चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
चाँदा और मैनाका मन्दिर-गमन— २५६-पण्डितका चाँदासे देव पूजा करनेको कहना २५७-देव-पूजाके लिये नाना जातिकी स्त्रियोंका जाना २५८-सहेलियोंके साथ चाँदाका मन्दिर जाना २५९- चाँदाका मन्दिर प्रवेश २६४-चाँदाका पूजा करना और मनौती मानना २६५- मैनाका सहेलियोंके साथ मन्दिरमें आना और पूजा करना । चाँदा मैना संग्राम— २६६-चाँदाका मैनासे उदासीका कारण पूछना; २६७-मैनाका क्षोभ भरा उत्तर देना २६८-चाँदाका प्रत्युत्तर २६९-मैनाका चाँदाको उत्तर १६०-चाँदाका मैनाको गाली २६१-मैनाका चाँदाके अभिसारकी बात प्रकट करना २६२- चाँदाका उत्तर; २६३-मैनाका प्रत्युत्तर २६४-चाँदाका उत्तर, २६५-मैनाका प्रत्युत्तर २६६-चाँदा मैनामें हाथापायी; २६७-चाँदा-मैनामें गुथमगुत्थी; २६८-दोनोंका रक्तरंजित होना २६९-युद्धसे मन्दिरके देवताकी परेशानी; २७०-लोररुका आना और स्थितिसे परिचित होना २७१-लोररुका मैना चाँदाको अलग करना । महरिसे चाँदाकी शिकायत— २७२-चाँदाका मन्दिरसे घर लौटना २७३-मैनाका मन्दिरसे घर आना; २७४- सोभिनका मैनासे मन्दिरकी घटना पूछना; २७५-मैनाका माखिनको बुला कर महरिके पास शिकायत भेजना २७६-माखिनका महरिके पास आना; २७७- माखिनका महरिसे चाँदाकी शिकायत करना २७८-चाँदाकी नादानी पर महरिका शंकित होना । लोरक-चाँदाका गोयर छोड़नेकी तैयारी— २७९-चाँदाका बिरसतको लोरकके पास भेजना २८०-बिरसतका लोरकसे चाँदाका सन्देश कहना; २८१-बिरसतका लोरकको समझाना २८७-बिरसतका चाँदाके पास वापस आना; २८८-लोरक चाँदाका भाग चलनेका निश्चय करना २८९-लोररुका यात्राका मुहूर्त पूछना २९०-ब्राह्मणका मुहूर्त बताना २९१- चाँदाका महलसे निकलना; २९२-चाँद-लोररुका गोयरसे प्रस्थान; २९३-उनका काले वस्त्र पहन आगे बढ़ना; २९४-मैनाका दुःखी होना । कुँवरूसे भेंट— १९५-कुँवरूका मार्गमें लोरकको पहचानना २९६-चाँदाका कुँवरूसे अपने प्रेम- की बात कहना २९७-कुँवरूका चाँदाकी भर्त्सना करना २९८-लोररुका कुंवरूसे मिलकर आगे बढ़ना । लोरक-चाँदाका गंगा पार करना— २९९-सायंकाल लोरक चाँदाका नन्दके नीचे सोना; ३०४-दोनोंका गंगा तट
७८ पर पहुँचना ३५-चाँद रूप पर मल्लाहका मोहित होना; ३६-मल्लाहका चाँदसे परिचय पूछना ३७-सोरठका मल्लाहको गिरा कर नाव पार ले जाना। (इस अंशमें कुछ कडवकों का अभाव जान पडता है। गंगा तट तक पहुँचने और मल्लाह के साथ होनेवाली घटनाका स्वरूप अस्पष्ट है।) बाबन-सोरठ युद्ध— ३८-गंगा तटपर बाबनका आना ३९-बाबनका गंगामें कूदकर सोरठका पीछा करना; १११-चाँदका बाबनके आ पहुँचनेकी सूचना सोरठको देना ११०-चाँदका बाबनसे अपने उपेक्षिता होनेकी बात कहना १११-बाबनका उत्तर और सोरठपर बाण छोड़ना ११४-चाँदका सोरठको सचेत करना और बाबनका पुन' बाण मारना; ११५-बाबनका हार मानना; ११६-बाबनका खेद प्रकट करना। सोरठ और विद्याका (?) संघर्ष— ११७-मार्गमें सोरठ-चाँदसे विद्या (?) का भेंट; ११८-किसीका रूप (?) से चाँदकी प्रशंसा; ११९-राय गागेवका सोरठके पास आना (?) १२०-सोरठका विद्याबलीस युद्ध; १२१-सोरठका विद्याका हाथ काटना; १२१-विद्याका रायसे परिवाद करना; १२४-रायका विद्यासे हाल पूछना और विद्याका कहना (यह अश अपूर्ण है। उपलब्ध कडवकोंसे कथा क्रमका पता नहीं चलता। कडवकोंका क्रम भी अनिश्चित है। उनके व्यतिक्रम होनेकी सम्भावना अधिक है।) राय बरिया और सोरठ— १२५-राय बरियाका मत्रियोंसे परामर्श १२६-रायका सोरठको बुलानेके लिए ब्राह्मण भेजना; १२७-सोरठसे ब्राह्मणोंका निवेदन करना; १२८-सोरठका रायके पास जाना १२९-सोरठका रायसे बातचीत; १३०-रायका सोरठका सम्मान करना; १३१-सोरठको भेंट देकर रायका विदा करना। चाँदको साँपका डसना— १३२-सोरठ चाँदका मादाम के घर ठहरना और रात में चाँदको साँपका डसना; १३३-चाँदका मूर्च्छित होना; १३४-चाँदके वियोगमें सोरठका रोना; १३५- सोरठका विलाप १३६-गारुड़ीका आकर मन्त्र पढ़ना; १३७-चाँदका जीवित हो उठना। सोरठका अहीरों-गदहियासे युद्ध— (कडवक १३८-१४३ अप्राप्य हैं। इनके बीचका केवल एक कडवक उपलब्ध है जिससे इस घटनाका अनुमान मात्र होता है ) चाँदका दुबारा सांप काटना— १४४-सोरठ-चाँदका बनभ्रमण करना और चाँदका सांप काटना; १४५ १४७ चाँदका मूर्च्छित होना और सोरठका विलाप करना १४८-सोरठका गारुडके
१४७को कोचना १४९-लोररुका साँपको कोचना १५ १५५ लोरकका कोचना और विलाप करना १५६-गारुडीका आना और लोरकका उसके पाँव पडना १ ७-लोरकका अपना सबस्व देनेका वादा करना १५८-गारुडीका मन्त्र पढना और चाँदका जीवित होना १५९-लोरकका गारुडीको सारे आभूषण देना १६०-कविकी उक्ति । सारंगपुरमें लोरक— महीपतिके साथ जुआ— महिपतिके साथ युद्ध— महसिया द्वारा लोरकका सम्मान (?)— मधुकरके साथ युद्ध (?)— चाँदको तीसरी बार साँप काटना— ( उपर्युक्त घटनाओंस सम्बध रखनेवाला अंश अनुपलब्ध है। इनका वर्णन कितने कड़बकौमें किया गया है, बताना कठिन है। हमने इनका वर्णन कड़बक १६१ १७२में होनेका अनुम्यन किया है। कड़बक १६१से लोरकके धारगपुर पहुँचनेका अनुमान होता है। इसके अतिरिक्त चार खण्डित कड़बक और उपलब्ध हैं जिनसे अन्य घटनाओका आभास मात्र होता है।) चाँदका स्वप्न वर्णन— १७१-चाँदका होशमें आना और स्वप्न देखनेकी बात कहना; १७४-स्वप्नमें विधाता लोरकको आदेश । दूँदू द्वारा चाँदका अपहरण— १७५-चादको मन्दिरमें बैठाकर लोरकका जाना और दूँदा (योगी) का आना; १७६-दूँदा (योगी) का जादू करना और चाँदका विस्मृत होना १७७-लोरक का लौटकर आना और चादाको न पाना १७८—दूँदा (योगी) का पता लगाना १७९-दूँदा और लोरक दोनोंका चाँदको अपनी पत्नी बताना १८ -सिद्धका उन्हें समासे झगड़ेका फैसला करानेकी सलाह देना; १८१-सभासे लोरककी फरियाद; १८२-सभाका लोरकसे प्रश्न; १८३-लोरकका उत्तर; १८४- योगीका चाँदको अपनी पत्नी बताना ( इस अंशके आगेके कुछ कड़बक अप्राप्य हैं ।) हरदोईमें लोरक और चाँद— १८९-लोरक-चाँदका हरदोईकी सीमापर पहुँचना; १९ -शिकारको जाते हुए राय सेतमका लोरकको देखना १९१-लोरकके सम्बन्धमें मार्गका जानकारी प्राप्त करना; १९२-लोरकका परिचय बताना; १९३-राय सेतमको लोरकका परिचय मिलना; १९४-लोरकका रायके पास जाना १९५-रायका लोरकका सम्मान करना १९६-रायका लोरकके पर पारिवारिक उपयोगकी सामग्री भेजना १९७-लोरक का नाच आदिको दान देना ।
७८ पर पहुँचना; १७—चाँदके रूप पर मल्लाहका मोहित होना; १८—मल्लाहका चाँदसे परिचय पूछना; १८-लोरकका मल्लाहको गिरा कर नाव पार ले जाना। (इस अंशमें कुछ कड़बकों का अभाव जान पड़ता है। गङ्गा तट तक पहुँचन और मल्लाह के साथ होनेवाली घटनाका स्वरूप अस्पष्ट है।) बाभन-लोरक युद्ध— १८-गङ्गा तटपर बाभनका आना; १ ९-बाभनका गंगा में कूदकर लोरकका पीछा करना; १११-चाँदका बाभनके आ पहुँचनेकी सूचना लोरकको देना; ११०-चाँदका बाभनसे अपने उपेक्षिता होनेकी बात कहना; १११-बाभनका उत्तर और लोरकपर बाण छोड़ना; ११४-चांदका लोरकको सचेत करना और बाभनका पुन' बाण मारना; १२५-बाभनका हार मानना; ११६-बाभनका खेद प्रकट करना। लोरक और वियाछा (?) संघर्ष— ११७-मार्गमें लोरक-चाँदसे बिया (?) का भेंट; ११८- किसीका राय (?) से चाँदकी प्रशंसा; ११९-राय गमोउका लोरकके पास आना (?) १२०-लोरकका वियाछानीसे युद्ध; १२१-लोरकका बियाछा हाथ काटना; १२२-वियाछा रायसे परिवाद करना १२४-रायका वियाछे हाल पूछना और वियाछा बताना (यह अंश अपूर्ण है। उपलब्ध कड़बकोंसे कथा-क्रमका पता नहीं चलता। कड़बकोंका क्रम भी अनिश्चित है। उनके व्यतिक्रम होनेकी सम्भावना अधिक है।) राय करिंगा और लोरक— १२५-राय करिंगाका मन्त्रियोंसे परामर्श; १२६-रायका लोरकको बुलानेके लिए ब्राह्मण भेजना; १२७-लोरकसे ब्राह्मणोंका निवेदन करना; १२८-लोरकका रायके पास आना १२९-लोरकका रायसे बातचीत; १३०-रायका लोरकका सम्मान करना; १३१-लोरकको भेंट देकर रायका विदा करना। चाँदको साँपका डसना— १३२-लोरक-चाँदका ब्राह्मण के घर ठहरना और रात में चाँदको साँपका डसना १३३-चाँदका मूर्छित होना १३४-चाँदके वियोगमें लोरकका रोना; १३५- लोरकका विलाप; १३६-गारुड़ीका आकर मन्त्र पढ़ना १३७-चाँदका जीवित हो उठना। लोरकका महीटौ-बहेलियोंसे युद्ध— (कड़बक १३८-१४३ अप्राप्य हैं। इनके बीचका केवल एक कड़बक उपलब्ध है जिससे इस घटनाका अनुमान मात्र होता है) चाँदको दुबारा साँप काटना— १४४-लोरक-चाँदका बनखण्डमें रुकना और चाँदको साँप काटना; १४५ १४७ चाँदका मूर्च्छित होना और लोरकका विलाप करना;; १४८-लोरकका चमकके
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१ (बीकानेर प्रतिके संशोधित पाठके आधारपर) पहिले गावउँ सिरजनहारा । जिन सिरजा इह देवस पयारा ॥१ सिरजसि धरती और अकासू । सिरजसि मेरु मँदर कबिलासू ॥२ सिरजसि चाँद सुरूज उजियारा । सिरजसि सरग नखत का मारा ॥३ सिरजसि छाँह सीउ औ घूपा । सिरजसि भिरतन और सरूपा ॥४ सिरजसि मेघ पवन अँधकारा । सिरजसि बीजु फरै चमकारा ॥५ जाकर सबै पिरिथिमी, कहेउँ एक सो गाइ ॥६ हिय थथरै मन हुलसै, दूसर चित न समाइ ॥७
टिप्पणी-(१) सिरजनहारा—सृष्टिकर्ता, ईश्वर। पयारा—वायु। (२) मेरु—सुमेरु पर्वत। मँदर—मन्दराचल। कबिलास—(कैलास> कइलास>कविलास (वकारका प्रम्लेष—कविलास) कैलास पर्वत ऊँचे महल और स्वर्गके अर्थमे भी जायसी आदिने कबिलासका प्रयोग किया है। (४) सीठ—शीत। (५) अँधकारा—अन्धकार। बीजु—बिजली।
६ (बीकानेर प्रतिके संशोधित पाठके आधारपर) पुरुष एक सिरजसि उजियारा । नाँउ मुहम्मद जगत पियारा ॥१ बाहिं लगि सबै पिरिथिमी सिरी । औ तिह नाँउ मौनदी फिरी ॥२
टिप्पणी--(२) मौनदी—मुनादी डिंढोरा।
७ (बीकानेर प्रतिके संशोधित पाठके आधारपर) अबाबकर उमर उसमान, अली सिंघ ये चारि ॥६ ते निसतु कर बिज तिस, सुरहि झाले मारि ॥७
टिप्पणी—(६) मुहम्मद साहबके पश्चात् अबा बकर (अबू बकर) (६३२-६३४ ई ), उमर (६३४-६४४ ई ), अली (६४४-६५६ ई ) और उसमान १
८ मैनाका वियोग-वर्णन— ३९८—मैनाका दुख कथन; ३९९—गोविन्दका टॉडर नायक सिरजनको बुलाना ४००—सिरजनका परिचय बताना; ४०१—गोविन्दका छाना और मैनाका सिरजनके पैरोंपर गिरना; ४०२—मैनाका व्यथा-कथन करना—सावन मास ४०३—भादों मास; ४०४—कुंभार मास; ४०५—कार्तिक मास; ४०६—अगहन मास ४०७—पूस मास; ४०८—माघ मास; ४०९—फागुन मास ४१०—विरह अवस्था कहना ४१२-४१५ लोरकके पास सन्देशा लेजानेका आग्रह करना; ४१६—गोविन्दका सिरजनसे अनुरोध करना। सिरजनका लोरकको सन्देश— ४१७—सिरजनका हरदीपाटन रवाना होना; ४१८—विरहदाहके कारण मार्गकी अवस्था ४१९ हरदीपाटन पहुँचकर सिरजनका लोरकसे मिलने जाना ४२०—द्वार पालका लोरकको सिरजनके आनेकी सूचना देना; ४२१—लोरकका सिरजनसे भेंट करना; ४२२-४२४—सिरजनका भाग्य कथनके बहाने मैनाकी चर्चा करना ४२५—लोरकका मैनाके सम्बन्धमें बिगाड़; ४२६—सिरजनका गोवररा समाचार कहना ४२७—अपने बनिजक सम्बन्धमें बताना ४२८-४२९—मैनाकी अवस्थाका कथन ४३०—मैनाकी दुरवस्था सुनकर लोरकका दुखी होना; ४३१—मैनाके समाचारसे चाँदाका परेशान होना। लोरकका घर लौटना— ४३२—राज छतमका लोरकको विदा करना ४३३—साथमें सहायक देना ४३४— चाँदाका लोरकसे अनुरोध ४३५—लोरकका उत्तर; ४३६—हरदीसे चलकर गोवरके निकट पहुँचना ४३७—गोबर नगरमें आतंक। मैनाकी परीक्षा— ४३८—मैनाका लोरकके आनेका स्वप्न देखना ४३९—लोरकका फूलके हाथ मालीको मैनाके पास भेजना ४४०—मैनाका रोकर अपनी अवस्था कहना ४४१—मालीका उत्तर, ४४२—मैनाका दूध बेंचते हुए लोरकके पड़ावपर जाना ४४३—लोरकका दूध खरीदकर दाम देना; ४४४—मैनाको रोककर छेड़खानी करना ४४५—मैनाका अपनी स्थिति कहना ४४६—दूसरे दिन मैनाका फिर लोरकके पड़ावमें आना; ४४७—चाँदाका मैनासे अपनी बड़ाई करना ४४८—मैना का शृंगार करना। लोरकका घर आना— ४४९—लोरकका अपने आनेकी सूचना घर भेजना। ४५०—घर आकर माँके पैर पड़ना ४५१-४५२—माँसे घरकी अवस्था पूछना। (आगे का कथा अप्राप्य है।)
८१ १ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) पहिले गावउँ सिरजनहारा । जिन सिरजा इह देषस यपारा ॥१ सिरजसि धरती और अकासू । सिरजसि मेरु मँदर कबिलासू ॥२ सिरजसि चाँद सुरुज उजियारा । सिरजसि सरग नखत का मारा ॥३ सिरजसि छाँह सीउ औ घूपा । सिरजसि फिरतन और सरूपा ॥४ सिरजसि मेघ पवन अँधकारा । सिरजसि बीजु करै चमकारा ॥५ बाफर सबै पिरिथिमी, कहेउँ एक सो गाइ ॥६ हिय पषरै मन हुलसै, दूसर चित न समाइ ॥७ टिप्पणी-(१) सिरजनहारा-सृष्टिकर्त्ता, ईश्वर । यपारा-वायु । (२) मेरु-सुमेरु पर्वत । मँदर-मन्दराचल । कबिलास-(कैलास> कब्लास>कबिलास (बकारका प्रक्षेप-कबिलास) कैलास पर्वत; ऊँचे महल और स्वर्गके अर्थमें भी जायसी आदिने कबिलासका प्रयोग किया है। (४) सीउ-शीत ! (५) अँधकारा-अन्धकार । बीजु-बिजली । ६ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) पुरुख एक सिरजसि उजियारा । नाँउ मुहम्मद जगत पियारा ॥१ तहिँ लगि सपै पिरिथिमी सिरी । औ तिह नाँउ मौनदी फिरी ॥२ टिप्पणी-(२) मौनदी-मुनादी; ढिंढोरा । ७ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) अबाबकर उमर उसमान, अली सिंघ ये चारि ॥६ ये निहचु कर बिज तिस, तुरहि झाले मारि ॥७ टिप्पणी-(१) मुहम्मद साहबके पश्चात् अबा बकर (अबू बकर) (६३२-६३४ ई ) उमर (६३४-६४४ ई ) अली (६४४-६५६ ई ) और उसमान ९
८२ (६३२-६६१ ई ) क्रमशः उनके उत्तराधिकारी खलीफ़ा हुए। ये चार यारक नामसे पुकारे जाते हैं। अबू बकर सिद्दीक (सत्यवादी) उमर फ़ारूक (न्यायी) उसमान विनम्र और अली आलिम (विद्वान) कहे जाते हैं। ८ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) साहि फिरोज दिल्ली बड़ राजा। छात पाट औ टोपी छाबा ॥१ एक पण्डित औ है पखिआहा। दान अपूरिस सराहै काहा ॥२ टिप्पणी-(१) फिरोजशाह-फीरोजशाह तुगलकवंशीय दिल्ली सुल्तान गयासुद्दीन तुगलकके छोटे भ्राता रजबका पुत्र और मुहम्मद तुगलकका चचेरा भाई था। मुहम्मद तुगलककी मृत्युके पश्चात् वह २३ मार्च १३५१ ई को सुल्तान घोषित किया गया और ३७ वर्षतक शासन करनेके पश्चात् २१ सितम्बर १३८८ ई को उसकी मृत्यु हुई। उसके समयमें प्रजा अपेक्षाकृत सुखी और समृद्धिपूण थी। छात-छत्र। पाट (त पट्ट) - राजपाट सिंहासन। टोपी-मुकुट। छाबा- (प्रा काच्छादेण कृञ्ज) सुशोभित होना । ९ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) सेख जैनदी हौ पखिलाना। धरम पन्थ सिंह पाप गँवाना ॥१ पाप दीन्ह मैं गाँग बहाई। धरम नाव हौ सीन्द चढ़ाई ॥२ टिप्पणी-(१) संख जैनदी- शेख जैनुद्दीन सुप्रसिद्ध चिश्ती सन्त हजरत नसीरुद्दीन महमूद लखमी 'चिराग ए-दिल्ही' की बड़ी बहनके बेटे थे। बड़ी बहनके बेटे होनेके साथ साथ वे उनके शिष्य और साहिबे पाख (मुख्य लेखक) भी थे। ११ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) खानजहाँ घरि जुग जुग खानी। अति नागर गुनबन्त बिनानी ॥१ चतुर सुजान मारु सब जाना। रूपवन्त मन्तरी सुखाना ॥२
८१ टिप्पणी—(१) खानजहाँ—यह दिल्लीके तुगलकवंशीय सुल्तानोंकी ओरसे दी जाने वाली एक उपाधि थी। यहाँ खानजहाँसे तात्पर्य खानजहाँ मक़बूलसे है, जिन्हें खाने-आज़म और कवाम-उल-मुल्ककी भी उपाधि प्राप्त थी। वे मूलतः तेलंगानाके निवासी ब्राह्मण थे और उनका नाम कन्नू था। मुसलमान हो जानेपर वे सुल्तान मुहम्मद तुगलकके कृपापात्र बने। निरक्षर होते हुए भी वे अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि थे। मुहम्मद तुगलक उनका अत्यन्त सम्मान करता था। फीरोज तुगलक ने उन्हें अपना वज़ीर नियुक्त किया। वे फीरोजशाहके इतने विश्वास- पात्र थे कि जब कभी वह राजधानीसे बाहर रहता उस समय वे ही उसका प्रतिनिधित्व करते थे। वे अत्यन्त धार्मिक, प्रभावोत्पादक और दीनबन्धु थे। सुप्रसिद्ध इतिहासकार अफ़ीफ़ने उनके जीवन चरित और उनके कार्योंका बड़े विस्तारसे वर्णन किया है। उसका कहना है कि ख़ॉनजहाँ मक़बूल चिश्ती सन्त नसीरुद्दीन महमूद अवधीके मुरीद (भक्त) थे। ७७२ हिजरी (१३७४ ई ) में उनकी मृत्यु हुई। १२ ( बम्बई १ ) ऐजन; बहु, पी मदहे खानजहाँ दर बाबे अदल व इन्साफ ( बहो खानजहाँकी प्रशंसा और उसके न्यायकी चर्चा ) एक खम्भ मेदिनि कहँ कीन्हा। डोल परै जो होत न दीन्हा ॥१ एकै पैरैं लोग चढ़ावइ। कर गुन खीचि तीर लइ लावइ ॥२ हिन्दू तुरुक दुहूँ सम राखै। सत जो होइ दुहुन्ह कहँ भाखै ॥३ गउव सिंह एक पन्थ रँगावइ। एक घाट दुहुँ पानि पियावइ ॥४ एक दीठि देखइ सँसारू। अधल न चलै चलै बेवहारू ॥५ मेरु धरनि जस भारन, सग मारन संस्यार ॥६ खानजहानहु कौन बड़ाई, बड़ जो कीन्हि करतार ॥७ टिप्पणी—(४) गउव—गौ गाय। वासुदेवशरण अग्रवालकी धारणा है कि यह सम्भवतः (रा ) गवय (नील गाय)का रूप है। जंगलमें नील गाय और शेरका मिलना और एक ही मागपर साथ चलकर पानी पीना अधिक सम्भव है (पद्मावत, पृ १५)। किन्तु अवधी-भोजपुरी क्षेत्रोंमें गायके लिए ही गउव सामान्य और प्रचलित शब्द है।
८४ १३ ( होकर प्रति ) मम्हूदे मालिक उरू-उमरा मलिक मुबारिक इब्न मालिक बयाँ मरतअ श्मूह बूद ( मालिक बयाँ के पुत्र मालिक मुबारिककी प्रशंसा ) मलिक मुबारिक दुनि क सिंगारू । दान जूझ बड़ बीर अपा[रू*] ॥१ खड़ग राहूँ रूँदि परहिं पहारा । बासुकि काँपैं नाहिं उबारा ॥२ काध छोरइ रकत बहावइ । धर सिर धन तिन्ह माँझ परापइ ॥३ बिधना मारि दस महँ आनी । मागहिं राह छोड़ि निसि रानी ॥४ बिन्द सर दह मुदगर फर पाठू । फेरि नहिं धरै सीध कें पाठू ॥५ जिन्ह जग परा भगानौँ, छोड़ देस नृप भाग ॥६ बीर देखि सरब रुण्ड, गय ते भयौँ लाग ॥७ टिप्पणी—(१) मालिक मुबारिक—इनके सम्बन्धकी जानकारी अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। इस ग्रन्थ से केवल इतना ही ज्ञात होता है कि ये मालिक बयाँके पुत्र और डालमऊके मीर (न्यायाधीश) थे। सम्भवतः उन्हें मालिक- उरू उमराकी उपाधि प्राप्त थी। बहुत सम्भव है कि ये चन्दायनके रचयिता मौलाना दाऊदके पिता हों। डालमऊके किलेके लश्करम एक कब्र है जिसे लोग शेख मुबारिककी कब्र बताते हैं। उनके सम्बन्धमें कहा जाता है कि वे सैयद सालार मसूद गाजीके साथ आये थे। नाम साम्यके कारण मित्रों ने उनकी ओर मेरा ध्यान आकृष्ट किया है। किन्तु वे इन मलिक मुबारिकसे सर्वथा भिन्न थे। १७ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) बरिख सात सै होइ इक्यासी । तिहि आइ कवि सरसेठ भासी' ॥१ साहि फिरोज दिल्ली सुरुतान् । जौनासाहि वजीरु बखानू ॥२ डलमठ नगर बसे नवरंगा । ऊपर कोट तले बहि गंगा ॥३ धरमी लोग बसहिं भगवन्ता । गुनगाहक नागर जसबन्ता' ॥४ मलिक बयाँ पूत उबरन भीरू । मलिक मुबारिक तहाँ के पीरू ॥५
८५ [ ] ॥६ [ ] ॥७ पाठान्तर—परशुराम चतुर्वेदीने इस कड़बकके प्रथम चार पंक्तियोंका त्रिलोकीनाथ दीक्षितसे प्राप्त एक पाठ प्रकाशित किया है (हिन्दी साहित्य द्वितीय खण्ड, पृ २७, पाद टिप्पणी २)। यह उन्हें किसी मौखिक परम्परासे प्राप्त हुआ था (हमारे नाम दीक्षितका १९ अगस्त १९५६ का पत्र)। उसमें प्राप्त मुख्य पाठान्तर इस प्रकार हैं— १—इते उन्यासी २–रहिया यह फणि सरस अमासी ३-चितवन्ता । टिप्पणी—(१) जौनासाहि—यह फीरोजशाह तुगलकके वजीर खानजहाँ मकबूलके पुत्र थे। उनका जन्म उस समय हुआ जब खानजहाँके अधिकारमें मुल्तानका इक्त था। उस समय सुल्तान मुहम्मद तुगलकने स्वयं फरमान भेज कर शिशुका नामकरण जौनाशाह किया था। उसे उस समय सुप्रसिद्ध सन्त जकरिया मुल्तानीके नाती सुहरवर्दी सन्त रुक्नुद्दीनका भी आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। पिताकी मृत्युपर जौना शाह ७७२ हिजरी (१६७ ई) में फीरोजशाह तुगलकके वजीर हुए और उन्हें भी खानजहाँकी उपाधि मिली। उनकी ख्याति अत्यन्त मेधावी और दूरदर्शी राजनीतिज्ञके रूपमें है। वे बीस बरसों तक फीरोजशाहके विश्वस्त सलाहकार रहे। किन्तु अन्तिम दिनोंमें उनका सुल्तानके अधिकारोंके प्रश्नको लेकर शाहजादा मुहम्मदसे जो पीछे सुल्तान बना मनमुटाव हो गया। निदान ७८१ हिजरी (सन् १३८६ ई ) में वे वजीरके पदसे हटा दिये गये और उनका मकान लूट लिया गया। उसी वर्ष उन्हें मलिक याकूब उर्फ सिकन्दर खाँने मार डाला। (२) डलमऊ—यह उत्तर प्रदेशके रायबरेली जिलेका एक प्रसिद्ध कस्बा है और रायबरेलीसे ४४ मील और कानपुरसे ६१ मील पर स्थिति रेलवे जंक्शन है। यहाँ गंगाके कगारके ऊपर किलेका भग्नावशेष अब भी मौजूद है। १८ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) गोबर फह्रां महर फर ठाऊँ। कूवा पाइ बहुत अँभराऊँ ॥१ नरियर गोवा कें तहँ रूखा। देखत रहै न लागे भूखा ॥२
८४ १३ ( होकर प्रति ) महूरे मलिक उल-उमरा मलिक मुबारिक इब्न मलिक वर्षा मखदूम रफूह कूद ( मलिक बयाँ के पुत्र मलिक मुबारिककी प्रशंसा ) मलिक मुबारफ दुनि क सिंगारू । दान जूस पड़ वीर अपा[रू०] ॥१ खड्ग खाइ तैंहि परहिं पहारा । बासुकि काँपै नाहिं उबारा ॥२ फाघ तोरइ रकत पहापइ । घर सिर वन विन्ह माँस परापइ ॥३ बिछना मारि दस महँ आनी । मागहिं राइ छाड़ि निसि रानी ॥४ जिन्ह सर दइ मुदगर कर पाळू । फिरि नहिं घरै सीध क पाऊ ॥५ सिन्धु अग परा भगानाँ, छाड़ देस नृप भाग ॥६ फीर पेन्ह सरब रुण्ड गये ते भयाँ छाग ॥७ टिप्पणी—(१) मलिक मुबारिक—इनके सम्बन्धकी जानकारी अन्यत्र उपलब्ध नहीं है । इस ग्रन्थ से केवल इतना ही ज्ञात होता है कि ये मलिक बयोंके पुत्र और डलमऊके मीर (न्यायाधीश) थे । सम्भवतः इन्हें मलिक उल-उमराकी उपाधि प्राप्त थी। बहुत सम्भव है कि ये चन्दायनके रचयिता मौलाना दाऊदके पिता हों । डलमऊक किलेके खण्डहर में एक कब्र है जिसे लोग शेख मुबारिककी कब्र बताते हैं। उनके सम्बन्धमें कहा जाता है कि वे सैयद सालार मसूद गाजीके साथ आये थे। नाम साम्यके कारण मित्रों ने उनकी ओर मेरा ध्यान आकृष्ट किया है। किन्तु वे इन मलिक मुबारिकसे सर्वथा भिन्न थे। १७ (बीकानेर प्रतिके प्रकाशित पाठके आधारपर) वरिस सात सै होइ इक्यासी । तिहि बाद कमि सरसेउ मासी' ॥१ साहि फिरोज दिल्ली सुरतान् । जौनासाहि वजीरु बखान् ॥२ डलमउ नगर बसे नभरगा । ऊपर कोट तले यहि गंगा ॥३ धरमी लोग बसहिं मगवन्ता । गुनगाइक नागर बसवन्ता' ॥४ मलिक बयाँ पूत ठघरन पीरू । मलिक मुबारिफ तहाँ के मीरू ॥५
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(६) बर—बड़ । पीपरा—पीपल । मंदिकी—इसकी । सेवार—अधिक । (७) बारी—बगीचा । २० ( रीकैण्ड्स २ ) सिफते बुतखानः बर हौज व मानदन जोगियान मकान व अस्नान हरु (सरोवरके ऊपर स्थित मन्दिरका वर्णन जहाँ चौ-पुदथ जोगी रहते हैं।) नारा पोखर कुण्ठ बनाये । मढ़ि देव जेहि पास उठाये ॥१ अनफाट नितइ आवहिं तहाँ । औ मगवन्त रहें तिह महाँ ॥२ निष [अ - - - ] छाये । पुरुख नाँउँ तिह ठौर न जाये ॥३ भेरा डँवरू ढाक बजाये । समद सुहाष इँदर मन माये ॥४ जोगी सहस पाँच एक गावहिं । सींगी पूरहिं भसम चढावहिं ॥५ सिद्ध पुरुख गुन आगर, देखि लुभाने ठाउँ ॥६ कहत सुनत अस आनै, दूनि चलि देखें जाउँ ॥७ टिप्पणी—(१) मढ़ि-मण्डप, देवस्थान । (४) भेरा-मुँहसे फूँककर बजानेवाला बड़ा बाजा । डँवरू—डमरू । ढाक-टंकार। (५) सींगी-(सं श्रृंग) सींगका बना फूकनेका बाजा । २१ ( रीकैण्ड्स ३ : पंजाब [१] ) सिफते शेज व स्तायशे आबे उ गोयद (सरोवर और उसके निर्मल जल का वर्णन) सरवर एक सफरि भरि रहा । झरनों सहस पाँच तिह पहा ॥१ अति अवगाह न पायइ थाहा । बातैं चूक सराहउँ काहा ॥२ [बास केमूरैं कह नित आवई] । देखत मोतीधूर सुहावई ॥३ [हुँवर लाख दोइ पानी चाहैं] । तीर पैठि ते लेहिं भर आवैं ॥४ [ठाँठ ठाँउ बैठे रखपारा] । पोर नहाइ न कोऊ पारा ॥५ [आप होइ महरहिं कै, - सों कह ] नी पाट ।६ [पाप रूप सरवर कै, रोवत माँ]घी घाट ॥७
८४ दारिउँ दाख बहुत लै लाई। नारिंग हरिफ फरै न आई ॥३ कटहर तार फरे अभिरामा। जामुन के गिनती को जाना ॥४ [ ]। [ ]॥५ बाँस खजूर बर पीपरा, बैंबिली भई सेबार ॥६ राय महर कै बारी, देखत होइ अँधियार ॥७ टिप्पणी—(१) गोवर—दौलतक़ाज़ीने अपने सति मयना उ कोर-चन्द्राउनीमें इसका नाम गोहारि दिया है। उसकी विवेचना करते हुए हरिनारायण द्विवेदीने उसे ग्वालियर बतानेका प्रयत्न किया है (साधन कृत मैना सत पृ १११-११४)। किन्तु गोवर अगर ग्वालियरसे सर्वथा भिन्न था यह छिताईवार्ताके साक्ष्यसे सिद्ध है। अगरचन्द नाहटाको इसकी जो प्रति मिली है उसमें देवनन्दनने दामोदरका परिचय देते हुए उनका जन्मस्थान गोवर बताया है (कायस्थया दामोदरौ आता। गोवर गिरी तिनकी उत्पाता ॥) और अपने जन्मस्थानके रूपमें ग्वालियरका नाम लिया है (देवीसुत कवि विठलनडु माउ। जन्म भूमि गोपाचल गाऊं ॥)। लोक-कथाओंमें इसका नाम गौर या गौराके रूपमें आता है। सतीशचन्द्रदासका कहना है कि यह मालदा जिले (बंगाल) में है। (जर्नल आव द मिक्किक सोसाइटी खण्ड २५, पृ १२२)। सत्यव्रत सिन्हाने लिखा है कि बिहारके शाहाबाद जिलेमें डुमराँव तहसीलमें गठरा नामक ग्राममें अहीरोंकी एक बहुत बड़ी बस्ती है। लोरिकीके गायकसे यह ज्ञात हुआ कि लोरिक इसी गठराका रहनेवाला था। अहीरों की बड़ी बस्ती से हम यह अनुमान कर सकते हैं कि लोरिकका स्थान वही है (भोजपुरी लोकगाथा पृ १२)। प्रस्तुत काव्यमें जो भौगोलिक सूत्र उप- लब्ध हैं उनसे ज्ञात होता है कि गोवर गंगा नदीसे बहुत दूर न रहा होगा। गोवर के निकट देवहा नदी होने का पता भी इस काव्यमें मिलता है। देवहा नदीकी पहचान होनेपर इस स्थानका निश्चय अधिक प्रामाणिकतासे किया जा सकेगा। अभी इसके सम्बन्धमें इतना ही कहा जा सकता है कि यह गंगाके मैदानमें पूर्वी उत्तरप्रदेश अथवा बिहारमें कहीं रहा होगा। कूप—कूप। बाई—बापी। अँवराउँ—आम्राराम; आम का बगीचा। (२) गौवा—(सं गुवाक) एक प्रकारकी सुपारी। करिवर—नारियल। (३) दारिउँ—दाड़िम, अनार। दाख—अंगूर। (४) कटहर—कटहल। तार—ताड़।
(६) बर—बड़। पीपरा—पीपल। अंबिकी—इमली। सेबार—अंभिक। (७) बारी—बगीचा। २० (रीडिंग्स् २) सिफते बुतखानः बर हौज व मानदन जोगियान मदान व कनान इरा (सरोवरके ऊपर स्थित मन्दिरका वर्णन जहाँ की-मुख्य जोगी रहते हैं।) नारा पोखर कुण्ड खनाये। मढ़ि देष जेहिं पास उठाये ॥१ कानफाट नितइ आवहिं तहाँ। औ भगवन्त रहैं तिह् महाँ ॥२ सिव [अ - ] छाये। पुरुष नाँउँ तिह ठौर न जाये ॥३ मेग सँबरू डाफ बजाये। सबद सुहाव इँदर मन माये ॥४ जोगी सहस पाँच एक गावहिं। सींगी पूरहिं भसम चढ़ावहिं ॥५ सिद्ध पुरुष गुन आगर, देखि लुभाने ठाठँ ॥६ कहत सुनत अस आवैं, दुनि चलि देखूँ जाठँ ॥७ टिप्पणी—(१) मढ़ि-मण्डप देवस्थान। (४) मेग-मुँहसे फूँककर बजानेवाला बड़ा बाजा। सँबरू—डमरू। डाफ-डंफा। (५) सींगी-(स शृंग) सींगका बना फूकनेका बाजा। २१ (रीडिंग्स् ३ : पंजाब [प] ) सिफते हौज व कताफते आबे उ गोयद (सरोवर और उसके निर्मल जल का वर्णन) सरवर एक सफरि भरि रहा। झरनाँ सहस पाँच तिह बहा ॥१ अति अवगाह न पायइ थाहा। घातें कूफ सराहउँ काहा ॥२ [घास फेफरें फह नित आवइँ]। देखत मोतीचूर सुहावइँ ॥३ [हुँवर लाख दोइ पानी बाहें]। तीर बैठि से लेहिं भर आहैं ॥४ [ठाँउ ठाँउ बैठे रखवारा]। छोर नहाइ न फेंक पारा ॥५ [आप होइ महरई के, - धोँ कह ] नी पाट ।६ [पाप रूप सरवर कै, रोवत धोँ]वी पाट ॥७
८८ पाठान्तर—१-भावा। २-मुरावा। टिप्पणी—२ '...' प्रतिका यह पृष्ठ पड़ा है जिसके कारण अंतिम तीन चमरौंकी पूर अद्याभियों तथा मध्यका अभिप्राय नष्ट हो गया है। पंजाब प्रतिका उद्धरण फोटो भी अत्यन्त अस्पष्ट है जिसके कारण पत्रांक के नर अर्धांश समुचित उद्धार सम्भव न हो सका। (१) सङ्गरी—मछली। सुमर पात भी सम्भर है—सुमर सरोवर रंघा बन्हि कराहि (पदमावत)। (२) अनगाह (सं —अगाध वराण्ड प्रच्छेउले अवगाह)—गम्भीर, अथाह। कूड—समाप्त हो गया। २३ ( ई०प्र० ४ ) सिफते बानावरी दर औ हौद गोवर (सरोवर के जन्तुओं का वर्णन) पैरहिं हंस माँछ पहिराहं। चकवा चकवी केलि फराहीं ॥१ दबला डेंक बैठ झरपाये। बगुला बगुली सहरी खाये ॥२ बनसेने सुबन पना जल छाये। अरु जलकुकुरी कर छाये ॥३ पसरीं पुरइं मूल मतूला। हरियर पात छह रात फूला ॥४ पाँखी आइ देस फन परा। कार कैंरबवा जलहर भरा ॥५ सारस कुरलहिं रात, नींद तिल एक न आवइ ।६ सबद सुहाव कान पर, जागहिं रैन बिहावइ ॥७ टिप्पणी—(१) डंक—धौंजा बगुला। सहरी—सफरी मछली। (४) पसरी—(स प्रसार) फैली। पुरइं—पुरइन (सं पद्मिनी) कमल की बेल। हरियर—हरी। पात—पत्ती। रात—(स रक्त) लाल। ( ) पाँखी—पक्षी। देस कर (मुहावरा)—नाना प्रकारक। कार— काला। करंवा—करज पक्षी विशेष। (६) कुरकहिं—तहकते हैं। २४ ( ई०प्र० ५ ) सिफत खन्दक कर गिर्दे शहर गोवर गोयद ( गोवर नगर की खाई का वर्णन ) आइ देख गोवर [केँ] खाइ। पुरिख पचास केर गहराई ॥१
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८८ पाठान्तर—१-आवा । २-सुहाबा । टिप्पणी—दीवेड्स प्रतिका यह पृष्ठ फटा है जिसके कारण अंतिम तीन चमक्रौकी पूर्व अर्द्धालियों तथा घत्तारो अभिसाख नष्ट हो गया है । पंजाब प्रतिका उपलब्ध फोटो भी अत्यन्त अस्पष्ट है जिसके कारण पप्ताके नष्ट अंशोंका समुचित उद्धार सम्भव न हो सका । (१) सफरी—मउली । सुभर पात भी सम्भव है—सुभर सरोवर हया चंकेि कराहिं (पद्मावत) । (२) अवगाह (सं —अगाध वकारके प्रस्लेवसे अवगाह)—गम्भीर, अथाह । बुडू—समाप्त हो गया । २३ ( रीवेड्स ४ ) सिफते जानावरों दर औं हौज गोयद ( सरोवरके जन्तुओंका वर्णन ) पैरहिं हंस माँछ महिंराहीं । चकवा चकवी केरि कराहीं ॥१ दबला ढेंक बैठ झरपाये । बगुला बगुली सहरी खाये ॥२ बनछेद सुबन पना जल छाये । अरु जलकुक्कुरी चर छाये ॥३ पसरी पुरइं कूल मतूला । हरियर पात बस रात फूला ॥४ पोंछी आइ बेस कर परा । फार फँरजवा अलहर भरा ॥५ सारस कुरलहिं रात, नींद तिल एक न आवइ ।६ सबद सुहाव कान पर, जागहिं रैन बिहावइ ॥७ टिप्पणी—(१) ढेंक—भोजन बगुला । सहरी—सफरी मछली । (४) पसरी—(ध प्रकार) फैली । पुरईं—पुरइन (सं पुण्ड्रिनी), कमल- की बेल । हरियर—हरी । पात—पत्ती । रात—(स रक्त) लाल । (५) पोंछी—पक्षी । बेस कर (मुहावरा)—नाना प्रकारके । कार— काला । फँरजवा—करज पक्षी विशेष । (६) कुरलहिं—रहते हैं । २४ ( रीवेड्स ५ ) सिफत रबक दर गिर्द शहर गोबर गोयद ( गोबर नगरकी खाईका वर्णन ) खाई देख गोवर [के] खाइ । पुरिस पचास फेर गहराई ॥१
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१ २६ ( रौकेन्स ० ) सिफत बहके-बाहर बस वस्ना महल्ल दरत्रों शाहरे-मज़कूर ( उक्त नगरके निवासियोँका वर्णन ) बाँभन खत्री बसहिं गुबारा । गहरवार औ आगरवारा ॥१ बसहिं तिवारी औ पचवानौं । घागर धूनी औ इजमानौं ॥२ बसहिं गँधाई औ बनजारा । सात सरावग औ बनवारा ॥३ सोनी बसहिं सुनार बिनानी । राउत लोग बिसाती आनी ॥४ ठाकुर बहुत बसहिं चौहानों । परजा पौनि गनति को जानौं ॥५ बहुत आस दरभर अधह, खोरहिं डीढ न बाइ ।६ सँस पा देस गोवर, मानुस चलत भुलाइ ॥७ टिप्पणी-(१) बाँभन-ब्राह्मण । खतरी-खत्री अथवा क्षत्रिय । गुबारा-आभीर अहीर । गहरवार-गहड़वाल राजपूतोंका एक वर्ग । आगरवारा- अग्रवाल वैश्योंका एक प्रमुख वर्ग । (२) तिवारी-त्रिपाठी ब्राह्मणोंका एक वर्ग । पचवानौँ-पंचम वर्ण । घागर-निम्न वर्गकी एक जाति जिनकी स्त्रियाँ जन्मके अनन्तर शिशुके नाल काटने और सूतिका-गृहके अन्य काम करती थीं । इजमानौं-इमाम, साहु । (३) गँधाई-गन्धी, तैल सुगन्धितका काम करनेवाले । बनजारा- ( स वाणिज्यारक > बाणिज्जारक ) व्यापारी, यह सार्थवाह शब्दका मध्यकालीन पर्यायवाची था और इसका प्रयोग उन व्यापारियोंके लिए किया जाता था जो टाँड लाद कर ( सामूहिक रूपसे माल लाद कर ) दूर देशोंसे व्यापार करने जाया करते थे । सरावग-( स श्रावक ) जैन धर्मावलम्बी गृहस्थ । बनवारा- बरणवाल वैश्योंकी एक जाति पनवारा पाठ भी सम्भव । उस समय इसका अर्थ होता-पानवाला बरई । (४) सोनी-सोनेका काम करनेवाले । बिनानी-विज्ञानी । राउत- ( स -राजपुत्र > राउत > राउत् > राउत ) राजपूतोंका वर्ग विशेष मूलतः यह राजघरौँसे सम्बन्ध रखनेवाले लोगोंकी उपाधि थी । बिसाती-फेरी लगाकर बेचनेवाले व्यापारी ।