भारतकोश
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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

९—सम । १०—ठन । ११—जरतै । १२—भाग न । १३—महारब औ बटपार । १४—सिरजन गये भेपार । टिप्पणी—(१) इन्द्र—द्वन्द्व । उद्वेग—उद्वेग । उचाट—खिंचता । (प्रथम वाचनमें ये शब्द “दण्डदीक व्यबात' पढ़े गये थे। पर उनका कोई अर्थ नहीं जान पड़ा। अन्य कोई पाठ समझमें नहीं आता । मिरगावर्तिमें कई स्थानोंपर इस वाक्यांश का प्रयोग हुआ है । भारत कला भवन काशीमें इसके कैथी लिपिमें लिखित कुछ सचित्र पृष्ठ हैं । उसमें यही पाठ है । उसीके आधारपर हमने प्रस्तुत पाठ ग्रहण किया है किन्तु हमें इस पाठ और अर्थसे सन्तोष नहीं है । (३) आध—अध । दरब—द्रव्य । जरब दरब—धन दौलत । वाजार— घर । (४) अह्वर शामीर—रात दिन । दी—अग्नि । (५) वै—से । जरतै—जलते हुए । (६) बटपार—बटमार, रास्तेमें लूटनेवाले लुटेरे । ४१८ ( फील्ड्स ४१८ : बम्बई ५१ ) कैफियते दर फिराक सिरजन गायद ( सिरजनकी विरह अवस्था ) मिरिग जा पन्थ लांघि कहूँ जाहीं । धूम¹ धरन हाइ जाइ पराही ॥१ जाँवत परिख उरधि उड़ि गये । किशन बरन कोइला जरि³ भये ॥२ घालहु मिरजन होइ भाँवारा । फारिया दहुँ नाउ गुनधारा ॥३ मायर दाहि मँछि ददिदहे । टहे करंजवा जलहर अहे ॥४ अइस झार विरह क भइ । धरती दाहि गगन लहि गइ ॥५ मरग चँदरमँहि मेला, औ घूम पखि भइ कार ।६ सिरजन बनिज तुम्हारे", उबर [पूह न प*]ार ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—अज फिराक मैना आहूवान सोख्तन व अनपरान दग्गी व आहियान दर आव साख्तन (मैनाके विरहमे हिरनों पशुओं और जलचरोंका जल उठना)

३१४ १—मिरग फब कैसे जो आहीं। २—बरम (धूम) लिखिने 'वाव'को 'रे' की तरह लिखा है। ३—छार । ४—कितन। ५—उरि कोरना । ६—बिंदु तर आइ होइ मैंतारा। ७—सरवर। ८—मइस। — सागर। ९ —बरम (धूम) नैन भये कार। १०—तुह्यारें। टिप्पणी—(१) धूम—धूम्र काला । (२) काँधत—बाबत, जितने भी। पंखि—पक्षी। उरथि—उच्च आकाश। किसान—कुन्त। बरन—वर्ण रंग। करि—कराकर । (३) करिया—कर्णधार; पतवार संभालने वाला। नाउ—नाव । गुनचारा—रस्सी खींचकर किनारे लाने वाला नाविक। इस शब्दका प्रयोग पदमावत (१८।६) और मधुमालति (१५।१) में भी हुआ है; किन्तु दोनों ही स्थानोंपर माताप्रसाद गुप्तने इसे 'कंदहारा' पढ़ा है। गाफ (काफ) नून दाल (दाल) हे अन्वि रे, अलिफ़को 'कंदहारा' पढ लेना सहज है। किन्तु नौकाचलन सम्बन्धी शब्दावलीमे कन्दहारा जैसा कोई शब्द नहीं है। माताप्रसाद गुप्त और वासुदेव शरण अग बाल दोनोंने इस तथ्यसे परिचित न होनेके कारण इसे संस्कृतक कर्णधारक—कणधारका रूप मान लिया है। किन्तु कर्णधार (पतवार सम्भालनेवाले नाविक) के लिए करिया शब्द है। नौकाचलनमें नाविक तीन प्रकारके होते हैं—(१) डाँड चलानेवाले—इनका काम नावको डाँडके सहारे गति देना होता है। इन्हें खेवक या डाँडेया कहते हैं। (२) पतवार सम्हालनेवाला—इसका काम पानी काटकर आगे बढने तथा दिशा नियन्त्रित करनेके निमित्त पतवारका सञ्चालन करना होता है। इसे करिया कहते हैं। इन दोनों प्रकारके नाविकोंका काम जलके मध्यमें होता है। (३) रस्सीके सहारे नावको खींचकर किनारे लानेवाला नाविक। इसको गुनचार कहते हैं। बिना इसकी सहायताके नावका किनारे आना सम्भव नहीं। (४) सायर—सागर। मॅडि—मण्डक मछली। कैरवहा—एक पक्षी विशेष। अडडर—अडम्बर। (५) कहि—सब । ४१९ (दीर्घकूट १९१) रसीदन सिरकन दर शहरे बाउन व खुद रफ्तन दर मुलाकाते गोरख (सिरजनका पाटन नगरमें पहुँचकर गोरखस मिलने जाना) माँझ चार बति पाट पटाई। हरदीपाटन उतरा बाइ ॥१॥

३१५ पाटन नगर पाइ अँधारा । देखि धौराहर इगुर द्वारा ॥२ गिरसन पन्तर माज पहिगाये । नरियर गावा धार मगाय ॥३ राग गजर पिंर्गजी लिय । सिञ्जन मेंट लार फकें गय ॥४ पूरन गरन लेग दुआरा । प्रनिहार मरि पैठ पारा ॥५ पात जनावहु पीर कएँ, परदेसी एक आयउ ।६ मारत नार धागदर, पैपरी जाइ लगायउ ॥७ टिप्पणी—(२) अँधारा—रस्ता, ... दिया । द्वारा—... ॥ (३) वन्ता—... । माज—पान कर । पहिराव—... । (५) प्रनिहार ... । ५१० ( चित्ररेखा ) .... ( .... ) जिन एक नन नींद मई आई । गय पैठ[रि] पा झाउ लगाई ॥१ दोमन एक पैवर र टारा । फिरिक दुआटम दन्तर फारा ॥२ दर्श बर्शि हाय दणारी । जन कान दूर पहुँची गयी ॥३ अनउ काँप बन्धात नगाउ । आग पुन साथ पहिगयी ॥४ पिग प्रद् गाम अदावन परा । आइ पुरन्तर डा फडा ॥ दहित दहा दिषरागर पाया वाशि दुगन ।६ दिर भाग नै माझ दूगर लगा न तान ॥७ टिप्पणी— .... .... .... .... .... .... .... ....

१७४ ४२१ ( रीश्दहूम ३ १ ) बरून आमदने लोरक व मुलाकात करदन बा सिरजन ( लोरकका बाहर आकर सिरजनसे भेंट करना ) लोर बचन सुनि पँवरि सिभारा । पँवरी बैरमन आइ जुहारा ॥१ पीरहि पीर सुनत आँधारी । बेर क्याइ तुम्ह रूपमरारी ॥२ विधि कल्यान पुछि भल पायहु । लउ आँधार सइस अरगामहु ॥३ अन्त गवर जग रास फरै सो । परै पियास खांडे अस ले जो ॥४ रूपवन्त धनवन्त सुलख्खन । सिरीवन्त जजमान विचख्खन ॥५ अमकें बहुतैं असीसा, पीर लोरकहिं दीन्हि ।६ पुन पतरैं चइ बैठउँ सिरजन, पोथि हाथ के लीन्हि ॥७ टिप्पणी—(१) बैरमन—ब्राह्मण । (२) पीर—(फारसी) ब्राह्मण । आँधारी—आया । (५) सुलख्खन—सुलक्षण । सिरीवन्त—श्रीमन्त । जजमान—यजमान । विचख्खन—विचक्षण । ४२२ ( रीश्दहूम ३ २ ) दीदने सिरजन ताल-ए-लोरक व तासीरे सितारगाने साद व नहस ( सिरजनका शुभ अशुभ ग्रहोंको देख कर लोरकका भाग्य बताना ) सेठ अन अवसि बलबारी । मख रासि तुम रूपमरारी ॥१ मेख बिरिख आर मिथुन मँजे । कर्क सिंह कन्या जो गुंजे ॥२ तुला बिरश्चिक धनु आइ सुलावइ । मकर कुम्भ गुन मीन सुनावई ॥३ मेख चँदर जनम पर आवा । विसरें घर सुरुज दिखरावा ॥४ नवमें घरें भय परकासू । सतमें मंगर आइ आबासू ॥५ चार नखत तुम्ह दाहिन, कहीं गुनति अति देखि ।६ मघर बुध विरस्पत, जनम चँदर बिसेसि ॥७

१२७ टिप्पणी—(१) मेख--मेष । रासि—राशि । (२) खिरिख—वृष । (३) बिरखिक—वृश्चिक । (५) मंगर—मगल । ४२३ ( रीकेण्ड्स ३ १ ) ऐजन ( वही ) चौथे बुध सुख कछु आवइ । बिहफइ सोइम राज करावइ ॥१ दूसरे मंगर पाँच परवानी । बइठर पाप धरम कर हानि ॥२ छठयें सनीचर देखि मेरावा । केठे अल्लैनै पुनि हाथ आवा ॥३ राहु केतु भइ आयसु दिलामहिं । मिलैं कुटुंब घर दसमैं आपहिं ॥४ ओ न होइ अस भीठ उतारउँ । गुनित टूट तो पोथा फारउँ ॥५ गंग नीर तुम्ह अन्हउब, दाख बेल फर खाब ।६ पाप तुम्ह सब तज लोरक, गंगा सुद्ध नहाय ॥७ टिप्पणी—(१) बिहफइ—बृहस्पति । सोइम—( फारसी—सोयम ) तीसरा । ४२४ ( रीकेण्ड्स ३ ३८ : बम्बइ १७ ) बजियत सितारगान गोयद ( ग्रह अवस्था कहना ) उसिय समो सब सुख पर आयहु' । पवि परना सब दुख अन्दायहु ॥१ राजा चँदर पाट बेंसारा । महत बिरस्पत सुरुज उमारा ॥२ पंद्रह बिसवा धरम जनावइ । पाप पाँच बायें दिसि पावइ' ॥३ अठ बिसवा दस पूषि मखाने । बारह बिसवा मोर बार आन' ॥४ सतरह बिसवाँ कहौं तू मानी' । बिसवाँ दोइ पाप केउ ज्ञानी ॥५

११८ राज पाठ तुम्ह गावरा अहँ, मैना' कर गुसाँइ ॥६ चाँदहि गगन चढ़ायहु, मना धरती काँइ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—ताज्ये खाब नमूद्ने सिरजन बज रस्तने लोरक बजने गरीबे खुद (सिरजनको लोरकका घर बापल आनकी शुभ बड़ी दखना)। १—अरी सम्हे समे सुगर बामहु। २—बित्सों फब्बर धरम चुकाया ३—पाप पाँच वामै दिति पावा। ४—जन बित्सों चौदह तिन खावा। ५—पाठ सठ बित्सों नी बाता। ६—हारह रिसबों बिदव बगानी। ७—बर बित्सों मुन्दु बैठ न जानी। ८—तुम्ह कारह है। —मै (लिपिक व दोषत 'ना' छूट गया है। ९ —चाँदा। १०—नारी। ४२५ ( रीकण्डम् ३ २५ : बम्बई ६१ ) पुरोबने लोरक ( लोरकका सुनना ) मैना सबद पीर जो सुनावा । सुनतँ लार हियँ' घबराबा ॥१ मैना बात बाँमन कित पायहु । औ चाँदा किइ आइ सुनायहु ॥२ कहु पंडित फिर कितहुत आवा । कैँ तुम्ह' हरदींनगर पठावा ॥३ मैना नाउ कहा तुम्ह सुनौं । औ चाँदा पर कइसौ गुनौं ॥४ तूँ न इह बाँमन परदेसी । दखतँ' लखतँ आइ सहदेसी ॥५ खह पाइ खर क्षार करेहिं, आपन सीस चढ़ाठें ॥६ माइ माइ मैना कर, कुसर खुम ' खा पाठें ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—सुनीदन लोरक हाले बाकने मैना व गिरिह्याकन बा फिराक बजने मैना (लोरकका मैनाका हाल सुनकर दुःखी होना)। १—हिय। २—सुनौं और हिये। ३—पाँव। ४—औ मैना ५। —आयहु। ६—ताँ। ७—पठाबहु। ८—तूँ। —कर। १०— हालि । ११ —कसन। १२ —सह पा० तोर बाँभन अपने सीस चढ़ाठैं। १३ —मय कुठार।

टिप्पणी—(१) पौर—ब्राह्मण । (२) बाँभन—ब्राह्मण । (३) किसहुत—कहाँ से । (५) सहदेसी—अपने देश का । (६) बरैहि—बरोनियों से मूँहा क । ४२६ ( रीडिंग्स ३ ५८ ) गुफ्तने सिरजन बर्रैरे रुजाई इसा असीशन ( सिरजनक बरवाकौक कुसल समाचार कहना ) कँवरू माइ तोर महतारी। लोग कुँटुम घर मैना नारी ॥१ तोरैं चिन्त रैन दिन आहाँहिं। नैन पसार विहि मारग चाहहिं ॥२ अन पानि चरू टेरि न भावइ। बागहि रैन दिन नीँद न आवइ ॥३ पन्थ बगाऊ पूछहिं लोरा। फोउ न कहैं सकूसर तोरा ॥४ सोक सो (मैनामॉअर) भइ। झार विरह अधिक अरि गइ ॥५ दुइ ताहि न सोफ, लोर सँ जो दई न डराइ ।६ तजफे बारि पियाहुत आपन, लीन्हा (नारि) पराइ ॥७ मूलपाठ—( ) मैना बन भैनी मॉअर म् । (७) पुरुग् (प्रमंग फ अनुसार यह पाट सर्वथा असंगत है) । ४२७ ( रीडिंग्स ३ ५६ ; बम्बई ४२ ) कजियत आवर्दने बनिज गुफ्तन सिरजन पसु लोरक ( सिरजनक लाएकय अपने बनिजकी बात कहना ) हाँ र पनिज गापरा¹ लै आयउँ। भिरव लेन कौँ² कँवरू भुलायउँ ॥१ उगेय मंदिर अहौँ बसतारा³। अड उठलें कँ भया हँकारा ॥२ पूछसि कौन पनिज तुम्ह आनौँ । कौन दसहुते कियत पयानौँ ॥३ कहा दस धँ गागरौँ आयउँ । गय माँस दाइ पुरुष चलायउँ ॥४ कहा लार नम आपन ठाँऊँ । गाबर का बाँभन मिरजन नाऊँ ॥५

४. पलायन, वन-संकट, सर्प-दंश व विष-हरण (कड़वक ३०१-४००)

५२ मोहि कों कहा सिरजन, हरदीं संदेस तँ जाइँ ॥६ अननि छोर औ साँवरी, परी दोइ लै पाइ' ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—कैफियते गैरतजानये गुफ्तन पीछे लोरक पैगाम बेरासिनीये मैना (लोरकसे घरकी स्थिति और मैनाका सन्देश कहना) । १—ही र बनिज सुफर । २—सैर कहूँ । ३—पहुनहि सारा । ४— वहूँ । ५—देस सुख्ख । ६—कहेउँ बैठ मैं गोवर साठाथ । ७—साठाथ । ८—कहेउ तयव भौर आपन ठाउँ । —गवर क । १ —कँवल रागे धोयल जहर रची न जाइ । १०—अननि छोर आर साँवरि मैनाँ पाइ परी तै धाइ । टिप्पणी—(२) थनपारा—बैठक । तउक कै—टोकनेके लिए । पथा—साजनेवाले । (६) साँवरी—पत्नी । ४२८ (रौडंग्रहम १ र.म. ; बम्बई ४३) कधिउत गहु गहो जो तुम्ह पर यहँ बनिज अलाठाथ । मैना कहि मैं गोहन आटाथ ॥१ छाड़ि आँचर कर गहि रही । अति सुख पूरे बिरह कै दही ॥२ खोसिन' आँचर आइ छुड़ावा । कहि संदेस लोर तिहँ आवा' ॥३ महिं देखत लै पैठि फनारि । अस कहु आज मरतै काँठसारी ॥४ खोसिन घर घर करत अहा' । मैना देखु मरन कँ चहा' ॥५ बनिज छाड़ि मैं छावेउँ, मैना केर संदेस ।६ बेग आउ चलु गवर', लोरक तजु परदेस ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—कैफियते मैना गुफ्तन सिरजन बा फिराक हाल साब मयूसन (सिरजनका मैनाँकी हालत और उसकी बिरह अवस्था कहना) । (१) आँचर गहिऊ रही । २—सुएके बूड़ि । ३—लोसिन । ४— कहति करोउ जिउ पिठ आवा । —दोखिन काहूर करती अहा । —५ मरन पै चाहा । ७—यावरी । ८—तोर कण्ठु ।

२५१ ४२९ ( री०क्यू० ३ १७ ) बेफियते शिकस्तगीए हाले मैना गोयद ( मैना का दुख एवं कहना ) मैल चीर सिर तेल न जानइ । यह दुख लोरक तोर पखानइ ॥१ फइत सँदेस नैन झरि पानी । बरसहि मेघ जइस घरानी ॥२ बूँदि सरै थाह न पावा । करिया नहीं तीर को लावा ॥३ मैना रूप देख का देखेउँ । अउर रूप सर्वैसार न लेखेउँ ॥४ सब एक दिन फने अहारू । फूँहि पर जियइ जानि करतारू ॥५ रोअस नित कजको मैंन, मैना बिध अस औतारी ।६ नैन मूझि भर आँसु लोरक, तें हीउर माँझ सुतारी ॥७ ४३० ( री०क्यू० ३ ७८ : बम्बई १९ ) जारी कर्दने लोरक अज शुनीदने सुखारिये मैना ( मैनाकी दुरवस्था सुन कर लोरकका रोना ) सुनि संताप मैना कर रोवा । लोरक हिये' क कसभर धोवा ॥१ अप' मैना बिनु रही न जाइ । देइ' पँख बिध जौंडै उड़ाइ ॥२ जो न जाइ मैना मुख देखउँ । तो यह जीउँ मरन लँ लेखउँ ॥३ देवस गयउँ निसि आइ तुलानी । यौभन फइत न पात' घटानी ॥४ सिरजन जाइ सीम अन्हयावहि । लँ अपनों फिइँ जेठ फरावहि ॥५ दाम लाख दोइ देउहौं, परद सहस भरावहु ।६ मोर गवन दिन इमरे, तुम फुनि गोहन आवहु ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक-शुनीदन लोरक हाले बेहाकिये मैना व गिरिया कर्दैन बा दिगरक हाल बाज नमूदन (मैना की दुरवस्था सुन कर लोरकका रोना और अपनी स्थिति कहना) ३१

१२२ १-हिप । २-दैहु । ३-मंदिर । ४-बिसु सुरंग । ५-कै । ६-सौंभव बात कहत न । ७-सिरजन जाइ सँवर क आवहु । तैस मनपान करावहु । ८-दोर नीन्द करैमन । ९-दूगर । १०-पुनि । टिप्पणी-(१) कम्मर-कंकड़ । (६) दाम-ताँबे का सिक्का । सिक्के के इस नाम के सम्बन्ध में सामान्य धारणा रही है कि उसे पहले पहल अकबर ने प्रवर्तित किया था । इस कारण अमीर खुसरोके खालिकबारी में 'दाम' के उल्लेखके प्रमाणसे अनेक विद्वानोंने उसे अकबरकाल अथवा उसके पश्चात्की रचना सिद्ध करनेकी चेष्टा की है । किन्तु यह नाम अकबरसे पूर्व भी प्रचलित था । इस उल्लेखके अतिरिक्त अलाउद्दीन खिलजीके दिल्ली टंकशालके टंकशाली ठक्कुर फेरूके ग्रन्थ 'द्रव्य परीक्षा' से भी 'दाम' का पूर्व अस्तित्व प्रकट होता है । द्रव्य-परीक्षाके अनुसार चाँदीका टंक ६ दामके बराबर होता था । अकबरके समयम रुपयेका मूल्य ४० दाम था । आइन अकबरीसे ज्ञात होता है कि उस समय चाँदी-सोनेके सिक्कोंके बावजूद रामदरा सारा हिसाब-किताब दामोंमें ही रखा जाता था । सो राय दाम्भ के उपर्युक्त उल्लेखसे भी यह लगता है कि दिल्ली सुलतानोंके समयम भी लेन देन और व्यवहार में दामका ही अधिक प्रचलन था । देखैहौँ-ढूँढ़ना । बरइ-पैक । ४३१ ( रीफैन्ग्यूग ३ क : बरगई ५५ ) बाज आमदने लोरक बखाना व मुतफक्किर गश्तने चाँदौ अज खबरे मैना ( लोरकका घरके भीतर आना और चाँदॉका मैनाकी बात सुन कर परेशान होना ) मैनाँ बात जा सिरखन कही । सुनत चाँद राहु जनु गही¹ ॥१ पूनेउँ जस मुख दीपत अहा । गयी सो जोति छीन² होइ रहा ॥२ जब पुरुख अपन³ घर जाइह । सिंह रासि कहँ⁴ गगन चढ़ाइह ॥३ फिर लोर मंदिर महँ आवा । कहा⁵ चाँद चित भमउ परावा ॥४ उठि पानि लै पांइ⁶ पखारहि । तुम्ह बैठ⁷ औ पीर हँकारहि⁸ ॥५

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१२४ समुँद वीर कछु साथ तुम्ह चायहु । गोबर देखि पलटि घर आयहु ॥४ फाँद सिंहासन चाँद चलावा । इन्ह तखियाव फिरे हूँ (आवा) ॥५ बरद सहस एक सिन्धौ भरा । पाटन छाड़ि सींठ ऊतरा ॥५ राहु गरह यस गरहै, चाँदा मुख अँधियार ।६ मीन रासि बन बैरिन, सिरजन कै उपकार ॥७ मूलपाठ—(४) आये । टिप्पणी—(५) सिन्धौ—सैन्धव नमक । ४३४ ( तीर्थखण्ड ३१ ) गुशउने चाँदा लोरक रा ( चाँदका लोरकसे अनुरोध ) सवदु चाँद लोर सों कहा । पलट नीर गंगा नै वहा ॥१ फिरथि साइ सैं मा तोड़ै डोरी । जहवाँ टूटि फुनि तहमों जोरी ॥२ तिह नखोर हा सरग लुकानी । कै सनेह हरदीं तें मानी ॥३ तिह दिन संवर बाच जिह कीन्हे । अब लै गोबर महि दीन्हे ॥४ बास देइ धनि नाठ चढ़ाये । अब गुन फाटि गाँग बहाये ॥५ बहुरि लोर असु हरदी, रँहहिं वरिन दोइ पार ।६ माथा पुरवहु अपनें साँई, बिनवइ दासि तुम्हार ॥७ टिप्पणी—(१) सवदु—गीत पने । नै—समान । (७) पुरवहु—पूरा करो । साँई—स्वामी । बिनवइ—विनय करती है । ४३५ ( तीर्थखण्ड ३१।अ ) जवाव दाइने लोरक सर चाँदा रा ( लोरकका चाँदको उत्तर ) हाँ जानउँ राजा कें जाइ । अपनें हुतें तिह होत पराई ॥१ हौं अस जानउँ बन क जाती । मन न दगउत एकाँ राती ॥२

३९५ देस देसन्तर तिहि संग धाये । मनसँड गँबने घर न रहाये ॥३ गरह नवइ जिंहि होइ निराबा । तुम नखोर हम चाहत पावा ॥४ हम नारि मोरैं सग आवसि । जिंहि लाये घनि अपुनैं राखसि ॥५ मगर बुध बिरस्पत, सुकर सनीचर राहु ।६ चाँद् सुरुज लै जँधषा, बारह घरिह उतराहु ॥७ ४३६ (रीडिंग्स २११ क) रवान कर्दने लोरक व चाँदा सूये गोबर (गोबरकी ओर लोरक और चाँदका रवाना होना) सुरुज दिस्टि सिंह घर गये । मीन ठाँउँ हुत अँठये मये ॥१ सवन न फरै चाँद्र क कहा । संग बैठि छोइ लागि रहा ॥२ पहर रात उठि कीन्हि पयानाँ । कोस बीस इक जाइ तुलानाँ ॥३ कोस तीस तिंह गोबराँ लागे । उतर देवहाँ लोग डरु मागे ॥४ घर घर गोबराँ बात जनाइ । फो एक राठ उतरि गा आइ ॥५ खाइ फोट सँवारहुँ बैठे कित्ते झूसार ।६ जौलहि राउ गइ होइ लागे, तौलहि लोग सँभार ॥७ टिप्पणी—(४) देवहाँ—एक नदी। प्रसगसे जान पडता है कि यह नदी गोवरके निकट ही थी। हरदी जाते समय लोर और चाँदने गंगा पार किया था। स्पष्ट है कि गंगा भी गोवरसे दूर न थी। अत' यह कहना गलत न होगा कि गंगाके आस-पास ही देवहाँ नदी भी बहती रही होगी। भारतीय सर्वे विभाग के डिप्टी सर्वेयर जनरल कर्नल यमुना नारायण सिनहाने हमें सूचित किया है कि देवहाँ नामकी नदी नैनीताल जिलेमें एक पहाडी तलहटी से निकलती है और पीलीभीत बीसलपुर, शाहजहाँपुर शाहबाद होती हुई कछीआते सात मील उत्तर गंगा में आकर गिरती है। शाहजहाँपुर तक इसका नाम देवहाँ है। उसके आगे शाहबाद तक यह देवहाँ और गरा दो नामोंसे पुकारी जाती है। शाहबाद के बाद लोग उस केवल गरा नामसे परिचित हैं। शाहबाद से ६ मील पश्चिम इस नदीके तट पर गोटा नामक स्थान भी है। गरा और गोटा दोनों ही गोवर की याद दिलाते हैं।

३२२ ४३७ (रौकेण्ड्स ३१२) हैब्त उफ़्तादन बर शहरे गोबर (गोबर नगरमें आतंकका बैठना) घर घर गोबरौं परा खभारू । कइहिं जासु राखइ करतारू ॥१ तरुबा कोट झराये खाई। परी रात मँह पयैर बँधाई ॥२ सोन रूप सब गोंठी फरहीं। घरहिं ओसारहिं मानुक घरहीं ॥३ मैना कँ जीठ अइस जनावा । अनौं डरहुतै मइ को आवा ॥४ छोरि लै पाट लोरक कै कङ्गा । मइ जीठ भया मावत अङ्गा ॥५ साँझ परे माइ खोलिन, मोर पिसहिं अस आइ ।६ आज रात के बीतहि, सारफ सुधि पाइ ॥७ टिप्पणी-(१) गोंठी-कथ्थी; टंट; कमरमें धन राखि रखनेका स्थान । (४) अनौं डरहुतै—यह अपपाठ जान पड़ता है। बीकानेर प्रतिमें 'इरबी हुवै जनइ को आवा' पाठ है। (६) साँझ परे—सन्ध्या बेला । ४३८ (रौकेण्ड्स ३१३) ख्वाब दीदने मैनौ अज आमदने लोरक (मैनौंका लोरकके आनेका स्वप्न देखना) गाँष कुठारैं परा अबासू । मैना कें चित अनद हुलासू ॥१ सोधन फर रात बा फूली। देख तरायौं मैना भूली ॥२ रहँस उठी चित मँह निसि जागी । पिछली रात नींद फिरि लागी ॥३ जागत नैन सपन एक आवा । मा बिहान मै गबर मसावा ॥४ खोतिन पूछहि सुतु पनि मैनों। परत साँझ जो घफविइ पैनौं ॥५ तोर मन फूल सो रँइसा, पायहुँ नीके भाइ ।६ सपन गुन गिनु मैना, कहु कछु देखतें आइ ॥७

१२७ ४३९ ( री०स्म ३१४ ) तलबीदने फुरिस्तादने लोरक गुलफरोश रा बरे मैना बा गुल ( लोरकका मालीको बुलाकर फूलके साथ मैनाके पास भेजना ) दिन भा लोरफ मारी बुलाबा । गोवराँ कस हँह पासा जनाबा ॥१ अस बनि रहु धि लोर पठायउ । जो को पूछहि कहसि हाँ आयउँ ॥२ फूल फरँद भरि माली लेतस । फिर फिर गोवरा घर घर देतस ॥३ देख फूल मैनाँ तस रोई । फर मोभरहि जिंहि पिउ होई ॥४ नाँह मोर परदेमहिं छावा । फूल पान महिं देख न भावा ॥५ परकँ हार मलसि, माली साँजरि फूल ।६ पाम लागि सत मैनां, उठ मेमी अब पोल ॥७ टिप्पणी—(१) मारी—माली । ४४० ( री०स्म ३१५ ) पुरसीदन मैना खर गुल फरोश रा खबर ( मैनाका मालीसे हाल चाल पूछना ) फग्गु मर्टि पारी किंविहुत भारा । फूलबाग म भारक पारा ॥१ जानउँ पग सों राग पठारा । मपन माँज जा दगउँ आपा ॥२ लाग राम मार दिया जुड़ानों । अहग फूल दिउ गरण आनों ॥३ मार नांउ हँ मप दूर गइ । जनु गाँरन मौगहरी दाइ ॥४ गुज्र पर्द मारग हां पाटनैं । मगषी सोद कहों अच पाटउँ ॥५ हरग बिराने गउं, रैन बागर बाह ।६ दायें मागि म दिनउउँ, जा परदगी आह ॥७

१२८ ४४१ (रीडैन्ट्स ३१६) जवाब दादने मैना भाजी बर मैना रा (माझीका मैनाको उत्तर) महि नहिँ कुरबी हा परदेसी। ताहि सँझाइ मोर सहदेसी ॥१ सो देखि मैंइकोँ घरहिँ चलावा। गोचर बसद् मैं देखन आवा ।२ महरि देखि हाँ दही फइँ आयउँ । तोर बिरह अस अउर न पायउँ ॥३ सब तूँ सुधि लोर कै पावसु । उइँकै दूध जो बेगों आनसु ॥४ फूल मोर तोरें झार सुखाने। छार भये औ खरि डुँबलाने ॥५ बहुत लोग पुर आवा, महु न बोल सुधि कोइ ।६ बेर्गा आउ तिह बेचैं, औ तहाँ मिरावा होइ ॥७ टिप्पणी-(१) कुरबी—घर-परिवारका व्यक्ति। सहदेसी—समान देशका वासी; अपने देशका निवासी। यहाँ तात्पर्य अपने गाँव नगरके निवासी से है। (२) बसद्—बस्ती। ( ) झार—(स ज्वाल) अग्नि। छार—(स क्षार), राख। (७) मिरावा—मिलाप भेंट। ४४२ (रीडैन्ट्स ३१७) रफ्तने मैना बा सहेलियान दर बेर्गों व तलबीदन लोरक मैना रा (सहेलियोंके साथ मैनाका बेर्गों जाना और लोरकका मैनाको बुलाना) दिन भा मैनों बेर्गा गई। और सहेली चुनी दस तईँ ॥१ बेचत दूध घर [पर] गई। दही कइँ लोरहिँ महरि बुलाई ॥२ महरी बय मध लोरक देखी। देखत मैनाँ और न लेखीँ ॥३ [—] सार चौदा कइँ बोलसु। सीप सिंदूर चन्दन वन पावसु ॥४ [मागौं*] छाड़ि जो पाछों आवा। चपक चमक धनि पाउ उठावा ॥५

१२९ बहि फर दूध दहि लीजइ, दस गुन दीजइ दान ॥६ सती रूप जस देखउँ, सिंह क बिदाई पान ॥७ टिप्पणी—(७) पाछौं—पीछे। उचावा—उठायी है। ४४३ (रैकीस ३१८ : सम्बत् ५९) खरीदने लरक शीर व दहानीदने मारू मर मैना रा ( लोरकका दूध खरीद कर मारू देना ) लेके दूध सो दरब दिवाया। सीप सिंघोरा माँग भरावा¹ ॥१ सेंदुर चन्दन सब फोउ लेई। मैना आपुन² करै न देई ॥२ सेंदुर सो करि बिह पिउ होई। नाँह मोर हरदी है सोई ॥३ [बोलहिं*] मुँहिका वह तज गयउ। साँसहि हम³ अस साध न मयउ ॥४ [निसि*] दिन हाँ दुख रोऊँ⁴। नींद न आवइ कैसें सोऊँ ॥५ रोवत दिस्टि घटानी, (घरी) चख कै जोत⁷।६ चाँद सुरुज तिह पर गहे, पास परी मुँइ लोट⁸ ॥७ मूलपाठ—६—कटी (हेने अभावके कारण यह पाठ है)। पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—सिरुदने लोरक शीर अज मेना व मारू दहानीदने ब मारू मुस्न मैके दिल रा ( लोरकका मनासे दूध खरीद कर धन देना और उसक हुलसकी पाह देना ) १—केर बहि दूध । २—आनि पठावा । ३—आपुहि । ४—मार नाँह । ५—जीवहि वह तज मॅहि बैह गवा । ६—मुहि । ७—मया । ८—दिन दिन आसू मोहू राऊँ । —गीन भए पल कात । ९— बीजु परी मुँइ लूट । टिप्पणी—(१) सो—हर । दरब—द्रव्य । दिवाया—दिलवाया । सीप—चाटका बना पानकार पात्र जिसमें अभिनन्दन-सामग्री यथा—रोली चन्दन सुपारी अक्षत (चावल) पंञ्चन आदि रखा जाता है। सिंघोरा— सिन्दूर रखनेका पात्र । माँग भरावा—माँगमें सिन्दूर लगानेका माँग भरना कहते हैं ।

११ (२) करे—करने । (३) बाँइ—पति । (४) जौंकहि—जब तक। मूँहिका—मुझको । तौंसहि—तब तक । अस—ऐसा । साथ—आकाश । (५) बटाथी—घट गयी । चक्र—नेत्र । ४४४ (रीडंग्इस ११५ होकर) ऐकन (वही) तोरफ मैनाहि बान न देइ । करै धमारी मरम सभ लेइ ॥१ मैना कहइ सुन साँझि¹ सँझाइ । मोरें आइ भीत रजाइ² ॥२ मैं का देरउ हा बेसादरी । तिह तँ माँ सों करसि धमारी ॥३ आनसि अस मैं सोवा सारी । थाप देइ महि पाठसि चोरी ॥४ अपने नाँह न रहँसु सँझाइ । मोर ठाँउ का करसु पड़ाइ⁵ ॥५ क्रोध भर कै मैना चली, तहँ पहेरु आवास⁶ ।६ साँदा भई पर⁷ पालंग ऊपर⁸, धरि मैं सारस पास⁹ ॥७ पाठांन्तर—इतर प्रति — शीर्प—नीज गुजराउने नौरक भर मैना रा बेसाजी व लग हरियाफ्त करदन (नोरकका मैनाको न जाने देना और छेडखानी करना) १—खरे । २—गह । ३—नभारं । ४—ते ४ शैरी मैं अद्विम कुमारी । ५—डर ते महि मा । ६—तै मारी मारी । ७—एकत्र । ८—भम्ने मान । —मोर ठाँउ पुर रहि म सहाइँ । ९—फोर बहुत दे मिना चल मह वह के आवास । ११—साँदा पर पर्यंग माँ । टिप्पणी— (१) धमारी—दवा पोकडी छेडछार हुड़दंग । मरम—हृदयकी बात । (३) बेसादरी—बेंगाइनि ।

३३१ ४४५ (रीड्स ३२ अ) ऐजन (वही) पिरम समुँद अति अवगाहा। जो अग बूड़ि न पावइ थाहा ॥१ चहुँ दिसि कैसैं थाह न पावइ। मानुस बूड़ै तीर न आवइ ॥२ मोरे रोयैँ साबर भये। धरती पूर सरग लहि गये ॥३ फूटि आँख जनु आँसू भये। पँथ सो छोड़ पानि न रहै ॥४ यह गुन हाँ तौरैँ न देखेउँ। रात चाँद दिन सुरुज देखेउँ ॥५ जान देइ पर आपुन, मोरहि सास मुहि माइ ।६ पिय सँताप सुन पैठउँ, काल पास तुम आइ ॥७ ४४६ (रीड्स ३२ अ। बम्बई ५९) बाज रफ्तने मैना दर बेगाँ बा सहेलियान खुद (मैनाका सहेलियोंके साथ बंगासे वापस जाना) उदये भानु औ रात' बिहानी। महरी देखहा जाइ' तुलानी ॥१ मैनाँ देखत मंदिर भुलाइ। बहुरि चाँद वह बात चलाइ ॥२ कहु कँह मैनाँ सुरुज' अस करा। सो लै चाँदहि पाटन घरा ॥३ मई तज सुरुज चाँद लै भागा। परहाँ माँस' आइ अब लागा ॥४ जो कहुँ चाँद हौँ पाऊँ। फार कें मुँह नगर फिराऊँ ॥५ जस पैँ प्रीत सँझाइ, तम जग करै न कोइ ।६ जइस दाह महि दीन्हों , यइस दाह यहि होइ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—बज शवे सुवह शद रोशन बरामदने ब बेरलीने मैना ब बरलीन्मे चाँदा (सुवह होने पर मैनाका आना और चाँदका बुझाना) १—भानु रात बिहानी। २—भार। ३—कहु में सुरुज चाँद।

३१९ ४—चाँदै हरखी। ५—चाँद। ६—को पै देखत चाँद को रामेरउँ । ७—कारमुरी के खरग डिखावेउँ। ८—दाइ मैं। ९—दीन्हौं। ४४७ (रीडिंग्स ३२१ ; बम्बई ५०) गुफ़्तगूए खुद नमूदन् चाँदा ब पैहानत करद्ने मैना (चाँदका अपनी बड़ाई और मैनाका अपमान करना) चाँद आपुन कियत बड़ाई। मैनहि पूछत रही लजाई ॥१ भोल पतोल भइ सुठाई¹। कहसि न चाँद कहाँ सँ² आई ॥२ परकी चाँदें झझ उषावा³। भा झझ अस दाउद गावा ॥३ तब उठि लारक आपु जनावा। मैनाँ रह[स⁴] लारेवो पावा⁵ ॥४ सोरफ चाँद⁶ तस कँ हरखी। जूसन फारन फिर न फरकी ॥५ घरि सात पाँच कइँ भोरुसि, मैना⁷ जाइ सँभारि ।६ आज रात मैनैं⁸ घर बामौं⁹, दाहिक हूँ¹⁰ पारि ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—गुफ़्तगू व एल्फिदम सुद शुफ्तन चाँदा व शनाख्तने मिन्द व बज़ बर्दन चाँदा (चाँदका अपनी प्रशंसा करना; मैनाका उसे पहचान लेना और झगड़ना) । इस प्रतिमे पंक्ति ४ नहीं है। उसके स्थानपर पंक्ति ७ है और पंक्ति ५ के स्थानपर एक नयी पंक्ति है। —कवत वकत भइ सुन्दाई। १—हुत । ३—उगावा । ४—भई। यह पंक्ति नहीं है। ६—चाँदहि। ७—हरषी। ८—चाँदा जूसे न फिरि न फहकी । —मैनाँद । ९ —मै बहि। ११—उठव । १२ राउदेवै करा सातवीं पंक्ति के स्थानपर नयी पंक्ति इस प्रकार है—भवहु तमुझ महि रही जगाइ। आपुन घर कँ कीन्ह बड़ाई ॥