भारतकोश
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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

९१ (५) ठाकुर—क्षत्रियौंकी उपाधि भोजपुरी-अवधी आदि प्रदेशोंम यह क्षत्रिय जातिका बोधक है। परजा पानि—सेवाकाज करनेवाले लोग। (६) खोर—गली रास्ता मार्ग। हूँड—टटोहना, ढूँढना। (७) तैस—ऐसा। का (क्रिया)—है। २७ (रिउण्ड्यस ८) सिफते मजलिस चरकधन्बन्वान राय महर गोयद (राय महरके सैनिकों (?) का वर्णन) राजकुरँ कँ पीस ठठारी। हम पुनि तहाँ बैठहिं बाठी ॥१ अति बिधवाँस पँडित ते बड़े। रूपमरार दयी के गढ़े ॥२ अधरन लागे पान पभाही। मुख मँह दाँत सड़सो जिहँ माहीं ॥३ दान शूज कर विरुद बुलावहिं। माटहिं कयपर घोर दिखावहिं ॥४ हाथ खरग धीरहि सर दीन्हें। धीरहि ऊपर धीरा लीन्हें ॥५ झेतस फरे राज नित, भूँजहि सासन गाँव ।६ देस कँ डाँड आठ महरँ कहुँ, तिहँ गउरहुँ कै नाँउ ॥७ टिप्पणी—(१) इस यमकका सन्तोषजनक पाठोद्धार सम्भव नहीं हो सका। प्रथम बाचनके समय हमने पूर्वपदको 'राज करें कै फेस उठाइ पढ़ा था पर आगेक यमकोंके प्रसगमें यह पाठ असंगत जान पड़ा। प्राय ही यह परिवर्तित पाठ भी सन्दिग्ध है विशेषरूपसे अन्तिम शब्दका पाठ। उत्तर पदके किसी शब्दक पाठस भी हम सन्तोष नहीं है। 'तहाँ'का पाठ 'थान' और 'बैठहि'का पाठ 'मये तिहि भी हा सकता है। पर किसी भी पाठके साथ कोर अथ नहीं निकलता। (२) बिधँवास-विद्वान। रूपमरार-इस शब्दका प्रयोग रूपका कथन करते हुए कविने अनेक स्थानोंपर किया है। जायसीने भी पदमावतूम इसका प्रयोग किया है। वहाँ इसे 'रूपमुरारी' पढ़ा गया है और वासुदेवशरण अग्रवालने टीका करते हुए इसका अर्थ 'रूपमें कृष्णक भांति सुन्दर' किया है। किन्तु न तो यह पाठ ही ठीक जान पड़ता और न अथ ही। चौदहवीं शताब्दीमें कृष्ण रूप-सौन्दर्यके प्रतीक बन गये थे, इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हमारी धारणा है कि इन कवियोंने यहाँ कृष्णवाचक 'मुरारि'का प्रयोग नहीं किया

१२ है। यह कोई सौन्दर्य-बोधक विशेषण है। जिसका भाव और अर्थ हमें स्पष्ट नहीं हो रहा है। शिवसहाय पाठकका सुझाव है कि 'मराउ' का तात्पर्य 'मराळ' से है और 'रुप-मराउ' का भाव है 'मयूरके समान सुन्दर'। (४) सापर-सपन। बार-घोड़ा। (५) सरम-सदृश, तद्रूपकार। (६) मूँजहि-उद्वेग कर। सासन (सं शासन)—राजाज्ञा अंकित ताम्र- पत्र। सासन गाँव-राज्यादेशसे प्राप्त ग्राम। २८ ( रत्नकण्ड ९ ) सिफत बाजार शरिपात शहरे गोबर व खरीद्ने खल्क (गोबर नगरके सुगन्धिके बाजार तथा वहाँकी खरीददारीका वर्णन) सुनो फूल हाट सब फूला। बीठ विमोइ गा देखत भूला ॥१ अगर चन्दन सब धरा बिकाने। कुंकुं परिमल सुगंधि गंधाने ॥२ बेनाँ और केवर सुहाया। मोल किये [पर*] महँक (सुँघाया) ॥३ पान नगरखण्ड सुरंग सुपारी। जैफर लौंग झिकरी झारी ॥४ दौंनाँ मरबा कुन्द निवारी। गूँदह हार ते बेचहिं नारी ॥५ खाँड चिरौंजी दाख खुरहुरी, बैठे लोग बिसाइ ।६ हीर पनेर सों भल कायड़, जित चाहे सब आइ ॥७ मुखपाठ-(१) सुनावा। टिप्पणी-(२) धरा-धड़ा पाँच सेरका तौल। कुंकूँ-केसर। परिमल-कई सुग न्धियोंको मिलाकर बनाई हुई विशेष बात (वासुदेवशरण अग्रवाल)। (३) बेना-बीरन छत। केवर-केवड़ा। (४) जैफर-जायफल। (५) दौंनाँ-तुलसीकी जातिका पौधा जिसकी पत्तियोंमें सुगन्धि होती है। मरबा-(सं मरुवक) यह फाल्गुन-चैतमें फूलता है। इसके फूल लाल और सफेद दो रंगोंके होते हैं। कुन्द-सफेद रंगका छोटा फूल जो अगहन-पूसमें फूलता है। नेवारी-इसे निवाड़ी भी कहते हैं। यह चैतमें फूलनेवाला सफेद फूल है। आइने अकबरीमें इसे एक दलेका फूल कहा गया है। यह रायबेलसे मिलता जुलता है। सवेरे फूल इतने अधिक आते हैं कि पेड़ ढक जाता है।

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(६) खाँड—शक्कर, चीनी। खुरहुरी—पद्मावतमें इसका उल्लेख हुआ है। वहाँ वासुदेवशरण अग्रवालने इसकी व्युत्पत्ति क्षुद्रखुरली—क्षुदखुरली—खुरहरी बताया है और वाट कृत डिक्शनरी आफ द इकनामिक प्राडक्ट्स (भाग २, पृष्ठ ११४) से इसके अनेक नाम गिनाये हैं। (पद्मावत २८।४)। पर हमारी दृष्टिमें यहाँ तात्पर्य छुहारेसे है। (७) हीर—इसके कई अर्थ हो सकते हैं। (१) ईराक स्थित हीरक बने हुए वस्त्र। इब्न-बतूताने वहाँके बने दीवाज (जरीका बना वस्त्र) हरीर (रेशम) और चित्रित तासीकी चर्चाकी है जो वहाँ इस्लामके उद्भवसे पूर्व तैयार होते थे (आल इस्लामिया, खण्ड २, पृ ८९)। किन्तु इस्लामके युगमें इस स्थानका महत्त्व घट गया था। इस कारण कदाचित इससे यहाँ तात्पर्य यह न होगा। (२) मोतीचन्द्रका कहना है कि हेरातके मार्गसे जो वस्त्र भारत आते थे वे पट्टहरि अथवा हीरपट्ट कहे जाते थे। (कास्ट्यूम्स ऐण्ड टेक्सटाइल्स इन सल्तनत पीरियड पृ १४)। (३) ऐसा वस्त्र जिसपर हीरेकी आकृति हो (यह सुझाव भी मोतीचन्द्रका ही है)। हो सकता है यहाँ इसीसे तात्पर्य हो, क्योंकि लहर-पटोर ऐसा प्रयोग पद्मावतमें मिलता है (१२९।१) जिसका तात्पर्य लहरियादार पटोर है। उसी प्रकार यहाँ हीर पटोरसे तात्पर्य हीरेकी आकृति अंकित पटोरसे हो सकता है। (४) लोककी बोलचालमें किसी वस्तुकी सर्वोत्तम छाँटी हुई वस्तुको उस वस्तुका हीर कहा करते हैं। हमारी समझमें उसी अर्थमें यहाँ इसका प्रयोग हुआ है। हीर पटोरसे तात्पर्य है उच्च कोटिका पटोर, अथवा बारीक किस्मका पटोर। पटोर—देखिये आगे १२।७।

२९ ( सैकँण्ड्स १ ) सिफ्ते बाजीगरों दर बाजार शहर गोबर गोयर (गोबर नगरके बाजीगरोंका वर्णन)

हाट छरेंटा पेखन होई। देखहिं निसर मनुस औ जोई ॥१ परढा राम रमायन कहहीं। गावैहिं कबिच नाच मल फरहीं ॥२ बहुरुपिये बहु भेस मराषा। मार युद्ध चलि देरैं आवा ॥३ रासैं गावैंहिं भइ झलझार्वहिं। संग मूद बिस बँह वहावैहिं ॥४ फीनर गावैंहि होई पँवारा। नट नाचहिं औ बाजहिं तारा ॥५

नाट हँकारे कूद धरि, हम देखा होइ अबार ।६ नवैइ बधावा गोवर, घर घर मंगलाचार ॥७ टिप्पणी—(१) छरहूँ—सं० च्छरह = छलका बाजार, जादूका तमाशा । पेखन— सं० प्रेक्षण = नाटक तमाशा । जोई—स्त्री । (३) परथा—पत्री । राम रमायन—इस उल्लेखसे यह स्पष्ट प्रकट होता है कि तुलसीदास कृत रामायणकी रचनासे बहुत पूर्व लोकमें राम कथा ख्यात हो चुकी थी और लोग रामयण नामक किसी रचनासे खूब परिचित थे और उसका पाठ किया करते थे । मखतूल उठक चिन बनते थे यह २ ५८ कड़वकसे ज्ञात होता है । अन्यत्र भी कई स्थानों पर रामायणकी घटनाएँ अभिप्राय रूपमें गृहीत हैं । (५) सीसर—सिषर, सम्भवतः यहाँ तात्पर्य हिचकोले है । (६) भवान—भवाणी > भवानी > भवान गृह । ३० ( रीव्ह्यूंस ११ ) सिषत दरबारे राज महर गौरब ( राज महरके दरबारका वर्णन ) कञ्चा महरिह बारि बखानि । बैठ सींह गइ से घरै बनानी ॥१ बहुत बीर तिंह देख पराहीं । हियें लाग डर खेंद न खाहीं ॥२ देखत पौर दीठि फिरि जाइ । एक पूत सतधार उँचाई ॥३ आँट रूप कै पानी ढारा । अस कै महरि दुआरि सँबारा ॥४ साठ लोह एकहिं कौटाने । बबर केवार पौर गइ छाने ॥५ राखहिं वैसे चौकी, कुन्त ढरग रहि छाइ ।६ पाखर सहस साठ फिरि, खाँड़ेहिं सैंचर न जाइ ॥७ टिप्पणी—(१) बारि—घर, निवास स्थान । सींह—सिंह; मध्यकालीन घरोंके प्रवेश-द्वारपर दोनों ओर दो सिंह बनानेकी प्रथा थी। उन्हें प्रायः मरोड़दार पूँछ फटकाते और जीभ निकाले हुए बनाया जाता था। बनानी—बन्द, भाँतिने तुलना कीजिये—सहु बनानके बाहर गये (पदमावत ४१। )। (५) केवार—किवाट दरवाजा । (६) कुन्त—पैदल सैनिकों द्वारा प्रयोगमें आनेवाला बर्छा ।

९५ ३१ (रॉइण्ड्स १२) सिफत करूसहाय राय महर गोयद (राय महरके महलोंका वर्णन) पुनि हौं कहौं धौराहर पाता । इंगुर पानि ढार कइ राता ॥१ सतखंड पाटा आनों भाँती । सात चौखण्डी मयी जिह पाँती ॥२ चौरासी [ ] बसे उछाई । छत्री दररें अती सुहाई ॥३ अस रचना कै कीन बनाई । सातौँ कलस धरै सुनपानी ॥४ कनक खम्भ जड़ मानिक परे । जगमगाहिं जनु सरउँ भरे ॥५ अगर चंदन अन्तो लै, अछर सुहावन बास ।६ देख लोग अस भाखहिं, महुँ आइ कबिलास ॥७ टिप्पणी-(१) धौराहर-ध वलहगृह राजमहलके भीतर रनिवास धौराहर कहलाता था । इसे अन्तःपुर भी कहते थे । (२) सतखंड-सप्तभूमिक प्रासाद सप्तमंजिला महल । इस प्रकारके राजप्रासादोंकी कल्पना गुप्तकालसे ही इस देशम प्रचलित थी । दतियामे सतखण्डी दतीका बीरसिंह देवका महल सतखण्डा है । आनों-अन्यान्य अनेक प्रकारके भाँति-भाँतिके तरह-तरहक । लोकमें बहु प्रचलित इस सीधे सादे शब्दसे परिचित न होनेके कारण माताप्रसाद गुप्तने पद्मावत और मधुमालतीमे सर्वत्र फारसी लिपिमें लिखे 'अलिफ़', 'नून' 'वाव' 'नून'को अनबन' पढा है और उसके अनकन <अन्यवर्णके विकृत पाठ होनेकी क्लिष्ट कल्पना की है । चौखण्डी-चार खण्डकी चौकियाँ अथवा बुर्ज । (४) कलस-कलश गुम्बद । सुनपानी-सोनेके पानीवाला, सुनहरा । (७) महुँ-मानों। कबिलास-स्वर्ग। ३२ (रॉइण्ड्स १३) सिफत हरमाँ राय महर हफ्ताद व चहार बूदन्द (राय महरकी चौरासी रानियोंका उल्लेख) राय महर रानी चौरासी । एक एक के तर चरि अकासी ॥१ जेकर जेकर होइ ओठनारा । जेकर मंदिर सेज सँभारा ॥२

९६ पाटमहादेवि फुलारानी । स्यँ अचेत पह अह सयानी ॥३ अगर चँदन फूल औ पानूँ । कुँकूँ सेंदुर परसेंहि आनूँ ॥४ रचैं हिंडोला झूल नारी । गावहिं अपुरुप जोबनबारी ॥५ अरथ दरब पोर औ हति, गिनत न आवइ काउ ।६ अन धन पाट-पटोर भल, कातुक भूला राउ ॥७ टिप्पणी-(१) तर-नीच आधीन । चेरि-दासी । अपछरी-अप्सरा । (६) बेञ्ज बेञ्ज-अलग अलग, तरह-तरहक । जेउनवार-(प्रा जेमणवार) भोजन रसाद् । (५) जोबनबारी-यौवनवाला युवती । (६) दरब-द्रव्य हति-हाथी । (७) पाट-हमें इस शब्दका प्रयोग किसी पूर्ववर्ती साहित्यमें नहीं मिला। समवर्ती साहित्यमें भी केवल नरपति नाल्ह कृत बीसलदेव रासामें इसका उल्लेख 'पाट पटम्बर'के रूपमें है। परवर्ती साहित्यमें पदमा वतमें एक स्थानपर इसका उल्लेख है (२६२।६) । सम्भवतः यह शब्द संस्कृत पट या पट्टने निकला है । ग्यारहवीं शतीक वैजयन्ती कोष (१६८।२११) और बारहवीं शतीक अभिधान चिन्तामणि कोष (३।५६६-६७) क अनुसार पट वस्त्रकी सामान्य संज्ञा थान पड़ती है । अभिधानमें पुराने कपड़ेके लिए पटच्चर शब्द है ( ३। ६७८) । दसवीं शतीक प्रारम्भमें लिखे गये क्षितिसंग्रह कृत नलचम्पूमें दमयन्तीकी माताको सम्बोधित करते हुए कहलावा गया है कि-इन चीनांशुक पट्टोंको स्वीकार करें जो अगणनीयदम् (अग्नि द्वारा स्वच्छ किये जानेवाले) हैं। स्पष्टतः यहाँ चीनके बने अशनके वस्त्रोंसे तात्पर्य है। इससे भी यही लगता है कि पट सामान्य रूपसे वस्त्रको कहते थे । इसके विपरीत अनेक ऐसे भी उल्लेख प्राप्त होते हैं जिनसे ज्ञात पड़ता है कि पट किसी विशेष प्रकार, सम्भवतः रेशमी वस्त्रको कहते थे । पश्चिमी चालुक्य नरेश सोमेश्वर (११२४- ११३८ ई ) ने अपने मानसोल्लासमें विभिन्न वस्त्रोंक विविध सूत्रोंका उल्लेख किया है उसमें कपास (कर्पास, तूर्ल) कीम (कृन पाट आदि कीड़ोंसे निकाले जानेवाले सूत) रोम (ऊन) के साथ साथ पट्टसूत्रका भी उल्लेख किया है जो प्रसंगके अनुसार रेशमी सूत अनुमान किया जा सकता है। कल्हणके राजतरंगिणीमें एक स्थानपर इस बातका उल्लेख है कि श्रीनगरसे कराढमूल (शरामूल) जानेवाले मार्गमें स्थित पट्टन (आधुनिक पटन) पट्टनानाम् (पट्टकी

बुनाइ) के लिए प्रसिद्ध था। इससे भी प्रकट होता है कि पट्ट रेशम का कहते थे। 'पालित्तीयरत्नसूर (बारहवीं शती) ने वर्णकभास्करमें वस्त्रोंकी तीन सूचियाँ दी हैं। एक सूची तो सूती वस्त्रोंकी है। दूसरी दो सूचियोंके विषय हैं—पट्टम्बर आदि वस्त्र और देसी पट्ट। इनसे भी स्पष्ट है कि पट्ट सूती वस्त्रोंसे भिन्न सम्भवतः वस्त्र था। पाटके अन्तर्गत पट्टके किस अंगका ग्रहण किया गया है, यह निश्चित रूपसे कहना कठिन है। पाट कदाचित उन रेशमी वस्त्रोंको कहते रहे हों, जिन्हें व्यालित्तीयरत्नने देसी पट्ट-वस्त्र कहा है। किन्तु लोकमें प्रचलित व्यवसाय-बोधक जाति-संज्ञा पटुआ और पटहरा इस बातका संकेत करते हैं कि शास्त्रमें पाट सूती वस्त्रकी संज्ञाके रूपमें ही ग्रहण किया गया रहा होगा। प्रस्तुत प्रसंग भी इसीका समर्थन करता जान पड़ता है। पटोर-पटोल अथवा पटोला नामक वस्त्र आज भी गुजरातमें काफी प्रसिद्ध है। वस्त्रोंके उस स्वरूपको पटोला कहते हैं जिसके सूतको बुननेके पूर्व ही निश्चित डिजाइनके अनुसार बाँधकर पद्धतिसे रंग दिया जाता है। चौदहवीं शतीमें वहां इसका प्रचार साटीके रूपमें काफी हो गया था इसका उल्लेख प्राचीन पाण्डुभाण्डार इण्टनेमें जान पड़ता है (प्राचीन पाण्डु संग्रह ४।१२ पृ० २)। ग्रन्थोंमें इसका उल्लेख पटोल पटोल पट्टोली आदि नामोंमें हुआ है (वर्णक समुच्चय, १८१)। विदेशप्रसार गियाउद्दीन खलजीने भी पट्टोलाका उल्लेख अन्यान्यदेशी विशिष्टोड़ा इवारिधि प्राप्त पाण्डुओंमें किया है (पृ ३७१)। पटोलाका प्राचीनतम स्वरूप मालव्यक पट्टावलम्बक पाठ्यमें मिलता है। वहाँ ठगकी गणना "पट्टोलबन्धादि" के अन्तर्गत हुई है (पृ १६८)। पाण्डवी कृतकी मण्डिका छायामें पट्टाला वेष्ट्या दृश्य बताया गया है (१/७/१६६)। पट्टोलाका अन्य रूपमें श्लथावशेष उल्लेख हुआ है। 'पालित्तीयरत्न रत्नसूरिने इसे देसी पट्टोंके अन्तर्गत रखा है। उन्होंने माण्डने बाँधनेके समयमें पाटर पटोलाका उल्लेख किया है। पाटर पटोला समानार्थी जान पड़ता है। इसके अनुसार पटर पटोलका ही पर्याय ठहरता है। इस प्रकार जान पड़ता है कि ... रेशमी वस्त्रोंकी भाँति ... प्रकारके वस्त्र थे। पाटर-पटोर—स्पष्ट है कि यह पट्टोलाके हमली जान पड़ता है कि पट्ट सूती वस्त्र रहा रेशमी कपड़ा रहता है ये ... पर पाटर १८ क ... पट्टोला ... लिए ... रहा। उल्लेख किया गया।

५८ ३३ ( रीकेण्ड्स १३ ) तबल्लुद शुदने चाँदा दर खान-ए महर व शिकस्त्ये कदने हमों सितारग्यान ( महरके घर चाँदाका जन्म और ज्योतिषियोंकी भविष्यवाणी ) सहदेव मंदिर चाँद औतारी। धरती सरग भइ उजियारी ॥१ भले घरें भयउ औतारू। दूज क चाँद आन सयँसारू ॥२ साठो चँदर नखत भा माँगा। आनौं सूर दिपै जिह आँगा ॥३ भय सपूरन चौदस राती। चाँद महर धी पदुमिनि जाती ॥४ राहु केतु दाइ सेउ गराहीं। सूक सनीचर पहिरें घाहीं ॥५ और नखत अरुझठें, आवैंहि पँवर दुआर ॥ चाँद लखत नर माइहिं, जगत भयउ उजियार ॥७ टिप्पणी—(५) सेउ—सवा अधिक बड़े । गराहैं—ग्रह । 'सेउ करावैं' भी पढ़ा जा सकता है । उस अवस्था में अथ होगा—सेवा करते हैं । ३४ ( बीकानेर प्रतिके अप्रक्षिप्त पाठ से ) चाँद सुरूज तेहि निरमरा, सहदेव गिनी जुवारि ॥६ गन गंधर्ब रिसि देवता, देखि बिमोहे नारि ॥७ टिप्पणी—(७) गन गंधर्ब—गन्धर्व समूह । यह पूरी पंक्ति १५वें कड़वकमें भी है। ३५ ( रीकेंड्स १५ ) रोशे पन्जुमें शश्ती शब ज्याफते खान्दा करदन व दीदन कुन्वारहारों ताले ( पाँचवें दिन रात्रिमें भोज और ब्राह्मणोंका कुण्डली देखना ) पाँचौँ दिवस छठी भइ राती। लिउवा गोबर छतीसो जाती ॥१ घर घर भम कर निठता आवा। औ तिह ऊपर बाज बधावा ॥२ महरें सहस सात एक जाये। अग मूड सेंदुर अन्हवाये ॥३ बाँभन सभा आइ जो भईती। छांड़ि पुरान रासि गुन दीठी ॥४ छठी का आखर देखि लिखारा। अब एहि सों जाइ जिंवाय ॥५

९९ अगिन घरफ मा चाँदा, अरकत छुई न जाइ ॥६ जस उजियारैं भुनगा, मरहिं राइ अवाइ ॥७ टिप्पणी—(१) निउता—न्योता निमन्त्रित किया । (३) सात—साठ पाठ भी सम्भव है । (४) पुरान—यहाँ तात्पर्य ज्योतिष ग्रन्थोंसे है । इसका प्रयोग जायसीने भी इसी अर्थमे किया है (५२।२) । रासि—राशि । सुभ—शुभ । दीठी—देखा । (५) भुनगा—दीपक पर मँडरानेवाला कीट, पतंग । ३६ ( रीलेण्ड्स १६ ) सिफ़ते जमाले सूरते चाँदा बरहम शहरा मुन्तशिर शुद ( समस्त नगरोंमें चाँदाके सौन्दर्यकी चर्चा ) बरहें माँस [प्र*]गटी बाता । घौरसमुँद माबर गुजराता ॥१ तिरहुत अठम बदाऊँ जानी । चहूँ भुवन अस बात बखानी ॥२ गोबरहि आइ महर कै धिया । चाँद नाउ धौराहर दिया ॥३ अस तिरिया जो माँगि पाई । अरु तिहि लाइके पियाहिं जाइ ॥४ राजा के नित परठत आवैहिं । फिरि जाहिं पै उत्तर न पावैहिं ॥५ महर कहै को मारै जोगहि, फासों करतौं पियारु ।६ तकतैं पितत सभन्को आहँ, बात न देखतौं काहु ॥७ टिप्पणी—(१) बरहें—बारहवें । घोरसमुद—द्वारसमुद्र द्वारसमुद्र, दक्षिणमें बेलूरसे आठ मील उत्तर-पश्चिम स्थित सुप्रसिद्ध नगर, जो १०६२ ई से होयसलोंकी राजधानी थी । माबर—दक्षिण पूर्वी तटवर्ती भाग जो प्राचीनकालमें चोलमण्डल और आजकल कारोमण्डल कहलाता है; दूसरे शब्दोंमें मद्राससे लेकर तिन्नेवेली तक विस्तृत प्रदेश । तिरहुत—तीरभुक्ति, बिहारका मैथिल प्रदेश । (२) अठम—अष्टम । बदायूँ—उत्तर प्रदेशका एक मुख्य नगर जो दिल्ली सुल्तानोंके शासनकालमें अपना विशेष महत्व रखता था । (३) धिया—धी, पुत्री । (४) तिरिया—स्त्री, नारी ।

१ (५) वरउत—सगाई पक्का करनेके निमित्त आनेवाले नाई और ब्राह्मण । (६) जोगहि—योग्य यह संबंधोंमें प्रयुक्त। कासों—किससे। ३७ (रीडिंग्स १०) पुरिखास्तने राव जीत भौमन व हुज्जाम रा बर महर बराये पैगाम बाबन रो ( राव जीतका बाबनके विवाहके सन्देशके साथ नाई और ब्राह्मणको भेजना ) चौथें बरिस धरसि जो पाऊ । जीत बुलावा बाँभन नाऊ ॥१ दीन्हि बिसारी मोतिन्ह हारू । कहहु महर सों मोर जुहारू ॥२ औ अस कहहु मोर तूँ माई । राजा नीके करहु सगाई ॥३ औ तस बान कहसि सँवारी । वइसन बर पर सुनी सँकारी ॥४ महर कहसि को मुँहि पै आजू । हम चाहत इहि आपन काजू ॥५ इत कहि के बाँभन नाऊ, दोऊ दीन्हि चलाइ ।६ बरै चाँद पायन फँह, बेग कहत मुँहि आइ ॥७ टिप्पणी—(१) जीत—चेत पाठ भी सम्भव है। (२) जुहार—प्रणाम । (३) अस—ऐसा । मोर—मेरा । नीके--अच्छे । (४) तस—तैसा । वइसन—वैसा । ३८ (रीडिंग्स १८) बामदन दर्रब्मन व हज्जाम बर महर व अर्ज कर्बने पैगामे बाबन ( ब्राह्मण और नाईका महरके पास आकर बाबनका सन्देशा कहना ) बाँभन नाऊ गय सिंहवारू । देख महर दुहुँ कीन्हि जुहारू ॥१ महर कहा कित पठि आवा । औहन लहि मौधारी पावा ॥२ सुनहु देव मम जीत पठाई । धरम लाग बिनन्ते आई ॥३ उठो आइ तुम्हारेउ भाई । रामा नीक करहु सगाई ॥४ धरमराम तुम जुग जुग पावहु । हम दिये कर बोल सुनावहु ॥५

१०१ जात करम गुनआगर, देस मान सम लोग ।६ सुनै बोल जीतइँ दीजइ, बेटी पावन जोग ॥७ टिप्पणी—(१) सिंहबारू—सिंहद्वार, मणेशद्वार । कित—कहाँ, कैसे । (२) ओहर—ओट, सहाय यहाँ तात्पर्य आसनसे है। औधारी—अव धारण > ओधारन > ओधार, रखना, बैठना । पावा—कीजिये । ओहर छोड़ि औधारी पावा—आसन लेकर बैठिये, आसन ग्रहण कीजिये । (३) बितन्ते—वृतान्त, अभिप्राय । (४) उहो—वह भी । आह—है । मीके—अच्छे । ३९ ( रौकेन्हूस १९ ) जवाब दादने बरहमन व हज्जाम रा अज ताले जाँगा व बामन ( बामन और जाँगाकी जन्मकुण्डली देखकर ब्राह्मण और नाईको उत्तर ) सुन साभो तू पढित सयानाँ । गुनिकार कस होत अयानाँ ॥१ छठ आठें गस जड़ रासी । घरी घरसु औ गुनत सुलासी ॥२ अब फुनि असकत करी न आई । पाछे रहे न खोर धुराई ॥३ नेह सनेह जो बिरथ न होई । कहां क पुरुख कहां कें जोई ॥४ दयी लिखा सो इ आहा । ताको हम तुम करिहहिं काहा ॥५ तोर कहा हौं कैसे मेटौं, सुनिफे रहौं लबाइ ।६ गुनति रासि बिन मूतहु, पाछें होइ पछताइ ॥७ टिप्पणी—(१) अयाना—अज्ञानी । (२) जड़रासी—जड़ राशि—कन्या और वृश्चिक छठ घरमें कन्या और आठवें घरमें वृश्चिक । (३) असकत—आलस्य । (४) जाई—नारी । (५) मेटों—मिटाऊँ, टारूँ ।

२ २ ४० ( रीकैण्ड्स ९ ) बाज नमूदने खुपारदार पैगामे-बावन व कबूल कर्द्ने महर व दहानीदने नेग (ब्राह्मणके बावनका सन्देश कहनेके पश्चात् महरका उसे स्वीकार करना नेग दिलाना ) बाँभन टीक बोल कै पहू । बरठ चाँद रहु मोर बढ़ाई ॥१ तूँ नरिन्द देस कइ राऊ । तोफइँ बरहि न आवइ फाऊ ॥२ रास गुनित फर नाँवँ न छीजा । राइ बीव घर बेटी दीजा ॥३ दयी लाग काज जो करा । ताकर धरम दुहूँ जग घरा ॥४ बाँभन बोल महर जो मानाँ । गोष क बनिज दिवाई पाना ॥५ सेंदुर फुछ चढ़ाये, भी मोविह गलबार ।६ देत चाँदा बावन कइँ, बीर लाउ फरतार ॥७ ४१ ( रीकैण्ड्स ११ ) बाज गप्तन खुपारदार व हम्माम व बाज गुफ्तन बैसियत निकाह वर जीव (ब्राह्मण और नाईका आपस आउर जीवसे सगाईकी बात कहना ) तेल फुलेल दुवठ अन्हवाये । अपूरुव वस्त्र काढ़ि पहिराये ॥१ महर मंदिर जेइहिं सेवनारा । छीन्हि पान मये असबारा ॥२ दसी असीस फिरामी बागा । रहस भले बोल भल लागा ॥३ जानि सीव घर देस बघाइ । घरी चाँद बावन कइँ पाई ॥४ पह भयी निसि अँधियार बिहावा । करहु बियाह चाँद घर जावा ॥५ जीव सुठाम सांग कहुँप, जिन सुनइ एक सस आइ ।६ महर दत बावन कइँ चाँदा, पलहु पियाहिं आइ ॥७ टिप्पणी—अन्हवाये—स्नान कराया।

१०१ ४२ ( रौकन्दुम १२ ) रधौ बर्दन जीत बरात निकार कर बर्दन घर खाने रपि महर ( विवाहके निमित्त रपि महरके घर जीतका दारात खाना करना ) मार सहम दोइ लादू लावहूँ । घाँघर पापर बहुतै पकावहिं ॥१ कीन्ह खिरौरा औ केसारा । फल कंडोर भये अमेभारा ॥२ चीर पनेर पराठी माँगा । टाँका लास सो अभरन लागा ॥३ हाँडी अमी नव इक घली । एक एक वाह सो एक एक पहली ॥४ सात आठ मे घोर पिलाने । भये असवार राइ औ राने ॥५ जस वसन्त रितु टसू फूलें, जिह अस देसी रात ।६ भाट फलावत बहुरिया, तस होई चली बरात ॥७ टिप्पणी-(१) खिरौरा-इसका उल्लेख जायसीने भी किया है (पद्मावत ५८९।२); ग्रियर्सनके अनुसार चाँवलके आटेसे गर्म पानीमें बनाय हुए लट्टू (बिहार पेजेंट लाइफ पृ १४०) । केसारा-सम्भवतः कसार, आटा भून कर शकर मिलाकर बनाया हुआ मण्डू । यह पूर्वी उत्तर प्रदेशमे विवाहके अवसरपर विशेष रूपसे बनाया जाता है। कंडोर-सम्भवतः गुड़ पाट कंडोर होगा । इसका तात्पर्य मिठाईसे होगा । (३) टाँका-टका; दिल्ली सुल्तानोंके समयमें प्रचलित चाँदीका सिक्का जिसका वजन १६८ १७ ग्रेन था । (५) पिलाने-पोस हाथी । (७) फलावत-गायक । बहुरिया-नर्तकी । ४३ ( रौकन्दुम १३ ) निपन्दीन्ह जीत रा हर जाने ब यादन निकार कियान पान्त्र क च दा ( जीतका स्वागत और बाचन चाँदका विचार ) उठी महर यनसार गँवारी । आन परान महो दैगारी ॥१ दीपर नल पनेर दिसाइ । सुरुभी एक पग निद राइ ॥२

१४ दिया सहस चहुँ दिसि धारा। घर बाहर सब भा उजियारा ॥३ भयी जेवनार फिर आये पानों। बेद भनहिं भौमन परभानों ॥४ मानुस बहुत सो देखत रहा। कोउ कहे रात देबस कोइ कहा ॥५ लाये धरन्हि पावन कँह, चाँदा आरति दीन्ह उतार। ६ आत सराफत देखेउ नाहीं, बेटवा भाँमर भार ॥७ टिप्पणी—(१) छाँपर—छया हुआ। नेत (सं० नेत्र)—इसका उल्लेख बाणभट्ट और उसके पश्चात् के प्राचीन और मध्यकालीन साहित्य में प्रायः मिलता है। क्षीरस्वामी के कथनानुसार यह व्यंगदुक था। अन्यत्र उसे सूक्ष्म रेशमीवस्त्र (सूक्ष्मपट्टसूत्रवारचना) बताया गया है। नेत्र का अर्थ मटा हुआ भी होता है। यह इस बात का संकेत करता है कि यह बंटे सूत का बनता रहा होगा। ऐसा जान पड़ता है कि यह वस्त्र पहनने के काम में कम बाहरी काम के लिए ही अधिक प्रयुक्त होता था यहाँ इसके फर्श पर बिछाने जाने का उल्लेख है। धनपाल (१०१९ ई०) ने अपनी तिलकमंजरी में इसके बने वितान का उल्लेख किया है (पृ० ९१)। किन्तु उत्तम कोटि नेत्र का उपयोग परिधान में भी होता था ऐसा नल-चम्पू (आरम्भिक ९ वीं शती) से ज्ञान पड़ता है (पृ० २१८)। पछोर—देखिने पीछे १२।७। (७) भाँमर—फाना शोरयुक्त नेत। बार—बाल अस्तव्यस्त। ४५ (रीडिंग्स १७) निरत दहेज चाँदा सोयर (दहेज का बयान) गाँव बीस भठ सामंजि पाये। फीनस एक हरष भरि आये ॥१ घोर पचास आन कै ठाढ़े। टंकण लाख दूज ते बाँधे ॥२ घरी चंर सहस एक पावा। गाइ मस नहिं गिनत बतावा ॥३ कापर सात पवन सों फाहा। हीरा मोति लागि सिंह आहा ॥४ सज मार कर नाँउ न जानीं। फर्सों सेज अस फह फरानीं ॥५ पाडर, कनक, खाँड घिउ, लान, तेल बिस्तार। ६ लाद टाँड़ सुरुतापा, बरद भये असँभार ॥७

१५ टिप्पणी—(१) उत्तर पदका मैस एक वरब बहिराये पाठ भी सम्भव है। किन्तु तीसरे यमकको देखते हुए मैस पाठ यहाँ सम्भव नहीं है। अरबकी अपेक्षा वरब मूल शे'रके अधिक निकट है। (५) सौर—ओढ़ना-बिछौना। दिल्ली मेरठकी बोलीम सौरका अर्थ रुइ भरी रज़ाइ है जो ओढनेके काम आती है। चित्रावली (२१९।७) से ज्ञात होता है कि रुइ भरे हुआ बिछानेके गद्देको सौर कहते हैं (सौरि माँह बिन बिनठर टोवा। फुस साँचरि सो कैसें धोवा ॥) जायसीने भी इसका कई स्थानोंपर उल्लेख किया है (१३९।२, ३३५।४ ३३६।६, १४ ।२) पर उन्होंने सौर-सुपेती युग्म का प्रयोग किया है और उसका तात्पर्य कहीं ओढने और कहीं बिछौनेसे है (देखिये—वासुदेवशरण अग्रवाल, पदमावत ३३६।४ टिप्पणी)। (६) चाउर—चावल। कनक—आटा। खाँड—शक्कर, चीनी। घिउ— घी। लोन—लवण नमक। बिसवार—मसाला। (७) राँध—सामग्री। सुकराना—शुकराना दहेजम प्राप्त वस्तुएँ। ४५ (रैडिंग्क्स ३५) बुशायददुम साले शुदन निकाह चाँदा ब बामन व नज़दीक नेशामद ने बामन (चाँदा-बामनके विवाहके बारह साल बाद, बामनका चाँदाके पास न आना) बरख दुआदस भयउ बियाहू । चाँदा सरै सोफ जस नाहू ॥१ उनत जोबन भइ चाँदा रानी । नाँहछोट औ अँखियी फनी ॥२ जाफहिं पिउइर बोलँ लोगू । सो पै चाँद न दीन्हों मोगू ॥३ हाथ पाठ मुख धरम न धोवा। औ तिह ऊपर संग न सोवा ॥४ दह्या फौन मैं कीन्हि पुराई । सरै कचोरें थूकेउ आई ॥५ रात दिवस मन झुरनइ, ऊपह सास फेरोई ।६ चाँद धौराहर ऊपर, बामन धरती सोइ ॥७ टिप्पणी—(१) दुआदस—द्वादश बारह। नाहू—नाथ। (२) उनत—उन्नत उभरा हुआ। नाँह—पति। (५) कचोरे—कटोरा। ⁀

१६ (९) हरबर—(सं रम) उत्सुकता या भावावेश हर्ज चिन्तित रहती है। बेरीह—दुखती है काँपती रहती है। ४६ (रौकन्दस ५१) गिरिया व जारी कर्दन् चाँदा अज दूर मानदने साजन व शुनीन्दने ननद चाँदाका विरह-विलाप, ननद का सुनना) बरस दिवस भा चाँदु बिपाँहै। घर न देखी आछी छाँईं ॥१ पतियाैंती निसि सेज हुड़ेली। सो धनि कैसे जिये अकेली ॥२ भावन फाठ पूछि नहिं माता। हाँ रे न सीयउँ फार फराता ॥३ एको साध न हियें पुजानी। मुयो पियासन नॉकलहि पानी ॥४ यहि घिरहँ उठि जैकें जाऊँ। जैसों राँड़ सुहागिन नाऊँ ॥५ ननद मात सब सुन के, कही महरि सो जाइ। ६ दीदी जाय मनावहु, चाँदा [रजलस*] खाइ ॥७ टिप्पणी—(२) हुड़ेली—होके हाय। (७) दीदी—माँ। यह प्रयोग असाधारण है। पिताके लिए दादा सम्बो- धन लोकमें प्रचलित है। सम्भव है उसीके अनुकरणपर माँको दीदी कहा जाता रहा हो। पर अब इसका प्रयोग बड़ी बहनके लिए होता है। दाउदने अन्यत्र (१९९।१) सासके लिए भी बहुसे यही सम्बोधन कराया है। ४७ (रौकन्दस २) आम्दने महूम व तफ़हीम कर्दन् चाँदा रा (सासका आकर चाँदाको समझाना) सुनिके महरि चाँद पहँ आयी। काहे बहु रजलस खायी ॥१ दूध दाँत तू बिटिया बारी। तूँ का जानसि पुरुख बड़ोरी ॥२ तूँ अचत पुरुख का जानसि। बिन पानी सातू कस सानसि ॥३

१७ सोन रूप भल (अमरन) आई । दिन-दिन पहिरहु चीर धोआई ॥४ जौँलहि भाषन होइ सँओगा । पान फूल रस फरिदै भोगा ॥५ ओ तुम्ह रापि महर के बेटी, अजहुँ हूर न लआइ ।६ ताथ दूध अनटहु, रहि चाँदा पीय मिलाइ ॥७ मूल पाठ—४ म० फिर पहिर म भल फिर-फिर आइ है। पर इनमें से कोई भी प्रसंग संगत पाठ नहीं है । हमारी समझमे मूल पाठ अमरन रहा होगा । जान पडता है लिपिक आरम्भका अधिक और अन्तका भून लिखना भूल और बीजके भरको दो बार लिख गया है । टिप्पणी—(१) साटू—सत्तू भुने हुए चने, जौ, मटर आदि का मिश्रित आटा जिसे पानीमें घोल अथवा सान कर नमक अथवा शकर मिला कर खाया जाता है । यह पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहारके लोक-जीवन में बहु प्रचलित भोजन है । (६) हूर—हुड़ । (७) ताथ—गर्म । ४८ (रौकंग्धूम २८) जवाब दादने चाँदा बर ससुअ रा (चाँदाका सासको उत्तर ) तुम्ह हूँ सास अतहिँ गँवानी । राखहु दूध पियायहु पानी ॥१ दही न देइ खाँउ जिहँ लाइ । महरँ कै हौँ परी अदाइ ॥२ सोन रूप का हमरे नाहीं । अनौँ सइज जेउनारहि खाहीं ॥३ तुम्हरे घी जो सीरै थाहा । पीठ न पूँछत पोलहु फाहा ॥४ अबलहि पैँ हुर आपन घरा । काम लुपुध बिरहूँ धन जरा ॥५ निसि अँधियार नीर घन, पीज लबइ सुँइ लागि ।६ सेज अकेलि फाटि मोरि हिरदै, ओ जो देउतँ जागि ॥७

१६ (६) झुरइ—(तु स्मृ धातुका प्रा भाषावेध रूपं चिन्तित घटती है। फेरोइ—कुरेदती है, काँचती रहती है। ४६ (रौंडंग्हस २६) गिरिया व जारी कर्दून चौंदा अज तूर मानदने बावन व सुनीन्दने नन्द चाँदाका विरह-विलाप; ननद का सुनना ) बरस देबस भा चाँद पियाहूँ। घर न देखी आछी छाँहूँ ॥१ पतिमाँती निसि सेझ दुहेली। सो धनि कैसे जिये अकेली ॥२ पावन काठ पूछि नहिं पाता। हाँ रे न खीमठ कार क राता ॥३ एको साथ न हियें मुझानी। मुयों पियासन नँकलहि पानी ॥४ यहि बिरहँ उठि मैके जाऊँ। तैंसों राँड़ सुहागिन नाऊँ ॥५ ननद् बात सब सुन के, कही महरि सों जाइ ।६ दीदी आय मनाबहु, चाँदा [रजलस*] खाइ ॥७ टिप्पणी—(२) दुहेली—शोक-ताप। (७) दीदी—माँ। यह प्रयोग असाधारण है। पिताके लिए बाबा शब्द जन लोकमें प्रचलित है। सम्भव है उसीके अनुकरणपर माँको दीदी कहा जाता रहा हो। पर अब इसका प्रयोग बड़ी बहनके लिए होता है। साठचने अन्यत्र (११९।१) सासके लिए भी बहूने यही सम्बोधन कराया है। ४७ (रौंडंग्हस २ ) आमदने महरि ब तसलीम कइन चौंदा रा (सासका आकर चाँदाको समझाना ) सुनि के महरि चाँद पहँ आयी। कहइ बहु रखलम राखी ॥१ दूध दाँत तूँ बियिया बारी। तूँ का जानसि पुरुख बहौरी ॥२ तूँ अचत पुरुउ का जानसि। बिन पानी सातू कस सानसि ॥३

जस मँछरी देखी बिनु पानी । (तरपत) महरैं रैन बिहानी ॥२ भानु सँझान न कीस पयारू । फँस आइ सो चाँद दुलारू ॥३ देत सुखासन चले कहारा । नावी पूत भये असवारा ॥४ घानुक पाँयक आगे पैंठे । जीत महर के पाखर केते ॥५ काढ़ि चाँद बैसार सुखासन, तुरत बेग लै आइ ।६ परनी होइ महर गँ, चूँब घाँट के पाइ ॥७ मूलपाठ—२-पिहंत । टिप्पणी—(१) मैं—दावाग्नि । (३) भानु—सूर्य । सँझान—अस्त हुए । कीस—किया । पयारू—व्यालू, रात्रिका भोजन । (४) सुखासन—पालकी । ५२ ( रीकमदस ३२ ) आमदने चाँदा दर खानये मादर व पिदर व रसीदन सहासियान चाँदा रा ( चाँदाका मैके आना और सखियोंस भेंट ) हैंरैं मरद चाँद अन्हवाए । सेंदुरी चीर काढ़ि पहराए ॥१ माँग चीर सिर मेंदुर (पूरी) । जानहु चाँद पर आँवरी ॥२ सखी सहेलिन देखन आईं । हँस हँस चाँद पहिरि फैलाई ॥३ सेन पिरम रस बनिज सुहागू । पिरत पियार सुगति फल मागू ॥४ अध पैठि दरअहुँ जिंह पासा । कहँहु चाँद कम कीन्ह पिआसा ॥५ चाँद सहेलिन पूँछि रस, धीरहरों राइ ।६ सीत आह जिनु मरु, कहु फँम रैन बिहाइ ॥७ मूलपाठ—१-पृग । टिप्पणी—(२) मेंदुर पूरी—माँगमें सदूर भरनेका जिसे अनूप पूरना कहती है । ५३ ( रीकमदस ३३ ) जबाब दादन चाँदा बा सहस्त्याने खुद बहार माह जमीता ( चाँदाका सहेलियोंका उत्तर—जाड़ेके बार आपसका कथन ) जस तुम्ह पूछहु तस हों कहा । सुर कै कान रजाती अहा ॥१

१८ ४९ ( रीकैण्ड्स २१ ) गुफ़्तम फ़रने पहूम बर चाँदा दर ब रवा दादन बराब महर रफ्तन ( सासका चाँदेसे क्रुद्ध होकर महरके घर चले जानेको कहना ) तोरे आघ में तहिया जानी । बात कहत तूँ मुँहि न छजानी ॥१ तोकों काही कीन्ह पसेऊ । बिन दहि मथें कै निसरे घीऊ ॥२ बाबन मोर दूध कर पोवा । निस दिन भावन तों संग सोवा ॥३ तूँ अचरैत न देखसि काहू । बिन धहि कस नघइ गयाहू ॥४ सौखहि भावन होइ सयाना । और पियाहि के है तो आना ॥५ जो तँ जेहसि मैकेँ, अमेँ पठै सन्देस ।६ कहाँ कर तूँ झाँगर बिटिया, आरों सोइ देस ॥७ ५० ( रीकैण्ड्स ५ ) तस्वीदने चाँदा कुश्रादार रा ब फिरिस्तादने तुष्यारी बर स्तिर ( चाँदाका ब्राह्मणको बुलाकर पिताके पास अपना कष्ट कहलाना) चाँदहि गरुर भयउ घरबारू । चेरी बाँभन आइ हँकारू ॥१ आइ सो बाँभन दीन्ह असीसा । चन्द्र बदन मुख फेँफर दीसा ॥२ परहँसि कहि संदेस पठावा । बोल थाक हियँ पघरावा ॥३ नैन सीप जस मोतिहँ भरे । रोयसि चाँद आँसु जस ढरे ॥४ धोली चीर भीज गा पानी । जनु अभरन सों गांग नहानी ॥५ बाँभन कहुतु महर सों, मोरै दुख कै बात ।६ भाउ कहार सुखासन, बेगि पठउ परभात ॥७ ५१ ( रीकैण्ड्स २१ ) बाज नमूदने ब्रॉहमन बर महर आयनीदने महर चाँदा रा ब बाछन बर खान ( ब्राह्मणका महरसे सन्देश कहना और महरका चाँदाको अपने घर बुलाना ) बाँभन जाइ महर सों कहा । हियें लाग हीं जरतईं रहा ॥१