भारतकोश
चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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९—सम । १०—ठन । ११—जरतै । १२—भाग न । १३—महारब औ बटपार । १४—सिरजन गये भेपार । टिप्पणी—(१) इन्द्र—द्वन्द्व । उद्वेग—उद्वेग । उचाट—खिंचता । (प्रथम वाचनमें ये शब्द “दण्डदीक व्यबात' पढ़े गये थे। पर उनका कोई अर्थ नहीं जान पड़ा। अन्य कोई पाठ समझमें नहीं आता । मिरगावर्तिमें कई स्थानोंपर इस वाक्यांश का प्रयोग हुआ है । भारत कला भवन काशीमें इसके कैथी लिपिमें लिखित कुछ सचित्र पृष्ठ हैं । उसमें यही पाठ है । उसीके आधारपर हमने प्रस्तुत पाठ ग्रहण किया है किन्तु हमें इस पाठ और अर्थसे सन्तोष नहीं है । (३) आध—अध । दरब—द्रव्य । जरब दरब—धन दौलत । वाजार— घर । (४) अह्वर शामीर—रात दिन । दी—अग्नि । (५) वै—से । जरतै—जलते हुए । (६) बटपार—बटमार, रास्तेमें लूटनेवाले लुटेरे । ४१८ ( फील्ड्स ४१८ : बम्बई ५१ ) कैफियते दर फिराक सिरजन गायद ( सिरजनकी विरह अवस्था ) मिरिग जा पन्थ लांघि कहूँ जाहीं । धूम¹ धरन हाइ जाइ पराही ॥१ जाँवत परिख उरधि उड़ि गये । किशन बरन कोइला जरि³ भये ॥२ घालहु मिरजन होइ भाँवारा । फारिया दहुँ नाउ गुनधारा ॥३ मायर दाहि मँछि ददिदहे । टहे करंजवा जलहर अहे ॥४ अइस झार विरह क भइ । धरती दाहि गगन लहि गइ ॥५ मरग चँदरमँहि मेला, औ घूम पखि भइ कार ।६ सिरजन बनिज तुम्हारे", उबर [पूह न प*]ार ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—अज फिराक मैना आहूवान सोख्तन व अनपरान दग्गी व आहियान दर आव साख्तन (मैनाके विरहमे हिरनों पशुओं और जलचरोंका जल उठना)