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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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९१ (५) ठाकुर—क्षत्रियौंकी उपाधि भोजपुरी-अवधी आदि प्रदेशोंम यह क्षत्रिय जातिका बोधक है। परजा पानि—सेवाकाज करनेवाले लोग। (६) खोर—गली रास्ता मार्ग। हूँड—टटोहना, ढूँढना। (७) तैस—ऐसा। का (क्रिया)—है। २७ (रिउण्ड्यस ८) सिफते मजलिस चरकधन्बन्वान राय महर गोयद (राय महरके सैनिकों (?) का वर्णन) राजकुरँ कँ पीस ठठारी। हम पुनि तहाँ बैठहिं बाठी ॥१ अति बिधवाँस पँडित ते बड़े। रूपमरार दयी के गढ़े ॥२ अधरन लागे पान पभाही। मुख मँह दाँत सड़सो जिहँ माहीं ॥३ दान शूज कर विरुद बुलावहिं। माटहिं कयपर घोर दिखावहिं ॥४ हाथ खरग धीरहि सर दीन्हें। धीरहि ऊपर धीरा लीन्हें ॥५ झेतस फरे राज नित, भूँजहि सासन गाँव ।६ देस कँ डाँड आठ महरँ कहुँ, तिहँ गउरहुँ कै नाँउ ॥७ टिप्पणी—(१) इस यमकका सन्तोषजनक पाठोद्धार सम्भव नहीं हो सका। प्रथम बाचनके समय हमने पूर्वपदको 'राज करें कै फेस उठाइ पढ़ा था पर आगेक यमकोंके प्रसगमें यह पाठ असंगत जान पड़ा। प्राय ही यह परिवर्तित पाठ भी सन्दिग्ध है विशेषरूपसे अन्तिम शब्दका पाठ। उत्तर पदके किसी शब्दक पाठस भी हम सन्तोष नहीं है। 'तहाँ'का पाठ 'थान' और 'बैठहि'का पाठ 'मये तिहि भी हा सकता है। पर किसी भी पाठके साथ कोर अथ नहीं निकलता। (२) बिधँवास-विद्वान। रूपमरार-इस शब्दका प्रयोग रूपका कथन करते हुए कविने अनेक स्थानोंपर किया है। जायसीने भी पदमावतूम इसका प्रयोग किया है। वहाँ इसे 'रूपमुरारी' पढ़ा गया है और वासुदेवशरण अग्रवालने टीका करते हुए इसका अर्थ 'रूपमें कृष्णक भांति सुन्दर' किया है। किन्तु न तो यह पाठ ही ठीक जान पड़ता और न अथ ही। चौदहवीं शताब्दीमें कृष्ण रूप-सौन्दर्यके प्रतीक बन गये थे, इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हमारी धारणा है कि इन कवियोंने यहाँ कृष्णवाचक 'मुरारि'का प्रयोग नहीं किया

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