यमलं भवेत् ।।१०० ।। पाँचवें भाव से पंचम में शनि हो, पाँचवें भाव में पंचमेश हो तो ७ पुत्र होते हैं, जिन में २ यमल (जुड़वा) होते हैं।।१००।। वित्तेशे पञ्चमस्थे च सुतस्थे पञ्चमाधिपे । षट्संख्या च सुतप्राप्तिस्तेषां च त्रिप्रजामृतिः ।।१०१ ।। धनेश पाँचवें भाव में, पंचमेश पंचम में हो तो ६ पुत्र होते हैं, जिसमें तीन मर जाते हैं।।१०१।। लग्नात्पञ्चमगे जीवे जीवात्पञ्चमगे शनौ । मन्दात्पञ्चमगे राहौ पुत्रमेकं विनिर्दिशेत् ।।१०२।। लग्न से पाँचवें भाव में गुरु, गुरु से पाँचवें भाव में शनि हों, शनि से पाँचवें राहु हो तो १ पुत्र होता है।।१०२।। पञ्चमे पापसंयुक्ते जीवात्पञ्चमगे शनौ। सुतेशे भौमसंयुक्ते लग्नेशे धनसङ्गते। जातं जातं विनाशं च दीर्घायुश्चैव मानवः।।१०३।।

१६४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् पंचम में पापग्रह हो और गुरु से पाँचवें भाव में शनि हो, पंचमेश भौम से युक्त हो, लग्नेश धनभाव में हो तो जितने बालक उत्पन्न हो सभी मर जावें।।१०३।। अथ षष्ठभावफलम्- षष्ठाधिपोऽपि पापश्चेद्देहे वाप्यष्टमे स्थितः । तदा व्रणो भवेद्देहे षष्ठस्थानेऽप्ययं विधिः ।।१०४।। षष्ठेश (६ठे भाव का स्वामी) पापग्रह हो और जन्मलग्न वा आठवें भाव में बैठा हो तो शरीर में व्रण (घाव) के चिह्न होते हैं। छठे भाव में हो तो भी वही फल होता है।।१०४।। एवं पित्रादिभावेशास्तत्तत्कारकसंयुताः । व्रणाधिपयुताश्चापि षष्ठाष्टमयुता यदि ।।१०५।। इसी प्रकार पिता आदि भावैशों के साथ षष्ठेश से युत होकर ६/८ भाव में हो तो उनके शरीर में भी व्रण के चिह्न कहना चाहिए। सूर्य षष्ठेश हो तो शिर में ।।१०५।। तेषामपि व्रणं वाच्यमादित्ये च शिरोव्रणम्। इन्दुना च मुखे कण्ठे भौमज्ञेन च नाभिषु ।।१०६।। चंद्रमा हो तो मुख या कंठ में, भौम-बुध हों तो नाभि में।।१०६।। गुरुणा नासिकायां च भृगुणा नयने पदे। शनिना राहुणा कुक्षौ केतुना च तथा भवेत् ।।१०७।। गुरु हो तो नाक में, शुक्ल हो तो आँख और पैर में, शनि-राहु हों तो कुक्षि (काँख) में, केतु से भी कुक्षि में चिह्न कहना चाहिए।।१०७।। लग्नाधिपः कुजक्षेत्रे बुधस्य यदि संस्थितः । यत्र कुत्र स्थितो ज्ञेन वीक्षितो मुखरुक्प्रदः ।।१०८।। लग्नेश भौम की राशि में वा बुध की राशि में होकर कहीं पर बैठा हो तथा बुध से देखा जाता हो तो मुख में रोग होता है।।१०८।। कुष्ठयोगः- लग्नाधिपो कुजबुधौ चन्द्रेण यदि संयुतौ । राहुणा शनिना सार्धं कुष्ठं तत्र विनिर्दिशेत् ।।१०९।। यदि भौम वा बुध लग्नेश होकर चंद्रमा, राहु वा शनि से युत हों तो कुष्ठ- रोग होता है।।१०९।।

द्वादशभावविचाराध्यायः १६५ लग्नाधिपं विना लग्ने स्थितश्चेत्तमसा शशी । श्वेतकुष्ठं तथा कृष्णकुष्ठं च शनिना सह ।।११० ।। कुजेन रक्तकुष्ठं स्यात्तत्तदेवं विचारयेत् । यदि लग्नेश को छोड़कर चंद्रमा राहु के साथ लग्न में हो तो सफेद कुष्ठ होता है। शनि के साथ हो तो काला कुष्ठ, भौम के साथ हो तो लाल कुष्ठ होता है।।११०।। गण्डादिरोगयोगाः- लग्ने षष्ठाष्टमाधीशौ रविणा यदि संस्थितौ ।।१११ ।। ज्वरगण्डः कुजे ग्रन्थिः शस्त्रव्रणमथापि वा । बुधेन पित्तं गुरुणा रोगाभावं विनिर्दिशेत् ।।११२ ।। यदि सूर्य से युत होकर षष्ठेश अष्टमेश लग्न में हों तो ज्वर से उत्पन्न गंडरोग, भौम से युत हो तो गठिया वा शस्त्र से आघात, बुध हो तो पित्त से उत्पन्न गंड और गुरु हो तो रोग का अभाव कहना चाहिए।।११२।। स्त्रीभिः शुक्रेण शनिना वायुना संयुतो यदि । गण्डश्चाण्डालतो नाभौ तमःकेत्वोर्युते भयम् ।।११३।। शुक्र से युत हो तो स्त्रीजनित रोग, शनि से युत हो तो वायुजनित गंड, राहु से युत हो तो चांडाल से नाभि में गंडरोग और केतु से युत हो तो भय होता है।।११३।। चन्द्रेण गण्डः सलिलैः कफश्लैष्मादिना भवेत् । एवं पित्रादिभावानां तत्तत्कारकयोगतः ।।११४।। चंद्रमा से युत हो तो जल से तथा कफरोग होता है। इसी प्रकार पिता आदि के भावेशों से उन लोगों के भी रोग का विचार करना चाहिए।।११४।। रोगप्राप्तिसमयः- गण्डो तेषां भवेदेवमूह्यमत्र मनीषिभिः । रोगस्थानगते पापे तदीशे पापसंयुते ।।११५।। राहुणा संयुते मन्दे सर्वदा रोगसंयुतः । रोगस्थानगते भौमे तदीशे रन्ध्रसंयुते ।।११६।। षड्वर्षे द्वादशे वर्षे ज्वररोगी भवेन्नरः ।

१६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् छठे स्थान में पापग्रह हो, षष्ठेश पापयुत हो, राहु से शनि युत हो तो सर्वदा रोगी होता है। षष्ठस्थान में भौम हो और षष्ठेश आठवें भाव में हो तो छठे, बारहवें वर्ष में ज्वररोग से युक्त होता है ।।११६।। षष्ठस्थानगते जीवे तद्गृहे चन्द्रसंयुते ।।११७।। द्वाविंशकोनविंशके कुष्ठरोगं विनिर्दिशेत्। छठे भाव में गुरु हो और गुरु की राशि में चंद्रमा हो तो २२वें, १९- वें वर्ष में कुष्ठरोग होता है ।।११७।। रोगस्थानं गतो राहुः केन्द्रे मान्दिसमन्वितः ।।११८।। लग्नेशे नाशराशिस्थे षड्विंशे क्षयरोगता। छठे भाव में राहु हो, केन्द्र में गुलिक हो; लग्नेश आठवें भाव में हो तो २६वें वर्ष में क्षयरोग होता है ।।११८।। व्ययेशे रोगराशिस्थे तदीशे व्ययराशिगे ।।११९।। त्रिंशद्वर्षेकोनवर्षे गुल्मरोगं विनिर्दिशेत्। व्ययेश छठे भाव में हो और षष्ठेश बारहवें भाव में हो तो ३०वें वा २९वें वर्ष में गुल्मरोग होता है ।।११९।। रिपुस्थानगते चन्द्रे शनिना संयुते यदि ।।१२०।। पञ्चपञ्चाशताब्देषु रक्तकुष्ठं विनिर्दिशेत्। छठे भाव में शनि से युत चंद्रमा हो तो ५५वें वर्ष में रक्तकुष्ठ होता है ।।१२०।। लग्नेशे लग्नराशिस्थे मन्दे शत्रुसमन्विते ।।१२१।। एकोनषष्टिवर्षे तु वातरोगादितो भवेत्। लग्नेश लग्न में हो और शनि छठे भाव में हो तो ५९वें वर्ष में वात- रोग होता है ।।१२१।। रन्ध्रेशे रिपुराशिस्थे व्ययेशे लग्नसंस्थिते ।।१२२।। चन्द्रे षष्ठेशसंयुक्ते वसुवर्षे मृगाद्भयम्। अष्टमेश छठे भाव में हो और व्ययेश लग्न में हो, चन्द्रमा षष्ठेश से युत हो तो ८वें वर्ष में मृग से भय होता है ।।१२२।। षष्ठाष्टमगतो राहुस्तस्मादष्टगते शनौ ।।१२३।। बालस्य जन्मतो विज्ञ आद्ये चैव द्वितीयके। वत्सरेऽग्निभयं तस्य त्रिवर्षे पक्षिदोषभाक् ।।१२४।।

द्वादशभावविचाराध्यायः १६७ छठे, आठवें भाव में राहु हो, उससे आठवें भाव में शनि हो तो, बालक को १, २. वर्ष में अग्नि का भय और ३ वर्ष में पक्षि का भय होता है।।१२३।। षष्ठाष्टमगते सूर्ये तद्व्यये चन्द्रसंयुते। पञ्चमे नवमेऽब्दे च जलभीतिं विनिर्दिशेत् ।।१२५।। ६, ८ भाव में सूर्य हो, उससे बारहवें चन्द्रमा हो तो ५, ९ वर्ष में जल से भय होता है।।१२४।। अष्टमे मन्दसंयुक्ते रन्ध्राद्धे द्वादशे कुजः। त्रिंशांके च दशांके च स्फोटकादि विनिर्दिशेत् ।।१२६।। आठवें भाव में शनि हो, उससे बारहवें भाव में भौम हो तो ३०वें वा १० वें वर्ष में चेचक आदि का भय होता है।।१२६।। रन्ध्रेशे राहुसंयुक्ते तदंशे रन्ध्रकोणगे। द्वाविंशेऽष्टादशे वर्षे ग्रन्थिमेहादिपीडनम् ।।१२७।। अष्टमेश राहु से युत होकर अपने ही अंश में आठवें ५/९ भाव में हो तो २२वें, १८वें वर्ष में गठिया, प्रमेह आदि से पीड़ा होती है।।१२७।। लाभेशे रिपुभावस्थे तदीशे लाभराशिगे। एकत्रिंशदेकचत्वारि शत्रुमूलाद्धनक्षयः ।।१२८।। लाभेश छठे भाव में हो और षष्ठेश लाभ भाव में होतो ३१वें, ४१वें वर्ष में शत्रु द्वारा द्रव्य का व्यय होता है।।१२८।। सुतेशे रिपुभावस्थे षष्ठेशे गुरुसंयुते। व्ययेशे लग्नभावस्थे तस्य पुत्रो रिपुर्भवेत् ।।१२९।। पंचमेश छठे भाव में हो, षष्ठेश गुरु से युत हो और व्ययेश लग्न में हो तो उसका पुत्र शत्रु होता है।।१२९।। लग्नेशे षष्ठराशिस्थे तदीशे षष्ठराशिगे। दशमैकोनविंशे च शुनकाद्भीतिरुच्यते ।।१३०।। लग्नेश छठे भाव में हो, षष्ठेश षष्ठ भाव में हो तो १०वें, १९वें वर्ष में कुत्ता से भय होता है।।१३०।। अथ सप्तमभावफलम्- कलत्रपो विनास्वर्क्षषडादित्रयसंस्थितः। रोगिणीं कुरुते नारीं तथा तुङ्गादिकं विना ।।१३१।।

१६८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् सप्तमेश यदि अपनी राशि से भिन्न राशि में ६।८।१२ भाव में नीचादि राशि में हो तो स्त्री रोगिणी होती है।।१३१।। सप्तमे तु स्थिते शुक्रेऽतीवकामी भवेन्नरः। यत्र कुत्र स्थिते पापयुते स्त्रीमरणं भवेत् ।।१३२।। सातवें स्थान में शुक्र हो तो पुरुष अत्यंत कामी होता है। कहीं किसी भाव में शुक्र पापग्रह से युत हो तो स्त्री की मृत्यु होती है।।१३२।। दाराधिपः पुण्यग्रहेण युक्तो दृष्टोऽपि वा पूर्णबलः प्रसन्नः । सौभाग्ययुक्तो गुणवान्प्रभुश्च दाता विभोग्यं बहुधान्ययुक्तः ।। यदि सप्तमेश शुभग्रह से युत-दृष्ट हो, पूर्ण बलवान् हो, असांगत आदि न हो तो पुरुष भाग्यवान्, गुणी, दाता, धन-धान्य से युक्त होता है।।१३३।। कलत्रेशेऽस्तनीचशत्रुराशिगतेष्वपि । बहुभार्यान्तरं विद्याद्रोगिणीं च विशेषतः ।।१३४।। सप्तमेश अस्तंगत हो, नीचराशि में हो, शत्रुराशि में हो तो अनेक स्त्री रोगिणी होती हैं।।१३४।। परमोच्चगते सप्ताधिनाथे मन्दराशौ शुभखेचरेण दृष्टे । अथवा भृगुसदने तुंगे बहुभार्या प्रवदन्ति बुद्धिमन्तः ।।१३५।। सप्तमेश परमोच्च में होकर शनि की राशि में शुभग्रह से देखा जाता हो अथवा शुक्र की राशि में उच्च का हो तो अनेक स्त्रियाँ होती हैं।।१३५।। वन्ध्यासंगो भवेद्भानौ चन्द्रे राशिसमस्त्रियः । कुजे रजस्वलासंगो वन्ध्यासंगश्च कीर्त्तितः ।।१३६।। सातवें सूर्य हो तो विधवा से संबंध होता है। चंद्रमा हो तो सप्तमस्थ राशि की जाति से, भौम हो तो रजस्वला और वंध्या से।।१३६।। बुधे वेश्या चं हीना च वणिक् स्त्री वा प्रकीर्त्तितः । गुरौर्ब्राह्मणभार्या स्याद्गर्भिणीसङ्ग एव च ।।१३७।। बुध हो तो वेश्या, हीना या बनिया की स्त्री से, गुरु हो तो ब्राह्मणी से वा गर्भिणी से।।१३७।। हीना च पुष्पिणी वाच्या मन्दराहुफणीश्वरैः । कुजेऽथ सुस्तनी मन्दे व्याधिदौर्बल्यसंयुता ।।१३८।। कटिनोर्ध्वकुचार्ये च शुक्रे स्थूलोत्तमस्तनी ।

द्वादशभावविचाराध्यायः १६९ शनि, राहु, केतु हों तो नीचजाति ओर रजोधर्मवती से सम्पर्क होता है। सप्तम में भौम हो तो अच्छे स्तनोंवाली, शनि हो तो रोगिणी, दुर्बल, भौम-गुरु हों तो कठिन ऊँचे कुचों वाली, शुक्र हो तो मोटे उन्नत कुचों वाली स्त्री होती है।।१३८।। पापे द्वादशकामस्थे क्षीणचन्द्रस्तु पञ्चमे। जातश्च भार्यावश्यः स्यादिति जातिविरोधकृत्।।१३९।। १२वें, ७वें भाव में पापग्रह हों और क्षीण चंद्रमा पाँचवें भाव में हो तो पुरुष स्त्री के वश में होता है और जाति से विरोध करने वाला होता है।।१३९।। जामित्रे मन्दभौमे च तदीशे मन्दभूमिगे।।१४०।। वेश्या वा जारिणी वापि तस्य भार्या न संशयः। भौमांशकगते शुक्रे भौमक्षेत्रगतेऽथवा।।१४१।। भौमयुक्ते च दृष्टे वा भगचुम्बनतत्परः। सातवें भाव में शनि-भौम हों अथवा सप्तमेश शनि के गृह में हो तो उसकी स्त्री वेश्या या जारिणी होती है। यदि शुक्र-भौम के नवांश में हो वा भौम की राशि में हो अथवा भौम से युत वा दृष्ट हो तो पुरुष भगचुम्बन करने वाला होता है।।१४१।। मन्दांशकगते शुक्रे मन्दक्षेत्रगतेऽपि वा।।१४२।। मन्दयुक्ते च दृष्टे च शिश्नचुम्बनतत्परः। शुक्र शनि के नवांश में अथवा शनि की राशि में हो, शनि से युत वा दृष्ट हो तो शिश्न (लिंग) का चुम्बन करने वाला होता है।।१४२।। दारेशे स्वोच्चराशिस्थे दारे शुभसमन्विते। दारे लग्नेशसंयुक्ते सत्कलत्रसमन्वितः।।१४३।। सप्तमेश अपनी उच्चराशि में हो और सप्तम में शुभग्रह हों तथा लग्नेश भी सातवें हो तो अच्छी स्त्री से युक्त होता है।।१४३।। कलत्रनाथे रिपुनीचसंस्थे मूढोऽथवा पापनिरीक्षिते वा। कलत्रभे पापयुते च दृष्टे कलत्रहानिं प्रवदन्ति सन्तः।।१४४।। सप्तमेश शत्रु राशि में वा अपनी नीचराशि में हो अथवा अस्तंगत हो, पापग्रह से युत वा दृष्ट हो और सप्तम भाव पापयुक्त वा पापदृष्ट हो तो स्त्री की हानि होती है।।१४४।।

१७० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् षष्ठाष्टमव्ययस्थे चेन्मदेशो दुर्बलो यदि। नीचराशिगतो वापि दारनाशं विनिर्दिशेत् ।।१४५ ।। सप्तमेश दुर्बल होकर ६/८/१२वें भाव मे हो वा नीचराशि में हो तो स्त्री का नाश होता है।।१४५।। कलत्रस्थानगे चन्द्रे तदीशे व्ययराशिगे। कारको बलहीनश्च दारसौख्यं न विद्यते ।।१४६ ।। सप्तम भाव में चंद्रमा हो और सप्तमेश १२वें भाव में हो और कारक निर्बल हो तो स्त्री का सुख नहीं होता है।।१४६।। भार्याधिपे नीचगृहे च पापे पापर्क्षगे वा बहुपापयुक्ते। क्लीबे ग्रहे सप्तमराशिसंस्थे तस्योदयांशे द्विकलत्रसिद्धिः।। सप्तमेश नीचराशि में हो और पापग्रह हो, पापग्रह की राशि में हो वा पापग्रह से युत हो और नपुंसक ग्रह सातवें भाव में हो वा नपुंसक की राशि सातवें भाव में हो तो २ स्त्रियाँ होती हैं।।१४७।। कलत्रस्थानगे भौमे शुक्रे जामित्रगे शनौ। लग्नेशे रन्ध्रराशिस्थे कलत्रत्रयवान् भवेत् ।।१४८।। सातवें भाव में भौम, शुक्र, शनि हों और लग्नेश आठवें भाव में हो तो ३ स्त्रियाँ होती हैं।।१४८।। द्विस्वभावगते शुक्रे स्वोच्चे तद्राशिनायके। दारेशे बलसंयुक्ते बहुदारसमन्वितः ।।१४९।। शुक्र द्विस्वभाव राशि में हो, द्विस्वभाव राशि का स्वामी अपने उच्च में हो और सप्तमेश बली हो तो अनेक स्त्रियाँ होती हैं।।१४९।। विवाहसमयमाह- दारेशे शुभराशिस्थे स्वोच्चस्वर्क्षगतो भृगुः। पञ्चमे नवमेऽब्दे च विवाहः प्रायशो भवेत् ।।१५०।। सप्तमेश शुभग्रह की राशि में हो, शुक्र अपने उच्च या अपनी राशि में हो तो पाँचवें या नवें वर्ष में विवाह होता है।।१५०।। दारस्थानगते सूर्ये तदीशे भृगुसंयुते। सप्तमैकादशे वर्षे विवाहः प्रायशो भवेत् ।।१५१।। सप्तम भाव में सूर्य हो, सप्तमेश शुक्र से युत हो तो ७वें या १२वें वर्ष में विवाह होता है।।१५१।।

द्वादशभावविचाराध्यायः १७१ कुटुम्बस्थानगे शुक्रे दारेशे लाभराशिगे । दशमे षोडशाब्दे च विवाहः प्रायशो भवेत् ॥१५२॥ दूसरे भाव में शुक्र हो और सप्तमेश ११वें भाव में हो तो १०वें या १६वें वर्ष में विवाह होता है॥१५२॥ लग्नकेन्द्रगते शुक्रे लग्नेशे मन्दराशिगे। वत्सरेकादशे प्राप्ते विवाहं लभते नरः॥१५३॥ लग्न वा केन्द्र में शुक्र हो और लग्नेश शनि की राशि में हो तो ११वें वर्ष में विवाह होता है॥१५३॥ लग्नात्केन्द्रगते शुक्रे तस्मात्कामगते शनौ । द्वादशैकोनविंशे च विवाहः प्रायशो भवेत् ॥१५४॥ लग्न से केन्द्र में शुक्र हो, उससे सातवें भाव में शनि हो तो १२वें वा १९वें वर्ष में विवाह होता है॥१५४॥ चन्द्राज्जामित्रगे शुक्रे शुक्राज्जामित्रगे शनौ । वत्सरेऽष्टादशे प्राप्ते विवाहं लभते नरः॥१५५॥ चन्द्रमा से ७वें भाव में शुक्र हो और शुक्र से ७वें भाव में शनि हो तो १८वें वर्ष में प्रायः विवाह होता है॥१५५॥ धनेशे लाभराशिस्थे लग्नेशे कर्मराशिभे । अब्दे पञ्चदशे जाते विवाहं लभते नरः॥१५६॥ द्वितीयेश लाभभाव में हो और लग्नेश १०वें भाव में हो तो १५वें वर्ष में विवाह होता है॥१५६॥ धनेशे लाभराशिस्थे लाभेशे धनराशिगे। अब्दत्रयोदशे प्राप्ते विवाहं लभते नरः॥१५७॥ धनेश (द्वितीयेश) लाभभाव में और लाभेश (११ भाव का स्वामी) धन भाव में हो तो १३वें वर्ष में विवाह होता है॥१५७॥ रन्ध्राज्जामित्रगे शुक्रे तदीशे भौमसंयुते । द्वाविंशे सप्तविंशाब्दे विवाहो लभते नरः॥१५८॥ अष्टमभाव से सातवें भाव में शुक्र हो और सप्तमेश भौम से युत हो तो २२वें या २७वें वर्ष में विवाह होता है॥१५८॥ दारांशकगते लग्ननाथे दारेश्वरे व्यये। त्रयोविंशे च षड्‌विंशे विवाहं लभते नरः॥१५९॥

१७२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् सप्तम भाव के नवांश में लग्नेश हो और सप्तमेश बारहवें भाव में हो तो २३वें या २६वें वर्ष में विवाह होता है॥१५९॥ रन्ध्रांशे दारराशिस्थे लग्नांशे भृगुसंयुते। पञ्चविंशे त्रयस्त्रिंशे विवाहं लभते नरः॥१६०॥ अष्टम भाव की नवांश राशि सातवें भाव में हो और लग्न के नवांश में शुक्र युत हो तो २५वें या ३३वें वर्ष में विवाह होता है॥१६०॥ भाग्याद्भाग्यगते शुक्रे तद्व्यये राहुसंयुते। एकत्रिशात्त्रयस्त्रिंशे दारलाभं विनिर्दिशेत् ॥१६१॥ भाग्यस्थान से भाग्यभाव में शुक्र हो, उससे बारहवें भाव में राहु हो तो ३१वें वा ३३वें वर्ष में विवाह होता है॥१६१॥ भाग्याज्जामित्रगे शुक्रे तद्द्यूने दारनायके। त्रिंशे वा सप्तत्रिंशाब्दे विवाहं लभते नरः॥१६२॥ भाग्यभाव से ७वें भाव में शुक्र हो, उससे बारहवें भाव में राहु हो तो ३०वें वा ३७वें वर्ष में विवाह होता है॥१६२॥ स्त्रीमृत्युसमयमाह— दारेशे नीचराशिस्थे शुक्रे रन्ध्रारिसंयुते। अष्टादशे त्रयस्त्रिंशे वत्सरे दारनाशनम्॥१६३॥ सप्तमेश अपनी नीच राशि में हो और शुक्र ८, ६ भाव में हो तो १८वें या ३३वें वर्ष में स्त्री का नाश होता है॥१६३॥ मदेशे नाशराशिस्थे व्ययेशे मदराशिगे। तस्य चैकोनत्रिंशाब्दे दारनाशं विनिर्दिशेत् ॥१६४॥ सप्तमेश ८वें भाव में हो और व्ययेश सातवें भाव में हो तो २९वें वर्ष में स्त्री का नाश होता है॥१६४॥ कुटुम्बस्थानगे राहुः कलत्रे भौमसंयुते। पाणिग्रहे विवाहे च सर्पदंष्ट्रे वधूमृतिः॥१६५॥ दूसरे भाव में राहु हो और सातवें भाव में भौम हो तो विवाह के बाद ही साँप के काटने से स्त्री की मृत्यु होती है॥१६५॥ रन्ध्रस्थानगते शुक्रे तदीशे सौरिराशिगे। द्वादशैकोनविंशाब्दे दारनाशं विनिर्दिशेत् ॥१६६॥

द्वादशभावविचाराध्यायः १७३ आठवें भाव में शुक्र हो और अष्टमेश शनि की राशि में हो तो १२- वें या २९वें वर्ष में स्त्री की मृत्यु होती है।।१६६।। लग्नेशे नीचराशिस्थे धनेशे निधनं गते। त्रयोदशे तु सम्प्राप्ते कलत्रस्य मृतिं वदेत्।।१६७।। लग्नेश अपनी नीचराशि में हो और धनेश आठवें भाव में हो तो १३वें वर्ष में स्त्री की मृत्यु होती है।।१६७।। शुक्राज्जामित्रगे चन्द्रे चन्द्राज्जामित्रगे बुधे। रन्ध्रेशे सुतभावस्थे प्रथमं दशमाब्दिकम्।।१६८।। द्वाविंशे च द्वितीयं च त्रयस्त्रिंशं तृतीयकम्। विवाहं लभते मर्त्यो नात्र कार्या विचारणा।।१६९।। शुक्र से सातवें भाव में चन्द्रमा हो और चन्द्रमा से सातवें भाव में बुध हो तथा अष्टमेश पाँचवें भाव में हो तो पहला विवाह १०वें वर्ष में, दूसरा २२वें वर्ष में और तीसरा ३३वें वर्ष में होता है।।१६९।। अथाष्टमभावफलमाह- आयुःस्थानाधिपः पापैः सहैव यदि संस्थितः। करोत्यल्पायुषं जातं लग्नेशोऽप्यत्र संस्थितः।।१७०।। अष्टमेश पापग्रह और लग्नेश के साथ आठवें भाव में हो तो जातक अल्पायु होता है।।१७०।। एवं हि शनिना चिन्ता कार्या तर्कैर्विचक्षणैः। कर्माधिपेन च तथा चिन्तनं कार्यमायुषः।।१७१।। इसी प्रकार तर्क द्वारा शनि और कर्मेश से भी आयु का विचार करना चाहिए।।१७१।। षष्ठे व्ययेऽपि षष्ठेशो व्ययाधीशो रिपौ व्यये। लग्नेऽष्टमे स्थितो वापि दीर्घमायुः प्रयच्छति।।१७२।। षष्ठेश ६ या १२ भाव में हो और व्ययेश ६ या १२ भाव में हो अथवा लग्न वा आठवें भाव में हो तो दीर्घायु होता है।।१७२।। स्वस्थाने स्वांशके वापि मित्रेशे मित्रमन्दिरे। दीर्घायुषं करोत्येव लग्नेशोऽष्टमपः पुनः।।१७३।। लग्नेश, अष्टमेश और पंचमेश अपने भाव में, अपने नवांश में वा मित्र की राशि में हो तो दीर्घायु होता है।।१७३।।

१७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् लग्नाष्टमकर्मेशमन्दाः केन्द्रत्रिकोणयोः। लाभे वा संस्थितास्तद्वत् दिशेयुर्दीर्घमायुषम् ।।१७४।। लग्नेश, अष्टमेश, कर्मेश और शनि केन्द्र-त्रिकोण और लाभ भाव में हों तो दीर्घायु होती है।।१७४।। अष्टमाधिपतौ केन्द्रे लग्नेशे बलवर्जिते। विंशद्वर्षाण्यसौ जीवेद्द्वात्रिंशत्परमायुषम् ।।१७५ ।। अष्टमेश केन्द्र में हो और लग्नेश निर्बल हो तो २० वर्ष या ३२ वर्ष की आयु होती है।।१७५।। रन्ध्रेशे नीचराशिस्थे रन्ध्रे पापग्रहैर्युते। लग्नेशे दुर्बले यस्य अल्पायुर्भवति ध्रुवम् ।।१७६ ।। अष्टमेश अपनी नीच राशि में हो, अष्टम भाव में पापग्रह हों और लग्नेश दुर्बल हो तो अल्पायु होती है।।१७६।। रन्ध्रेशे पापसंयुक्ते रन्ध्रे पापग्रहैर्युते। व्यये क्रूरग्रहैर्जाते जातमात्रं मृतिर्भवेत् ।।१७७।। अष्टमेश पापग्रह से युक्त हो, आठवें भाव में पापग्रह हों और बारहवें भाव में पापग्रह हों तो उत्पन्न होते ही मृत्यु हो जाती है।।१७७।। केन्द्रत्रिकोणपापस्थाः षष्ठाष्टेषु शुभा यदि। लग्ने रन्ध्रेशनीचस्थे जातः सद्यो मृतो भवेत् ।।१७८ ।। केन्द्र-त्रिकोण में पापग्रह हों, ६/८ भाव में शुभग्रह हों, लग्न में अष्टमेश अपनी नीचराशि का हो तो शीघ्र ही मृत्यु होती है।।१७८।। पञ्चमे पापसंयुक्ते रन्ध्रेशे पापसंयुते। रन्ध्रे पापग्रहैर्युक्ते अल्पायुष्यः प्रजायते ।। १७९ ।। पाँचवें भाव में पापग्रह हो, अष्टमेश पापग्रह से युत हो और अष्टम भाव पापग्रह से युत हो तो अल्पायु होती है।।१७।। रन्ध्रेशे रन्ध्रराशिस्थे चन्द्रे पापसमन्विते। शुभदृग्रहिते विद्वन् मासान्ते च मृतिर्भवेत् ।।१८० ।। अष्टमेश आठवें भाव में और चन्द्रमा पापयुक्त हो, शुभग्रह से न देखा जाता हो तो मास के अंत में मृत्यु होती है।।१८०।। लग्नेशे स्वोच्चराशिस्थे चन्द्रे लाभसमन्विते। रन्ध्रस्थानगते जीवे दीर्घायुष्यं न संशयः ।।१८१ ।।

द्वादशभावविचाराध्यायः १७५ लग्नेश अपनी उच्चराशि में हो और चन्द्रमा लाभभाव में हो तथा आठवें भाव में गुरु हो तो दीर्घायु होती है, इसमें संशय नहीं है ।।१८१।। अथ नवमभावफलमाह- गुरुस्थानगते जीवे तदीशे केन्द्रसंस्थिते। लग्नेशे बलसंयुक्ते बहुभाग्याधिपो भवेत् ।।१८२।। नवम स्थान में गुरु हो, नवमेश केन्द्र में हो और लग्नेश बलवान् हो तो बड़ा ही भाग्यवान् होता है।।१८२।। भाग्येशे बलसंयुक्ते भाग्ये भृगुसमन्विते। लग्नात्केन्द्रगते जीवे पितृभाग्यसमन्वितः।।१८३।। भाग्येश बलवान् हो, भाग्यस्थान में शुक्र हो, लग्न से केन्द्र में गुरु हो तो पिता भाग्यवान् होता है।।१८३।। भाग्यस्थानाद्द्वितीये वा सुखे भौमसमन्विते। भाग्येशे नीचराशिस्थे पिता निर्धन एव च ।।१८४।। भाग्यस्थान से दूसरे वा चौथे स्थान में भौम हो और भाग्येश नीच राशि में हो तो पिता निर्धन होता है।।१८४।। भाग्येशे परमोच्चस्थे भाग्यांशे जीवसंयुते। लग्नाच्चतुष्टये शुक्रे पिता दीर्घायुरादिशेत् ।।१८५।। भाग्येश परम-उच्चांश में हो, गुरु भाग्यांश में हो, लग्न से केन्द्र में शुक्र हो तो पिता दीर्घायु होता है।।१८५।। भाग्येशे केन्द्रभावस्थे गुरुणा च निरीक्षिते। तत्पिता वाहनैर्युक्तो राजा वा तत्समो भवेत् ।।१८६।। भाग्येश केन्द्र में गुरु से देखा जाता हो तो उसका पिता वाहन से युक्त राजा वा उसके समान होता है।।१८६।। भाग्येशे कर्मभावस्थे कर्मेशे भाग्यराशिगे। शुभयोगे धनाढ्यश्च कीर्त्तिमांस्तत्पिता भवेत् ।।१८७।। भाग्येश कर्मभाव में हो, कर्मेश भाग्यभाव में हो और शुभग्रह से किसी प्रकार का संपर्क हो तो उसका पिता धनी और कीर्त्तिमान् होता है।।१८७।।

१७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् परमोच्चांशगे सूर्ये भाग्येशे लाभसंस्थिते । धर्मिष्ठो नृपवात्सल्यः पितृभक्तो भवेन्नरः ।।१९८८ ।। सूर्य परम-उच्चांश में हो, भाग्येश लाभभाव में हो तो जातक धर्मिष्ठ, राजा का प्रेमपात्र और पितृभक्त होता है ।। १९८८ ।। लग्नात्त्रिकोणगे सूर्ये भाग्येशे सप्तमस्थिते । गुरुणा सहिते दृष्टे पितृभक्तिसमन्वितः ।।१९८९।। भाग्येशे धनभावस्थे धनेशे भाग्यराशिगे । द्वात्रिंशात्परतो भाग्यं वाहनं कीर्त्तिसम्भवः ।।१९९०।। लग्न से त्रिकोण में सूर्य हो, भाग्येश धनभाव में और धनेश भाग्यभाव में हो तो ३२वें वर्ष के बाद भाग्य, वाहन और कीर्त्ति का लाभ होता है।।१९९०।। पितृवैरयोगः- लग्नेशे भाग्यराशिस्थे षष्ठेशे भाग्यराशिगे । अन्योऽन्यवैरं ब्रुवते जनकः कुत्सितो भवेत् ।।१९९१।। लग्नेश भाग्यभाव में हो और षष्ठेश भाग्यभाव में हो तो परस्पर पिता- पुत्र में वैर होता हैं तथा पिता निन्दनीय होता है।।१९९१।। भिक्षाशनयोगः- कर्माधिपेन सहितो विक्रमेशो च निर्बलः । नीचास्तगो च भाग्येशो योगो भिक्षाशनप्रदः ।।१९९२।। यदि निर्बल तृतीयेश कर्मेश से युक्त हो और भाग्येश नीच वा अस्त में हो तो जातक भिक्षा से उदरपूर्त्ति करने वाला होता है ।।१९९२।। पितृमरणयोगमाह- षष्ठाष्टमव्यये भानू रन्ध्रेशे भाग्यसंयुते । व्ययेशे लग्नराशिस्थे षष्ठेशे पञ्चमे स्थिते ।।१९९३।। जातस्य जननात्पूर्वं जनकस्य मृतिं वदेत् । सूर्य ६/८/१२ भाव में हो और अष्टमेश भाग्य भाव में हो तथा व्ययेश लग्न में और षष्ठेश पाँचवें भाव में हो बालक के जन्म से पूर्व ही पिता की मृत्यु हो जाती है।।१९९३।। रन्ध्रस्थानगते सूर्ये रन्ध्रेशे भाग्यभावगे ।।१९९४ ।। जातस्य प्रथमाब्दे च पितुर्मरणमादिशेत् ।

द्वादशभावविचाराध्यायः १७७ आठवें स्थान में सूर्य हो और अष्टमेश भाग्यभाव में हो तो बालक के पहले वर्ष में ही पिता की मृत्यु होती है।।१९४।। व्ययेशे भाग्यराशिस्थे नीचांशे भाग्यनायके। तृतीये षोडशे वर्षे जनकस्य मृतिर्भवेत् ।।१९५।। व्ययेश भाग्यभाव में, भाग्येश नीचांश में हो तो तीसरे वा सोलहवें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।।१९५।। लग्नेशे नाशराशिस्थे रन्ध्रेशे भानुसंयुते। द्वितीये द्वादशे वर्षे पितुर्मरणमादिशेत् ।।१९६।। लग्नेश आठवें भाव में और अष्टमेश सूर्य से युत हो तो दूसरे वा १२वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।।१९६।। भाग्याद्रन्ध्रगते राहौ भाग्याद्भाग्यगते रवौ। राहुणा सहिते सूर्ये चन्द्राद्भाग्यगते शनौ ।।१९७।। सप्तमैकोनविंशाब्दे तातस्य मरणं भवेत्। भाग्यभाव से आठवें भाव में राहु हो, भाग्य से भाग्यभाव में रवि राहु से युक्त हो और चन्द्रमा से भाग्यभाव में शनि हो तो ७वें या १९वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।।१९७।। भाग्येशे व्ययराशिस्थे व्ययेशे भाग्यराशिगे ।।१९८।। चतुश्चत्वारिवर्षाच्च पितुर्मरणमादिशेत्। भाग्येश १२वें भाव में और व्ययेश भाग्यभाव में हो तो ४४वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।।१९८।। रव्यंशे च स्थिते चन्द्रे लग्नेशे रन्ध्रसंयुते ।।१९९।। पञ्चत्रिंशैकचत्वारिंशद्वर्षे पितृनाशनम्। सूर्य के नवांश में चन्द्रमा हो और लग्नेश आठवें भाव में हो तो ३५वें वा ४१वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।।१९९।। पितृस्थानाधिपे सूर्ये मन्दभौमसमन्विते ।।२००।। पञ्चाशद्वत्सरे प्राप्ते जनकस्य मृतिर्भवेत्। पितृस्थान (१०) का स्वामी सूर्य हो और शनि-भौम से युत हो तो ५०वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।।२००।। भाग्यात्सप्तमगे सूर्ये भ्रातृसप्तमगस्तमः ।।२०१।। षष्ठे वा पञ्चविंशाब्दे पितुर्मरणमादिशेत्।

१७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् भाग्यभाव से ७वें सूर्य हो और भ्रातृभाव से ७वें राहु हो तो छठे वा २५वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है॥२०१॥ रन्ध्रजामित्रगे मन्दे मन्दाज्जामित्रगे रवौ॥२०२॥ त्रिंशैकविंशे षड्विंशे जनकस्य मृतिर्भवेत्। आठवें से सातवें भाव में शनि हो और शनि से ७वें भाव में राहु हो तो ३०वें, २१वें वा २६वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है॥२०२॥ भाग्येशे नीचराशिस्थे तदीशे भाग्यराशिगे॥२०३॥ षड्विंशे च त्रयस्त्रिंशे पितुर्मरणमादिशेत्। एवं तातस्य भो विद्वन् फलं ज्ञात्वा समादिशेत्॥२९४॥ भाग्येश नीच राशि में और नीच राशि का स्वामी भाग्यभाव में हो तो २६वें वा ३३वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है। इस प्रकार से पिता की मृत्यु का विचार कर आदेश देना चाहिए॥२०३-२०४॥ परमोच्चांशगे शुक्रे भाग्येशेन समन्विते। भ्रातृस्थाने शनियुते बहुभाग्याधिपो भवेत्॥२०५॥ भाग्येश से युत शुक्र परम-उच्चांश में हो और मातृस्थान में शनि हो तो बड़ा भाग्यवान् होता है॥२०५॥ गुरुणा संयुते भाग्ये तदीशे केन्द्रराशिगे। विंशद्वर्षात्परं चैव बहुभाग्यं विनिर्दिशेत्॥२०६॥ भाग्यस्थान में गुरु हो और भाग्येश केंद्र में हो तो २२ वर्ष के बाद भाग्योदय होता है॥२०६॥ परमोच्चांशगे सौम्ये भाग्येशे भाग्यराशिगे। षट्त्रिंशाच्च परं चैव बहुभाग्यं विनिर्दिशेत्॥२०७॥ बुध परम उच्चांश में हो और भाग्येश भाग्यभाव में हो तो ३६वें वर्ष के बाद भाग्योदय होता है॥२०७॥ लग्नेशे भाग्यराशिस्थे भाग्येशे लग्नसंयुते। गुरुणा संयुते द्यूने धनवाहनलाभकृत्॥२०८॥ लग्नेश भाग्यभाव में और भाग्येश लग्न में हो तथा गुरु सप्तम भाव में हो तो धन-वाहन से युक्त होता है॥२०८॥

द्वादशभावविचाराध्यायः १७९ भाग्यहीनयोगः भाग्याद्भाग्यगतो राहुर्भाग्येशे निधनं गते । भाग्येशे नीचराशिस्थे भाग्यहीनो भवेन्नरः ॥२०९॥ भाग्यस्थान से नवम भाव में राहु हो तथा भाग्येश अपनी नीच राशि के आठवें भाव में हो तो मनुष्य भाग्यहीन होता है॥२०९॥ भाग्यस्थानगते मन्दे शशिना च समन्विते । लग्नेशे नीचराशिस्थे भिक्षाशी च नरो भवेत् ॥२१०॥ भाग्यस्थान में शनि चन्द्रमा के साथ हो और लग्नेश नीच राशि में हो तो भिक्षा का अन्न खाने वाला होता है॥२१०॥ अथ दशमभावफलमाह- कर्माधिपो बलोनश्चेत्कर्मवैकल्यमादिशेत् । सैंहिः केन्द्रत्रिकोणस्थो ज्योतिष्टोमादियागकृत् ॥२११॥ कर्मेश निर्बल हो तो जातक कर्महीन होता है। राहु केन्द्र-त्रिकोण में हो तो ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ करने वाला होता है॥२११॥ दशमे पापसंयुक्ते लाभे पापसमन्विते । दुष्कृतिं लभते मर्त्यः स्वजनानां विदूषकः ॥२१२॥ दशम भाव में पापग्रह हो और लाभ भाव में पापग्रह हो तो जातक दुष्कीर्त्ति पाता है॥२१२॥ कर्मेशे नाशराशिस्थे राहुणा संयुतेऽपि च। जनद्वेषी महामूर्खो दुष्कृतिं लभते नरः ॥२१३॥ कर्मेश राहु से संयुक्त होकर आठवें भाव में हो तो मनुष्यों से द्वेष करने वाला, महामूर्ख और दुष्कर्म में प्रवृत्त होता है॥२१३॥ कर्मेशे द्यूनराशिस्थे मन्दभौमसमन्विते । द्यूनेशे पापसंयुक्ते शिश्नोदरपरायणः ॥२१४॥ कर्मेश शनि-भौम से युत होकर सप्तम भाव में हो और सप्तमेश पाप से युत हो तो जातक शिश्न द्वारा उदरपूर्त्ति (जीविका) करने वाला होता है॥२१४॥ तुङ्गराशिं समाश्रित्य कर्मेशे गुरुसंयुते । भाग्येशे कर्मराशिस्थे यानैश्वर्यप्रतापवान् ॥२१५॥

१८० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अपनी उच्चराशि में कर्मेश गुरु से युत हो और भाग्येश कर्मराशि में हो तो जातक मान-ऐश्वर्य से युक्त प्रतापी होता है।।२१५।। लाभेशे कर्मराशिस्थे कर्मेशे लग्नसंयुते । तावुभौ केन्द्रगौ वादि सुखजीवनभाग्भवेत् ।।२१६ ।। लाभेश कर्मराशि में हो और कर्मेश लग्न में हो अथवा दोनों केन्द्र में हों तो सुखी जीवन वाला होता है।।२१६।। कर्मेशे बलसंयुक्ते मीने गुरुसमन्विते । वस्त्राभरणसौख्यादि लभते नात्र संशयः ।।२१७ ।। कर्मेश बलवान् होकर मीनराशि में गुरु से युत हो तो जातक वस्त्र, आभूषण सुख आदि से युक्त होता है।।२१७।। कर्महीनयोगः- लाभस्थानगते सूर्ये राहुभौमसमन्विते । रविपुत्रेण संयुक्ते कर्मच्छेत्ता भवेन्नरः ।।२१८ ।। सूर्य लाभभाव में राहु, भौम, शनि से युत हो तो जातक कर्महीन होता है।।२१८।। शुभकर्मयोगाः- मीने जीवे भृगुसुते लग्नेशे बलसंयुते । स्वोच्चराशिगते चन्द्रे सम्यग्ज्ञानार्थवान् भवेत् ।।२१९ ।। मीनराशि में गुरु-शुक्र हों, लग्नेश बलवान् हो और चंद्रमा अपनी उच्चराशि में हो तो ज्ञानी और धनी होता है।।२१९।। कर्मेशे लाभराशिस्थे लाभेशे लग्नसंस्थिते । कर्मराशिस्थिते शुक्रे रत्नवान् स नरो भवेत् ।।२२० ।। कर्मेश लाभभाव में और लग्नेश लग्न में तथा शुक्र कर्मभाव में हो तो मनुष्य रत्नों से युक्त होता है।।२२०।। केन्द्रत्रिकोणगे कर्मनाथे स्वोच्चसमाश्रिते । गुरुणा सहिते दृष्टे स कर्मसहितो भवेत् ।।२२१।। अपनी उच्च राशि में कर्मेश केंद्र-त्रिकोण में और गुरु से युत-दृष्ट हो तो मनुष्य कर्मश्रेष्ठ होता है।।२२१।। कर्मेशे लग्नभावस्थे लग्नेशेन समन्विते । केन्द्रत्रिकोणगे चन्द्रे सत्कर्मनिरतो भवेत् ।।२२२।।